ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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09.सीताहरण

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सीताहरण

(६०)

पुष्पक विमान में बैठ इधर, रावण भी चले युद्ध करने।
जैसे ही नीचे दृष्टि पड़ी, सीता का रूप लगा ठगने।।
वह भूल गये सब क्रोध, शोक, सीता पर वह आसक्त हुए।

अवलोकिनी विद्या के द्वारा, तत्क्षण ही सब कुछ जान गए।।
(६१)

कर दिया उन्होंने सिंहनाद, हे राम!राम! की ध्वनि हुई।
व्याकुल हो उठे राम पल में, सीता भी डर कर लिपट गयी।।
कह कर जटायु से सीता की, रक्षा करना मैं जाता हूँ।

हे प्रिये! यहांr पर तुम ठहरो, मैं अभी लौटकर आता हूँ।।
(६२)

श्री राम चले थे जैसे ही अपशकुन हुए तब कई तरह ।
पर भ्रातप्रेम आसक्त प्रभू नहिं सोच सके कुछ और वजह।।
पक्षी रो रोकर रोक रहे फिर भी उनके पग रुके नहीं ।

होनी को कोई ना टाल सके यह सूक्ति कही है इसीलिए।।
(६३)

अपनी युक्ति को सफल देख, रावण उतरा झट से नीचे।
सीता को उठा भुजाओं में, चल पड़ा तभी देखा पीछे।।
गुस्से में भरा जटायू था, अपनी शक्ती भर बार किया।

लेकिन रावण ने कर प्रहार से, उसको नीचे गिरा दिया।।
(६४)

अपना अपहरण हुआ जान सीता ने करुण विलाप किया।
रावण भी उसका रुदन देख थोड़ा विरक्ति को प्राप्त हुआ ।।
पर सोचा शायद सुख संपत्ति से यह वश में हो जायेगी।

बलपूर्वक ना उपभोग करूँ , जो स्त्री मुझे न चाहेगी।
(६५)

यह नियम याद करके रावण ने, सोचा वचन निभाएँगे।
निज निकट बिठाया गोदी से घर चलकर इसे मनाएँगे।।
जब अनुनय विनय और भय से ,नहिं वश में उसको कर पाये।

तब कड़ी सुरक्षा के भीतर, उसको उपवन पहुँचा आये।।
(६६)

निज स्वार्थप्रेम के वश होकर, इंसान सोच ना पाता है।
बस हाल हुआ ये रावण का, वह बात न कोई मानता है।।
जब आता है विनाशकाल, विपरीत बुद्धि हो जाती है।

इसलिए यहीं से रावण पर, देखें क्या विपदा आती है।।
(६७)

अब इधर युद्ध के प्रांगण में, रघुवर प्रवेश जब करते हैं।
लक्ष्मण को सही रूप में लख, कुछ—कुछ आशंकित होते हैं।।
वह सिंहनाद वे आवाजें, यह सब कुछ किसकी माया है।

शायद कुछ अघटित हुआ है अथवा, आगे कुछ होने वाला है।।
(६८)

लक्ष्मण को आश्वासन देकर, श्रीराम लौट कर आते हैं ।
सीता को नहीं देखकर वह, मूच्र्छित होकर गिर जाते हैं।।
छुप गयी कहाँ हो हे सीते! इस तरह मुझे ना तड़पाओ।

यह हँसी—खेल का वक्त नहीं, हे प्रिये! सामने आ जावो।।
(६९)

तब ही कुछ दूरी पर देखा, घायल जटायु था पड़ा हुआ।
संन्यास ग्रहण करवा करके, नवकार मंत्र था सुना दिया।।
हे! सीता तुम भी छोड़ गयी, पक्षी जटायु भी छोड़ गया।

यह कहकर राम बहुत रोये, जंगल का कण—कण भी रोया।।
(७०)

श्री रामचंद्र की यह हालत, लक्ष्मण ने आकर जब देखी ।
घबड़ाकर बोले भ्रात उठो, हे नाथ! हुई क्या अनहोनी।।
तब रामचंद्र ने गले लगा, बोले भ्राता कुछ ज्ञात नहीं ।

अपहरण हुआ है उसका या फिर, सिंह—व्याघ्र का ग्रास बनी।।
(७१)

होकर विषादयुत लक्ष्मण भी, बोले भाई कुछ धैर्य धरो।
भाभी सीता हों जहाँ कहीं, खोजूंगा मैं विश्वास करो।।
इस तरह मधुर संवादों से, भाई का दुख थे बाँट रहे।

और तभी विराधित विद्याधर ने, आकर प्रभु के चरण हुए।।
(७२)

लक्ष्मण ने परिचय करवाया, ये आज बने हैं मित्र मेरे।
सीता का पता लगाने में, इनसे शायद कुछ मदद मिले ।।
यह सुनकर रामचंद्र बोले, यदि कार्य आप कुछ कर सकते ।

तो मेरी सीता को ला दो, जब तक हम प्राण नहीं तजते।।
(७३)

भेजा तब दशों दिशाओं में, सब खोज—खोज कर हार गये ।
ना पता लगा जब सीता का, यह देख राम अति दुखी हुए।।
श्रीराम—लखन को समझाकर, ले गये विराधित गुप्त जगह।

इस समय क्षुभित होंगे रावण खरदूषण की है मृत्यु वजह।।
(७४)

इसलिए सुरक्षित रहकर हम, सीता का पता लगायेंगे।
वह गुप्तभवन खरदूषण का, जहाँ शत्रु नहीं घुस पायेंगे।।
जाकर जिनमंदिर में रघुवर को, कुछ क्षण की थी शान्ति मिली।

लेकिन वियोग दुख सीता का, कर जाता उनको बहुत दुखी।।
(७५)

इकदिन राजा सुग्रीव चले, श्री रामचंद्र के दर्शन को।
उनकी जब व्यथा सुनी प्रभु ने, तब गले लगाया था उनको।।
मेरे जैसा ही रूप बनाकर, एक मायावी आया है।

कहता सुग्रीव स्वयं को वह, सबके मन संशय छाया है।।
(७६)

इसका निराकरण हनुमान भी, नहीं कर सके हे रघुवर!।
इसलिए शरण में आया हूँ ,अब देखे स्वयं आप चलकर ।।
सोचा तब रामचंद्र ने कि, मुझसे भी अधिक दु:खी ये है।

मेरी भार्या का पता नहीं, पर इसका शत्रु सामने है।।
(७७)

करके विमर्श लक्ष्मण से वे, बोले राजन्! मत शोक करो।
भार्या और राज्य दिला दूँगा, पर बाद में तुम एक काम करो।।
तुम मेरी प्राणाधिका प्रिया, सीता का पता लगा देना।

बोला सुग्रीव वचन देकर ,यह तो होगा सौभाग्य घना।।
(७८)

बस सात दिनों के अंदर ही, सीता का पता लगाऊँगा।
वरना सबके सम्मुख अग्नि में, मैं प्रवेश कर जाऊँगा।।
यह शपथ ग्रहण करके सुग्रीव, श्रीरामचंद्र के साथ चले।

दूजा सुग्रीव देखकर प्रभु, इक क्षण के लिए संशय में पड़े।।
(७९)

हो गया तभी था युद्ध शुरू, दोनों को रघुवर देख रहे।
पर पड़ा सामने मायावी, तब रामचंद्र न समझ सके।।
इसलिए पराजित हो उससे, सुग्रीव बहुत ही दुखी हुआ।

हे नाथ! सामने शत्रू को, आने पर भी क्यों छोड़ दिया।।
(८०)

अगले दिन राम चले रण में, बोले सुग्रीव यहीं रहना।
वरना धोखे में कहीं तुम्हें, पड़ जाये युद्ध में है मरना।।
आ गया देखकर रामचन्द्र को, असलरूप में मायावी।

और तभी राम ने मार दिया, दिलवाया राज्य सुतारा भी।
(८१)

सब कुछ पाकर सुग्रीव हर्ष से, हो विभोर फिर पूजा की।
नंतर अपनी तेरह पुत्री, श्री रामचंद्र को अर्पण की।।
पर रामचंद्र का दुखी हृदय, कोई कन्या ना जीत सकी।

वे सीता का ही ध्यान करें, नयनों में वो ही बसी रही।।
(८२)

इक दिन लक्ष्मण ने भाई के आँखो में आंसू देख लिए।
बस फिर क्या थे चल दिये, गरजते रे पापी! क्या भूल गये ?।
मेरे भ्राता दुख में निमग्न, तू महलों में सुख भोग रहा!।

मैं अभी तुझे पहुंचाता हूँ ,जहाँ तेरा वह सुग्रीव गया।।
(८३)

फिर किसी तरह से लक्ष्मण को, कर शांत खोजना शुरु किया।
मिल गया एक विद्याधर जिसने, सीता का यह पता दिया।।
हे देव! उन्हें रावण लेकर, जा रहा एक दिन तब मैंनें।

समझाया किया सामना भी, तब विद्याएँ हर ली उसने।।
(८४)

उसको वश में करना मुश्किल, वह बहुत प्रतापी राजा है।
यह सुनकर लक्ष्मण थे बोले, उसका अंतिम क्षण आया है।।
सबने मिल कहा सुनो राघव! जो कोटि शिला उठा लेगा।

वह महा प्रतापी शूरवीर, रावण का वधकर्ता होगा।।