ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

Whatsappicon.png
Whatsappicon.png
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें |


पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा देश के समस्त जैन विद्वानों के लिए विशेष सैद्धांतिक विषयों पर ऋषभगिरि-मांगीतुंगी से विद्वत प्रशिक्षण शिविर का पारस चैनल पर ४ दिसंबर, रविवार से ११ दिसंबर २०१६, रविवार तक प्रातः ६ बजे से ७ बजे तक सीधा प्रसारण होगा | घर बैठे देखकर अवश्य ज्ञान लाभ लें |

09. अष्टम चूलिका अधिकार ( सम्यक्त्वोत्पत्ति चूलिका )

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


विषय सूची

[सम्पादन]
अष्टम चूलिका अधिकार(सम्यक्त्वोत्पत्ति चूलिका)

7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
7021-illu.png
सम्यक्त्वोत्पत्तिचूलिका

अष्टम चूलिकाधिकार:
मंगलाचरणं
अनुष्टुप्छंद-पुरुदेव! नमस्तुभ्यं, युगादिपुरुषाय ते।
इक्ष्वाकुवंशसूर्याय, वृषभाय नमो नम:।।१।।
येषां आदिब्रह्मणां श्रीऋषभदेवभगवतां जन्मजयंतीमहामहोत्सव: संपूर्णभारतवर्षे राष्ट्रीयस्तरेण क्रियते इति संकल्पमकार्षम्। तेषामेव भगवतां युगादितीर्थकराणां ‘नवफुट’ इति उत्तुंगपद्मासनप्रतिमा अत्र तारंगानामधेये सिद्धक्षेत्रे स्थापयिष्यते। तेषां कृते अत्र भूमिपूजनं कृत्वा लघुवैलाशपर्वतनिर्माणार्थं रक्षायंत्रं स्थापितं, तेभ्यं श्रीऋषभदेवेभ्य: अस्माकमनन्तशो नमोऽस्तु नमोऽस्तु नमोऽस्तु।
अथ षट्खण्डागमस्य प्रथमखण्डे षष्ठग्रन्थे अष्टभि:स्थलै: षोडशसूत्रै: सम्यक्त्वोत्पत्तिचूलिकानाम अष्टमोऽधिकार: प्रारभ्यते। तत्र तावत् प्रथमस्थले कीदृक्कालस्थितौ सत्यां प्रथमसम्यक्त्वं न लभते, लभते वा इति प्रश्नोत्तररूपेण ‘‘एवदिकाल’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तत: परं द्वितीयस्थले स: भव्यजीव: कीट्टशो भवेत् इति प्रतिपादनत्वेन ‘‘सो पुण्य पंचिंदिओ’’ इत्यादिसूत्रद्वयं। तत्पश्चात् तृतीयस्थले प्रथमसम्यक्त्वमुत्पादयन् मिथ्यात्वस्य भागत्रयं करोति इति सूचनपरत्वेन ‘‘पढमसम्मत्तं’’ इत्यादिना सूत्रद्वयं। पुनश्च चतुर्थस्थले प्रथमसम्यक्त्वमुत्पादयन् कदा कस्यां गत्यां इत्यादिकथनपरत्वेन ‘‘दंसण’’ इत्यादि सूत्रत्रयं। तदनंतरं पंचमस्थले क्षायिकसम्यक्त्वमुत्पादयन् भव्य: क्व उत्पादयति इत्यादिना विस्तरकथनत्वेन ‘‘दंसणमोहणीयं’’ इत्यादिना सूत्रत्रयं। तदनु षष्ठस्थले सम्यक्चारित्रं प्राप्नुवन् कीदृशीं स्थितिं करोति इति समाधानरूपेण ‘‘चारित्तं’’ इत्यादिसूत्रमेकं। तत्पश्चात् सप्तमस्थले संपूर्णं चारित्रं प्राप्नुवन् सन् घातिकर्मणां स्थितिमन्तर्मुहूर्तं करोति इति प्रतिपादनपरत्वेन ‘‘संपुण्णं’’ इत्यादि सूत्रमेकं। पुनरपि अष्टमस्थले अघातिकर्मणां स्थितिं कीदृशीं करोतीति निरूपणत्वेन ‘‘वेदणीयं’’ इत्यादिसूत्रमेकं इति समुदायपातनिका सूचिता भवति।
अधुना सम्यक्त्वोत्पत्तिकालनिषेधार्थं सूत्रमवतरति-एवदिकालट्ठिदिएहि कम्मेहि सम्मत्तं ण लहदि।।१।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इदं देशामर्षकसूत्रं, तेन एतेषु कर्मषु जघन्यस्थितिबंधे उत्कृष्टस्थितिबंधजघन्योत्कृष्ट-स्थितिसत्त्वकर्मसु जघन्योत्कृष्टानुभागसत्त्वकर्मसु जघन्योत्कृष्टप्रदेशसत्त्वकर्मसु सम्यक्त्वं न प्रतिपद्यते इति गृहीतव्यम्।
अधुना जीवस्थानचूलिकाया: प्रथमसूत्रे ‘लभदि’ इतिपदस्य व्याख्याकरणार्थं प्रतिज्ञासूत्रमवतरति-लभदि त्ति विभासा।।२।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यान् प्रकृति-स्थिति-अनुभाग-प्रदेशान् बध्नन् सन् यै: प्रकृति-स्थिति-अनुभाग-प्रदेशै: सत्त्वस्वरूपेण भवद्भि: उदीर्यमाणै: सम्यक्त्वं प्रतिपद्यते तेषां प्ररूपणा क्रियते इति प्रतिज्ञासूत्रमिदमिति।
संप्रति प्रथमसम्यक्त्वाभिमुखो जीव: कीदृक्स्थितिं करोतीति प्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-एदेसिं चेव सव्वकम्माणं जावे अंतो कोडाकोडिट्ठिदिं बंधदि तावे पढमसम्मत्तं लभदि।।३।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एतेषां चैव सर्व कर्मणां यदा अंत:कोटाकोटिस्थितिं बध्नाति तदा अयं जीव: प्रथमोपशमसम्यक्त्वं लभ्यते। प्रथमसम्यक्त्वस्य प्राप्तयोग्यो जीव: उपचारेण ‘प्रथमसम्यक्त्वं लभ्यते’ इति प्ररूपित:। अर्थत: पुन: न लभ्यतेऽत्र, त्रिकरणचरमसमये सम्यक्त्वोत्पत्ते:।
एतेन सूत्रेण क्षयोपशमलब्धि: विशुद्धिलब्धि: देशनालब्धि: प्रायोग्यलब्धि: इति चतस्रो लब्धय: प्ररूप्यन्ते।
पूर्वसंचितकर्ममलपटलस्य अनुभागस्पर्धकानि यदा विशुद्ध्या प्रतिसमयमनन्तगुणहीनानि भूत्वा उदीर्यन्ते तदा क्षयोपशमलब्धिर्भवति।
प्रतिसमयमनन्तगुणहीनक्रमेण उदीरितानुभागस्पर्धकजनितजीवपरिणाम: सातादिशुभकर्मबंधनिमित्त: असातादि-अशुभकर्मबंधविरुद्ध: विशुद्धि: कथ्यते। तस्या: उपलब्धिर्विशुद्धिलब्धिर्नाम।
षड्द्रव्यनवपदार्थोपदेशो देशना नाम। तया देशनया परिणताचार्यादीनामुपलंभ:, देशितार्थस्य ग्रहण धारणविचारणशक्त्या: समागमश्च देशनालब्धिर्नाम।
सर्वकर्मणामुत्कृष्टस्थितिमुत्कृष्टानुभागं च घातयित्वा अन्त:कोटाकोटिस्थितौ द्वि:स्थानीयानुभागे च अवस्थानकरणं प्रायोग्यलब्धिर्नाम। किंच एतेषु सत्सु करणयोग्यभावोपलंभात्।
सूत्रे काललब्धिश्चैव प्ररूपिता, तासु एतासां लब्धीनां कथं संभव: ?
नैतद् वक्तव्यं, प्रतिसमयमनन्तगुणहीनानुभागोदीरणाया: अनन्तगुणक्रमेण वद्र्धमानविशुद्धे: आचार्योेपदेशोपलंभस्य च तत्रैव संभवात्।
एता: चतस्रोऽपि लब्धय: भव्याभव्यमिथ्यादृष्ट्यो: साधारणा:, द्वयोरपि एतासां संभवात्।
उक्तं च- खयउवसमिय-विसोही देसणपाओग्ग-करणलद्धी य।
चत्तारि वि सामण्णा करणं पुण होइ सम्मत्ते।।
एवमभव्ययोग्यपरिणामै: स्थिति-अनुभागयो: काण्डकघातं बहुबारं कृत्वा गुरुपदेशबलेन तेन विना वा अभव्यजीवयोग्यविशुद्धी: व्यतीत्य भव्यजीवयोग्यविशुद्धौ अध:प्रवृत्तकरणसंज्ञितायां भव्यो जीवो परिणमति, तस्य जीवस्य लक्षणं अग्रिमसूत्रे कथयन्ति सूरिवर्या:।
एवं प्रथमस्थले सम्यक्त्वोत्पत्तिकथनप्रतिज्ञारूपेण सूत्रत्रयं गतम्।

[सम्पादन]
सम्यक्त्वोत्पत्ति चूलिका (आठवाँ चूलिका अधिकार)

मंगलाचरण

हे पुरुदेव! आपको नमस्कार हो, युगादिपुरुष, इक्ष्वाकु वंश के सूर्य, श्री ऋषभदेव भगवान आपके लिये बारम्बार नमस्कार हो, नमस्कार हो। जिन आदिब्रह्मा श्री ऋषभदेव भगवान का जन्मजयंती महोत्सव सम्पूर्ण भारतवर्ष में राष्ट्रीय स्तर पर मनाया जावे ऐसा मैंने संकल्प किया, उन्हीं भगवान युग के आदि तीर्थंकर ऋषभदेव की ‘नव फुट’ की उत्तुंग पद्मासन प्रतिमा यहाँ ‘तारंगा’ नाम के सिद्धक्षेत्र पर स्थापित की जायेंगी। उसके लिये यहाँ भूमिपूजन करके लघु कैलाश पर्वत निर्माण हेतु रक्षायंत्र मैंने स्थापित किया है। उन श्री ऋषभदेव को हमारा अनंत बार नमस्कार हो, नमस्कार हो, नमस्कार हो।

इस षट्खण्डागम ग्रन्थ के प्रथम खण्ड में, छठे ग्रन्थ में आठ स्थलों द्वारा, सोलह सूत्रों से सम्यक्त्वोत्पत्ति चूलिका नाम का आठवाँ अधिकार प्रारम्भ किया जा रहा है। उसमें प्रथम स्थल में कैसी काल की स्थिति के होने पर प्रथम सम्यक्त्व नहीं प्राप्त होता है या प्राप्त होता है इस प्रकार प्रश्नोत्तर के रूप में ‘एवदिकाल’ इत्यादि तीन सूत्र कहेंगे। पुन: आगे द्वितीय स्थल में वह भव्य जीव वैâसा हो, इत्यादि प्रतिपादन रूप से ‘सो पुण पंचिंदिओ’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। इसके बाद तृतीय स्थल में प्रथम सम्यक्त्व को उत्पन्न करते हुये मिथ्यात्व के तीन भाग करता है, इसको सूचित करते हुए ‘पढमसम्मत्तं’ इत्यादि दो सूत्र हैं। पुन: चौथे स्थल में प्रथम सम्यक्त्व को उत्पन्न करते हुये कब किस गति में इत्यादि को कहते हुए ‘दंसण’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। पुन: पाँचवें स्थल में क्षायिक सम्यक्त्व को उत्पन्न करते हुए ‘भव्य जीव कहाँ उत्पन्न करता है’ इत्यादि रूप से विस्तृत कथन करते हुये ‘दंसणमोहणीयं’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। इसके बाद छठे स्थल में सम्यक्चारित्र को प्राप्त करते हुये कैसी स्थिति करता है, इसके समाधान रूप में ‘चारित्तं’ इत्यादि एक सूत्र है। इसके बाद सातवें स्थल में सम्पूर्ण चारित्र को प्राप्त करते हुये घातिया कर्मों की स्थिति अन्तर्मुहूर्त करता है ऐसा प्रतिपादन करते हुए ‘संपुण्णं’ इत्यादि एक सूत्र है। अनन्तर आठवें स्थल में अघातिया कर्मों की कैसी स्थिति करता है ऐसा निरूपण करते हुए ‘वेदणीयं’ इत्यादि रूप से एक सूत्र कहेंगे। इस प्रकार से यह समुदायपातनिका सूचित की गई है।

[सम्पादन]
अब जो सम्यक्त्व की उत्पत्ति का काल नहीं है, उसको बतलाने के लिये सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

इतने काल प्रमाण स्थिति वाले कर्मों के द्वारा जीव सम्यक्त्व को नहीं प्राप्त करता है।।१।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-यह देशामर्शक सूत्र है, इसलिये इन (पूर्व दो चूलिकाओं में उक्त) कर्मों के जघन्य स्थितिबंध होने पर, उत्कृष्ट स्थितिबंध होने पर, जघन्य और उत्कृष्ट स्थिति सत्कर्म अर्थात् स्थितिसत्त्व होने पर, जघन्य और उत्कृष्ट अनुभागसत्त्व होने पर तथा जघन्य और उत्कृष्ट प्रदेशसत्त्व होने पर जीव सम्यक्त्व को नहीं प्राप्त करता है, यह अर्थ ग्रहण करना चाहिये।

[सम्पादन]
अब जीवस्थान की चूलिका के प्रथम सूत्र में ‘लभदि’ जो पद है, उसकी व्याख्या करने के लिये प्रतिज्ञा सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

प्रथम चूलिका का प्रथम सूत्र-पठित ‘लभति’ यह जो पद है, उसकी व्याख्या की जाती है।।२।।

'सिद्धान्तिंचतामणिटीका-जिन प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेशों को बाँधता हुआ, जिन प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेशों के द्वारा सत्त्वस्वरूप होते हुए और उदीरणा को प्राप्त होते हुए यह जीव सम्यक्त्व को प्राप्त करता है, उनकी प्ररूपणा की जाती है, इस प्रकार यह प्रतिज्ञासूत्र है।

[सम्पादन]
अब प्रथम सम्यक्त्व के अभिमुख हुआ जीव कैसी स्थिति को करता है, ऐसा प्रतिपादन करने के लिये सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

इन ही सर्व कर्मों की जब अन्त:कोड़ाकोड़ी स्थिति को बाँधता है, तब यह जीव प्रथमोपशमसम्यक्त्व को प्राप्त करता है।।३।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-इन सभी कर्मों की जब यह जीव अन्त:कोटाकोटी प्रमाण स्थिति को बाँधता है तब प्रथम सम्यक्त्व को प्राप्त करता है। प्रथमोपशमसम्यक्त्व के प्राप्त करने योग्य जीव प्रथमोपशमसम्यक्त्व को प्राप्त करता है, यह बात उपचार से प्ररूपण की गई है परन्तु यथार्थ से यहाँ पर अर्थात् उक्त प्रकार की स्थिति होने पर, नहीं प्राप्त करता है, क्योंकि त्रिकरण अर्थात् अध:करण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण के अन्तिम समय में सम्यक्त्व की उत्पत्ति होती है। इस सूत्र के द्वारा क्षयोपशमलब्धि, विशुद्धिलब्धि, देशनालब्धि और प्रायोग्यलब्धि, ये चारों लब्धियाँ प्ररूपण की गई हैं। पूर्व संचित कर्मों के मलरूप पटल के अनुभागस्पर्धक जिस समय विशुद्धि के द्वारा प्रतिसमय अनन्तगुणहीन होते हुए उदीरणा को प्राप्त किए जाते हैं, उस समय क्षयोपशमलब्धि होती है। प्रतिसमय अनन्तगुणित हीन क्रम से उदीरित अनुभागस्पर्धकों से उत्पन्न हुआ, साता आदि शुभ कर्मों के बंध का निमित्तभूत और असाता आदि अशुभ कर्मों के बंध का विरोधी जो जीव का परिणाम है, उसे विशुद्धि कहते हैं। उसकी प्राप्ति का नाम विशुद्धिलब्धि है। छह द्रव्यों और नौ पदार्थों के उपदेश का नाम देशना है। उस देशना से परिणत आचार्य आदि की उपलब्धि को और उपदिष्ट अर्थ के ग्रहण, धारण तथा विचारण की शक्ति के समागम को देशनालब्धि कहते हैं। सर्वकर्मों की उत्कृष्ट स्थिति और उत्कृष्ट अनुभाग को घात करके अन्त:कोड़ाकोड़ी स्थिति में और द्वि:स्थानीय अनुभाग में अवस्थान करने को प्रायोग्यलब्धि कहते हैं क्योंकि इन अवस्थाओं के होने पर करण अर्थात् पाँचवीं करणलब्धि के योग्य भाव पाये जाते हैं।

विशेषार्थ-यहाँ पर अनुभाग को घात करके द्विस्थानीय अनुभाग में अवस्थान कहा है उसका अभिप्राय यह है कि घातिया कर्मों की अनुभाग शक्ति लता, दारू, अस्थि और शैल के समान चार प्रकार की होती है। अघातिया कर्मों में दो विभाग हैं-पुण्यप्रकृतिरूप और पापप्रकृतिरूप। पुण्यरूप अघातिया कर्मों की अनुभागशक्ति गुड़, खाण्ड, शक्कर और अमृत के समान होती है और पापरूप अघातिया कर्मों की अनुभागशक्ति नीम, कांजीर, विष और हलाहल के समान हीनाधिकता लिए होती है (देखें गो.क. गाथा १८-१८४)। प्रथमोपशमसम्यक्त्व के अभिमुख जीव प्रायोग्यलब्धि के द्वारा घातिया कर्मों के अनुभाग को घटाकर लता और दारु इन दो स्थानों में तथा अघातिया कर्मों की पापरूप प्रकृतियों के अनुभाग को नीम और कांजीर, इन दो स्थानों में अवस्थित करता है। इसी को द्विस्थानीय अनुभाग में अवस्थान कहते हैं।

शंका-सूत्र में केवल एक काललब्धि ही प्ररूपण की गई है, उसमें इन शेष लब्धियों का होना कैसे संभव है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि प्रतिसमय अनन्तगुणहीन अनुभाग की उदीरणा का, अनन्तगुणितक्रम द्वारा वर्धमान विशुद्धि का और आचार्य के उपदेश की प्राप्ति का उसी एक काललब्धि में होना संभव है अर्थात् उक्त चारों लब्धियों की प्राप्ति काललब्धि के ही आधीन है अत: वे चारों लब्धियाँ काललब्धि में अन्तर्निहित हो जाती हैं।

ये प्रारम्भ की चारों ही लब्धियाँ भव्य और अभव्य मिथ्यादृष्टि जीवों के साधारण हैं क्योंकि दोनों ही प्रकार के जीवों में इन चारों लब्धियों का होना संभव है। कहा भी है-

क्षयोपशमलब्धि, विशुद्धिलब्धि, देशनालब्धि, प्रायोग्यलब्धि और करणलब्धि, ये पाँच लब्धियाँ होती हैं। इनमें से पहली चार तो सामान्य हैं अर्थात् भव्य और अभव्य, दोनों प्रकार के जीवों के होती हैं किन्तु करणलब्धि सम्यक्त्व होने के समय होती है।।

इस प्रकार अभव्य जीवों के योग्य परिणाम के होने पर स्थिति और अनुभागों के कांडकघात को बहु बार करके गुरुपदेश के बल से अथवा उसके बिना भी, अभव्य जीवों के योग्य विशुद्धियों को व्यतीत करके भव्य जीवों के योग्य अध:प्रवृत्तकरण संज्ञा वाली विशुद्धि में जो भव्य जीव परिणत होता है, उस जीव का लक्षण बतलाने के लिये आचार्यदेव उत्तरसूत्र कहते हैं।

इस प्रकार प्रथमस्थल में सम्यक्त्व की उत्पत्ति के कथन की प्रतिज्ञारूप से तीन सूत्र पूर्ण हुए।

[सम्पादन]
प्रथमोपशमसम्यक्त्वं प्राप्तुकाम: कीदृशो भवतीतिकथनाय सूत्रमवतरति-

सो पुण पंचिंदिओ सण्णी मिच्छाइट्ठी पज्जत्तओ सव्वविसुद्धो।।४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-य: कश्चिद् भव्य: स: सम्यक्त्वं प्रतिपद्यमान: एकेन्द्रिय: द्वीन्द्रिय: त्रीन्द्रिय: चतुरिन्द्रियो वा न भवति, तत्र सम्यक्त्वग्रहणपरिणामाभावात्। तत: पंचेन्द्रियश्चैव तत्रापि असंज्ञी न भवति, तेषु मनसा विना विशिष्टज्ञानानुत्पत्ते:। तत: स: संज्ञी चैव सासादनसम्यग्दृष्टि: सम्यग्मिथ्यादृष्टि: वेदकसम्यग्दृष्टि: वा प्रथमसम्यक्त्वं न प्रतिपद्यते, एतेषां तेन पर्यायेण परिणमनशत्तेरभावात्। उपशमश्रेणिं चटमानवेदकसम्यग्दृष्टिजीवा: उपशमसम्यक्त्वं प्रतिपद्यमाना: सन्ति, किन्तु न तस्य प्रथमसम्यक्त्वव्यपदेश:, किंच तस्य उपशमश्रेण्या: उपशमसम्यक्त्वस्योत्पत्ति: सम्यक्त्वादेव भवति। तत: तेन मिथ्यादृष्टिजीवेन चैव भवितव्यम्। सोऽपि पर्याप्तश्चैव, अपर्याप्ते प्रथमसम्यक्त्वोत्पत्तिविरोधात्।
स देवो वा नारको वा तिर्यङ् वा। स्त्रीवेद: पुरुषवेद: नपुंसकवेदो वा। मनोयोगी वचोयोगी काययोगी वा। क्रोधकषायी मानकषायी मायाकषायी लोभकषायी वा, किन्तु हायमानकषाय:। असंयत: मतिश्रुतसाकारोपयुक्त:। तत्र अनाकारोपयोगो नास्ति, तस्य बाह्यार्थे प्रवृत्तेरभावात्। षण्णां लेश्यानाम-न्यतरलेश्य:, किन्तु हायमानाशुभलेश्य: वध्र्यमानशुभलेश्य:। भव्य:। आहार:। ज्ञानावरणस्य पंचप्रकृतिसत्कर्मिक:। दर्शनावरणस्य नवप्रकृतिसत्कर्मिक:। वेदनीयस्य द्विप्रकृतिसत्कर्मिक:। मिथ्यात्वस्य सम्यक्त्व-सम्यग्मिथ्यात्वाभ्यां विना षड्विंशतिप्रकृतीनां सत्कर्मिक:, सम्यक्त्वेन विना मोहनीयस्य सप्तविंशतिसत्कर्मिक:, मोहनीयस्य अष्टाविंशतिसत्कर्मिक: वा। यदि बद्धायुष्क: आयुष: द्विविधसत्कर्मिक:। अथवा अबद्धायुष्क: आयुष: एकप्रकृतिसत्कर्मिक:।
चतुर्गति-पंचजाति-आहारशरीररहित चतु:शरीर-चतु:बंधन-चतु:संघात-षट्संस्थान-आहारांगोपांग-विरहितद्वि-अंगोपांग-षट्संहनन-वर्ण-गंध-रस-स्पर्श-चतु:आनुपूर्वि-अगुरुलघुक-उपघात-परघात-उच्छ्वास-आतप-उद्योत-द्विविहायोगति-त्रस-स्थावर-बादर-सूक्ष्म-प्रत्येक-साधारण-पर्याप्त-अपर्याप्त-स्थिरास्थिर-शुभाशुभ-सुभगदुर्भग-सुस्वर-दु:स्वर-आदेय-अनादेय-यश:कीर्ति-अयश:कीर्ति-निर्माणमिति नामकर्मण: द्वासप्ततिप्रकृतिसत्कर्मिक:। गोत्रस्य द्विप्रकृतिसत्कर्मिक:। अन्तरायस्य पंचप्रकृतिसत्कर्मिक:। आयु: कर्मरहितकर्मणां अन्त:कोटाकोटिस्थितिसत्कर्मिक:।
पंचज्ञानावरणीय-नवदर्शनावरणीय-असातावेदनीय-मिथ्यात्व-षोडशकषाय नवनोकषाय-सम्यक्त्व-सम्यग्मिथ्यात्व-नरकगति-तिर्यग्गति-एकेन्द्रिय-द्वीन्द्रिय-त्रीन्द्रिय-चतुरिन्द्रियजाति-पंचसंस्थान-पंचसंहनन-अप्रशस्तवर्णगंधरसस्पर्श-नरकगति-तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्वि-उपघात-अप्रशस्तविहायोगति-स्थावर-सूक्ष्म-अपर्याप्त-साधारणशरीर-अस्थिर-अशुभ-दुर्भग-दु:स्वर-अनादेय-अयश:कीर्ति-नीचगोत्र-पंचान्तरायाणां द्वि:स्थानीयानुभागसत्कर्मिक:, एतासां अप्रशस्तप्रकृतीनामनुभागस्य त्रिचतु:स्थानानां विशुद्ध्या घातसंभवात्।
सातावेदनीय-मनुष्यगति-देवगति-पंचेन्द्रियजाति-औदारिकवैक्रियिकतैजसकार्मणशरीर-चतु:बंधन-चतु:संघात-समचतुरस्रसंस्थान-औदारिकवैक्रियिक-शरीरांगोपांग-वङ्काऋषभवङ्कानाराचशरीरसंहनन-प्रशस्तवर्णगंधरसस्पर्श-मनुष्यगति-देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वि-अगुरुलघुक-परघात-उच्छ्वास-आतप-उद्योत-प्रशस्तविहायोगति-त्रस-बादर-पर्याप्त-प्रत्येकशरीर-स्थिर-शुभ-सुभग-सुस्वर-आदेय-यश:कीर्ति-निर्माण-उच्चगोत्राणां चतु:स्थानानुभागसत्त्वकर्मिक:। एतासां प्रशस्तप्रकृतीनां विशुद्धे: अनुभागस्य घाताभावात्, समयं प्रतिविशुद्धिवृद्धित: अनन्तगुणक्रमेण एतासामनुभागबंधस्य वृद्धिदर्शनाच्च।
मासां प्रकृतीनां सत्त्वकर्मास्ति, तासां अजघन्यानुत्कृष्टप्रदेशसत्कर्मिक:। त्रिषु महादण्डकेषु उक्तप्रकृतीनां बंधक:, अवशेषाणामबंधक:। त्रिषु महादण्डकेषु कथितप्रकृतीनामन्त:कोटाकोटिस्थितेर्बंधक:। त्रिमहादण्डकेषु कथिताप्रशस्तप्रकृतीनां द्वि:स्थानीयानुभागबंधक:। तत्रोक्त प्रशस्तप्रकृतीनां चतु:स्थानीयानुभागस्य बंधक:।
पंचज्ञानावरणीय-षड्दर्शनावरणीय-सातावेदनीय-द्वादशकषाय-पुरुषवेद-हास्य-रति-भय-जुगुप्सा-तिर्यग्गति-मनुष्यगति-पंचेन्द्रियजाति-औदारिक-तैजस-कार्मणशरीर-औदारिकशरीरांगोपांग-वर्ण-गंध-रस-स्पर्श-तिर्यग्गति-मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वि-अगुरुलघुक-उपघात-परघात-उच्छ्वास-उद्योत-त्रस-बादर-पर्याप्त-प्रत्येकशरीर-स्थिर-शुभ-यश:कीर्ति-निर्माण-उच्चगोत्र-पंचान्तरायाणां अनुत्कृष्टप्रदेशबंधक:।
निद्रानिद्रा-प्रचलाप्रचला-स्त्यानगृद्धि-मिथ्यात्व-अनन्तानुबंधिक्रोध-मान-माया-लोभ-देवगति-वैक्रियिकशरीर-समचतुरस्रशरीरसंस्थान-वैक्रियिकशरीरांगोपांग-वङ्कार्षभसंहनन-देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वि-प्रशस्तविहायोगति-सुभग-सुस्वर-आदेय-नीचगोत्राणां उत्कृष्टप्रदेशबंधको वा अनुत्कृष्टप्रदेशबंधको वा।
पंचानां ज्ञानावरणीयाणां वेदक:।चक्षुर्दर्शनावरणीयमचक्षुर्दर्शनावरणीयमवधिदर्शनावरणीयं केवलदर्शनावरणीयमिति चतुर्णां वेदक:, निद्राप्रचलयो: एकतरेण सह पंचानां वा वेदक:। साता सातयोरेकतरस्य वेदक:। मोहनीयस्य दशानां नवानां अष्टानां वा वेदक:।
कास्ता: दशप्रकृतय: ?
मिथ्यात्वं अनन्तानुबंधिचतुष्कानामेकतरं अप्रत्याख्यानावरणचतुष्कानामेकतरं प्रत्याख्यानावरणचतुष्का-नामेकतरं संज्वलनचतुष्कानां एकतरं त्रयाणां वेदानां एकतरं हास्यरति-अरतिशोकद्वियुगलयो: एकतरं भयजुगुप्से चेति दश प्रकृतय: सन्ति। इमा: एव भयजुगुप्सयोरन्यतरोदयेन विना नव, भयजुगुप्सयोरुदयेन विना अष्टौ भवन्ति।
चतुर्णामायुषामन्यतरस्य वेदक: भवति।
यदि नारक:, नरकगति-पंचेन्द्रियजाति-वैक्रियिक-तैजस-कार्मणशरीर-हुंडसंस्थान-वैक्रियिक-शरीरांगोपांग-वर्ण-गंध-रस-स्पर्श-अगुरुलघुक-उपघात-परघात-उच्छ्वास-अप्रशस्तविहायोगति-त्रस-बादर-पर्याप्त-प्रत्येकशरीर-स्थिरास्थिर-शुभाशुभ-दुर्भग-दु:स्वर-अनादेय-अयश:कीर्ति-निर्माण-नीचगोत्र-पंचान्तरायाणां वेदक: भवति।
यदि तिर्यङ्, तिर्यग्गति-पंचेन्द्रियजाति-औदारिक-तैजस-कार्मणशरीराणि-षट्संस्थानानां एकतरस्य औदारिकशरीरांगोपांगस्य षट्संहननानां एकतरस्य वर्णगंधरसस्पर्श-अगुरुलघुक-उपघात-परघात-उच्छ्वासानां, उद्योतस्य कदाचित् वेदक:, कदाचित् न वेदक:। द्विविहायोगत्योरेकतरस्य, त्रसबादरपर्याप्तप्रत्येकशरीराणां स्थिरास्थिर-शुभाशुभानां सुभग-दुर्भगयोरेकतरस्य सुस्वरदु:स्वरयोरेकतरस्य आदेयानादेययोरेकतरस्य यश:कीर्ति-अयश:कीत्र्यो: एकतरस्य निर्माणनीचगोत्र-पंचान्तरायाणां वेदको भवति।
यदि मनुष्य:, मनुष्यगति-पंचेन्द्रियजाति-औदारिक-तैजस-कार्मणशरीराणां, षट्संस्थानानामेकतरस्य औदारिकशरीरांगोपांगस्य षट्संहननानामेकतरस्य वर्णगंधरसस्पर्श-अगुरुलघुक-उपघात-परघात-उच्छ्वासानां द्वयो: विहायोगत्योरेकतरस्य त्रस-बादर-पर्याप्त-प्रत्येकशरीराणां स्थिरास्थिर-शुभाशुभानां सुभगदुर्भगयोरे-कतरस्य सुस्वरदु:स्वरयोरेकतरस्य आदेयानादेययोरेकतरस्य यश:कीर्ति-अयश:कीत्र्यो: एकतरस्य निर्माणनाम्न: नीचोच्चगोत्रयोरेकतरस्य पंचानामन्तरायाणां वेदको भवति।
यदि देवो, देवगति-पंचेन्द्रियजाति-वैक्रियिक-तैजस-कार्मणशरीर-समचतुरस्रशरीरसंस्थान-वैक्रियिकशरीरांगोपांग-वर्ण-गंध-रस-स्पर्श-अगुरुलघुक-उपघात-परघात-उच्छ्वास-प्रशस्तविहायोगति-त्रस-बादर-पर्याप्त-प्रत्येकशरीर-स्थिरास्थिर-शुभाशुभ-सुभग-सुस्वर-आदेय-यश:कीर्ति-निर्माण-उच्चगोत्र-पंचान्तरायाणां वेदको भवति, उक्तशेषसर्वप्रकृतीनामवेदकश्च भवति।
प्रथमोपशमसम्यक्त्वाभिमुखस्य जीवस्य यासां प्रकृतीनामुदयोऽस्ति तासां प्रकृतीनां एकस्या: स्थिते: स्थितिक्षयेण उदयं प्रविष्टाया: वेदक:, शेषाणां स्थितीनामवेदक:। यासां प्रकृतीनामप्रशस्तानामुदयोऽस्ति तासां द्वि:स्थानीयानुभागस्य वेदक:। प्रशस्तानां प्रकृतीनां उदयागतानां चतु:स्थानीयानुभागस्य वेदक:। उदयागतानां प्रकृतीनामजघन्यानुत्कृष्टप्रदेशयो: वेदक:। यासां प्रकृतीनां वेदक: तासां प्रकृतिस्थिति-अनुभागप्रदेशानामुदीरक: भवति।
उदयोदीरणयो: को विशेष: इति चेत् ?
उच्यते-ये कर्मस्कंधा: अपकर्षणोत्कर्षणादिप्रयोगेन विना स्थितिक्षयं प्राप्य आत्मात्मन: फलं ददति, तेषां कर्मस्कंधानामुदय इति संज्ञा। ये महत्सु स्थिति-अनुभागेषु अवस्थिता: कर्मस्कंधा: अपकर्षणं कृत्वा फलदायिन: क्रियन्ते, तेषामुदीरणा इति संज्ञा, अपक्वपाचनस्य उदीरणाव्यपदेशात्।
उदयोदीरणादिलक्षणानि सूत्रे अनुपदिष्टानि कथमत्र प्ररूप्यन्ते ?
नैष दोष:, एतस्य सूत्रस्य देशामर्षकत्वात्। येनेदं सूत्रं देशामर्षकं तेनोक्ताशेषलक्षणानि एतेनैवोक्तानि ज्ञातव्यानि।
अधुना ‘सर्वविशुद्ध:’ इति एतस्य पदस्यार्थ: उच्यते-तद्यथा अत्र प्रथमसम्यक्त्वं प्रतिपद्यमानस्य अध:प्रवृत्तकरण-अपूर्वकरण-अनिवृत्तिकरणभेदेन त्रिविधा विशुद्ध्यो भवन्ति।
तत्राध:प्रवृत्तकरणसंज्ञितविशुद्धीनां लक्षणं किंचिदुच्यते-तद्यथा-अन्तर्मुहूर्तमात्रसमयपंत्तिंâ ऊध्र्वाकारेण स्थापयित्वा तेषां समयानां प्रायोग्यपरिणामप्ररूपणं ज्ञातव्यं। प्रथमसमयप्रायोग्यपरिणामा: असंख्याता: लोका:, अध:प्रवृत्तकरणद्वितीयसमयप्रायोग्या: अपि परिणामा: असंख्याता: लोका:। एवं समयं प्रति अध:प्रवृत्तपरिणामानां प्रमाणप्ररूपणं कर्तव्यं यावत् अध:प्रवृत्तकरणकालस्य चरमसमय: इति। प्रथमसमयपरिणामेभ्य: द्वितीयसमयप्रायोग्यपरिणामा: विशेषाधिका:। विशेष: पुन: अन्तर्मुहूर्तप्रतिभागिक:। द्वितीयसमयपरिणामेभ्य: तृतीयसमयपरिणामा: विशेषाधिका:। एवं नेतव्यं यावत् अध:प्रवृत्तकरणकालस्य चरमसमय इति।
अस्मिन् करणे उपरिमपरिणामा: अधस्तनपरिणामेषु प्रवर्तन्ते-समानत्वं प्राप्नुवन्ति इति अस्य अध:प्रवृत्तकरणसंज्ञा।
कथं परिणामानां करणसंज्ञा ?
नैष दोष:, असिवास्यादीनामिव साधकतमभावविवक्षायां परिणामानां करणत्वोपलंभात्।
उक्तं च जैनेन्द्रव्याकरणे-
‘‘साधकतम: करणम्।।’’ इति सूत्रेण यस्तु साधकतम: तस्य करणसंज्ञा, किन्तु यस्तु साधक: साधनरूपेण वा तस्य कारणमिति संज्ञा अस्ति।
यद्येवं तर्हि मिथ्यादृष्ट्यादीनां स्थितिबंधादिपरिणामा: अपि अधस्तना उपरिमेषु उपरिमा: अधस्तनेषु अनुकुर्वन्ति, पुनस्तेषामपि अध:प्रवृत्तसंज्ञा किन्न कृता: ?
नैष दोष:, इष्टत्वात्।
कथमेतत् ज्ञायते ?
अध:प्रवृत्तनाम्न: अंतदीपकत्वात्।
अस्मिन् करणे प्रथमसमयजघन्या विशुद्धि: स्तोका:। द्वितीयसमये जघन्या विशुद्धि: अनन्तगुणा। तृतीयसमयजघन्या विशुद्धि: अनन्तगुणा। एवं नेतव्यं यावत् अन्तर्मुहूर्तमात्रनिर्वर्गणाकांडकचरम-समयजघन्यविशुद्धि: इति।
तस्मात्निवृत्त्य प्रथमसमयोत्कृष्टा विशुद्धि: ततोऽनन्तगुणा। पूर्वप्ररूपितजघन्यविशुद्धे: उपरिमसमय-जघन्यविशुद्धिरनन्तगुणा। तत: द्वितीयसमयोत्कृष्टा विशुद्धिरनन्तगुणा। तत: पूर्वोक्त-जघन्यविशुद्धित: उपरिमसमयजघन्यविशुद्धिरनन्तगुणा। इत्यादिना तावत् नेतव्यं यावत् अध:प्रवृत्तकरणस्य चरमसमय-जघन्यविशुद्धिरिति। तत: निर्वर्गणाकांडकमात्रं अपसार्य स्थिताधस्तनसमयस्य उत्कृष्टा विशुद्धि: अनन्तगुणा। तत: उपरिमसमये उत्कृष्टा विशुद्धि: अनन्तगुणा। एवमुत्कृष्टा: चैव विशुद्धय: निरंतरं अनन्तगुणक्रमेण नेतव्या: यावत् अध:प्रवृत्तकरणस्य चरमसमयोत्कृष्टविशुद्धिरिति। एवमध:प्रवृत्तकरणस्य लक्षणं किंचिन्मात्रं प्ररूपितं। विशेषतस्तु निर्वर्गणाकांडकादीनां लक्षणं धवलाटीकायां दृष्टव्यं।
संप्रति अपूर्वकरणस्य लक्षणं मनाक् प्ररूप्यते-अपूर्वकरणकाल: अंतर्मुहूर्तमात्रो भवति, इति अन्तर्मुहूर्तमात्रसमयानां प्रथमं रचना कर्तव्या। तत्र प्रथमसमये प्रायोग्यविशुद्धीनां प्रमाणमसंख्याता: लोका:। द्वितीयसमयप्रायोग्यविशुद्धीनां प्रमाणमसंख्याता: लोका:। एवं नेतव्यं यावत् चरमसमय इति।
प्रथमसमयविशुद्धिभ्य: द्वितीयसमयविशुद्धय: विशेषाधिका:। एवं नेतव्य: यावत् चरमसमय इति। विशेष: पुन: अंतर्मुहूर्तप्रतिभागित:।
अपूर्वकरणस्य प्रथमसमयजघन्यविशुद्धि: स्तोका:। तत्रैव उत्कृष्टाविशुद्धिरनन्तगुणा। द्वितीयसमयजघन्या विशुद्धि: अनन्तगुणा। तत्रैवोत्कृष्टा विशुद्धिरनन्तगुणा। एवं नेतव्यं यावदपूर्वकरणचरमसमय इति।
करणं परिणाम:, अपूर्वाणि च तानि करणानि च अपूर्वकरणानि, असमानपरिणामा इति यदुत्तं भवति। एवमपूर्वकरणस्य लक्षणं कथितम्।
इदानीमनिवृत्तिकरणस्य लक्षणमुच्यते-अनिवृत्तिकरणकाल: अन्तर्मुहूर्तमात्रो भवतीति तस्य कालस्य समया: रचयितव्या:। अत्र समयं प्रति एवैकश्चैव परिणामो भवति। एवैकस्मिन् समये जघन्योत्कृष्ट-परिणामभेदाभावात्।
अस्मिन् करणे प्रथमविशुद्धि: स्तोका। द्वितीयसमयविशुद्धिरनन्तगुणा। तत्त: तृतीयसमयविशुद्धिर-जघन्योत्कृष्टा अनन्तगुणा। एवं नेतव्यं यावत् अनिवृत्तिकरणकालस्य चरमसमय इति।
एकसमये वर्तमानानां जीवानां परिणामै: न विद्यते निवृत्ति: विभिन्नता वा यत्र ते अनिवृत्तिपरिणामा:। एवं अनिवृत्तिकरणस्य लक्षणं गतम्। एताभिर्विशुद्धिभि: परिणतो जीव: यानि यानि कार्याणि करोति तेषां कथनं अग्रे करिष्यन्ति।

[सम्पादन]
अब प्रथमोपशमसम्यक्त्व को प्राप्त करने का इच्छुक कैसा होता है ? इस बात को बतलाने के लिये सूत्र अवतार लेता है-

सूत्रार्थ-

वह प्रथमोपशमसम्यक्त्व को प्राप्त करने वाला जीव पंचेन्द्रिय, संज्ञी, मिथ्यादृष्टि, पर्याप्त और सर्व विशुद्ध होता है।।४।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-जो सम्यक्त्व को प्राप्त होने वाला जीव है, वह एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय अथवा चतुरिन्द्रिय नहीं होता है, क्योंकि उसमें सम्यक्त्व को ग्रहण करने योग्य परिणाम नहीं पाये जाते हैं। इसलिए वह पंचेन्द्रिय ही होता है। पंचेन्द्रियों में भी वह असंज्ञी नहीं होता है क्योंकि, असंज्ञी जीवों में मन के बिना विशिष्ट ज्ञान की उत्पत्ति नहीं होती है। इसलिए वह संज्ञी ही होता है। सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि अथवा वेदकसम्यग्दृष्टि जीव प्रथमोपशमसम्यक्त्व को नहीं प्राप्त होता है, क्योंकि, इन जीवों के उस प्रथमोपशमसम्यक्त्वरूप पर्याय के द्वारा परिणमन होने की शक्ति का अभाव है। उपशमश्रेणी पर चढ़ने वाले वेदकसम्यग्दृष्टि जीव उपशमसम्यक्त्व को प्राप्त करने वाले होते हैं, किन्तु उस सम्यक्त्व का ‘प्रथमोपशमसम्यक्त्व’ यह नाम नहीं है, क्योंकि, उस उपशमश्रेणी वाले उपशमसम्यक्त्व की उत्पत्ति सम्यक्त्व से होती है। इसलिए प्रथमोपशमसम्यक्त्व को प्राप्त करने वाला जीव मिथ्यादृष्टि ही होना चाहिये। वह भी पर्याप्तक ही होना चाहिये, क्योंकि, अपर्याप्त जीव में प्रथमोपशमसम्यक्त्व की उत्पत्ति होने का विरोध है।

प्रथमोपशमसम्यक्त्व के अभिमुख यह जीव देव अथवा नारकी अथवा तिर्यंच होना चाहिये। स्त्रीवेदी, पुरुषवेदी अथवा नपुंसकवेदी हो। मनोयोगी, वचनयोगी अथवा काययोगी हो अर्थात् तीनों योगों में से किसी एक योग में वर्तमान हो। क्रोधकषायी, मानकषायी, मायाकषायी अथवा लोभकषायी हो अर्थात् चारों कषायों में से किसी एक कषाय से उपयुक्त हो, किन्तु हीयमान कषाय वाला होना चाहिये। असंयत हो। मतिश्रुतज्ञानरूप साकारोपयोग से उपयुक्त हो, प्रथमोपशमसम्यक्त्व उत्पन्न होने के समय अनाकार उपयोग नहीं होता है, क्योंकि अनाकार उपयोग को बाह्य अर्थ में प्रवृत्ति का अभाव है। कृष्णादि छहों लेश्याओं में से किसी एक लेश्या वाला हो, किन्तु यदि अशुभ लेश्या हो तो हीयमान होना चाहिये और यदि शुभ लेश्या हो तो वर्धमान होना चाहिये। भव्य हो। आहारक हो। ज्ञानावरणीय कर्म की पाँच प्रकृतियों का सत्कर्मिक अर्थात् सत्ता वाला हो। दर्शनावरणीय कर्म की नौ प्रकृतियों की सत्ता वाला हो। वेदनीय कर्म की दो प्रकृतियों की सत्ता वाला हो। मोहनीय कर्म में मिथ्यात्व की सम्यक्त्वप्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृति, इन दो के बिना छब्बीस प्रकृतियों की सत्ता वाला हो अथवा सम्यक्त्वप्रकृति के बिना मोहनीय कर्म की सत्ताईस प्रकृतियों की सत्ता वाला हो अथवा मोहनीय कर्म की अट्ठाईस प्रकृतियों की सत्ता वाला है। यदि वह बद्धायुष्क हो तो आयुकर्म की भुज्यमान आयु और बध्यमान आयु, इन दो प्रकार के आयुकर्मों की सत्ता वाला हो अथवा यदि अबद्धायुष्क हो तो एक आुयकर्म की सत्ता वाला हो।

चारों गतियाँ, पाँचों जातियाँ, आहारकशरीर को छोड़कर चार शरीर, आहारकबंधन को छोड़कर चार बंधन, आहारकसंघात को छोड़कर चार संघात, छहों संस्थान, आहारकशरीर-अंगोपांग के बिना शेष दो शरीर अंगोपांग, छहों संहनन, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, चारों आनुपूर्वियाँ, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, आतप, उद्योत, दोनों विहायोगतियाँ, त्रय, स्थावर, बादर, सूक्ष्म, प्रत्येक शरीर, साधारण शरीर, पर्याप्त, अपर्याप्त, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, सुभग, दुर्भग, सुस्वर, दु:स्वर, आदेय, अनादेय, यश:कीर्ति, अयश:कीर्ति और निर्माण, नामकर्म की इन बहत्तर प्रकृतियों की सत्ता वाला हो। गोत्रकर्म की दोनों प्रकृतियों की सत्ता वाला हो, अन्तराय कर्म की पाँचों प्रकृतियों की सत्ता वाला हो। आयुकर्म को छोड़कर शेष सात कर्मों की अन्त:कोड़ाकोड़ी प्रमाण स्थितिसत्व वाला हो।

पाँचों ज्ञानावरणीय, नवों दर्शनावरणीय, असातावेदनीय, मिथ्यात्व, अनन्तानुबंधी आदि सोलह कषाय, हास्य आदि नवों नोकषाय, सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व, नरकगति, तिर्यग्गति, एकेन्द्रियजाति, द्वीन्द्रियजाति, त्रीन्द्रियजाति, चतुरिन्द्रियजाति, प्रथम संस्थान के सिवाय शेष पाँच संस्थान, प्रथम संहनन के सिवाय शेष पाँच संहनन, अप्रशस्त वर्ण, गन्ध, रस और स्पर्श, नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्वी, उपघात, अप्रशस्तविहायोगति, स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्त, साधारणशरीर, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, दु:स्वर, अनादेय, अयश:कीर्ति, नीचगोत्र और पाँचों अन्तराय, इन प्रकृतियों के द्विस्थानीय अर्थात् नीम और कांजीर, इन दो स्थानरूप अनुभाग की सत्ता वाला हो, क्योंकि इन अप्रशस्तप्रकृतियों के त्रिस्थानीय और चतु:स्थानीय अनुभाग का विशुद्धि के द्वारा घात संभव है।

सातावेदनीय, मनुष्यगति, देवगति, पंचेन्द्रियजाति, औदारिकशरीर, वैक्रियिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, इन चारों शरीरों के चार बन्धन नाम कर्म, चार संघात नामकर्म, समचतुरस्रसंस्थान, औदारिकशरीर-अंगोपांग, वैक्रियिकशरीर-अंगोपांग, वङ्काऋषभ वङ्कानाराच-शरीरसंहनन, प्रशस्तवर्ण, गन्ध, रस और स्पर्श, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, परघात, उच्छ्वास, आतप, उद्योत, प्रशस्तविहायोगति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येक शरीर, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, यश:कीर्ति, निर्माण और उच्चगोत्र, इन प्रकृतियों के चतु:स्थानीय अर्थात् गुड़, खांड, शक्कर और अमृत, इन चार स्थानरूप अनुभाग की सत्ता वाला हो, क्योंकि, इन प्रशस्त प्रकृतियों के अनुभाग का विशुद्धि से घात नहीं होता है, किन्तु प्रतिसमय विशुद्धि के बढ़ने से अनन्तगुणित क्रम द्वारा इन उपर्युक्त प्रकृतियों के अनुभागबंध की वृद्धि देखी जाती है।

जिन प्रकृतियों का उसके सत्त्व है, उनके अजघन्य-अनुत्कृष्ट प्रदेश की सत्ता वाला हो। तीनों महादण्डकों में कही गई प्रकृतियों का बांधने वाला हो, उनसे अवशिष्ट प्रकृतियों का बांधने वाला न हो। तीनों महादण्डकों में उक्त प्रकृतियों की अन्त:कोड़ाकोड़ी स्थिति का बांधने वाला हो, तीनों महादण्डकों में उक्त अप्रशस्त प्रकृतियों के द्विस्थानीय अनुभाग का बांधने वाला हो। उन्हीं तीनों महादण्डकों में उक्त प्रशस्त प्रकृतियों के चतु:स्थानीय अनुभाग का बाँधने वाला हो, पाँच ज्ञानावरणीय, स्त्यानगृद्धि आदि तीन प्रकृतियों को छोड़कर शेष छह दर्शनावरणीय, सातावेदनीय, अनन्तानुबंधी चतुष्क को छोड़कर शेष बारह कषाय, पुरुषवेद, हास्य, रति, भय, जुगुप्सा, तिर्यग्गति, मनुष्यगति, पंचेन्द्रियजाति, औदारिक शरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, औदारिक शरीर-अंगोपांग, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्वी, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, उद्योत, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येक शरीर, स्थिर, शुभ, यश:कीर्ति, निर्माण, उच्चगोत्र और पाँचों अन्तराय, इन प्रकृतियों का अनुत्कृष्ट प्रदेश बंधने वाला हो। निद्रानिद्रा, प्रचला-प्रचला, स्त्यानगृद्धि, मिथ्यात्व, अनन्तानुबंधी क्रोध, मान, माया, लोभ, देवगति, वैक्रियिकशरीर, समचतुरस्रशरीरसंस्थान, वैक्रियिकशरीर-अंगोपांग, वङ्काऋषभसंहनन, देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, प्रशस्तविहायोगति, सुभग, सुस्वर, आदेय और नीचगोत्र, इन प्रकृतियों का उकृष्ट प्रदेशबंध करने वाला हो अथवा अनुत्कृष्ट प्रदेशबंध करने वाला हो। पाँचों ज्ञानावरणीय प्रकृतियों का वेदक अर्थात् उदय वाला हो। चक्षुदर्शनावरणीय, अचक्षुदर्शनावरणीय, अवधिदर्शनावरणीय और केवलदर्शनावरणीय, इन चार दर्शनावरणीय प्रकृतियों का वेदक हो, अथवा निद्रा और प्रचला,इन दोनों में से किसी एक के साथ पाँच दर्शनावरणीय प्रकृतियों का वेदक हो। सातावेदनीय और असातावेदनीय, इन दोनों में से किसी एक का वेदक हो। मोहनीय कर्म की दश, नौ अथवा आठ प्रकृतियों का वेदक हो।

शंका-मोहनीय कर्म की वे दश प्रकृतियाँ कौन सी हैं ?

समाधान-मिथ्यात्व, अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया और लोभ इन चारों में से कोई एक, अप्रत्याख्यानावरणीय क्रोध, मान, माया और लोभ इन चारों में से कोई एक, प्रत्याख्यानावरणीय क्रोध, मान, माया और लोभ इन चारों में से कोई एक, संज्वलन क्रोध, मान, माया और लोभ इन चारों में से कोई एक, स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुंसकवेद इन तीनों वेदों में से कोई एक, हास्य-रति और अरति-शोक इन दोनों युगलों में से कोई एक युगल, भय और जुगुप्सा ये मोहनीय कर्म की वे दश प्रकृतियाँ हैं जिनका उक्त जीव वेदक होता है।

पूर्वोक्त दश प्रकृतियों में से भय और जुगुप्सा, इन दोनों में से किसी एक के उदय के बिना शेष नौ प्रकृतियाँ ऐसी जानना चाहिये जिनका उक्त जीव वेदक होता है।

पूर्वोक्त दस प्रकृतियों में से भय, जुगुप्सा, इन दोनों के उदय के बिना शेष आठ प्रकृतियाँ होती हैं, जिनका कि उदय प्रथमोपशमसम्यक्त्व के अभिमुख मिथ्यादृष्टि जीव के होता है।

चारों आयु कर्मों में से किसी एक का वेदक होता है।

यदि वह जीव नारकी है तो नरकगति, पंचेन्द्रियजाति, वैक्रियिक शरीर, तैजस शरीर, कार्मण शरीर, हुण्डकसंस्थान, वैक्रियिक शरीर-अंगोपांग, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, अप्रशस्तविहायोगति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येक शरीर, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, दुर्भग, दु:स्वर, अनादेय, अयश:कीर्ति, निर्माण, नीचगोत्र और पाँचों अन्तराय, इन प्रकृतियों का वेदक होता है।

यदि वह जीव तिर्यंच है, तो तिर्यग्गति, पंचेन्द्रियजाति, औदारिक शरीर, तैजस शरीर, कार्मण शरीर, छहों संस्थानों में से कोई एक, औदारिक शरीर-अंगोपांग, छहों संहननों में से कोई एक, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, इन प्रकृतियों का वेदक होता है। उद्योत प्रकृति का कदाचित् वेदक होता है कदाचित् नहीं। दोनों विहायोगतियों में से कोई एक, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येक शरीर, स्थिर-अस्थिर, शुभ-अशुभ, सुभग और दुर्भग इन दोनों में से कोई एक, सुस्वर और दु:स्वर इन दोनों में से कोई एक, आदेय और अनादेय इन दोनों में से कोई एक, यश:कीर्ति और अयश:कीर्ति इन दोनों में से कोई एक, निर्माण, नीचगोत्र और पाँचों अन्तराय, इन प्रकृतियों का वेदक होता है।

यदि वह जीव मनुष्य है तो मनुष्यगति, पंचेन्द्रियजाति, औदारिक शरीर, तैजस शरीर, कार्मण शरीर, छहों संस्थानों में से कोई एक, औदारिक शरीर-अंगोपांग, छहों संहननों में से कोई एक, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, दोनों विहायोगतियों में से कोई एक, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येक शरीर, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, सुभग, दुर्भग इन दोनों में से कोई एक, सुस्वर और दु:स्वर इन दोनों में से कोई एक, आदेय और अनादेय इन दोनों में से कोई एक, यश:कीर्ति और अयश:कीर्ति इन दोनों में से कोई एक, निर्माणनाम, नीचगोत्र और उच्चगोत्र इन दोनों में से कोई एक और पाँचों अन्तराय, इन प्रकृतियों का वेदक होता है।

यदि वह जीव देव है, तो देवगति, पंचेन्द्रियजाति, वैक्रियिक शरीर, तैजस शरीर, कार्मण शरीर, समचतुरस्रशरीरसंस्थान, वैक्रियिक शरीर-अंगोपांग, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, प्रशस्तविहायोगति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येक शरीर, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, यश:कीर्ति, निर्माण, उच्चगोत्र और पाँचों अन्तराय, इन प्रकृतियों का वेदक होता है। ऊपर कही गई प्रकृतियों के सिवाय शेष सर्व प्रकृतियों का अवेदक होता है।

प्रथमोपशमसम्यक्त्व के अभिमुख जीव के जिन प्रकृतियों का उदय होता है, उन प्रकृतियों की स्थिति के क्षय से उदय में प्रविष्ट एक स्थिति का वह वेदक होता है। शेष स्थितियों का अवेदक होता है। उक्त जीव के जिन अप्रशस्त प्रकृतियों का उदय होता है, उनके निंब और कांजीर रूप द्विस्थानीय अनुभाग का वेदक होता है। उदय में आई हुई प्रशस्त प्रकृतियों के चतु:स्थानीय अनुभाग का वेदक होता है। उदय में आई हुई प्रकृतियों के अजघन्य-अनुत्कृष्ट प्रदेशों का वेदक होता है। जिन प्रकृतियों का वेदक होता है उनके प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेशों की उदीरणा करता है।

शंका-उदय और उदीरणा में क्या भेद है ?

समाधान-कहते हैं-जो कर्म-स्कन्ध अपकर्षण, उत्कर्षण आदि प्रयोग के बिना स्थिति क्षय को प्राप्त होकर अपना-अपना फल देते हैं, उन कर्म-स्कन्धों की ‘उदय’ यह संज्ञा है। जो महान स्थिति और अनुभागों में अवस्थित कर्म-स्कन्ध अपकर्षण करके फल देने वाले किए जाते हैं, उन कर्म-स्कन्धों की ‘उदीरणा’ यह संज्ञा है, क्योंकि अपक्व कर्म-स्कन्ध के पाचन करने को उदीरणा कहा गया है।

शंका-सूत्र में अनुपदिष्ट उदय और उदीरणा आदि के लक्षण यहाँ क्यों निरूपण किये जा रहे हैं ?

समाधान-यह कोई दोष नहीं, क्योंकि यह सूत्र देशामर्शक है। चूँकि यह सूत्र देशामर्शक है, इसलिए कहे गये लक्षणों के सिवाय अन्य समस्त लक्षण इसके द्वारा कहे ही गये हैं।

अब सूत्रोक्त ‘सर्वविशुद्धि’ इस पद का अर्थ कहते हैं। वह इस प्रकार है-यहाँ पर प्रथमो-पशमसम्यक्त्व को प्राप्त होने वाले जीव के अध:प्रवृत्तकरण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण के भेद से तीन प्रकार की विशुद्धियाँ होती हैं। उनमें पहले अध:प्रवृत्तकरण संज्ञा वाली विशुद्धियों का लक्षण कहते हैं। वह इस प्रकार है-अन्तर्मुहूर्तप्रमाण समयों की पंक्ति को ऊध्र्व आकार से स्थापित करके उन समयों के प्रायोग्य परिणामों का प्ररूपण करते हैं-अध:प्रवृत्तकरण में प्रथम समयवर्ती जीवों के योग्य परिणाम असंख्यात लोकप्रमाण हैं। द्वितीय समयवर्ती जीवों के योग्य परिणाम भी असंख्यात लोकप्रमाण हैं। इस प्रकार समय-समय के प्रति अध:प्रवृत्तकरण सम्बन्धी परिणामों के प्रमाण का निरूपण अध:प्रवृत्तकरण काल के अन्तिम समय तक करना चाहिये। अध:प्रवृत्तकरण के प्रथम समय सम्बन्धी परिणामों से द्वितीय समय के योग्य परिणाम विशेष अधिक होते हैं। वह विशेष अन्तर्मुहूर्त प्रतिभागी है, अर्थात् प्रथम समय सम्बन्धी परिणामों के प्रमाण में अन्तर्मुहूर्त का भाग देने पर जितना प्रमाण आता है, उतने प्रमाण से अधिक हैं। अध:प्रवृत्तकरण के द्वितीय समयसम्बन्धी परिणामों से तृतीय समय के परिणाम विशेष अधिक होते हैं। इस प्रकार यह क्रम अध:प्रवृत्त-करणकाल के अंतिम समय तक ले जाना चाहिए। इन पूर्वोक्त अध:प्रवृत्त लक्षण वाली विशुद्धियों की ‘अध:प्रवृत्तकरण’ यह संज्ञा है, क्योंकि उपरितन समयवर्ती परिणाम अध: अर्थात् अधस्तन, समयवर्ती परिणामों में समानता को प्राप्त होते हैं इसलिए अध:प्रवृत्त यह संज्ञा सार्थक है।

शंका-परिणामों की ‘करण’ यह संज्ञा कैसे हुई ?

समाधान-यह कोई दोष नहीं, क्योंकि असि (तलवार) और वासि (वसूला) के समान साधकतम भाव की विवक्षा में परिणामों में करणपना पाया जाता है।

श्री पूज्यपादस्वामी विरचित जैनेन्द्र व्याकरण में कहा है- जो साधकतम है वह ‘करण’ है। इस सूत्र से जो साधकतम-पूर्णरूप से कार्य को करने में समर्थ है वह ‘करण’ है, किन्तु जो साधक है अथवा साधनरूप से है उसकी ‘कारण’ यह संज्ञा है।

शंका-मिथ्यादृष्टि आदि जीवों के अधस्तन स्थितिबंधादि परिणाम उपरिम परिणामों में और उपरिम स्थितिबंधादि परिणाम अधस्तन परिणामों में अनुकरण करते हैं, अर्थात् परस्पर समानता को प्राप्त होते हैं, इसलिए उनके परिणामों की ‘अध:प्रवृत्त’ यह संज्ञा क्यों नहीं की ?

समाधान-यह कोई दोष नहीं, क्योंकि यह बात इष्ट है अर्थात् मिथ्यादृष्टि आदिकों के अधस्तन और उपरिम समयवर्ती परिणामों की पायी जाने वाली समानता में अध:प्रवृत्तकरण का व्यवहार स्वीकार किया गया है।

शंका-यह कैसे जाना जाता है ?

समाधान-क्योंकि अध:प्रवृत्त यह नाम अन्तदीपक है अर्थात् प्रथमोपशमसम्यक्त्व होने के पूर्व तक मिथ्यादृष्टि आदि के पूर्वोत्तर समयवर्ती परिणामों में जो सदृशता पाई जाती है उसकी अध:प्रवृत्त संज्ञा का सूचक है।

अब इन अध:प्रवृत्त लक्षण वाली विशुद्धियों की तीव्र-मंदता का अल्पबहुत्व कहते हैं-प्रथम समय की जघन्य विशुद्धि सबसे कम है। उससे द्वितीय समय की जघन्य विशुद्धि अनन्तगुणित है। उससे तृतीय समय की जघन्य विशुद्धि अनन्तगुणित है। इस प्रकार यह क्रम अन्तर्मुहूर्तमात्र निर्वर्गणाकांडक के अंतिम समयसम्बन्धी जघन्य विशुद्धि तक ले जाना चाहिये। वहाँ से लौटकर प्रथम समय की उत्कृष्ट विशुद्धि उससे अनन्तगुणित है। पूर्व प्ररूपित अर्थात् प्रथम निर्वर्गणाकांडक के अंतिम समय सम्बन्धी जघन्य विशुद्धि से उपरिम समय की अर्थात् द्वितीय निर्वर्गणाकांडक के प्रथम समय की जघन्य विशुद्धि अनन्तगुणित है। उससे दूसरे समय की उत्कृष्ट विशुद्धि अनन्तगुणित है। पुन: पूर्वोक्त जघन्य विशुद्धि से उपरिम समय की जघन्य विशुद्धि अनन्त गुणित है। इस क्रम से यह अल्पबहुत्व अध:प्रवृत्तकरण के अंतिम समय सम्बन्धी जघन्य विशुद्धि प्राप्त होने तक ले जाना चाहिये। उससे निर्वर्गणाकांडक मात्र दूर जाकर स्थित अधस्तन समय की उत्कृष्ट विशुद्धि अनन्तगुणित है। उससे उपरिम समय की उत्कृष्ट विशुद्धि अनन्तगुणित है। इसी प्रकार उत्कृष्ट ही विशुद्धियों को निरन्तर अनन्त गुणित क्रम से अध:प्रवृत्तकरण के अंतिम समयसम्बन्धी उत्कृष्ट विशुद्धि प्राप्त होने तक ले जाना चाहिये। इस प्रकार अध:प्रवृत्तकरण का किंचित् लक्षण निरूपण किया। विशेषरूप से निर्वर्गणाकांडक आदि का लक्षण धवलाटीका में देखना चाहिये।

अब अपूर्वकरण का लक्षण कहेंगे। वह इस प्रकार है-अपूर्वकरण का काल अन्तर्मुहूर्तमात्र होता है, इसलिए अन्तर्मुहूर्तप्रमाण समयों की पहले रचना करना चाहिये। उसमें प्रथम समय के योग्य विशुद्धियों का प्रमाण असंख्यात लोक है। दूसरे समय के योग्य विशुद्धियों का प्रमाण असंख्यात लोक है। इस प्रकार यह क्रम अपूर्वकरण के अंतिम समय तक ले जाना चाहिये। प्रथम समय की विशुद्धियों से दूसरे समय की विशुद्धियाँ विशेष अधिक होती हैं। इस प्रकार यह क्रम अपूर्वकरण के अंतिम समय तक ले जाना चाहिए। यहाँ पर विशेष अन्तर्मुहूर्त का प्रतिभागी है।

इन करणों से, अर्थात् अपूर्वकरणकाल के विभिन्न समयवर्ती परिणामों की, तीव्र-मंदता के अल्पबहुत्व कहते हैं। वह इस प्रकार है-अपूर्वकरण की प्रथम समय सम्बन्धी जघन्य विशुद्धि सबसे कम है। वहाँ पर ही उत्कृष्ट विशुद्धि अनन्तगुणित है। प्रथम समय की उत्कृष्ट विशुद्धि से द्वितीय समय की जघन्य विशुद्धि अनन्तगुणित है। वहाँ पर ही उत्कृष्ट विशुद्धि अनन्तगुणित है अर्थात् द्वितीय समय की उत्कृष्ट विशुद्धि से तृतीय समय की जघन्य विशुद्धि अनन्तगुणित है। वहाँ पर ही उत्कृष्ट विशुद्धि अनन्तगुणित है। इस प्रकार यह क्रम अपूर्वकरण के अन्तिम समय तक ले जाना चाहिये। करण नाम परिणाम का है। अपूर्व जो करण होते हैं उन्हें अपूर्वकरण कहते हैं, जिनका कि अर्थ असमान परिणाम कहा गया है। इस प्रकार अपूर्वकरण का लक्षण निरूपण किया।

अब अनिवृत्तिकरण का लक्षण कहते हैं। वह इस प्रकार है-अनिवृत्तिकरण का काल अन्तर्मुहूर्तमात्र होता है, इसलिये उसके काल के समयों की रचना करना चाहिये। यहाँ पर अर्थात् अनिवृत्तिकरण में, एक-एक समय के प्रति एक-एक ही परिणाम होता है, क्योंकि यहाँ एक समय में जघन्य और उत्कृष्ट परिणामों के भेद का अभाव है।

अब अनिवृत्तिकरणसम्बन्धी विशुद्धियों की तीव्र-मन्दता का अल्पबहुत्व कहते हैं-प्रथम समय सम्बन्धी विशुद्धि सबसे कम है। उससे द्वितीय समय की विशुद्धि अनन्तगुणित है। उससे तृतीय समय की विशुद्धि अजघन्योत्कृष्ट अनन्तगुणित है। इस प्रकार यह क्रम अनिवृत्तिकरण काल के अंतिम समय तक ले जाना चाहिये।

एक समय में वर्तमान जीवों के परिणामों की अपेक्षा निवृत्ति या विभिन्नता जहाँ पर नहीं होती है वे परिणाम अनिवृत्तिकरण कहलाते हैं। इस प्रकार अनिवृत्तिकरण का लक्षण कहा।

इन उपर्युक्त तीन प्रकार की विशुद्धियों से परिणत जीव जिन-जिन कार्यों को करता है, उनका प्रतिपादन करने के लिए आचार्यदेव आगे कहेंगे।

[सम्पादन]
अधुना प्रथमसम्यक्त्वमुत्पादयितुकामस्य कार्यनिरूपणाय सूत्रमवतार्यते श्रीभूतबलिसूरिवर्येण-

एदेसिं चेव सव्वकम्माणं जावे अंतोकोडाकोडिट्ठिदिं ठवेदि संखेज्जेहि सागरोवमसहस्सेहि ऊणियं तावे पढमसम्मत्तमुप्पादेदि।।५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अध:प्रवृत्तकरणे तावत् स्थितिकांडकघात: अनुभागकांडकघात: गुणश्रेणि: गुणसंक्रमो वा नास्ति, एतेषां परिणामानां पूर्वोक्तचतुर्विधकार्योत्पादनशत्तेरभावात्। केवलमनन्तगुणविशुद्ध्या प्रतिसमयं विशुद्ध्यन् अप्रशस्तानां कर्मणां द्वि:स्थानीयमनुभागं समयं प्रति अनन्तगुणहीनं बध्नाति, प्रशस्तानां कर्मणां अनुभागं चतु:स्थानीयं समयं प्रति अनन्तगुणं बध्नाति। अत्र स्थितिबंधकाल: अन्तर्मुहूर्तमात्र:। पूर्णे पूर्णे स्थितिबंधे पल्योपमस्य संख्येयभागेनोनामन्यां स्थितिं बध्नाति। एवं संख्यातसहस्रवारं स्थितिबंधापसरेषु कृतेषु अध:प्रवृत्तकरणकाल: समाप्यते।
अध:प्रवृत्तकरणप्रथमसमयस्थितिबंधात् चरमसमयस्थितिबंध: संख्यातगुणहीन:। अत्रैव प्रथमसम्यक्त्व-संयमासंयमाभिमुखस्य स्थितिबंध: संख्यातगुणहीन: संख्यातगुणहीन:, प्रथमसम्यक्त्व-संयमाभिमुखस्य अध:प्रवृत्तकरण-चरमसमयस्थितिबंध: संख्यातगुणहीन:।
सूत्रे संख्यातै: सागरोपमसहस्रै: ऊनां स्थितिं बध्नाति इति त्रिषु अपि करणेषु सामान्येन भणितं।
एष विशेष: अनिर्दिष्ट: कथं ज्ञायते ?
आचार्यपरंपरागतोपदेशात्। एवमध:प्रवृत्तकरणस्य कार्यप्ररूपणं कृतं।
अपूर्वकरणस्य प्रथम: स्थितिखंडो जघन्य: पल्योपमस्य संख्यातभाग:, उत्कृष्टक: सागरोपमपृथक्त्वमात्र: कथित:। अध:प्रवृत्तकरणचरमसमयस्थितिबंधात् पल्योपमस्य संख्यातभागेन ऊन: स्थितिबंध: अपूर्वकरणस्य प्रथमसमये एव आरब्ध:। अयं आयुर्वर्जितानां सर्वकर्मणां स्थितिखंडको भवति। स्थितिबंध: पुन: बध्यमानप्रकृतीनामेव। अपूर्वकरणप्रथमसमये चैव गुणश्रेणिरपि प्रारब्धा।
विशेषेण तु-अपूर्वकरणस्य प्रथमसमयसंबंधिस्थितिसत्त्व-स्थितिबंधाभ्यां अपूर्वकरणस्य चरमसमय-स्थितिसत्त्व-स्थितिबंधयो: दीर्घत्वं संख्यातगुणहीनं भवति। अपूर्वकरणप्रथमसमयानुभागसत्त्वात् चरमसमये अप्रशस्तप्रकृतीनामनुभागसत्त्वकर्मानन्तगुणहीनं, प्राश्स्तानामनन्तगुणं भवति। एवमपूर्वकरणपरिणामस्य अतिसंक्षिप्तकार्यप्ररूपणा कृता।
तदनंतरमुपरिमसमये अनिवृत्तिकरणं प्रारभते। तस्मिन्नेव समये अन्यं स्थितिखंडकं अन्यमनुभागखण्डकं अन्यं स्थितिबंधं च प्रारभते। पूर्वापकर्षितप्रदेशाग्रात् असंख्यातगुणितप्रदेशस्यापकर्षणं कृत्वा अपूर्वकरण इव गलितावशेषगुणश्रेणिं करोति।
सूत्रे स्थितिबंधापसरणमेव प्ररूपितं, स्थिति-अनुभाग-प्रदेशघाता न प्ररूपिता:, तेषां प्ररूपणा नात्र युज्यते इति चेत् ?
न, तालप्रलंबसूत्रमिव तस्य देशामर्षकत्वात्। एवं स्थितिबंध-स्थितिकांडकघात-अनुभागकांडक-घातसहस्रेषु गतेषु अनिवृत्तिकरणकालस्य चरमसमयं प्राप्नोति।
अत्र अपूर्वकरणे कार्ये निक्षेप-अतिस्थापना-उदयावली-अचलावली-अव्याघात-व्याघातादीनां लक्षणं स्थितिकांडक-अनुभागकांडकादिलक्षणं च धवलाटीकायां दृष्टव्यं।
एवं द्वितीयस्थले प्रथमोपशमसम्यक्त्वमुत्पादयितुकाम: भव्य: कीदृश: इतिकथनमुख्यत्वेन द्वे सूत्रे गते।
अधुना अनिवृत्तिकरणपरिणामानां कार्यविशेषप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-पढमसम्मत्तमुप्पादेंतो अंतोमुहुत्तमोहट्टेदि।।६।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-प्रथमोपशमसम्यक्त्वमुत्पादयन् सातिशयमिथ्यादृष्टी जीव: अन्तर्मुहूर्तकालं अन्तरकरणं करोति। इदं सूत्रं अन्तरकरणं प्ररूपयति। अथवा ‘‘केवचिरेण कालेण’’ इति पृच्छासूत्रस्यार्थं प्ररूपयति।
विवक्षितकर्मणां अधस्तनोपरिमस्थिती: विहाय मध्यवर्ति-अन्तर्मुहूर्तमात्रस्थितिनिषेकानां परिणामविशेषेण अभावकरणं अन्तरकरणमुच्यते।
प्रथमोपशमसम्यक्त्वाभिमुख: कस्यान्तरं करोति ?
मिथ्यात्वस्यान्तरं करोति, किंचात्र अनादिमिथ्यादृष्टिजीवस्याधिकारोऽस्ति, अन्यथा पुन: यदस्ति दर्शनमोहनीयं तस्य सर्वस्यान्तरं करोति।
कुत्र, कस्य करणस्य काले वा अन्तरं क्रियते ?
अनिवृत्तिकरणकालस्य संख्यातबहुभागान् गत्वान्तरं क्रियते। अन्तरकरणस्य प्रथमसमये अन्यं स्थितिकांडकं अनुभागकांडकं च प्रारभते, अन्य स्थितिबंधं च करोति। यावान् स्थितिबंधकाल: तावता कालेन अन्तरं क्रियमाण: गुणश्रेणिनिक्षेपस्य अग्राग्रात् संख्यातभागं खण्डयति। गुणश्रेणिशीर्षकात् उपरि संख्यातगुणा उपरिमस्थिती: खण्डयति, अन्तरार्थं तत्रोत्कीर्णप्रदेशाग्रं आबाधाहीनायां द्वितीयस्थितौ बंधे स्थापयति, प्रथमस्थितौ च ददाति, किंतु अन्तरस्थितिषु नियमात् न ददाति। एवं अन्तरमुत्कीर्यमाणमुत्कीर्णं-अन्तरकरणकार्यं संपन्नमिति। तत: प्रभृति ‘उपशामक:’ इति भण्यते।
यदि एवं, तर्हि पूर्वमुपशामकत्वस्य अभावो भवति इति चेत् ?
पूर्वमपि उपशामकश्चैव, किंतु मध्यदीपकं कृत्वा शिष्यप्रतिबोधनार्थं एष: दर्शनमोहनीयोपशामक: इति यतिवृषभाचार्येण भणितं कषायप्राभृतचूर्णि-उपशमनाधिकारे, अत: नेदं वचनं अतीतभागस्य उपशामकत्वप्रतिषेधकं।
प्रथमस्थिते: द्वितीयस्थितेश्च तावत् आगालप्रत्यागालौ यावत् आवलिकाप्रत्यावलिके च शेषे इति। तत: प्रभृति मिथ्यात्वस्य गुणश्रेणिर्नास्ति, उदयावलिबाह्ये निक्षेपाभावात्। शेषाणां आयुर्वर्जितानां गुणश्रेणिरस्ति। तदा प्रत्यावलिकायाश्चैव मिथ्यात्वस्य उदीरणा भवति, किंतु एकावलिकायां शेषायां मिथ्यात्वकर्मण: उदीरणा नास्ति। तदानीमयं जीव: चरमसमयवर्ती मिथ्यादृष्टिर्जात:।
अथवा नैतेन सूत्रेण अन्तरघात: एव प्ररुपित:, किन्तु स्थितिघात: अनुभागघात: गुणश्रेणिक्रमेण प्रदेशघात: अन्तरस्थितीनां घातश्च प्ररुपित:। तथा पूर्वोक्त सूत्रमपि न देशामर्षकं, स्थितिबंधापसरणस्य एकस्य चैव प्ररूपणात्। अत्र ‘लभ्यते’ इति यत्पदं तस्यार्थ: समाप्त:।
‘‘कदि भाए वा करेदि मिच्छत्तं’’ एतस्या: पृच्छाया: अर्थप्ररूपणार्थं अग्रे सूत्रं भण्यते।
अधुना मिथ्यात्वस्य त्रिभागसूचनाय सूत्रमवतरति-ओहट्टेदूण मिच्छत्तं तिण्णि भागं करेदि सम्मत्तं मिच्छत्तं सम्मामिच्छत्तं।।७।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एतेन सूत्रेण मिथ्यात्वप्रथमस्थितिं गालयित्वा सम्यक्त्वं प्रतिपन्नप्रथमसमयप्रभृति उपरिमकाले यो व्यापार: स: प्ररूपित:। ‘ओहट्टेदूण’ मिथ्यात्वस्य प्रथमस्थितिं गालयित्वा इति पदस्य पूर्वं स्थिति-अनुभाग-प्रदेशै: प्राप्तघातं मिथ्यात्वं अनुभागेन पुनरपि घातयित्वा तस्य त्रीन् भाागान् करोति। अस्य कारणमेतत्-‘मिथ्यात्वानुभागात् सम्यग्मिथ्यानुभाग: अनन्तगुणहीन:, तस्मात् सम्यक्त्वानुभाग: अनंतगुणहीन:, इति कषायप्राभृतसूत्रे निर्दिष्टत्वात्। न च उपशमसम्यक्त्वकालाभ्यन्तरे अनन्तानुबंधिवि-संयोजनक्रियया विना मिथ्यात्वस्य स्थितिघातो वा अनुभागघातो वा अस्ति, तथोपदेशाभावात्।
तेन ‘ओहट्टेदूण’ इति उत्ते कांडकघातेन विना मिथ्यात्वानुभागं घातयित्वा सम्यक्त्व-सम्यग्मिथ्यात्वानु-भागाकारेण परिणाम्य प्रथमसम्यक्त्वं प्रतिपन्नप्रथमसमये चैव मिथ्यात्वरूपैककर्मण: त्रीन् कर्मांशान् भेदान् वा उत्पादयति।
प्रथमसमयोपशमसम्यग्दृष्टि: मिथ्यात्वात् प्रदेशाग्रं गृहीत्वा सम्यग्मिथ्यात्वे बहुकं ददाति, तस्मात् असंख्यातगुणहीनं सम्यक्त्वे ददाति। प्रथमसमये सम्यग्मिथ्यात्वे दत्तप्रदेशेभ्य: द्वितीयसमये सम्यक्त्वप्रकृतौ असंख्यातगुणप्रदेशान् ददाति। तस्मिंश्चैव समये सम्यक्त्वप्रकृतौ दत्तप्रदेशेभ्य: सम्यग्मिथ्यात्वे असंख्यातगुणं ददाति। एवमन्तर्मुहूर्तकालं गुणसंक्रमेण सम्यक्त्वसम्यग्मिथ्यात्वे आपूरयति यावत् गुणसंक्रमचरमसमय: इति। तेन परं सूच्यंगुलस्य असंख्यातभागप्रतिभागिक: विध्यातसंक्रमो भवति। यावत् गुणसंक्रमस्तावद् आयुर्वर्जितानां कर्मणां स्थितिघात: अनुभागघात: गुणश्रेणिश्चास्ति।
अस्मिन् विषये पंचविंशतिप्रतिक: अल्पबहुत्वदंडक: भवति, स: धवलाटीकायां दृष्टव्य:।
तात्पर्यमेतत्-प्रथमोपशमसम्यक्त्वेन मिथ्यात्वं त्रिविधं भवति।
उक्तं च- जंतेण कोद्दवं वा पढमुवसमसम्मभावजंतेण।
मिच्छं दव्वं तु तिधा असंखगुणहीणदव्वकमा।।
एवं तृतीयस्थले मिथ्यात्वकर्मण: त्रिभागं करोति इति निरूपणत्वेन सूत्रद्वयं गतं।
संप्रति दर्शनमोहनीयोपशमनप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-दंसणमोहणायं कम्मं उवसामेदि।।८।।
उवसामेंतो कम्हि उवसामेदि ? चदुसु वि गदीसु उवसामेदि। चदुसु वि गदीसु उवसामेंतो पंचिंदिएसु उवसामेदि, णो एइंदिय-विगलिंदियेसु। पंचिंदिएसु उवसामेंतो सण्णीसु उवसामेदि, णो असण्णीसु। सण्णीसु उवसामेंतो गब्भोवक्कंतिएसु उवसामेदि, णो सम्मुच्छिमेसु। गब्भोवक्कंतिएसु उवसामेंतो पज्जत्तएसु उवसामेदि, णो अपज्जत्तएसु। पज्जत्तएसु उवसामेंतो संखेज्जवस्साउगेसु वि उवसामेदि, असंखेज्जवस्साउगेसु वि।।९।।
उवसामणा वा केसु व खेत्तेसु कस्स व मूले।।१०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमोऽस्ति। दर्शनमोहनीयस्य उपशामक: इन्द्रकश्रेणिबद्धादि-सर्वनरकेषु सर्वभवनवासिदेवेषु सर्वसमुद्र-द्वीपसंबंधि-सर्वव्यन्तरदेवेषु समस्तज्योतिष्केषु सौधर्मकल्पादारभ्य नवग्रैवेयकविमानपर्यन्तदेवेषु आभियोग्येषु-वाहनादिकर्मनियुक्तवाहनजातीयदेवेषु किल्विषकादि-अनुत्तमेषु देवेषु पारिषदादि उत्तमदेवषु च भवति। अयं उपशामक: उपसर्गादिषु अपि विच्छेद-मरणरहितो भवति, सासादनगुणस्थानं च न प्राप्नोति। उपशमसम्यक्वसंजाते सति भजितव्य:-स्यात् सासादनं प्राप्नोति न वा प्राप्नोति। उपशमसम्यक्त्वस्य काले क्षीणे सति मिथ्यात्वादित्रिभ्य: एकस्य कतमस्य उदये आगते मिथ्यात्वादिभावं प्राप्नोति। अथवा दर्शनमोहनीयकर्मण: क्षीणे सति सासादनपरिणामस्य सर्वथा रहितो भवति।
सम्यग्मिथ्यादृष्टि: वेदकसम्यग्दृष्टि: क्षायिकसम्यग्दृष्टि: उपशमसम्यग्दृष्टिश्च दर्शनमोहनीयकर्मणोऽबंधको भवति। अनादिमिथ्यादृष्टे: सम्यक्त्वस्य प्रथमवारं लाभ: सर्वोपशमेन भवति। तथा विप्रकृष्टसादिमिथ्यादृष्टे: जीवस्यापि प्रथमोपशमसम्यक्त्वस्य लाभ: सर्वोपशमेनैव। किन्तु यो जीव: सम्यक्त्वात् प्रच्युत्य पुन: सत्त्वरं सम्यक्त्वं गृण्हाति, स: सर्वोपशमेन देशोपशमेन वा भजितव्य:।
मिथ्यात्वादित्रिकर्मणां उदयाभाव: सर्वोपशम: कथ्यते। तथा सम्यक्त्वप्रकृतिसंबंधिदेशघातिस्पर्धकानां देशोपशम: उच्यते।
अनादिमिथ्यादृष्टे: प्रथमोपशमसम्यक्त्वस्यानंतरं मिथ्यात्वोदयो भवति, किन्तु सादिमिथ्यादृष्टे: मिथ्यात्वं भजितव्यं।
उक्तं च- सम्मत्तपढमलंभस्सणंतरंतरं पच्छदो य मिच्छत्तं।
लंभस्स अपढमस्स दु भजितव्यं पच्छदो होदि।।
सम्यग्दृष्टिजीवस्य विशेषलक्षणं कथ्यते-
सम्माइट्ठी सद्दहदि पवयणं णियमसा दु उवइट्ठं।
सद्दहदि असब्भावं अजाणमाणो गुरुणियोगा।
पुनश्च मिथ्यादृष्टेरपि लक्षणं ज्ञातव्यं भवति-
मिच्छाइट्ठी णियमा उवइट्ठं पवयणं ण सद्दहदि।
सद्दहदि असब्भावं उवइट्ठं वा अणुवइट्ठं।।
अत्र ‘‘कदि भागे वा करेदि मिच्छत्तं’’ अस्य सूत्रस्यार्थो निगदित:।
पुनरपि-दर्शनमोहस्य उपशामना केषु वा क्षेत्रेषु कस्य वा पादमूले भवतीति पृच्छासूत्रं कथितं, तस्य पूर्वं विभाषा प्ररूपिता, किंच अस्मिन् सम्यक्त्वे क्षेत्रनियमो नास्ति। ‘कस्य पादमूले’ अत्रापि नियमो नास्ति, सर्वत्र सम्यक्त्वग्रहणसंभवात्।
एवं चतुर्थस्थले प्रथमोपशमसम्यक्त्वं क: कुत्र चोत्पादयतीति कथनमुख्यत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।

[सम्पादन]
अब प्रथमोपशम सम्यक्त्व को प्राप्त करने के इच्छुकजन के कार्य का निरूपण करने के लिये श्री भूतबलिसूरिवर्य सूत्र अवतरित करते हैं-

सूत्रार्थ-

जिस समय इन ही सर्वकर्मों की संख्यात हजार सागरोपमों से हीन अन्त:कोड़ाकोड़ी सागरोपमप्रमाण स्थिति को स्थापित करता है, उस समय यह जीव प्रथम सम्यक्त्व को उत्पन्न करता है।।५।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-अध:प्रवृत्तकरण में स्थितिकांडक घात, अनुभागकांडक घात, गुणश्रेणी और गुणसंक्रमण नहीं होता है, क्योंकि, इन अध:प्रवृत्त परिणामों के पूर्वोक्त चतुर्विध कार्यों के उत्पादन करने की शक्ति का अभाव है। केवल अनन्तगुणी विशुद्धि के द्वारा प्रतिसमय विशुद्धि को प्राप्त होता हुआ यह जीव अप्रशस्त कर्मों के द्विस्थानीय अर्थात् निम्ब और कांजीरूप अनुभाग को समय-समय के प्रति अनन्तगुणित हीन बांधता है और प्रशस्त कर्मों के गुड़, खांड आदि रूप चतु:स्थानीय अनुभाग को प्रतिसमय अनन्तगुणित बांधता है। यहाँ अर्थात् अध:प्रवृत्तकरण काल में स्थितिबंध का काल, अन्तर्मुहूर्तमात्र है। एक-एक स्थितिबन्धकाल के पूर्ण होने पर पल्योपम के संख्यातवें भाग से हीन अन्य स्थिति को बांधता है। इस प्रकार संख्यात सहस्र बार स्थितिबंधापसरणों के करने पर अध:प्रवृत्तकरण का काल समाप्त हो जाता है। अध:प्रवृत्तकरण के प्रथम समय सम्बन्धी स्थितिबंध से उसी का अन्तिम समयसम्बन्धी स्थितिबंध संख्यातगुणा हीन होता है। यहाँ पर ही, अर्थात् अध:प्रवृत्तकरण के चरम समय में, प्रथम सम्यक्त्व के अभिमुख जीव के जो स्थितिबंध होता है, उससे प्रथम सम्यक्त्व सहित संयमासंयम के अभिमुख जीव का स्थितिबंध संख्यातगुणहीन-संख्यातगुणहीन होता है। इससे प्रथम सम्यक्त्व सहित सकल संयम के अभिमुख जीव का अध:प्रवृत्तकरण के अन्तिम समय सम्बन्धी स्थितिबंध संख्यातगुणा हीन होता है।

शंका-सूत्र में, ‘संख्यात हजार सागरोपमों से हीन स्थिति को बांधता है’ यह वाक्य तीनों ही करणों में सामान्य से कहा है, फिर सूत्र में अनिर्दिष्ट यह उपर्युक्त विशेष कैसे जाना जाता है ?

समाधान-सूत्र में अनिर्दिष्ट वह उपर्युक्त कथन आचार्य-परम्परा के द्वारा आए हुए उपदेश से जाना जाता है। इस प्रकार अध:प्रवृत्तकरण के कार्यों का निरूपण किया।

अपूर्वकरण का प्रथम जघन्य स्थितिखंड पल्योपम का संख्यातवाँ भाग और उत्कृष्ट स्थितिखण्ड सागरोपम पृथक्त्व मात्र ग्रहण किया है। अध:प्रवृत्तकरण के अंतिम समय वाले स्थितिबंध से पल्योपम के संख्यातवें भाग से हीन स्थितबंध उस काल में, अर्थात् अपूर्वकरण के प्रथम समय में ही आरम्भ किया। यह स्थितिखंड आयुकर्म को छोड़कर शेष समस्त कर्मों का होता है। किन्तु स्थितिबंध बंधने वाली प्रकृतियों का ही होता है। अपूर्वकरण के प्रथम समय में ही गुणश्रेणी भी प्रारम्भ की।

विशेषतया-अपूर्वकरण के प्रथम समय सम्बन्धी स्थितिसत्त्व और स्थितिबंध के द्वारा अपूर्वकरण का चरम समय सम्बन्धी स्थितिसत्त्व और स्थितिबंध की दीर्घता संख्यातगुणे हीन होती है। अपूर्वकरण के प्रथम समय के अनुभाग सत्त्व से चरम समय में अप्रशस्त प्रकृतियों का अनुभाग सत्त्वकर्म अनंतगुणाहीन है और प्रशस्त प्रकृतियों का अनंतगुणा अधिक होता है। इस प्रकार अपूर्वकरण परिणाम की अतिसंक्षिप्त कार्य प्ररूपणा बतायी गई है।

इसके बाद ऊपर के समय में अनिवृत्तिकरण प्रारम्भ करता है। उसमें ही अन्य स्थितिखंडक, अन्य अनुभागखंडक और अन्य स्थितिबंध को करता है। पूर्व में अपकर्षित प्रदेशाग्र से असंख्यातगुणित प्रदेशों का अपकर्षण करके अपूर्वकरण के समान ही गलितावशेष गुणश्रेणी करता है।

शंका-सूत्र में केवल स्थितिबंधापसरण ही कहा है, स्थितिघात, अनुभाग और प्रदेशघात नहीं कहे हैं, इसलिये उनकी प्ररूपणा यहाँ युक्तिसंगत नहीं है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि तालप्रलंब सूत्र के समान यह सूत्र देशामर्शक है, अतएव स्थितिघात आदि की प्ररूपणा घटित हो जाती है।

इस प्रकार सहस्रों स्थितिबंध, स्थितिकांडकघात और अनुभागकांडकघातों के व्यतीत हो जाने पर अनिवृत्तिकरण के काल का अंतिम समय प्राप्त होता है।

वहाँ अपूर्वकरण के कार्य में निक्षेप, अतिस्थापना, उदयावली, अचलावली, अव्याघात और व्याघात आदि के लक्षण तथा स्थितिकण्डक, अनुभागकांडक आदि के लक्षण धवलाटीका में देखना चाहिये।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में प्रथमोपशम सम्यक्त्व को उत्पन्न करने का इच्छुक भव्य कैसा हो ? इस कथन की मुख्यता से दो सूत्र पूर्ण हुये।

[सम्पादन]
अब अनिवृत्तिकरण परिणामोें के कार्य विशेष का प्रतिपादन करने के लिये सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

प्रथमोपशमसम्यक्त्व को उत्पन्न करता हुआ सातिशय मिथ्यादृष्टि जीव अन्तर्मुहूर्तकाल तक हटाता है अर्थात् अन्तरकरण करता है।।६।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-प्रथमोपशम सम्यक्त्व को उत्पन्न करता हुआ सातिशय मिथ्यादृष्टि जीव अन्तर्मुहूर्तकाल तक अंतरकरण करता है। यह सूत्र अन्तरकरण का निरूपण करता है अथवा कितने काल से सम्यक्त्व उत्पन्न करता है ? ऐसी पृच्छा होने पर पृच्छा सूत्र का अर्थ कहता है।

विवक्षित कर्मों की अधस्तन और उपरिम स्थितियों को छोड़कर मध्यवर्ती अन्तर्मुहूर्तमात्र स्थितियों के निषेकों का परिणामविशेष के द्वारा अभाव करने को अन्तरकरण कहते हैं।

शंका-प्रथमोपशम सम्यक्त्व के अभिमुख हुआ जीव किसका अन्तर करता है ?

समाधान-मिथ्यात्व का अंतर करता है, क्योंकि यहाँ पर अनादि मिथ्यादृष्टि जीव का अधिकार है। अन्यथा पुन: जो दर्शनमोहनीय कर्म तीन भेदरूप है, उस सबका अंतर करता है।

शंका-किसमें अर्थात् कहाँ पर या किस करण के काल में अन्तर रहता है ?

समाधान-अनिवृत्तिकरण के काल का संख्यात बहुभाग व्यतीत होने पर अन्तर करता है। अन्तरकरण के प्रथम समय में अन्य स्थितिकांडक और अन्य अनुभागकांडक का आरम्भ करता है तथा अन्य स्थितिबंध आरम्भ करता है। जितना स्थितिबंध का काल है, उतने काल के द्वारा अन्तर को करता हुआ गुणश्रेणी निक्षेप के अग्राग्र से अर्थात् गुणश्रेणी शीर्ष से लेकर नीचे संख्यातवें भाग प्रदेशाग्र को खण्डित करता है। गुणश्रेणी शीर्ष से ऊपर संख्यातगुणी उपरिम स्थितियों को खण्डित करता है तथा अन्तर के लिये वहाँ पर उत्कीर्ण किये गये प्रदेशाग्र को (लेकर) बंध में अर्थात् उस समय बंधने वाले मिथ्यात्व कर्म में, उसकी आबाधाकाल हीन द्वितीय स्थिति में स्थापित करता है और प्रथमस्थिति में देता है किन्तु अन्तरकालसम्बन्धी स्थितियों में निश्चयत: नहीं देता है। इस प्रकार किया जाने वाला अन्तर किया गया अर्थात् अन्तरकरण का कार्य सम्पन्न हुआ। अन्तरकरण समाप्त होने के समय से लेकर वह जीव ‘उपशामक’ कहलाता है।

शंका-यदि ऐसा है अर्थात् अन्तरकरण समाप्त होने के पश्चात् वह जीव ‘उपशामक’ कहलाता है तो इससे पूर्व अर्थात् अध:प्रवृत्तकरणादि परिणामों के प्रारम्भ होने से लेकर अन्तरकरण होने तक, उस जीव के उपशामकपने का अभाव प्राप्त होता है ?

समाधान-अन्तरकरण समाप्त होने के पूर्व भी वह जीव उपशामक ही था किन्तु मध्यदीपक करके शिष्यों के प्रतिबोधनार्थ ‘यह दर्शनमोहनीयकर्म का उपशामक है’ इस प्रकार यतिवृषभाचार्य ने अपनी कसायपाहुडचूर्णि के उपशमना अधिकार में कहा है। इसलिये यह वचन अतीत भाग के उपशामकता का प्रतिषेध नहीं करता है।

प्रथमस्थिति से और द्वितीयस्थिति से तब तक आगाल और प्रत्यागाल होते रहते हैं जब तक कि आवली और प्रत्यावलीमात्र काल शेष रह जाता है।

विशेषार्थ-प्रथमस्थिति और द्वितीयस्थिति की परिभाषा पहले दी जा चुकी है। अपकर्षण के निमित्त से द्वितीयस्थिति के कर्मप्रदेशों का प्रथमस्थिति में आना आगाल कहलाता है। उत्कर्षण के निमित्त से प्रथमस्थिति के कर्मप्रदेशों का द्वितीयस्थिति में जाना प्रत्यागाल कहलाता है। ‘आवली’ ऐसा सामान्य से कहने पर भी प्रकरणवश उसका अर्थ उदयावली लेना चाहिये तथा उदयावली से ऊपर के आवलीप्रमाण काल को द्वितीयाली या प्रत्यावली कहते हैं। जब अन्तरकरण करने के पश्चात् मिथ्यात्व की स्थिति आवलि-प्रत्यावलीमात्र रह जाती है, तब आगाल-प्रत्यागालरूप कार्य बन्द हो जाते हैं।

इसके पश्चात् अर्थात् आवलि-प्रत्यावलीमात्र काल शेष रहने के समय से लेकर मिथ्यात्व की गुणश्रेणी नहीं होती है, क्योंकि उस समय से उदयावली से बाहर कर्मप्रदेशों का निक्षेप नहीं होता है किन्तु आयुकर्म को छोड़कर शेष समस्त कर्मों की गुणश्रेणी होती रहती है। उस समय प्रत्यावली से ही मिथ्यात्वकर्म की उदीरणा होती रहती है किन्तु एक आवली के शेष रह जाने पर मिथ्यात्वकर्म की उदीरणा नहीं होती है तब यह जीव चरमसमयवर्ती मिथ्यादृष्टि हो जाता है।

अथवा इस सूत्र के द्वारा केवल अन्तरघात ही नहीं प्ररूपण किया गया है किन्तु स्थितिघात, अनुभागघात, गुणश्रेणी के क्रम से प्रदेशघात और अन्तर-स्थितियों का घात भी प्ररूपण किया गया है तथा इससे पहले का सूत्र भी देशामर्शक नहीं है क्योंकि वह केवल एक स्थितिबन्धापसरण का ही प्ररूपण करता है।

इस प्रकार ‘सम्यक्त्व को प्राप्त करता है’ यह जो पद है, उसका अर्थ समाप्त हुआ।

अब ‘मिथ्यात्वकर्म को कितने भागरूप करता है’ इस प्रश्न का अर्थ प्ररूपण करने के लिए आगे कहते हैं।

[सम्पादन]
अब मिथ्यात्व के तीन भाग को सूचित करने के लिये सूत्र का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

मिथ्यात्व की प्रथमस्थिति बतलाकर मिथ्यात्वकर्म के तीन भाग करता है-सम्यक्त्व, मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्व।।७।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-इस सूत्र के द्वारा मिथ्यात्व की प्रथमस्थिति को गलाकर सम्यक्त्व को प्राप्त होने के प्रथम समय से लेकर उपरिम काल में जो व्यापार अर्थात् कार्यविशेष होता है, वह प्ररूपण किया गया है। यहाँ ‘‘ओहट्टेदूण’ इस कथन से मिथ्यात्व की प्रथम स्थिति गलाकर इस पद के पहले से ही स्थिति, अनुभाग और प्रदेशों की अपेक्षा घात को प्राप्त मिथ्यात्वकर्म को अनुभाग के द्वारा पुनरपि घात कर उसके तीन भाग करता है, यह प्ररूपित किया गया है। इसका कारण यह है कि ‘मिथ्यात्वकर्म के अनुभाग से सम्यग्मिथ्यात्वकर्म का अनुभाग अनन्तगुणा हीन होता है, इससे सम्यक्त्व प्रकृति का अनुभाग अनंतगुणाहीन है। ऐसा प्राभृतसूत्र अर्थात् कषायप्राभृत के चूर्णिसूत्रों में निर्देश किया गया है तथा उपशमसम्यक्त्वसम्बन्धी काल के भीतर अनन्तानुबन्धी कषाय की विसंयोजनरूप क्रिया के बिना मिथ्यात्वकर्म का स्थितिकांडकघात और अनुभागकांडकघात नहीं होता है क्योंकि उस प्रकार का उपदेश नहीं पाया जाता है इसलिए ‘ओहट्टेदूण’ ऐसा कहने पर कांडकघात के बिना मिथ्यात्वकर्म के अनुभाग को घात कर और उसे सम्यक्त्व प्रकृति और सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृति के अनुभागरूप आकार से परिणमाकर प्रथमोपशमसम्यक्त्व को प्राप्त होने के समय में ही मिथ्यात्वरूप एक कर्म के तीन कर्मांश अर्थात् भेद या खण्ड उत्पन्न करता है।

प्रथम समयवर्ती उपशमसम्यग्दृष्टि जीव मिथ्यात्व से प्रदेशाग्र अर्थात् उदीरणा को प्राप्त कर्म-प्रदेशों को लेकर उनका बहुभाग सम्यग्मिथ्यात्व में देता है और उससे असंख्यातगुणा हीन कर्म प्रदेशाग्र सम्यक्त्व प्रकृति में देता है। प्रथम समय में सम्यग्मिथ्यात्व में दिए गए प्रदेशों से अर्थात् उनकी अपेक्षा द्वितीय समय में सम्यक्त्व प्रकृति में असंख्यातगुणित प्रदेशों को देता है और उसी ही समय में अर्थात् दूसरे ही समय में सम्यक्त्वप्रकृति में दिए गए प्रदेशों की अपेक्षा सम्यग्मिथ्यात्व में असंख्यातगुणित प्रदेशों को देता है। इस प्रकार अन्तर्मुहूर्त काल तक गुणसंक्रम के (गुणश्रेणी के मु.) द्वारा सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकर्म को पूरित करता है जब तक कि गुणसंक्रमणकाल का अंतिम समय प्राप्त होता है। इस गुणसंक्रमण के पश्चात् सूच्यंगुल के असंख्यातवें भाग का प्रतिभागी अर्थात् सूच्यंगुल के असंख्यातवें भाग प्रमाण वाला, विध्यात संक्रमण होता है। जब तक गुणसंक्रमण होता है तब तक आयुकर्म को छोड़कर शेष कर्मों का स्थितिघात, अनुभागघात और गुणश्रेणीघात होता है।

इस विषय में पच्चीस प्रतिक या पदवाला अल्पबहुत्व दण्डक कहने योग्य है, उसे धवलाटीका से जानना चाहिये।

तात्पर्य यह है कि प्रथमोपशमसम्यक्त्व के द्वारा मिथ्यात्व तीनरूप हो जाता है। कहा भी है- जैसे यंत्र के द्वारा कोदों के तीन भाग हो जाते हैं, वैसे ही प्रथमोपशम सम्यक्त्व रूपी मंत्र के द्वारा मिथ्यात्व के भी तीन भाग हो जाते हैं, वे असंख्यातगुणित हीन द्रव्य वाले होते हैं।।

इस प्रकार तृतीय स्थल में मिथ्यात्वकर्म के विभाग करता है ऐसा प्रतिपादन करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुये।

[सम्पादन]
अब दर्शनमोहनीय के उपशमन का प्रतिपादन करने के लिये तीन सूत्रों का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

इस प्रकार यह जीव दर्शनमोहनीय कर्म को उपशमाता है।।८।।

दर्शनमोहनीय कर्म को उपशमाता हुआ यह जीव कहाँ उपशमाता है ? चारों ही गतियों में उपशमाता है। चारों ही गतियों में उपशमाता हुआ पंचेन्द्रियों में उपशमाता है, एकेन्द्रिय और विकलेन्द्रियों में नहीं उपशमाता है। पंचेन्द्रियों में उपशमाता हुआ संज्ञियों में उपशमाता है, असंज्ञियों में नहीं। संज्ञियों में उपशमाता हुआ, गर्भोपक्रान्तिकों में अर्थात् गर्भज जीवों में उपशमाता है, सम्मूच्र्छिमों में नहीं। गर्भोेपक्रान्तिकों में उपशमाता हुआ पर्याप्तकों में उपशमाता है, अपर्याप्तकों में नहीं। पर्याप्तकों में उपशमाता हुआ संख्यात वर्ष की आयु वाले जीवों में उपशमाता है और असंख्यात वर्ष की आयु वाले जीवों में भी उपशमाता है।।९।।

दर्शनमोह की उपशामना किन-किन क्षेत्रों में और किसके पादमूल में होती है।।१०।।

सिद्धान्तिंचतामणिटीका-सूत्रों का अर्थ सरल है।

दर्शनमोहनीय कर्म का उपशम करने वाला जीव चारों ही गतियों में जानना चाहिये। वह जीव नियम से पंचेन्द्रिय, संज्ञी और पर्याप्तक होता है। इन्द्रक, श्रेणीबद्ध आदि सर्व नरकों में, सर्व प्रकार के भवनवासी देवों में, सर्व समुद्रों में और द्वीपों में, समस्त व्यन्तर देवों में, समस्त ज्योतिष्क देवों में, सौधर्मकल्प से लेकर नवग्रैवेयक विमान तक विमानवासी देवों में, आभियोग्य अर्थात् वाहनादि कर्म में नियुक्त वाहन देवों में, उससे भिन्न किल्विषिक आदि अनुत्तम तथा पारिषद आदि उत्तम देवों में दर्शनमोहनीय कर्म का उपशम होता है।

दर्शनमोह का उपशामक सर्व ही जीव निव्र्याघात अर्थात् उपसर्गादिक के आने पर भी विच्छेद और मरण से रहित होता है। सासादनगुणस्थान को नहीं प्राप्त होता है। उपशमसम्यक्त्व होने के पश्चात् भजितव्य है अर्थात् सासादनपरिणाम को कदाचित् प्राप्त होता भी है और कदाचित् नहीं भी प्राप्त होता है। उपशमसम्यक्त्व का काल क्षीण अर्थात् समाप्त हो जाने पर मिथ्यात्व आदि किसी एक दर्शनमोहनीय प्रकृति का उदय आने से मिथ्यात्व आदि भावों को प्राप्त होता है अथवा दर्शनमोहनीय कर्म के क्षीण हो जाने पर सासादनपरिणाम से सर्वथा रहित होता है।

सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव दर्शनमोहनीय कर्म का अबंधक अर्थात् बंध नहीं करने वाला कहा गया है। इसी प्रकार वेदकसम्यग्दृष्टि, क्षायिकसम्यग्दृष्टि तथा ‘च’ शब्द से उपशमसम्यग्दृष्टि जीव भी दर्शनमोहनीय कर्म का अबंधक होता है।

अनादि मिथ्यादृष्टि जीव के सम्यक्त्व का प्रथम बार लाभ सर्वोपशम से होता है। इसी प्रकार विप्रकृष्ट जीव के अर्थात् जिसने पहले कभी सम्यक्त्वप्रकृति एवं सम्यग्मिथ्यात्व कर्म की उद्वेलना कर बहुत काल तक मिथ्यात्व सहित परिभ्रमण कर पुन: सम्यक्त्व को प्राप्त किया है, ऐसे जीव के प्रथमोपशमसम्यक्त्व का लाभ भी सर्वोपशम से होता है किन्तु जो जीव सम्यक्त्व से गिरकर अभीक्ष्ण अर्थात् जल्दी ही पुन:-पुन: सम्यक्त्व को ग्रहण करता है वह सर्वोपशम और देशोपशम से भजनीय है। मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्वप्रकृति, इन तीनों कर्मों के उदयाभाव को सर्वोपशम कहते हैं तथा सम्यक्त्वप्रकृतिसम्बन्धी देशघाती स्पर्धकों के उदय को देशोपशम कहते हैं। अनादि मिथ्यादृष्टि के प्रथमोपशमसम्यक्त्व के अनन्तर मिथ्यात्व का उदय होता है, किन्तु सादि मिथ्यादृष्टि के मिथ्यात्व भजितव्य है। कहा भी है-

अनादि मिथ्यादृष्टि जीव के जो सम्यक्त्व का प्रथम बार लाभ होता है उसके अनन्तर पूर्व मिथ्यात्व का उदय होता है किन्तु सादि मिथ्यादृष्टि जीव के जो सम्यक्त्व का अप्रथम अर्थात् दूसरी, तीसरी आदि बार लाभ होता है, उसके अनन्तर पश्चात् समय में मिथ्यात्व भजितव्य है अर्थात् वह कदाचित् मिथ्यादृष्टि होकर वेदक अथवा उपशम सम्यक्त्व को प्राप्त होता है और कदाचित् सम्यग्मिथ्यादृष्टि होकर वेदक सम्यक्त्व को प्राप्त होता है।

अब सम्यग्दृष्टि का विशेष लक्षण कहते हैं-

सम्यग्दृष्टि जीव सर्वज्ञ के द्वारा उपदिष्ट प्रवचन को तो नियम से श्रद्धान करता ही है किन्तु कदाचित् अज्ञानवश सद्भूत अर्थ को स्वयं नहीं जानता हुआ गुरु के नियोग से असद्भूत अर्थ का श्री श्रद्धान कर लेता है।।

पुनरपि मिथ्यादृष्टि का लक्षण जानना चाहिये-

मिथ्यादृष्टि जीव नियम से सर्वज्ञ द्वारा उपदिष्ट प्रवचन का तो श्रद्धान नहीं करता है किन्तु असर्वज्ञों के द्वारा उपदिष्ट या अनुपदिष्ट असद्भाव का अर्थात् पदार्थ के विपरीत स्वरूप का श्रद्धान करता है।।

यहाँ पर ‘मिथ्यात्वकर्म को कितने भागरूप करता है’ इस सूत्र का अर्थ पूर्ण हुआ।

पुनश्च ‘दर्शनमोहनीय की उपशामना किन जीवों में अथवा किनके पादमूल में होती है’ इस पृच्छासूत्र को कहा है। उसके पूर्व में विभाषा कही गई है, क्योंकि इस सम्यक्त्व में क्षेत्र का नियम नहीं है और किनके पादमूल में होता है, यहाँ पर भी नियम नहीं है, क्योंकि सर्वत्र सम्यक्त्व ग्रहण संभव है।

इस प्रकार चौथे स्थल में ‘प्रथमोपशमसम्यक्त्व कौन कहाँ उत्पन्न करता है’ इस कथन की मुख्यता से तीन सूत्र पूर्ण हुये हैं।

[सम्पादन]
संप्रति क्षायिकसम्यक्त्वं क्व प्राप्नोतीति प्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-

दंसणमोहणीयं कम्मं खवेदुमाढवेंतो कम्हि आढवेदि, अड्ढाइज्जेसु दीवसमुद्देसु पण्णारसकम्मभूमीसु जम्हि जिणा केवली तित्थयरा तम्हि आढवेदि।।११।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-दर्शनमोहनीयस्य कर्मण: क्षपणप्रदेशं पृच्छितस्य शिष्यस्य तत्प्रदेशप्ररूपणार्थमिदं सूत्रमागतं। ‘सार्धद्वयद्वीपेषु द्वीपसमुद्रेषु’ इति भणिते जंबूद्वीप: धातकीखण्ड: पुष्करार्धमिति सार्धद्वया: द्वीपा: गृहीतव्या:। एतेषु चैव द्वीपेषु दर्शनमोहनीयकर्मण: क्षपणमारभते इति नो शेषद्वीपेषु, शेषद्वीपस्थितजीवानां तत्क्षपणशक्तेरभावात्। लवण-कालोदधिसंज्ञितयो: द्वयो: समुद्रयो: दर्शनमोहनीयं कर्म क्षपयति, नो शेष समुद्रेषु, तत्र सहकारिकारणाभावात्।
सार्धद्वयशब्देषु समुद्र: किन्न विशेषित: ?
नैष दोष:, यथासंभवं विशेषण-विशेषितभाव: ‘इति न्यायात् संभवाभावात् सार्धद्वयसंख्यया न समुद्र: विशेष्यते। न च सार्धद्वयद्वीपानां मध्ये सार्धद्वयसमुद्रा: सन्ति विरोधात्। न च सार्धद्वयद्वीपेभ्य: बाह्यसमुद्रे दर्शनमोहनीयक्षपणं संभवति, उपरि उच्यमानस्य ‘जम्हि जिणा तित्थयरा’ इति विशेषणेन प्रतिषिद्धत्वात्। न मानुषोत्तरगिरिपरभागे जिना: तीर्थकरा: सन्ति, विरोधात्। सार्धद्वयद्वीप-समुद्रस्थितजीवेषु दर्शनमोहनीयक्षपणे प्रसंगे तत्प्रतिषेधार्थं ‘पण्णारसकम्मभूमीसु’ इति भणितं। पंचदशकर्मभूमीषु इति भणिते भोगभूमय: प्रतिषिद्धा:।
कर्मभूमीषु स्थितदेव-मनुष्य-तिरश्चां सर्वेषां अपि ग्रहणं किन्न प्राप्नोतीति चेत् ? न प्राप्नोति, कर्मभूमीषूत्पन्नमनुष्याणां उपचारेण कर्मभूमिव्यपदेशात्।
तह्र्यपि तिरश्चां ग्रहणं प्राप्नोति, तेषां तत्रापि उत्पत्तिप्रसंगात् ?
न, येषां तत्रैवोत्पत्ति:, नान्यत्र संभवोऽस्ति, तेषां चैव मनुष्याणां पंचदशकर्मभूमिव्यपदेश:, न तिरश्चां स्वयंप्रभपर्वतपरभागे उत्पन्नेन व्यभिचारप्राप्ततिरश्चामिति।
उक्तं च- दंसणमोहक्खवणापट्ठवओ कम्मभूमिजादो दु।
णियमा मणुसगदीए णिट्ठवओ चावि सव्वत्थ।।
कश्चिदाह-मनुष्येषूत्पन्ना: कथं समुद्रेषु दर्शनमोह क्षपणं प्रस्थापयन्ति ? नैतद् वक्तव्यं, विद्यादिवशेन तत्रागतानां दर्शनमोहक्षपणसंभवात्।
दु:षमा-अतिदु:षमा-सुषमासुषमा-सुषमा-सुषमादु:षमाकालोत्पन्नमनुष्याणां क्षपणनिवारणार्थं ‘‘जम्हि जिणा’’ इति वचनं। यस्मिन् काले जिना: संभवन्ति तस्मिंश्चैव दर्शनमोहक्षपणाया: प्रस्थापक: भवति, न अन्यकालेषु। देशजिनानां प्रतिषेधार्थं ‘केवली’ पदस्य ग्रहणं। यस्मिन् क्षेत्रे केवलज्ञानिन: सन्ति, तत्रैव क्षपणा भवति, नान्यत्र। तीर्थकरकर्मोदयविरहितकेवलिप्रतिषेधार्थं ‘‘तित्थयरगहणं’’। तीर्थकरपादमूले दर्शनमोहनीयक्षपणं प्रस्थापयन्ति, नान्यत्रेति।
अथवा ‘जिणा’ इति उत्ते ‘चोद्दसपुव्वहरा’ गृहीतव्या:। केवली इति भणिते केवलज्ञानिन: तीर्थकर-कर्मोदयविरहिता: गृहीतव्या:, ‘तित्थयरा’ इति उत्ते तीर्थकरनामकर्मोदयजनिताष्टमहा-प्रातिहार्य-चतुस्त्रिंशदतिशयसहितानां ग्रहणं। एतेषां त्रयाणामपि पादमूले दर्शनमोहक्षपणं प्रस्थापयन्ति इति। अत्र जिनशब्दस्य आवत्र्तिं कृत्वा जिना: दर्शनमोहक्षपणं प्रस्थापयन्ति इति वक्तव्यं, अन्यथा तृतीयपृथिवीत: विनिर्गतानां कृष्णादीनां तीर्थकरत्वानुपपत्ते: इति केषांचित् आचार्याणां व्याख्यानं। एतेन व्याख्यानाभिप्रायेण दु:षमा-अतिदु:षमा-सुषमासुषमा-सुषमाकालेषु उत्पन्नानां एव दर्शनमोहनीयक्षपणा नास्ति, अवशेषद्वयोरपि कालयो: उत्पन्नानामस्ति, एकेन्द्रियात् आगत्य तृतीयकालोत्पन्नवद्र्धनकुमारादीनां१ दर्शनक्षपणदर्शनात्। इदं चैवात्र व्याख्यानं प्रधानं कर्तव्यं।
तात्पर्यमेतत्-सामान्येन तु जीवा: केवलं पूर्वोक्तदु:षमसुषमानामचतुर्थकालेषु तीर्थकर-केवलि-चतुर्दशपूर्विजिनभगवतां पादमूले एव दर्शनमोहनीयक्षपणां प्रारभन्ते, किन्तु ये केचित् तस्मिन्नेव भवे तीर्थकरा: जिना: वा भविष्यन्ति ते तीर्थकरादि-अनुपस्थितौ अपि दर्शनमोहक्षपणां कुर्वन्ति तथा सुषमादु:षमानामतृतीयकालेऽपि दर्शनमोहनीयं क्षपयन्ति वद्र्धनकुमारादीनामिव इति ज्ञातव्यम्।
अधुना दर्शनमोहनीयक्षपणानिष्ठापकानां स्थानप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-णिट्ठवओ पुण चदुसु वि गदीसु णिट्ठवेदि।।१२।।
सिद्धाान्तचिंतामणिटीका-कृतकृत्यवेदकस्य प्रथमसमयादारभ्य उपरितनसमयेषु दर्शनमोहस्य क्षपको जीव: निष्ठापक: उच्यते। स आयुर्बंधवशेन चतु:ष्वपि गतिषु उत्पद्य दर्शनमोहनीयक्षपणां पूरयति, तासु गतिषु उत्पत्ते: कारणलेश्यापरिणामानां तत्र विरोधाभावात्।
दर्शनमोहक्षपणविधिरत्र किन्न प्ररुपिता ?
न, प्रथमोपशमसम्यक्त्वोत्पादनविधे: त्रिकरणादिक्रियाभि: दर्शनमोहक्षपणविधे: भेदाभावेण तत्तश्चैवावगमात्। तस्मात् प्ररूपिता एव भवति।
अथ अस्ति कश्चिद् विशेष:, सोऽपि व्याख्यानात् अवगम्यते।
अधुना दर्शनमोहक्षपणगतविशेषप्ररूपणा क्रियते-
तद्यथा-तत्र तावत् भव्यो जीव: दर्शनमोहनीयं क्षपयन् प्रथमं अनन्तानुबंधिचतुष्कं विसंयोजयति अध:प्रवृत्त-अपूर्वकरण-अनिवृत्तिकरणानि कृत्वा। एतेषां करणानां लक्षणानि यथा प्रथमसम्यक्त्वोत्पत्ते: सन्ति तथैवात्र ज्ञातव्यानि। अध:प्रवृत्तकरणे स्थितिघात: अनुभागघात: गुणश्रेणि: गुणसंक्रमश्च नास्ति। केवलमनन्तगुणाविशुद्धया विशुद्ध्यन् गच्छति यावत् अध:प्रवृत्तकरणकालस्य चरमसमय इति। केवलं विशेषेण तु-अन्यं स्थितिं बध्नन् पूर्वस्थितिबंधात् पल्योपमस्य संख्यातभागेन ऊनां स्थितिं बध्नाति। एतस्य करणस्य प्रथमस्थितिबंधात् चरमस्थितिबंध: संख्यातगुणहीन:।
अपूर्वकरणप्रथमसमये पूर्वस्थितिबंध: पल्योपमस्य संख्यातभागेनोन: अन्य: स्थितिबंध: भवति। तस्मिन् चैव समये पल्योपमस्य संख्यातभागमात्रायामं सागरोपमपृथक्त्वायामं वा आयुर्वर्जितानां कर्मणां स्थितिखंडं आरभते। अप्रशस्तानां कर्मणां अनुभागस्यानंतभागमात्रकाण्डकं च तत्रैवारभते। तत्रैव अनंतानुबंधिनां गुणसंक्रमं अपि आरभते।
अनिवृत्तिकरणप्रथमसमये अन्य: स्थितिबंध:, अन्य: स्थितिखंडक:, अन्योऽनुभागखंडक: अन्या च गुणश्रेणि: सार्धं आरब्धा। एवमनिवृत्तिकरणकाले संख्यातेषु भागेषु गतेषु विशेषघातेन घातयन् अनंतानुबंधिचतुष्कस्थितिसत्त्वकर्ममसंज्ञिस्थितिबंधसमानं जातं। तत: स्थितिकांडकसहस्रेषु चतुरिन्द्रियस्थितिबंधसमानं जातं, इत्यादिविधिना स्थितिकांडकादिकार्यं कुर्वन् अन्तर्मुहूर्तकाले अतिक्रान्ते दर्शनोहनीयक्षपणं प्रस्थापयति।
दर्शनमोहनीयक्षपणपरिणामा अपि अध:प्रवृत्त-अपूर्व-अनिवृत्तिभेदेन त्रिविधा: भवन्ति।
दर्शनमोहनीयस्य अनिवृत्तिकरणप्रथमसमये प्रविष्टस्य स्थितिसत्त्वकर्म संख्यातगुणं। दर्शनमोहनीय-वर्जितानां कर्मणां जघन्य: स्थितिबंध: संख्यातगुण:। तेषां चैव स्थितिबंध: संख्यातगुण:। दर्शनमोहनीयवर्जितानां जघन्यस्थितिसत्त्वकर्म संख्यातगुणं। तेषां चैव उत्कृष्टस्थितिसत्त्वकर्मसंख्यातगुणमिति ज्ञातव्यं।

[सम्पादन]
अब क्षायिक सम्यक्त्व कहाँ प्राप्त होता है, इसका प्रतिपादन करने के लिए सूत्र अवतार लेता है-

सूत्रार्थ-

दर्शनमोहनीय कर्म का क्षपण करने के लिए आरंभ करता हुआ यह जीव कहाँ पर आरंभ करता है ? अढाई द्वीप समुद्रों में स्थित पन्द्रह कर्मभूमियों में जहाँ जिस काल में जिन, केवली और तीर्थंकर होते हैं वहाँ उस काल में आरंभ करता है।।११।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-दर्शनमोहनीय कर्म के क्षपण करने के प्रदेश को पूछने वाले शिष्य के क्षपण-प्रदेश बतलाने के लिए यह सूत्र आया है ‘अढ़ाई-द्वीप समुद्र में’ ऐसा कहने पर ‘जम्बूद्वीप, धातकीखंड और पुष्करार्ध ये अढाई द्वीप ग्रहण करना चाहिए, क्योकि इन अढाई द्वीपों में ही दर्शनमोहनीय कर्म के क्षपण को आरंभ करता है, शेष द्वीपों में नहीं। इसका कारण यह है कि शेष द्वीपों में स्थित जीवों के दर्शनमोहनीय कर्म के क्षपण करने की शक्ति का अभाव है। लवण और कालोदधि संज्ञा वाले दो समुद्रों में जीव दर्शनमोहनीय कर्म का क्षपण करते हैं, शेष समुद्रों में नहीं, क्योंकि उनमें दर्शनमोह के क्षपण करने के सहकारी कारणों का अभाव है।

शंका-‘अढ़ाई’ इस विशेषणरूप के द्वारा समुद्र को विशिष्ट क्यों नहीं किया ?

समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि, ‘यथासंभव विशेषण-विशेष्यभाव होता है’ इस न्याय के अनुसार तीसरे अर्ध समुद्र की संभावना का अभाव होने से ‘अढ़ाई’ इस संख्या के द्वारा समुद्र विशिष्ट नहीं किया गया है और न अढ़ाई द्वीपों के मध्य में अढ़ाई समुद्र हैं, वैसा मानने पर विरोध आता है तथा अढ़ाई द्वीपों से बाहरी आधे समुद्र में दर्शनमोहनीय कर्म का क्षपण संभव भी नहीं है, क्योंकि आगे कहे जाने वाले ‘जहाँ जिन, तीर्थंकर संभव हैं’ इन विशेषण के द्वारा वह प्रतिषिद्ध हो जाता है। मानुषोत्तर पर्वत के पर भाग में जिन और तीर्थंकर नहीं होते हैं, क्योंकि वहाँ उनका अस्तित्व मानने में विरोध आता है।

अढ़ाई द्वीप और समुद्रों में स्थित सर्व जीवों में दर्शनमोह के क्षपण का प्रसंग प्राप्त होने पर उसका प्रतिषेध करने के लिए ‘पन्द्रह कर्मभूमियों में’ यह पद कहा है और पन्द्रह कर्मभूमियों में ऐसा कहने पर भोगभूमियों का प्रतिषेध हो जाता है।

शंका-‘पन्द्रह कर्मभूमियों में’ ऐसा सामान्य से कहने पर कर्मभूमियों में स्थित देव, मनुष्य और तिर्यंच, इन सभी का ग्रहण क्यों नहीं प्राप्त होता है ?

समाधान-नहीं प्राप्त होता है, क्योेंकि कर्मभूमियों में उत्पन्न हुए मनुष्यों की उपचार से ‘कर्मभूमि’ यह संज्ञा की गई है।

शंका-यदि कर्मभूमियों में उत्पन्न हुए जीवों की ‘कर्मभूमि’ यह संज्ञा है, तो भी तिर्यंचों का ग्रहण प्राप्त होता है, क्योंकि उनकी भी कर्मभूमियों में उत्पत्ति संभव है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि जिनकी वहीं पर उत्पत्ति होती है और अन्यत्र उत्पत्ति संभव नहीं है, उन ही मनुष्यों के पन्द्रह कर्मभूमियों का व्यपदेश किया गया है न कि स्वयंप्रभ पर्वत के परभाग में उत्पन्न होने से व्यभिचार को प्राप्त तिर्यंचों का। कहा भी है-

कर्मभूमि में उत्पन्न हुआ और मनुष्यगति में वर्तमान जीव ही नियम से दर्शनमोह की क्षपणा का प्रस्थापक, अर्थात् प्रारंभ करने वाला होता है। किन्तु उसका निष्ठापक अर्थात् पूर्ण करने वाला सर्वत्र अर्थात् चारों गतियों में होता है।।

शंका-मनुष्यों में उत्पन्न हुए जीव समुद्रों में दर्शनमोहनीय की क्षपणा का प्रस्थापन कैसे करते हैं ?

समाधान-नहीं, क्योंकि विद्या आदि के वश से समुद्रों में आये हुए जीवों के दर्शनमोह का क्षपण होना संभव है।

दु:षमा, अतिदु:षमा, सुषमासुषमा, सुषमा और सुषमादु:षमा काल में उत्पन्न हुए मनुष्यों के दर्शनमोह का क्षपण निषेध करने के लिए ‘जहाँ जिन होते हैं’ यह वचन कहा है। जिस काल में जिन संभव हैं, उस ही काल में दर्शनमोह के क्षपण का प्रस्थापक होता है, अन्य कालों में नहीं।

विशेषार्थ-अध:प्रवृत्तकरण के प्रथम समय से लेकर जब तक जीव मिथ्यात्व और मिश्र मोहनीय प्रकृतियों के द्रव्य का अपवत्र्य करके सम्यक्त्व प्रकृति में संक्रमण कराता है तब अन्तर्मुहूर्तकाल तक वह जीव दर्शनमोहनीय का क्षपण का प्रस्थापक कहलाता है।

देशजिनों का अर्थात् श्रुतकेवली, अवधिज्ञानी और मन:पर्ययज्ञानियों का प्रतिषेध करने के लिए सूत्र में ‘केवली’ इस पद का ग्रहण किया है। अर्थात् जिस काल में केवलज्ञानी होते हैं, उसी काल में दर्शनमोह की क्षपणा होती है, अन्य कालों में नहीं। तीर्थंकर नामकर्म के उदय से रहित सामान्य केवलियों के प्रतिषेध के लिए सूत्र में ‘तीर्थंकर’ इस पद का ग्रहण किया है अर्थात् तीर्थंकर के पादमूल में ही मनुष्य दर्शनमोहनीय कर्म का क्षपण प्रारंभ करते हैं, अन्यत्र नहीं। अथवा ‘जिन’ ऐसा कहने पर चतुर्दश पूर्वधारियों का ग्रहण करना चाहिए, ‘केवली’ ऐसा कहने पर तीर्थंकर नामकर्म के उदय से रहित केवलज्ञानियों का ग्रहण करना चाहिए और ‘तीर्थंकर’ ऐसा कहने पर तीर्थंकर नामकर्म के उदय से उत्पन्न हुए आठ महाप्रातिहार्य और चौंतीस अतिशयों से सहित तीर्थंकर केवलियों का ग्रहण करना चाहिए। इन तीनों के पादमूल में कर्मभूमिज मनुष्य दर्शनमोह का क्षपण प्रारंभ करते हैं, ऐसा अर्थ ग्रहण करना चाहिए।

यहाँ पर ‘जिन’ शब्द की आवृत्ति करके अर्थात् दुबारा ग्रहण करके, जिन दर्शनमोहनीयकर्म का क्षपण प्रारंभ करते हैं, ऐसा कहना चाहिए, अन्यथा तीसरी पृथिवी से निकले हुए कृष्ण आदिकों के तीर्थंकरत्व नहीं बन सकता है, ऐसा किन्हीं आचार्यों का व्याख्यान है। इस व्याख्यान के अभिप्राय से दु:षमा, अतिदु:षमा, सुषमा-सुषमा और सुषमा कालों में उत्पन्न हुए जीवों के ही दर्शनमोहनीय की क्षपणा नहीं होती है, अवशिष्ट दोनों कालों में उत्पन्न हुए जीवों के दर्शनमोह की क्षपणा होती है। इसका कारण यह है कि एकेन्द्रिय पर्याय से आकर (इस अवसर्पिणी के) तीसरे काल में उत्पन्न हुए वद्र्धनकुमार आदिकों के दर्शनमोह की क्षपणा देखी जाती है। यहाँ पर हय व्याख्यान ही प्रधानतया ग्रहण करना चाहिए।

तात्पर्य यह है कि-

तात्पर्य यह है कि सामान्यत: तो जीव केवल पूर्वोक्त दुषम-सुषमा काल में तीर्थंकर, केवली या चतुर्दशपूर्वी जिन भगवान के पादमूल में ही दर्शनमोहनीय की क्षपणा का प्रारंभ करते हैं, किन्तु जो उसी भव में तीर्थंकर या जिन होने वाले हैं वे तीर्थंकरादि की अनुपस्थिति में तथा सुषम-दुषमा काल में भी दर्शनमोह का क्षपण करते हैं, उदाहरणार्थ वर्धनकुमार आदि, ऐसा जानना चाहिए।

[सम्पादन]
अब दर्शनमोहनीय की क्षपणा के निष्ठापकों का स्थान प्रतिपादित करने के लिए सूत्र अवतार लेता है-

सूत्रार्थ-

दर्शनमोह की क्षपणा का निष्ठापक तो चारों ही गतियों में उसका निष्ठापन करता है।।१२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-कृतकृत्यवेदक होने के प्रथम समय से लेकर ऊपर के समयों में दर्शनमोह की क्षपणा करने वाला जीव निष्ठापक कहलाता है। दर्शनमोह की क्षपणा का प्रारंभ करने वाला जीव कृतकृत्यवेदक होने के पश्चात् आयु-बंध के वश से चारों ही गतियों में उत्पन्न होकर दर्शनमोहनीय की क्षपणा को पूरा करता है, क्योंकि उन-उन गतियों में उत्पत्ति के कारणभूत लेश्या-परिणाम के वहाँ होने में कोई विरोध नहीं है।

विशेषार्थ-अनिवृत्तिकरण के अन्त समय में सम्यक्त्व मोहनीय की अंतिम फालि के द्रव्य को नीचे के निषेकों में साथ क्षेपण करने से अन्तर्मुहूर्तकाल तक जीव कृतकृत्यवेदक सम्यग्दृष्टि होता है।

शंका-दर्शनमोह के क्षपण की विधि यहाँ पर क्यों नहीं कही ?

समाधान-नहीं, क्योंकि प्रथमोपशमसम्यक्त्व को उत्पादन करने वाली विधि से तीनों करण आदि क्रियाओं के साथ दर्शनमोह की क्षपण-विधि का कोई भेद नहीं है, इसलिए उससे ही दर्शनमोह की क्षपण-विधि का ज्ञान हो जाता है। अतएव वह प्ररूपित की ही गई है और जो कुछ विशेषता है वह भी व्याख्यान से जान ली जाती है। अब दर्शनमोह की क्षपणासंबंधी विशेषता की प्ररूपणा की जाती है। वह इस प्रकार है-

दर्शनमोहनीय का क्षपण करता हुआ भव्य जीव सर्वप्रथम अध:प्रवृत्तकरण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण, इन तीन करणों को करके अनन्तानुबंधिचतुष्क का विसंयोजन करता है। इन करणों के लक्षण, जिस प्रकार प्रथमोपशमसम्यक्त्व की उत्पत्ति में तीनों करणों के लक्षण कहे हैं, उसी प्रकार यहाँ प्ररूपण करना चाहिए। अध:प्रवृत्तकरण में स्थितिघात, अनुभागघात, गुणश्रेणी और गुणसंक्रम नहीं होता है। केवल अनन्तगुणी विशुद्धि से विशुद्ध होता हुआ अध:प्रवृत्तकरणकाल के अन्तिम समय तक चला जाता है। केवल विशेषता यह है कि अन्य स्थिति को बांधता हुआ पहले के स्थितिबंध की अपेक्षा पल्योपम के संख्यातवें भाग से हीन स्थिति को बांधता है। इस अध:प्रवृत्तकरण के प्रथम समय में होने वाले स्थितिबंध से अंतिम समय में होने वाला स्थितिबंध संख्यातगुणा हीन होता है।

अपूर्वकरण के प्रथम समय में पूर्व स्थितिबंध से पल्योपम के संख्यातवें भाग से हीन अन्य स्थितिबंध होता है। उसी समय में आयुकर्म को छोड़कर शेष कर्मों के पल्योपम के संख्यातवें भाग मात्र आयाम वाले अथवा सागरोपमपृथक्त्व आयाम वाले स्थितिकांडक को आरंभ करता है तथा उसी समय में अप्रशस्त कर्मों के अनुभाग के अनन्त बहुभागमात्र अनुभागकांडक को आरंभ करता है। उसी समय में अनन्तानुबंधी कषायों का गुणसंक्रमण भी आरंभ करता है।

अनिवृत्तिकरण के प्रथम समय में अन्य स्थितिबंध, अन्य स्थितिकांडक, अन्य अनुभागकांडक और अन्य गुणश्रेणी एक साथ आरंभ की, इस प्रकार अनिवृत्तिकरणकाल के संख्यात बहुभाग व्यतीत होने पर विशेष घात से घात किया जाता हुआ अनन्तानुबंधी चतुष्क का स्थितिसत्व संज्ञी पंचेन्द्रिय के स्थितिबंध के समान हो गया। इसके पश्चात् सहस्रों स्थितिकांडकों के व्यतीत होने पर अनन्तानुबंधी-चतुष्क का स्थितिसत्त्व चतुरिन्द्रिय के स्थितिबंंध के समान हो गया। इत्यादि विधि से स्थितिकाण्डक आदि कार्यों को करते हुए अन्तर्मुहूर्त काल के व्यतीत हो जाने पर दर्शनमोहनीय कर्म का क्षपण प्रारंभ करता है।

दर्शनमोहनीय के क्षपण करने वाले परिणाम भी अध:प्रवृत्तकरण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण के भेद से तीन प्रकार के होते हैं। इससे अनिवृत्तिकरण के प्रथम समय में प्रविष्ट हुए जीव के दर्शनमोहनीय कर्म का स्थितिसत्त्व संख्यातगुणित है। इससे दर्शनमोहनीय कर्म को छोड़कर शेष कर्मों का जघन्य स्थितिबंध संख्यातगुणित है। इससे उन्हीं कर्मों का उत्कृष्ट स्थितिबंध संख्यातगुणित है। इससे दर्शनमोहनीय कर्म को छोड़कर शेष कर्मों का जघन्य स्थितिसत्त्व संख्यातगुणित है। इससे उन्हीं कर्मों का उत्कृष्ट स्थितिसत्त्व संख्यातगुणित है।

[सम्पादन]
अयं सम्यक्त्वं प्रतिपद्यमानो जीव: अन्येषां कर्मणां स्थितिं कीदृशीं करोति इति पृच्छायां सूत्रमवतार्यते-

सम्मत्तं पडिवज्जंतो तदो सत्त कम्माणमंतोकोडाकोडिं ट्ठिदिं ठवेदि णाणावरणीयं दंसणावरणीयं वेदणीयं मोहणीयं णामं गोदं अंतराइयं चेदि।।१३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सम्यक्त्वोत्पत्तिप्ररूप्यमाणायां सप्तानां कर्मणां स्थितिबंधस्थितिसत्त्वकर्मणो: प्रमाणं प्ररूप्यते।
एतत्प्रमाणं पूर्वं प्ररूपितं ततोऽत्र न वक्तव्यं, पुनरुक्तदोषप्रसंगात् ?
नैष दोष:, सम्यक्त्वं प्रतिपद्यमानस्य स्थितिबंधस्थितिसत्त्वकर्मणो: पूर्वं प्ररुपितप्रमाणं स्मारयित्वा चारित्रं प्रतिपद्यमानस्य स्थितिबंध-स्थितिसत्त्वकर्मणो: प्रमाणप्ररूपणार्थं पुनरपि एतस्य प्ररूपणं कृतं।
सूत्रे ‘तदो’ इत्युत्ते सर्वविशुद्धमिथ्यादृष्टिजीवेन स्थितिबंधापसरणस्थितिकांडकघाताभ्यां घातयित्वा स्थापितस्थितिबंध-स्थितिसत्त्वकर्मणां ग्रहणं कर्तव्यं। तत: सर्वविशुद्धमिथ्यादृष्टिजीवेन स्थापितस्थितिसत्त्वेन संख्यातगुणितहीनं अन्त:कोटाकोटिप्रमाणं सूत्रोक्तसप्तकर्मणां स्थितिसत्त्वं स्थापयति इति कथितं भवति।
अत्र सूत्रे अविद्यमानं संख्यातगुणहीनत्वं कुतो लभ्यते ?
अध्याहारात् लभ्यते। मिथ्यादृष्टिस्थितिबंधं स्थितिसत्त्वं च अपूर्वानिवृत्तिकरणाभ्यां घातयित्वा संख्यातगुणहीनं कृत्वा प्रथमसम्यक्त्वं प्रतिपद्यते, इत्येतेन ज्ञापितं भवति। अत्रतनस्थितिबंधात् स्थितिसत्त्वकर्म संख्यातगुणं, किंच-विशुद्ध्या सत्त्वात् स्थितिबंधस्य बहु घातोपदेशात्।
एवं पंचमस्थले क्षायिकसम्यक्त्वोत्पादनविधिकथनमुख्यत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।
संप्रति चारित्रधारणाय कर्मणां स्थितिप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-चारित्तं पडिवज्जंतो तदो सत्तकम्माणमंतोकोडाकोडिं ट्ठिदिं ट्ठवेदि णाणावरणीयं दंसणावरणीयं वेदणीयं मोहणीयं णामं गोदं अंतराइयं चेदि।।१४।।
'सिद्धान्तचिंतामणिटीका'-तस्य प्रथमोपशमसम्यक्त्वाभिमुखचरमसमयवर्तिमिथ्यादृष्टिजीवस्य स्थितिबंधस्थितिसत्त्वापेक्षया चारित्रं प्रतिपद्यमानजीव: आयुर्वर्जितज्ञानावरणादिसप्तकर्मणां स्थितिं अन्त:कोटाकोटिप्रमाणां स्थापयति।
तच्चारित्रं द्विविधं-देशचारित्रं सकलचारित्रं चेति। तत्र देशचारित्रं प्रतिपद्यमानौ-मिथ्यादृष्टि जीवौ द्विविधौ भवत:। वेदकसम्यक्त्वेन सहितसंयमासंयमाभिमुखा उपशमसम्यक्त्वेन सहितसंयमासंयमाभिमुखाश्चेति। संयमं प्रतिपद्यमाना: अपि एवमेव द्विविधा: भवन्ति। एतेषु संयमासंयमं प्रतिपद्यमानचरमसमयमिथ्यादृष्टि: तत: प्रथमसम्यक्त्वाभिमुखचरमसमयमिथ्यादृष्टिबंधात् स्थितिसत्त्वकर्मणश्च सप्तानां कर्मणां अन्त:कोटा-कोटिस्थितिं स्थापयति।
अस्य भावार्थ:-प्रथमसम्यक्त्वाभिमुखचरमसमयमिथ्यादृष्टिजीवस्य स्थितिबंधात् स्थितिसत्त्वकर्मणश्च संयमासंयमाभिमुखचरमसमयमिथ्यादृष्टिस्थितिबंध-स्थितिसत्त्वकर्म संख्यातगुणहीनं अस्ति, प्रथमसम्यक्त्वत्रि-करणपरिणामेभ्य: अनन्तगुणै: प्रथमसम्यक्त्वानुविद्धसंयमासंयमप्रायोग्यत्रिकरणपरिणामै: प्राप्तघातत्वात्। वेदकसम्यक्त्वं संयमासंयमं च युगपत् प्रतिपद्यमानस्य द्वे चैव करणे भवत:, तत्र अनिवृत्तिकरणस्य अभावात्।
एतस्य अपूर्वकरणचरमसमये वर्तमानमिथ्यादृष्टे: स्थितिसत्त्वकर्म प्रथमसम्यक्त्वाभिमुखानिवृत्ति-करणचरमसमयस्थितमिथ्यादृष्टिस्थितिसत्त्वकर्मण: कथं संख्यातगुणहीनं ?
न, स्थितिसत्त्वस्यापवर्तनं कृत्वा संयमासंयमं प्रतिपद्यमानस्य संयमासंयमचरममिथ्यादृष्टे: तदविरोधात्। अथवा तत्रतनानिवृत्तिकरण-स्थितिघातादपि अत्रतनापूर्वकरणस्थितिघातस्य बहुतरत्वात्, न चेदं अपूर्वकरणं प्रथमसम्यक्त्वाभिमुख-मिथ्यादृष्टि-अपूर्वकरणेन तुल्यं, सम्यक्त्व-संयमासंयम-संयमफलानां तुल्यत्वविरोधात्।
विशेषेण तु-प्रथमोपशमसम्यक्त्वं संयमासंयमं च युगपत् उत्पादयन् भव्य: त्रीण्यपि करणानि करोति, किन्तु असंयतसम्यग्दृष्टि:, अष्टाविंशतिमोहसत्कर्मिक: वेदकसम्यक्त्वाभिमुख: मिथ्यादृष्टिर्वा यदि संयमासंयमं प्राप्नोति तर्हि तस्य द्वे एव करणे भवत:, न चानिवृत्तिकरणं।
संयतासंयतस्य प्रथमसमयादारभ्य यत् प्रतिसमयं अनन्तगुणाविशुद्धिर्भवति सा एकान्तवृद्धिरिति कथ्यते। अस्या: कालोऽन्तर्मुहूर्तमात्रमेव।
सकलचारित्रं त्रिविधं-क्षायोपशमिउक्तं औपशमिउक्तं क्षायिउक्तं चेति। तत्र प्रथमोपशमसम्यक्त्वं संयमं च युगपत् प्रतिपद्यमान: त्रीण्यपि करणानि करोति। यदि पुन: अष्टाविंशतिमोहकर्मसत्ताक: मिथ्यादृष्टि:, असंयतसम्यग्दृष्टि: संयतासंयतो वा संयमं प्राप्नोति तस्य द्वे एव करणे भवत:, अनिवृत्तिकरणाभावात्।
यानि संयमलब्धिस्थानानि तानि त्रिविधानि भवन्ति-प्रतिपातस्थानानि उत्पादस्थानानि तद्व्यतिरिक्त-स्थानानि इति। यस्मिन् स्थाने मिथ्यात्वं वा असंयमसम्यक्त्वं वा संयमासंयमं वा गच्छति तत्प्रतिपातस्थानं। यस्मिन् स्थाने संयमं प्रतिपद्यते तदुत्पादस्थानं। शेषसर्वाणि चैव चारित्रस्थानानि तानि तद्व्यतिरिक्तस्थानानि। एतेषां लब्धिस्थानानामल्पबहुत्वं कथ्यते-सर्वस्तोकानि प्रतिपातस्थानानि। मिथ्यात्वं वा असंयमसम्यक्त्वं वा संयमासंयमं वा गच्छत: चरमसमयसंयतस्य जघन्यपरिणाममादिं कृत्वा यावत् उत्कृष्टप्रतिपातस्थानं इति सर्वेषां ग्रहणात्। उत्पादस्थानानि असंख्यातगुणानि, प्रतिपातस्थानानि अप्रतिपात-अप्रतिपद्यमानस्थानानि च मुक्त्वा शेषसर्वस्थानानां ग्रहणात्। तद्व्यतिरिक्तस्थानानि असंख्यातगुणानि, प्रतिपातोत्पादस्थानानि मुक्त्वा शेषसर्वस्थानानां ग्रहणात्।
अधुना संयमस्थानस्य अल्पबहुत्वं निरूप्यते-
सर्वमन्दानुभागं मिथ्यात्वं गच्छत: जीवस्य जघन्यं संयमस्थानं। तस्यैव उत्कृष्टंसंयमस्थानमनन्तगुणं। असंयमसम्यक्त्वं गच्छत: जघन्यं संयमस्थानमनन्तगुणां। तस्यैवोत्कृष्टं संयमस्थानमनन्तगुणं। संयमासंयमं गच्छत: जघन्यं संयमस्थानमनन्तगुणं। तस्यैवोत्कृष्टं संयमस्थानमनन्तगुणं। कर्मभूमिजस्य संयमं प्रतिपद्यमानस्य जघन्यं संयमस्थानमनन्तगुणं। अकर्मभूमिजस्य-पंचम्लेच्छखंडनिवासिनां संयमं प्रतिपद्यमानस्य जघन्यं संयमस्थानमनन्तगुणं। तस्यैवोत्कृष्टं संयमं प्रतिपद्यमानस्य संयमस्थानमनन्तगुणं। कर्मभूमिजस्य संयमं प्रतिपद्यमानस्य उत्कृष्टं संयमस्थानमनन्तगुणं।
परिहारविशुद्धिसंयतस्य जघन्यं संयमस्थानं छेदोपस्थापनासंयमाभिमुखस्य साधो: अनंतगुणं। तस्यैवोत्कृष्टं संयमस्थानमनन्तगुणं। अस्योपरि सामायिकछेदोपस्थापनासंयतयो: उत्कृष्टं संयमस्थानं अनंतगुणं। अनिवृत्तिकरणगुणस्थानाभिमुखस्य सूक्ष्मसांपरायशुद्धिसंयतस्य जघन्यं संयमस्थानमनन्तगुणं। तस्यैवोत्कृष्टं संयमस्थानमनन्तगुणं, अनन्तगुणविशुद्ध्या समुत्पत्ते:। वीतरागस्य अजघन्यमनुत्कृष्टं चारित्रलब्धिस्थान-मनन्तगुणं१ भवतीति।
संप्रति औपशमिकचारित्रप्राप्र्तेिवधानं कथ्यते-
य: वेदकसम्यग्दृष्टिर्जीव: स: तावत् पूर्वमेव अनन्तानुबंधिकषायान् विसंयोजयति। तस्य तानि त्रीण्येव करणानि प्ररूपयितव्यानि-अध:प्रवृत्तकरणं अपूर्वकरणं अनिवृत्तिकरणं च। अध:प्रवृत्तकरणे नास्ति स्थितिघात: अनुभागघात: गुणश्रेणि: वा। अपूर्वकरणे स्थितिघातोऽनुभागघात: गुणश्रेणि: गुणसंक्रमश्चास्ति। अनिवृत्तिकरणेऽपि एतानि कार्याणि चैव, अन्तरकरणं नास्ति। य: अनन्तानुबंधिकषायान् विसंयोजयति तस्य एषा तावत्समासप्ररूपणा। तत: अनन्तानुबंधिनं विसंयोज्य अन्तर्मुहूर्तं अध:प्रवृत्तो भूत्वा पुन: प्रमत्तगुणस्थानं प्रतिपद्य असाता-अरति-शोक-अयश:कीत्र्यादीनि अत्र बंधयोग्यत्रिषष्टिकर्माणि अन्तर्मुहूर्तं बंधयित्वा तत: दर्शनमोहनीयमुपशामयति। यानि अनन्तानुबंधिविसंयोजनायां त्रीणि करणानि प्ररूपितानि तानि सर्वाणि अस्यौपशमिकचारित्रप्राप्तेरपि प्ररूपयितव्यानि।
य: कश्चिद् उपशमश्रेणीमारोहति, तस्य उपशमनविधानं धवलाटीकायां पठितव्यम्। ततश्च स एव उपशामको महामुनि: दशमगुणस्थानं प्राप्नोति।
सूक्ष्मसांपरायिकचरमसमयस्य ज्ञानावरण-दर्शनावरण-अन्तरायाणां अन्तर्मुहूर्तिक: स्थितिबंध:। नामगोत्रयो: स्थितिबंध: षोडश मुहूर्ता:। वेदनीयस्य स्थितिबंध: चतुर्विंशतिमुहूर्ता:। अनंतरकाले सर्वं मोहनीयमुपशान्तं।
तत: प्रभृति अन्तर्मुहूर्तमुपशान्तकषायवीतरागो जात:। सर्वस्मिन् उपशान्तकाले अवस्थितपरिणाम:। गुणश्रेणिनिक्षेप: उपशान्तकालस्य संख्यातभाग:। केवलज्ञानावरणकेवलदर्शनावरणयोरनुभागोदयेन सर्वोपशान्तकालस्य अवस्थितवेदक:। निद्राप्रचलयो: अपि यावद् वेदक: तावदवस्थितवेदक:। अन्तरायस्याव-स्थितवेदक:। शेषाणां लब्धिकर्मांशानाम् अनुभागोदयो वृद्धिर्वा हानिर्वा अवस्थानं वा। नामगोत्रौ यौ परिणामप्रत्ययौ तयोरवस्थितवेदक: अनुभागेन। एवमौपशमिकचारित्रप्राप्तेर्विधानं भणितम्।
इदमौपशमिकं चारित्रं न मोक्षकारणं, अन्तर्मुहूर्तकालादुपरि निश्चयेन मोहोदयनिबंधनत्वात्।
अवस्थितपरिणाम: वीतराग: उपशान्तकषाय: कथं मोहे निपतति ?
स्वभावात्। स च उपशान्तकषाय प्रतिपातो द्विविध:-भवक्षयनिबंधन: उपशमनकालक्षयनिबंधनश्च। तत्र भवक्षयेण प्रतिपतितस्य सर्वाणि करणानि देवेषु उत्पन्नप्रथमसमये एव उद्घाटितानि। यानि उदीर्यमाणानि कर्माणि तानि उदयावलीं प्रवेशितानि। यानि न उदीर्यमाणानि तानि अपि अपकर्षणं कृत्वा आवलिकाबाह्ये गोपुच्छाकारश्रेणिरूपेण निक्षिप्तानि।
उपशान्तकालस्य क्षयेण प्रतिपतनं कथयिष्यते-उपशान्त: कालक्षयेण पतन् लोभे चैव प्रतिपतति। सूक्ष्मसांपरायिकगुणस्थानमागत्य गुणस्थानान्तरगमनाभावात्। अत्र यथा उपशमश्रेणिमारुह्य महामुनि: यानि यानि कार्याणि अकरोत् तानि तानि कार्याणि उद्घाट्य अधोऽधोऽवतरति इति ज्ञातव्यं।
विशेषजिज्ञासुभि: धवलाटीकायां दृष्टव्य:।
अत्र मनाक् विशेष: कथ्यते-
कश्चिदपि महायति: उपशमश्रेणिमारुह्यमाण: क्रमेणारोहति, पतत्यपि क्रमेणैव।
उक्तंच- उवसामगा दु सेढिं आरोहंति य पडंति य कमेण।
उवसामगेसु मरिदो देवतमत्तं समल्लियई।।
अस्यायमर्थ:-उपशमश्रेणिमारुह्यमाणस्य अपूर्वानिवृत्तिसूक्ष्मसांपरायनामानि त्रीणि गुणस्थानानि भवन्ति, अवतीर्यमाणोऽपि सूक्ष्मसांपराय-अनिवृत्ति-अपूर्वकरणनामानि त्रीण्येव लभन्ते। उपशमश्रेण्यां मृत्वा महाऋद्धिधारिणो देवा भवंति। उपशान्तकषायो वीतराग: महायति: कालक्षयेण दशमगुणस्थानं, भवक्षयेण तत्क्षणमेव चतुर्थगुणस्थानं प्राप्नोति अत: उपशान्तकषायनामधेयस्य एकादशगुणस्थानवर्तिनो वीतरागछद्मस्थस्य द्वे एव गुणस्थाने भवत:।
उपशमश्रेणिं कतिवारां लब्धुं शक्नोति इति पृच्छायां कथ्यते-
चत्तारि वारमुवसमसेढिं समरुहदि खविदकम्मंसो।
बत्तीसं वाराइं, संजममुवलहिय णिव्वादि।।६१९।।
कश्चिदपि महामुनि: व्यवहार-निश्चयरत्नत्रयबलेन निर्विकल्पशुद्धात्मश्रद्धानज्ञानानुचरणरूपनिश्चय-धम्र्यध्यानेन शुक्लध्यानेन वा अधिकतमा: चतु:वारानेव उपशमश्रेणी: समारोहति, न चाधिकवारान् पश्चात् नियमेन कर्मांशान् क्षपयन् क्षपकश्रेणिमारुह्य केवलज्ञानी भगवान् अर्हन् परमेष्ठी भवति।
कश्चिदपि महासाधु: संयमं द्वात्रिंशद्वारान् एवं प्राप्तुं शक्नोति पुनश्च नियमेन निर्वाणं प्राप्नोति।
भगवान् ऋषभदेव: पूर्वभवे द्विवारं उपश्रेणिमारुरोह। तद्यथा-
अस्मिन् मध्यलोके प्रथमद्वीपस्य जंबूद्वीपस्य पूर्वविदेहे पुष्कलावतीदेशस्य पुण्डरीकिणीनगर्यां तीर्थकरपदधारको राजा वङ्कासेन:, तस्य श्रीकान्तामहाराज्ञ्य: पुत्रोऽभूद् वङ्कानाभि:। एकदा लौकान्तिकामरै: पूजित: श्रीवङ्कासेनतीर्थकर: दीक्षां जग्राह, पुत्रवङ्कानाभये राज्याभिषेकं कृत्वा। तदनंतरं दु:सहतपश्चरणं कुर्वता भगवता वङ्कासेनतीर्थकरेण ध्यानचव्रेण घातिकर्माणि निहत्य केवलज्ञानं लब्धं। इत: वङ्कानाभि-महाराजस्य आयुधशालायां चक्ररत्नमाविर्बभूव। चक्रवर्तिना वङ्कानाभिसम्राजा षट्खण्डान् विजित्य दिग्विजयी संजात:। बहुकालपर्यंतं चक्रवर्तित्वपदमनुभूय एकदा पित्रा तीर्थकरदेवेन दुर्लभं रत्नत्रयस्वरूपं ज्ञात्वा जैनेश्वरी दीक्षां जग्राह। नानाविधतपश्चरणं कुर्वता वङ्कानाभिमहामुनिना स्वपितु: तीर्थकरस्य पादमूले दर्शनविशुद्ध्यादिषोडशकारणभावनां भावयता तीर्थकरप्रकृतिबंध: कृत:।
एकचर्यांव्रतं पालयन् महासाधु एकदा विशुद्धात्मानं ध्यायन् सन् उपशमश्रेणिमारुह्य उपशान्तकषाय-गुणस्थानं संप्राप्य तत्रान्तर्मुहूर्तं स्थित्वा गुणस्थानकालक्षयेणाधोऽवतीर्य पुनरपि षष्ठसप्तमगुणस्थानयो: कालं व्यतीत्य द्वितीयवारं उपश्रेणिमारुह्य उपशान्तकषायवीतरागछद्मस्थो महामुनि: तत्रान्तर्मुहूर्तमात्रं स्थित्वा भवक्षयेण तत्रैव मनुष्यायु: समाप्य-मृत्वा सर्वार्थसिद्धिविमाने अहमिंद्रो बभूव।
उक्तं च महापुराणे आर्षग्रन्थे-
विशुद्धभावन: सम्यग् विशुद्ध्यन् स्वविशुद्धिभि:। तदोपशमकश्रेणीमारुरोह मुनीश्वर:।।८९।।
अपूर्वकरणं श्रित्वाऽनिवृत्तिकरणोऽभवत्। स सूक्ष्मराग: संप्रापद् उपशांतकषायताम्।।९०।।
कृत्स्नस्य मोहनीयस्य प्रशमादुपपादितं। तत्रौपशमिकं प्रापच्चारित्रं सुविशुद्धिकम्।।९१।।
सोऽन्तर्मुहूत्र्ताद् भूयोऽपि स्वस्थानस्थोऽभवद् यति:। नोध्र्वं मूहूत्र्तात् तत्रास्ति निसर्गात् स्थितिरात्मन:।।९२।।
सोऽबुद्ध परमं मंत्रं सोऽबुद्ध परमं तप:। सोऽबुद्ध परमामिष्टिं सोऽबुद्ध परमं पदम् ।।९३।।
तत: कालात्यये धीमान् श्रीप्रभाद्रौ समुन्नते। प्रायोपवेशनं कृत्वा शरीराहारमत्यजत्।।९४।।
रत्नत्रयमयीं शय्यां अधिशय्य तपोनिधि:। प्रायेणोपविशत्यस्मिन्नित्यन्वर्थमापिपत् ।।९५।।
पुनश्च-
द्वितीयवारमारुह्य श्रेणीमुपशमादिकाम्। पृथक्त्वध्यानमापूर्य समाधिं परमं श्रित:।।११०।।
उपशान्तगुणस्थाने कृतप्राणविसर्जन:। सर्वार्थसिद्धिमासाद्य संप्रापत् सोहमिन्द्रताम् ।।१११।।
द्विषट्कयोजनैर्लोकप्रान्तमप्राप्य यत्स्थितं। सर्वार्थसिद्धिनामाग्र्यं विमानं तदनुत्तरम् ।।११२।।
जंबूद्वीपसमायामविस्तारपरिमण्डलम्। त्रिषष्टिपटलप्रान्ते चूडारत्नमिव स्थितम् ।।११३।।
यत्रोत्पन्नवतामर्था: सर्वे सिद्ध्यन्त्ययत्नत:। इति सर्वार्थसिद्ध्याख्यां यद्विभत्त्र्यर्थयोगिनाम्१।।११४।।
ततश्च्युत्वा अयमहमिन्द्र: प्रथमतीर्थकर: श्रीऋषभदेवो बभूव।
एवं षष्ठस्थले क्षायोपशमिक-औपशमिकचारित्रप्रतिपादनत्वेन एकं सूत्रं गतम्।
अधुना संपूर्णचारित्रप्रतिपद्यमानमहासाधो: स्वरूपनिरूपणाय सूत्रमवतरति-संपुण्णं पुण चारित्तं पडिवज्जंतो तदो चत्तारि कम्माणि अंतोमुहुत्तट्ठिदिं ट्ठवेदि णाणावरणीयं दंसणावरणीयं मोहणीयमंतराइयं चेदि।।१५।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तत: अन्त:कोटाकोटिप्रमाणात् स्थितिबंधात् विशुद्ध्या घातयन् चतु:कर्मणां अन्तर्मुहूर्तस्थितिं स्थापयति।
किमर्थमन्तर्मुहूर्तिकां स्थितिं करोति ?
उपशामकविशुद्धे: क्षपकविशुद्धीनामानन्त्यात्।
एवं सप्तमस्थले संपूर्णचारित्रप्रतिपद्यमानस्य कथनत्वेन सूत्रमेकं गतम्।

[सम्पादन]
अब सम्यक्त्व को प्राप्त करता हुआ जीव अन्य कर्मों की स्थिति को कैसी करता है, ऐसा प्रश्न होने पर सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

उस सर्वविशुद्ध मिथ्यादृष्टि के स्थितिसत्त्व की अपेक्षा सम्यक्त्व को प्राप्त होने वाला जीव ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, वेदनीय, मोहनीय, नाम, गोत्र और अन्तराय, इन सात कर्मों की अन्त:कोड़ाकोड़ीप्रमाण स्थिति को स्थापित करता है।।१३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सम्यक्त्व की उत्पत्ति की प्ररूपणा में सातों कर्मों की स्थितिबंधों और स्थितिसत्त्वों का प्रमाण प्ररूपित किया गया है।

शंका-सम्यक्त्वोत्पत्ति की प्ररूपणा करते समय सातों कर्मों के स्थितिबंधों और स्थितिसत्त्वों का प्रमाण पहले ही प्ररूपण कर दिया गया है इसलिए उसे यहाँ पर नहीं कहना चाहिए, क्योंकि पुनरुक्त दोष का प्रसंग आता है ?

समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि सम्यक्त्व को प्राप्त होने वाले जीव के कर्मों के स्थिति बंध और स्थितिसत्त्व का पूर्वप्ररूपित प्रमाण स्मरण कराकर चारित्र को प्राप्त करने वाले जीव के स्थितिबंध और स्थितिसत्त्व का प्रमाण प्ररूपण करने के लिए पुन: इसका प्ररूपण किया गया है।

सूत्र में ‘तदो’ यह पद कहने पर सर्वविशुद्ध मिथ्यादृष्टि जीव के द्वारा स्थितिबंधापसरण और स्थितिकांडकघात से घातकर स्थापित कर्मों के स्थितिबंध और स्थितिसत्त्व का ग्रहण करना चाहिए। उससे, अर्थात् विशुद्ध मिथ्यादृष्टि जीव के द्वारा स्थापित स्थितिसत्त्व से संख्यातगुणित हीन अन्त:कोड़ाकोड़ीप्रमाण इन सूत्रोक्त सात कर्मों का स्थितिसत्त्व स्थापित करता है, अर्थात् उत्पन्न करता है, यह अर्थ कहा गया है।

शंका-यहाँ सूत्र में अविद्यमान संख्यात गुणहीन भाव कहाँ से लब्ध होता है ?

समाधान-सूत्र में अविद्यमान उक्त अर्थ अध्याहार से उपलब्ध होता है।

मिथ्यादृष्टि के स्थितिबंध को और स्थितिसत्त्व को अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण परिणामों के द्वारा घात करके संख्यातगुणित हीन कर प्रथमोपशमसम्यक्त्व को प्राप्त होता है, यह बात इस सूत्र-पद से ज्ञापित की गई है। यहाँ पर होने वाले स्थितिबंध से यहाँ पर होने वाला स्थितिसत्त्व संख्यातगुणित होता है, क्योंकि विशुद्धि के द्वारा सत्त्व की अपेक्षा स्थितिबंध के बहुत घात का उपदेश पाया जाता है।

इस प्रकार पाँचवें स्थल में क्षायिक सम्यक्त्व के उत्पन्न करने की विधि की मुख्यता से तीन सूत्र पूर्ण हुए।

[सम्पादन]
अब चारित्र को धारण करने के लिए कर्मों की स्थिति प्रतिपादन हेतु सूत्र अवतार लेता है-

सूत्रार्थ-

उस प्रथमोपशमसम्यक्त्व के अभिमुख चरमसमयवर्ती मिथ्यादृष्टि के स्थितिबंध और स्थितिसत्त्व की अपेक्षा चारित्र को प्राप्त होने वाला जीव ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, वेदनीय, मोहनीय, नाम, गोत्र और अन्तराय, इन सात कर्मों की अन्त:कोड़ाकोड़ी प्रमाण स्थिति को स्थापित करता है।।१४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-प्रथमोपशमसम्यक्त्व के अभिमुख हुये अंतिम समयवर्ती मिथ्यादृष्टि जीव के स्थितिबंध और स्थितिसत्त्व की अपेक्षा से चारित्र को प्राप्त करने वाला जीव आयु को छोड़कर शेष सात कर्मों की स्थिति को अन्त:कोटाकोटी प्रमाण स्थापित करता है।

वह चारित्र दो प्रकार का है-देशचारित्र और सकलचारित्र। उनमें देशचारित्र को प्राप्त होने वाले मिथ्यादृष्टि जीव दो प्रकार के होते हैं-वेदकसम्यक्त्व से सहित संयमासंयम के अभिमुख और उशमसम्यक्त्व से सहित संयमासंयम के अभिमुख। इसी प्रकार संयम को प्राप्त होने वाले मिथ्यादृष्टि जीव भी दो प्रकार के होते हैं। इनमें संयमासंयम को प्राप्त होने वाला चरमसमयवर्ती मिथ्यादृष्टि उससे अर्थात् प्रथमोपशमसम्यक्त्व के अभिमुख चरमसमयवर्ती मिथ्यादृष्टि के स्थितिबंध और स्थितिसत्त्व की अपेक्षा आयुकर्म को छोड़कर शेष सातों कर्मों की अन्त:कोड़ाकोडी प्रमाण स्थिति को स्थापित करता है। इस पूर्वोक्त कथन का भावार्थ यह है-प्रथमोपशमसम्यक्त्व के अभिमुख चरमसमयवर्ती मिथ्यादृष्टि के स्थितिबंध से और स्थितिसत्त्व से संयमासंयम के अभिमुख चरमसमयवर्ती मिथ्यादृष्टि का स्थितिबंध और स्थितिसत्त्व संख्यातगुणित हीन होता है, क्योंकि प्रथमोपशमसम्यक्त्व को उत्पन्न करने वाले तीनों करण-परिणामों की अपेक्षा अनन्तगुणित ऐसे प्रथमोपशमसम्यक्त्व से संयुक्त संयमासंयम के योग्य तीनों करण-परिणामों से यह स्थितिघात प्राप्त हुआ है। वेदक सम्यक्त्व को और संयमासंयम को युगपत् प्राप्त होने वाले जीव के दो ही करण होते हैं, क्योंकि वहाँ पर अनिवृत्तिकरण नहीं होता है।

शंका-अपूर्वकरण के अंतिम समय में वर्तमान इस उपर्युक्त मिथ्यादृष्टि जीव का स्थितिसत्त्व, प्रथमोपशमसम्यक्त्व के अभिमुख अनिवृत्तिकरण के अंतिम समय में स्थित मिथ्यादृष्टि के स्थितिसत्त्व से संख्यातगुणित हीन कैसे है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि स्थितिसत्त्व का अपवर्तन करके संयमासंयम को प्राप्त होने वाले संयमासंयम के अभिमुख चरमसमयवर्ती मिथ्यादृष्टि के संख्यातगुणित हीन स्थितिसत्त्व के होने में कोई विरोध नहीं है। अथवा वहाँ के अर्थात् प्रथमोपशमसम्यक्त्व के अभिमुख मिथ्यादृष्टि के, अनिवृत्तिकरण से होने वाले स्थितिघात की अपेक्षा यहाँ के अर्थात् संयमासंयम के अभिमुख मिथ्यादृष्टि के, अपूर्वकरण से होने वाला स्थितिघात बहुत अधिक होता है तथा यह अपूर्वकरण, प्रथमोपशमसम्यक्त्व के अभिमुख मिथ्यादृष्टि के अपूर्वकरण के साथ समान नहीं है, क्योंकि सम्यक्त्व, संयमासंयम और संयमरूप फल वाले विभिन्न परिणामों के समानता होने का विरोध है।

विशेष बात यह है कि कोई भव्य जीव प्रथमोपशम सम्यक्त्व और संयमासंयम को एक साथ उत्पन्न करते हुए तीनों करणों को करता है किन्तु अट्ठाईस मोहनीय कर्म की सत्त्व वाला असंयतसम्यग्दृष्टि अथवा वेदक सम्यक्त्व के अभिमुख हुआ मिथ्यादृष्टि यदि संयमासंयम को प्राप्त करता है तो उसके दो ही करण होते हैं, अनिवृत्तिकरण नहीं होता है।

संयतासंयत के प्रथम समय से प्रारंभ करके जो प्रतिसमय अनंतगुणा विशुद्धि होती है, वह ‘एकान्तवृद्धि’ कहलाती है। इसका काल अन्तर्मुहूर्त मात्र ही है।

क्षायोपशमिक, औपशमिक और क्षायिक के भेद से सकल चारित्र तीन प्रकार का है। उनमें क्षायोपशमिक चारित्र को प्राप्त करने का विधान कहते हैं। वह इस प्रकार है-प्रथमोपशमसम्यक्त्व और संयम को एक साथ प्राप्त करने वाला जीव तीनों ही करणों को करके (संयम को) प्राप्त होता है। उन करणों का लक्षण किस प्रकार सम्यक्त्व की उत्पत्ति में कहा है उसी प्रकार कहना चाहिए। यदि पुन: मोहकर्म की अट्ठाईस प्रकृतियों की सत्ता वाला मिथ्यादृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि अथवा संयतासंयत जीव संयम को प्राप्त करता है, तो दो ही करण होते हैं क्योंकि उसके अनिवृत्तिकरण का अभाव होता है।

यहाँ पर जो संयमलब्धि के स्थान हैं, वे तीन प्रकार के होते हैं। वे इस प्रकार हैं-प्रतिपातस्थान, उत्पादस्थान और तद्व्यतिरिक्तस्थान। उनमें पहले प्रतिपातस्थान को कहते हैं-जिस स्थान पर जीव मिथ्यात्व को अथवा असंयमसम्यक्त्व को अथवा संयमासंयम को प्राप्त होता है वह प्रतिपातस्थान है। अब उत्पादस्थान को कहते हैं-जिस स्थान पर जीव संयम को प्राप्त होता है वह उत्पादस्थान है। इनके अतिरिक्त शेष सर्व ही चारित्र स्थानों को तद्व्यतिरिक्तस्थान कहते हैं। अब इन संयमलब्धि स्थानों का अल्पबहुत्व कहते हैं। वह इस प्रकार है-प्रतिपातस्थान सबसे कम हैं, क्योंकि मिथ्यात्व को अथवा असंयमसम्यक्त्व को अथवा संयमासंयम को जाने वाले अन्तिमसमयवर्ती संयत के जघन्य परिणामों को आदि करके उत्कृष्ट प्रतिपातस्थान तक के सभी स्थानों का ग्रहण किया गया है। प्रतिपातस्थानों से उत्पादस्थान असंख्यातगुणित हैं, क्योंकि प्रतिपातस्थानों को और अप्रतिपात-अप्रतिपद्यमानस्थानों को छोड़कर शेष सर्व स्थानों का ग्रहण किया गया है। उत्पादस्थानों से तद्व्यतिरिक्त स्थान असंख्यातगुणित हैं, क्योंकि प्रतिपातस्थान और उत्पादस्थानों को छोड़कर शेष सर्व स्थानों का ग्रहण किया गया है।

अब संयमस्थान के अल्पबहुत्व को कहते हैं-

सर्वमन्दानुभागरूप मिथ्यात्व को प्राप्त करने वाले जीव के जघन्य संयमस्थान होता है। उसका ही उत्कृष्ट संयमस्थान अनन्तगुणा है। अविरतसम्यक्त्व को प्राप्त करने वाले जीव का जघन्य संयमस्थान अनन्तगुणा है। उसका ही उत्कृष्ट संयमस्थान अनन्तगुणा है। संयमासंयम को प्राप्त होने वाले का जघन्य संयमस्थान अनन्तगुणा है। उसका ही उत्कृष्ट संयमस्थान अनंतगुणा है। संयम को प्राप्त करने वाले कर्मभूमिज (आर्य) मनुष्य का जघन्य संयमस्थान अनंतगुणा है। संयम को प्राप्त करने वाले अकर्मभूमिज, अर्थात् पाँच म्लेच्छ खंडों में रहने वाले, मनुष्य का जघन्य संयमस्थान अनन्तगुणा है। संयम को प्राप्त करने वाले उसका ही उत्कृष्ट संयमस्थान अनन्तगुणा है। संयम को प्राप्त करने वाले कर्मभूमिज (आर्य) मनुष्य का उत्कृष्ट संयमस्थान अनन्तगुणा है। छेदोपस्थापनासंयम के अभिमुख हुए परिहारविशुद्धिसंयत का जघन्य संयमस्थान अनन्तगुणा है। उसका ही उत्कृष्ट संयमस्थान अनन्तगुणा है। इसके ऊपर सामायिक छेदोपस्थापनसंयतों का उत्कृष्ट संयमस्थान अनन्तगुणा है। अनिवृत्तिकरण गुणस्थान के अभिमुख हुए सूक्ष्मसाम्परायिकविशुद्धिसंयत का जघन्य संयमस्थान अनंतगुणा है। उसी का उत्कृष्ट संयमस्थान अनन्तगुणा है। क्योंकि उसकी उत्पत्ति अनन्तगुणी विशुद्धि से है। वीतराग का अजघन्यानुत्कृष्ट चरित्रलब्धिस्थान अनन्तगुणा है।

अब औपशमिक चारित्र की प्राप्ति के विधान को कहते हैं। वह इस प्रकार है-जो वेदकसम्यग्दृष्टि जीव है वह पूर्व में ही अनन्तानुबंधिचतुष्ट्य का विसंयोजन करता है। उसके जो करण होते हैं उनका प्ररूपण करते हैं। वह इस प्रकार है-अध:प्रवृत्तकरण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण। अध:प्रवृत्तकरण में स्थितिघात, अनुभागघात अथवा गुणश्रेणी नहीं है। किन्तु अपूर्वकरण में स्थितिघात, अनुभागघात गुणश्रेणी और गुणसंक्रमण हैं। ये ही कार्य अनिवृत्तिकरण में भी हैं, अन्तरकरण नहीं है। जो अनन्तानुबंधिचतुष्ट्य का विसंयोजन करता है उसकी यह संक्षेप से प्ररूपणा है। तत्पश्चात् अनन्तानुबंधिचतुष्ट्य का विसंयोजन करके अन्तर्मुहूर्तकाल तक अध:प्रवृत्त अर्थात् स्वस्थानअप्रमत्त होकर पुन: प्रमत्तगुणस्थान को प्राप्त कर असाता, अरति, शोक और अयश:कीर्ति आदिक (प्रमत्तगुणस्थान में बंधने योग्य तिरेसठ) कर्मप्रकृतियों को अन्तर्मुहूर्त तक बांधकर पश्चात् दर्शनमोहनीय को उपशमाता है। अनन्तानुबंधी के विसंयोजन में जिन तीनों करणों का प्ररूपण किया जा चुका है, वे सब इसके भी कहे जाने चाहिए। जो कोई महामुनि उपशमश्रेणी पर आरोहण करते हैं। उनके उपशमन का विधान धवला टीका में पढ़ना चाहिए। इसके पश्चात् वे उपशामक महामुनि दशवें गुणस्थान को प्राप्त कर लेते हैं।

चरमसमयवर्ती सूक्ष्मसाम्परायिक के ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय, इनका अन्तर्मुहूर्त मात्र स्थिति वाला बंध होता है। नाम व गोत्र कर्मों का स्थितिबंध सोलह मुहूर्तप्रमाण होता है। वेदनीय का स्थितिबंध चौबीस मुहूर्तमात्र होता है। अनन्तर काल में सब मोहनीय कर्म उपशान्त हो जाता है। तब से लेकर अन्तर्मुहूर्त तक उपशान्तकषायवीतराग रहता है। समस्त उपशान्तकाल में अवस्थित परिणाम होता है तथा (ज्ञानावरणादि कर्मों का) गुणश्रेणी निक्षेप उपशान्तकाल के संख्यातवें भाग होता है। केवल ज्ञानावरण और केवलदर्शनावरण के सर्व उपशान्त काल में अवस्थित अनुभागोदय का वेदक है। निद्रा और प्रचला का भी जब तक वेदक है तब तक अवस्थित वेदक ही है। अन्तराय की पाँच प्रकृतियों का भी अवस्थित वेदक ही है। शेष लब्धिकर्मांशों का अर्थात् चार ज्ञानावरण और तीन दर्शनावरण कर्मों का, अनुभागोदय वृद्धि, हानि एवं अवस्थितिस्वरूप है। नाम, गोत्र जो परिणामप्रत्यय हैं उनका अनुभाग से अवस्थित वेदक होता है। इस प्रकार औपशमिक चारित्र की प्राप्ति का विधान कहा गया है। यह औपशमिक चारित्र मोक्ष का कारण नहीं है, क्योंकि अन्तर्मुहूर्त काल से ऊपर वह निश्चयत: मोह के उदय का कारण होता है।

'शंका-अवस्थित परिणाम वाला उपशान्तकषाय वीतराग मोह में कैसे गिरता है ?

समाधान-स्वभाव से गिरता है।

उपशान्तकषाय का वह प्रतिपात दो प्रकार है, भवक्षयनिबंधन और उपशमनकालक्षयनिबंधन। इनमें भव क्षय से प्रतिपात को प्राप्त हुए जीव के देवों में उत्पन्न होने के प्रथम समय मेें ही बंध, उदीरणा एवं संक्रमणादिरूप सब कारण निज स्वरूप से प्रवृत्त हो जाते हैं। जो कर्म उदीरणा को प्राप्त हैं वे उदयावली में प्रवेशित हैं। जो उदीरणा को प्राप्त नहीं है, वे भी अपकर्षण करके उदयावली के बाहर गोपुच्छाकार श्रेणीरूप से निक्षिप्त होते हैं। उपशान्तकाल के क्षय से होने वाले प्रतिपात को कहते हैं। वह इस प्रकार है-उपशान्तगुणस्थान काल के क्षय से प्रतिपात को प्राप्त होने वाला उपशान्तकषाय जीव लोभ में अर्थात् सूक्ष्मसाम्परायिक गुणस्थान में गिरता है, क्योंकि उसके सूक्ष्मसाम्परायिक गुणस्थान को छोड़कर अन्य गुणस्थान में जाने का अभाव है। यहाँ जिस प्रकार उपशमश्रेणी में चढ़कर महामुनि ने जिन-जिन क्रियाओं को किया था। स्थितिघात आदि की भी, उन्हीं-उन्हीं क्रियाओं का उद्घाटन करके नीचे-नीचे उतरते हैं, ऐसा समझना। विशेष जिज्ञासुओं को धवला टीका में देखना चाहिए।

यहाँ किंचित् विशेष कहते हैं-

कोई भी महायति उपशमश्रेणी पर चढ़ते हुए क्रम-क्रम से चढ़ते हैं और पुन: उसी क्रम से ही नीचे उतरते हैं।

गोम्मटसार कर्मकांड में कहा भी है-

उपशामक मुनि उपशमश्रेणी में क्रम से आरोहण करते हैं और उसी क्रम से नीचे गिरते हैं। उपशमश्रेणी में मरते हैं तो नियम से देवगति में उत्कृष्ट देवत्व-अहमिंद्रपद को प्राप्त करते हैं।।

इसका अभिप्राय यह है कि उपशमश्रेणी में चढ़ते समय अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण और सूक्ष्मसांपराय ये तीन गुणस्थान होते हैं और उतरने वाले के भी सूक्ष्मसाम्पराय, अनिवृत्तिकरण और अपूर्वकरण ये ही तीन गुणस्थान होते हैं। उपशम श्रेणी में मरण होने पर महाऋद्धिधारी देव अहमिंद्र ही होते हैं।

उपशम श्रेणी से चढ़कर उपशांतकषाय सहित वीतरागी महामुनि काल के क्षय से उपशांतकषाय नाम के ग्यारहवें गुणस्थान का काल पूर्ण हो जाने से वापस दशवें गुणस्थान में आते हैं और भव के क्षय से आयु के पूर्ण हो जाने से उसी क्षण चौथे गुणस्थान को प्राप्त कर लेते हैं। इसलिए उपशांतकषाय नाम वाले ग्यारहवें गुणस्थानवर्ती वीतराग छद्मस्थ महामुनि के दो ही गुणस्थान होते हैं। उपशमश्रेणी कितनी बार प्राप्त करना शक्य है ? ऐसा प्रश्न होने पर कहते हैं-

कर्मों के अंश का क्षपण करने वाले ऐसे क्षपितकर्मांश मुनि उपशम श्रेणी पर अधिक से अधिक चार बार ही चढ़ सकते हैं। सकल संयम को उत्कृष्टरूप से बत्तीस बार प्राप्त कर सकते हैं पुन: नियम से मोक्ष को प्राप्त कर लेते हैं।।६१९।।

कोई महामुनि व्यवहार-निश्चयरत्नत्रय के बल से निर्विकल्प शुद्ध आत्मा का श्रद्धान, ज्ञान और अनुचरणरूप निश्चयधर्मध्यान अथवा शुक्लध्यान के द्वारा अधिकतम चार बार ही उपशम श्रेणी पर चढ़ते हैं इससे अधिक बार नहीं, पश्चात् नियम से कर्मों के अंशों का क्षपण करते हुए क्षपक श्रेणी पर चढ़कर केवलज्ञानी भगवान अर्हंत परमेष्ठी हो जाते हैं।

कोई भी महासाधु संयम को बत्तीस बार ही प्राप्त कर सकते हैं, पुन: नियम से मोक्ष को प्राप्त कर लेते हैं।

भगवान ऋषभदेव पूर्व भव में दो बार उपशम श्रेणी में चढ़े हैं। उसी को कहते हैं-

इस मध्यलोक में प्रथम द्वीप जंबूद्वीप के पूर्व विदेह में पुष्कलावती देश की पुण्डरीकिणी नगरी में तीर्थंकर पद के धारक राजा वङ्कासेन हुए हैं, उनकी महारानी श्रीकांता के पुत्र वङ्कानाभि हुए हैं। एक समय लौकांतिक देवों के द्वारा पूजा को प्राप्त श्री वङ्कासेन तीर्थंकर ने पुत्र वङ्कानाभि का राज्याभिषेक करके स्वयं दीक्षा ग्रहण कर ली। अनंतर घोर तपश्चरण करते हुए भगवान वङ्कासेन तीर्थंकर ने ध्यानचक्र के द्वारा घातिकर्मों का नाश कर केवलज्ञान प्राप्त कर लिया। इधर वङ्कानाभि महाराज की आयुधशाला में चक्ररत्न उत्पन्न हो गया। तब चक्रवर्ती वङ्कानाभि सम्राट् छह खण्ड पृथिवी को जीतकर दिग्विजयी हुए। बहुत काल पर्यंत चक्रवर्ती पद का अनुभव करके एक समय पिता तीर्थंकर वङ्कासेन के समवसरण में दुर्लभ रत्नत्रय का स्वरूप सुनकर जैनेश्वरी दीक्षा ले ली, नाना प्रकार के तपश्चरण को करते हुए वङ्कानाभि महामुनि ने अपने पिता तीर्थंकर प्रभु के पादमूल में दर्शनविशुद्धि आदि सोलहकारण भावनाओं को भाते हुए तीर्थंकर प्रकृति का बंध कर लिया।

पुन: एक चर्या व्रत का पालन करते हुए महासाधु किसी समय विशुद्ध आत्मा का ध्यान करते हुए उपशम श्रेणी में चढ़कर उपशांतकषाय नाम के ग्यारहवें गुणस्थान को प्राप्त करके वहाँ पर अंतर्मुहूर्त रहकर गुणस्थान का काल पूर्ण हो जाने से नीचे उतरकर पुन: छठे-सातवें गुणस्थान में आकर उसमें काल व्यतीत कर दूसरी बार उपशम श्रेणी में चढ़कर उपशांतकषाय वीतराग छद्मस्थ महामुनि वहाँ पर अंतर्मुहूर्त काल रहकर भव के क्षय से वहीं पर मनुष्यायु को समाप्त करके मरण करके-उत्कृष्ट पंडितमरण करके सर्वार्थसिद्धि विमान मेंं अहमिन्द्र हो गये। महापुराण नाम के आर्षग्रंथ में कहा है-

विशुद्ध भावनाओं को धारण करने वाले वङ्कानाभि मुनिराज जब अपने विशुद्ध परिणामों से उत्तरोत्तर विशुद्ध हो रहे थे तब वे उपशमश्रेणी पर आरूढ़ हुए।।८९।। वे अध:करण के बाद आठवें अपूर्वकरण का आश्रय कर नौवें अनिवृत्तिकरण गुणस्थान को प्राप्त हुए और उसके बाद जहाँ राग अत्यन्त सूक्ष्म रह जाता है ऐसे सूक्ष्मसाम्पराय नामक दसवें गुणस्थान को प्राप्तकर उपशान्तमोह नामक ग्यारहवें गुणस्थान को प्राप्त हुए। वहाँ उनका मोहनीय कर्म बिल्कुल ही उपशान्त हो गया था।।९०।। सम्पूर्ण मोहनीय कर्म का उपशमन हो जाने से वहाँ उन्हें अतिशय विशुद्ध औपशमिक चारित्र प्राप्त हुआ।।९१।। अन्तर्मुहूर्त के बाद वे मुनि फिर भी स्वस्थानअप्रमत्त नामक सातवें गुणस्थान में स्थित हो गये अर्थात् ग्यारहवें गुणस्थान में अन्तर्मुहूर्त ठहरकर वहाँ से च्युत हो उसी गुणस्थान में आ पहुँचे जहाँ से कि आगे बढ़ना शुरू किया था। उसका खास कारण यह है कि ग्यारहवें गुणस्थान में आत्मा की स्वाभाविक स्थिति अन्तर्मुहूर्त से आगे है ही नहीं।।९२।। मुनिराज वङ्कानाभि उत्कृष्ट मंत्र को जानते थे, उत्कृष्ट तप को जानते थे, उत्कृष्ट पूजा को जानते थे और उत्कृष्ट पद (सिद्धपद) को जानते थे।।९३।। तत्पश्चात् आयु के अंत समय में उन बुद्धिमान वङ्कानाभि ने श्रीप्रभ नामक ऊँचे पर्वत पर प्रायोपवेशन (प्रायोपगमन नाम का सन्यास) धारण कर शरीर और आहार से ममत्व छोड़ दिया।।९४।। चूँकि इस सन्यास में तपस्वी साधु रत्नत्रयरूपी शय्या पर उपविष्ट होता है, बैठता है, इसलिए इसका प्रायोपवेशन नाम सार्थक है।।९५।। पुन: वे द्वितीय बार उपशम श्रेणी पर आरूढ़ हुए और पृथक्त्ववितर्क नामक शुक्लध्यान को पूर्ण कर उत्कृष्ट समाधि को प्राप्त हुए।।११०।। अन्त में उपशान्तमोह नामक ग्यारहवें गुणस्थान में प्राण छोड़कर सर्वार्थसिद्धि पहुँचे और वहाँ अहमिन्द्र पद को प्राप्त हुए।।१११।। यह सर्वार्थसिद्धि नामक विमान लोक के अंत भाग से बारह योजन नीचा है। सबसे अग्रभाग में स्थित और सबसे उत्कृष्ट है।।११२।। इसकी लम्बाई, चौड़ाई और गोलाई जम्बूद्वीप के बराबर है। यह स्वर्ग के तिरेसठ पटलों के अंत में चूड़ामणि रत्न के समान स्थित है।।१३।। चूँकि उस विमान में उत्पन्न होने वाले जीवों के सब मनोरथ अनायास ही सिद्ध हो जाते हैं इसलिए वह सर्वार्थसिद्धि इस सार्थक नाम को धारण करता है।।११४।।

ये अहमिंद्र वहाँ से च्युत होकर प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव हुए हैं।

इस प्रकार छठे स्थल में क्षायोपशमिक और औपशमिक चारित्र का प्रतिपादन करने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ।

[सम्पादन]
अब संपूर्ण चारित्र को प्राप्त करने वाले महासाधु के स्वरूप का प्रतिपादन करने के लिए सूत्र अवतार लेता है-

सूत्रार्थ-

सम्पूर्ण चारित्र को प्राप्त करने वाला ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय और अन्तराय इन चार कर्मों की अन्तर्मुहूर्तमात्र स्थिति को स्थापित करता है।।१५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सम्पूर्ण चारित्र को प्राप्त करने वाला क्षपक विशुद्धि के निमित्त से घात को प्राप्त होने वाले ऐसे अन्त: कोड़ाकोड़ी प्रमाण स्थितिबंध से ज्ञानावरण आदि चार कर्मों की अन्तर्मुहूर्त मात्र स्थिति को स्थापित करता है।

शंका-यह क्षपक अन्तर्मुहूर्तमात्र ही स्थिति को क्यों स्थापित करता है ?

समाधान-उपशामक की विशुद्धि से क्षपक की विशुद्धियाँ अनन्तगुणी हैं, अतएव वह अन्तर्मुहूर्तमात्र स्थिति को स्थापित करता है।

इस प्रकार सातवें स्थल में सम्पूर्ण चारित्र को प्राप्त करने वाले का कथन करते हुए एक सूत्र पूर्ण हुआ।

[सम्पादन]
अघातिकर्मणां जघन्यस्थितिप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-

वेदणीयं वारसमुहुत्तं ट्ठिदिं ठवेदि, णामागोदाणमट्ठमुहुत्तट्ठिदिं ठवेदि, सेसाणं कम्माणं भिण्णमुहुत्तट्ठिदिं ठवेदि।।१६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इदं सूत्रं, पूर्वमपि सूत्रं, द्वे अपि देशामर्शके स्त:।
संपूर्णचारित्रं प्रतिपद्यमानस्य महायते: अपूर्वकरणादिगुणस्थानेषु स्थितिकांडकानुभागकांडकादिक्रियाभि: कर्मक्षपणा जायते। तद्विशेषजिज्ञासाऽिस्त तर्हि धवलाटीका अभ्यसनीया लब्धिसारग्रन्थोऽपि पठितव्य:।
यदा सूक्ष्मसांपरायिको महामुनि: चरमसमयवर्ती भवति तदा तस्य नामगोत्रयो: स्थितिबंधोऽष्टमुहूर्ता:, वेदनीयस्य स्थितिबंध: द्वादश मुहूर्ता:, त्रयाणां घातिकर्मणां स्थितिबंधोऽन्तर्मुहूर्तं। तेषां चैव त्रयाणां स्थितिसत्त्वमपि अन्तर्मुहूर्तं नामगोत्रवेदनीयानां स्थितिसत्त्वमसंख्यातवर्षाणि। मोहनीयस्य स्थितिसत्त्वं तत्र नश्यति।
तदानीं चारित्रमोहनीयस्य क्षयानंतरं प्रथमसमयक्षीणकषायो जात:।
तस्मिन्नेव समये स्थिति-अनुभागयोरबंधक:। एवं यावत् एकसमयाधिकावलिमात्रछद्मस्थकालस्यावशेष: तावत् त्रयाणां घातिकर्मणामुदीरकोऽस्ति। तत: द्विचरमसमये निद्राप्रचलयो: उदयसत्त्वव्युच्छेद:। तत्पश्चात् ज्ञानावरण-दर्शनावरण-अन्तरायाणां एकसमयेन सत्त्वोदयव्युच्छेद:। अनंतरं-
अनन्तकेवलज्ञान-दर्शन-वीर्ययुक्त: जिन: केवली सर्वज्ञ: सर्वदर्शी सयोगिजिन: असंख्यातगुणश्रेण्या: कर्मप्रदेशाग्रं निर्जरयन् विहरति इति।
केषु गुणस्थानेषु का: का: प्रकृती: क्षपयति ?
उच्यते-कर्माभावो द्विविध:-यत्नसाध्योऽयत्नसाध्यश्चेति। तत्र चरमदेहस्य नारकतिर्यग्देवायुषामभावो न यत्नसाध्य:, असत्त्वात्। यत्नसाध्यस्तु कथ्यते-असंयतसम्यग्दृष्ट्यादिषु चतुर्षु गुणस्थानेषु कस्मिंश्चित्सप्त-प्रकृतिक्षय: क्रियते। निद्रानिद्रा-प्रचलाप्रचला-स्त्यानगृद्धि:-नरकगतितिर्यग्गत्येकद्वित्रिचतुरिन्द्रियजातिनरक-गतितिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूव्र्यातपोद्योतस्थावरसूक्ष्मसाधारणसंज्ञिकानां षोडशानां कर्मप्रकृतीनामनिवृत्तिबादर-सांपरायस्थाने युगपत्क्षय: क्रियते। तत: परं तत्रैव कषायाष्टकं नष्टं क्रियते। नपुंसकवेद: स्त्रीवेदश्च क्रमेण तत्रैव क्षयमुपयाति। नोकषायषट्कं च सहैकेनैव प्रहारेण विनिपातयति। तत: पुंवेदसंज्वलनक्रोधमानमाया: क्रमेण तत्रैवात्यन्तिकं ध्वंसमास्कदन्ति। लोभसंज्वलन: सूक्ष्मसांपरायान्ते यात्यन्तं। निद्राप्रचले क्षीणकषाय-वीतरागच्छद्मस्थस्योपान्त्यसमये प्रलयमुपव्रजत: पंचानां ज्ञानावरणानां चतुर्णां दर्शनावरणानां पंचानामन्तरायाणां च तस्यैवान्त्यसमये प्रक्षयो भवति।’’ तदनंतरं ज्ञानदर्शनस्वभावं केवलपर्यायमप्रतक्त्र्यविभूति-विशेषमवाप्नोति।
इमे केवलिभगवन्त: समवसरणमध्ये चतुरंंगुलाधरविराजमाना: द्वादशगणान् अष्टदशमहाभाषाभि: सप्तशतलघुभाषाभिश्च दिव्यध्वनिना उपदिशन्ति योगनिरोधात्पूर्वं आर्यखण्डे विहरन्ति असंख्यभव्यजीवान् धर्मामृतवृष्टिभि: परितर्पयन्ति।
ततोऽन्तर्मुहूर्ते आयुषि शेषे केवलिसमुद्घातं करोति। प्रथमसमये दण्डं करोति। तस्मिन् समुद्घाते आयुर्वर्जितत्रि-अघातिकर्मणां स्थिते: असंख्यातबहुभागान् हन्ति। क्षीणकषायस्यान्त्यसमयशेषस्य चानुभागस्य अप्रशस्तप्रकृतीनां अनन्तस्य बहुभागान् हन्ति।
द्वितीयसमये कपाटं करोति। तस्मिन्नेव शेषस्थिते: असंख्यातबहुभागान् नाशयति। तथा अप्रशस्तप्रकृतीनां शेषानुभागस्य अनन्तबहुभागान् नाशयति। पश्चात् तृतीयसमये मंथसंज्ञितं अपरनामप्रतरसमुद्घातं करोति। अस्मिन् समुद्घाते स्थितिअनुभागान् पूर्ववत् हन्ति। अनंतरं चतुर्थसमये लोकपूरणसमुद्घातं समाप्नोति। अस्मिन् लोकपूरणसमुद्घाते समयोगजातसमये योगस्य एक वर्गणा भवति। पूर्ववत् अस्मिन्नपि स्थिति-अनुभागान् निर्जरयति। लोके पूरणे आयुष: संख्यातगुणितां अन्तर्मुहूर्तस्थितिं स्थापयति।
एतेषु चतुर्षु समयेषु अप्रशस्तकर्मांशानामनुभागस्य प्रतिसमयमपवर्तना भवति, एकैकसमये एकैकस्य स्थितिकांडकस्य घातश्च।
समुद्घातसंकोचस्य-अवतरणस्य प्रथमसमयादारभ्य शेषस्थिते: संख्यातबहुभागं हन्ति। शेषस्य चानुभागस्य अनन्तबहुभागं नाशयति। लोकपूरणसमुद्घातस्यानंतरसमयादारभ्य स्थितिकांडकस्यानुभाग-कांडकस्य च अन्तर्मुहूर्तमात्रं उत्कीरणकालं प्रवर्तमानमस्ति।
इत: अन्तर्मुहूर्तं गत्वा बादरकाययोगेन बादरमनोयोगं निरुणद्धि। तत: अंतर्मुहूत्र्तेण बादरकाययोगेन बादरवचोयोगं निरुणद्धि। अनंतरं अन्तर्मुहूर्तेण बादरकाययोगेन बादरोच्छ्वासनि:श्वासं निरुणद्धि। तत्पश्चात् अन्तर्मुहूर्तेण बादरकाययोगेन तमेव बादरकाययोगं निरुणद्धि। तदनु अन्तर्मुहूर्तं गत्वा सूक्ष्मकाययोगेन सूक्ष्ममनोयोगनिरोधं करोति। तत: परं अन्तर्मुहूर्तं गत्वा सूक्ष्मवचनयोगनिरोधं करोति। तदनंतरं अन्तर्मुहूर्तं गत्वा सूक्ष्मकाययोगेन सूक्ष्मोच्छ्वासनि:श्वासनिरोधं करोति।
तत: अन्तर्मुहूर्तं गत्वा सूक्ष्मकाययोगेन सूक्ष्मकाययोगनिरोधं कुर्वन् इमानि करणानि करोति-प्रथमसमये पूर्वस्पर्धकानां अध: अपूर्वस्पर्धकानि करोति।
आदिवर्गणाया: अविभागप्रतिच्छेदानामसंख्यातभागमपकर्षयति, जीवप्रदेशानांचासंख्यातभागम-पकर्षयति। एवमन्तर्मुहूर्तमपूर्वस्पर्धकानि करोति। इमानि अपूर्वस्पर्धकानि असंख्यातगुणहीनाया: श्रेण्या: क्रमेण करोति, परन्तु जीवप्रदेशानां अपकर्षणं असंख्यातगुणितश्रेण्या: क्रमेण भवति। एतानि सर्वाणि अपूर्वस्पर्धकानि जगत्श्रेण्या: असंख्यातभाग:, श्रेणिवर्गमूलस्यापि असंख्यातभाग:, पूर्वस्पर्धकानामपि चासंख्यातभाग इति।
एतेषां अपूर्वस्पर्धकानां करणानन्तरं अन्तर्मुहूर्तपर्यंतं कृष्टी: करोति। कृष्टिकरणसमाप्तौ तदनंतरसमये पूर्वस्पर्धकानि अपूर्वस्पर्धकानि च नाशयति। अन्तर्मुहूर्तकालं यावत् कृष्टिगतयोगो भवति। तदानीं केवली भगवान् सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति ध्यानं ध्यायति। सयोगिकेवलिगुणस्थानस्य चरमसमये च कृष्टीनां असंख्यातान् बहुभागान् नाशयति। योगस्य निरोधे सति नामगोत्रवेदनीयकर्माणि आयु:समानि भवन्ति।
तत: अन्तर्मुहूर्तं योगाभावेन निरुद्धास्रवत्वात् शैलेश्यं प्रतिपद्यते-अष्टादशसहस्रशीलानां आधिपत्यं प्राप्नोति। तदानीं असौ अयोगिकेवली भगवान् समुच्छिन्नक्रियानिवृत्तिशुक्लध्यानं ध्यायति। अस्यायोगिकेवलिन: द्बिचरमसमये त्रिसप्ततिप्रकृतीनां सत्त्वव्युच्छेद: क्षय: निर्मूलविनाश: भवति। तासां नामानि-देवगति-पंचशरीर-पंचबंधन-पंचसंघात-षट्संस्थान-षट्संहनन-त्र्यंगोपांग-पंचवर्ण-द्विगंध-पंचरस-अष्टस्पर्श-मनुष्य-देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वि-अगुरुलघुक-उपघात-परघात-उच्छ्वास-प्रशस्ताप्रशस्तविहायोगति-प्रत्येकशरीर-अपर्याप्त-स्थिरास्थिर-शुभाशुभ-सुस्वरदु:स्वर-दुर्भग-अनादेय-अयश:कीर्ति-निर्माण-नीचैर्गोत्राणि अन्यतरवेदनीयश्चैता: त्रिसप्ततिप्रकृतयो भवन्ति।
ततश्च एतस्यैवायोगिकेवलिनो भगवत: अन्त्यसमये शेषैकवेदनीय-मनुष्यगति-मनुष्यायु:-पंचेन्द्रियजाति-त्रस-बादर-पर्याप्त-सुभग-आदेय-यश:कीर्ति-तीर्थकर-उच्चैर्गोत्राणीति एता: द्वादशप्रकृतय: सत्त्वात् विनश्यन्ति। तत्समये एव अयं भगवान् सर्वकर्मविप्रमुक्त: सिद्धिं गच्छति।
एवं द्वाभ्यां सूत्राभ्यां सूचितस्यार्थस्य प्ररूपणायां कृतायां संपूर्णचारित्रप्राप्तेर्विधानं प्ररुपितं भवति।
कै: कै: तीर्थकरदेवै: कियत्कियत्दिवसानां योगनिरोध: कृत: ?
उच्यते- आद्यश्चतुर्दशदिनैर्विनिवृत्तयोग:, षष्ठेन निष्ठितकृतिर्जिनवर्धमान:।
शेषा विधूतघनकर्मनिबद्धपाशा: मासेन ते यतिवरास्त्वभवन्वियोगा:।।
यद्यपि अत्र अधिकतमयोगनिरोधकाल: एकमासपर्यंतं कथ्यते तथापि समवसरणविघटनकाल एव तावत्, किंच-बादरकाययोगनिरोधादिसूक्ष्मकाययोगनिरोधपर्यंतकाला: पृथक्पृथगन्तर्मुहूर्ता:, तथापि सर्वे मिलित्वा अन्तर्मुहूर्तमेवेति ज्ञातव्यम्।
एते तीर्थकरादय: येनासनेन योगनिरोधं कुर्वन्ति तेनैवासनेन मोक्षं गच्छन्ति।
उक्तं च- वृषभो वासुपूज्यश्च, नेमि: पद्मासनात् शिवम्।
कायोत्सर्गस्थिता: प्रापु:, शेषाश्च जिनपुंगवा:।।
दिगम्बरजैनशासने खड्गासनेन पद्मासनेन वा मोक्षं प्राप्नुवन्ति न चान्यासनेन।
‘संपुण्णं चारित्तं’ अनेन कतितमश्चारित्रं विवक्षितं अस्ति किं च षष्ठसप्तमगुणस्थानवर्तिनोरपि चारित्रं सकलमिति निगद्यते ?
सत्यमुक्तं भवता, यत् षष्ठादिगुणस्थानवर्तिनां सामायिक-छेदोपस्थापना-परिहारशुद्धि-सूक्ष्मसांपराय-चारित्राणि, तानि तु पंचपापानां पूर्णत्यागात् महाव्रतापेक्षयैव। चारित्रस्य पूर्णता तु यथाख्यातचारित्रे एव। इदमपि चारित्रं उपशान्तकषायगुणस्थानादारभ्य आ अयोगिनस्तत्रापि चतुर्दशगुणस्थानान्त्यसमये एव अस्य पूर्णत्वं कथितमस्ति अत्र धवलाटीकायां-श्लोकवार्तिकालंकारे च, तदेव दृश्यताम्-
‘‘निश्चयनयादयोगकेवलिचरमसमयवर्तिनो रत्नत्रयस्य मुत्तेर्हेतुत्वव्यवस्थिते:।’’
इदं सकलचारित्रं सर्वसावद्ययोगनिवृत्तेरपेक्षया सामायिकचारित्रमेकं, छेदोपस्थापनापेक्षया भेदमाश्रित्य त्रयोदशविधं अष्टाविंशतिमूलगुणस्वरूपं भवति। एतत्कर्मभूमिजानां मनुष्यानामेव संभवति न च भोगभूमिजानां। आर्यिकाणामपि उपचारमहाव्रतै: श्रूयते अतोऽतीवदुर्लभं। अस्मिन् दु:षमकाले कथमपि एनमवाप्य सर्वप्रयत्नेन रक्षणीयं अस्माभिरिति। अस्य माहात्म्यं महर्षयोऽपि ब्रुवन्ति, इदं महत्फलदायीति ज्ञातव्यम्।
श्रीगौतमस्वामिना सकलचारित्रस्य वृक्षसंज्ञा कृता-
उक्तं च- व्रतसमुदयमूल: संयमस्कंधबंधो, यमनियमपयोभिर्वर्धित: शीलशाख:।
समितिकलिकभारो गुप्तिगुप्तप्रवालो, गुणकुसुमसुगंधि: सत्तपश्चित्रपत्र:।।
शिवसुखफलदायी यो दयाछाययोद्घ:, शुभजनपथिकानां खेदनोदे समर्थ:।
दुरितरविजतापं प्रापयन्नन्तभावं, स भवविभवहान्यै नोऽस्तु चारित्रवृक्ष:१।।
एतानि चारित्राणि पंचभेदयुक्तानि तानि सर्वाण्यपि वयं नमस्याम:। गणधरदेवा अपि तानि प्रणमन्ति तथा च पंचमचारित्रं याचन्ते।
तथैवोत्तं- चारित्रं सर्वजिनैश्चरितं प्रोत्तंकं च सर्वशिष्येभ्य:।
प्रणमामि पंचभेदं, पंचमचारित्रलाभाय।।
सम्यग्दर्शनस्य पूर्णत्वं क्षायिकसम्यग्दर्शने परमावगाढसम्यक्त्वे वा। ज्ञानस्य पूर्णत्वं केवलज्ञाने, सम्यक्चारित्रस्य पूर्णत्वं अयोगिकेवलिनामन्त्यसमये च। अतएव वयमपि रत्नत्रयस्य पूर्णत्वं प्राथ्र्यते श्रीजिनेन्द्रदेवस्य पादपद्ममूले।
श्रीपद्मनन्द्रि-आचार्येणापि ईदृशी प्रार्थना कृता पद्मनन्दिपंचविंशतिकाग्रन्थे-
इन्द्रत्वं च निगोदतां च बहुधा मध्ये तथा योनय:। संसारे भ्रमता चिरं यदखिलं प्राप्ता मयाऽनन्तश:।।
तन्नापूर्वमिहास्ति किंचिदपि मे हित्वा विकल्पावलिं। सम्यग्दर्शनबोधवृत्त पदवीं तां देव! पूर्णां कुरु।।
एवं सप्तमस्थले घाति-अघातिकर्मणां जघन्यस्थिति-कर्मनाशनविधिना सिद्धपदप्राप्तिपर्यंतसूचनपरत्वेन सूत्रद्वयं गतम्।
इति षट्खण्डागमस्य प्रथमखण्डे षष्ठग्रन्थे गणिनीज्ञानमती कृत सिद्धान्तचिंतामणिटीकायां सम्यक्त्वोत्पत्ति चूलिका नामाष्टमश्चूलिकाधिकार: समाप्त:।
येनादिब्रह्मणा श्रीऋषभदेवेन भगवता हुंडावसर्पिण्या: दोषेण त्रिवर्षाष्टमासैकपक्षाधिकं चतुरशीति-लक्षपूर्ववर्षं पुरा अयोध्यानगर्यां जन्म गृहीत्वा सा पूतीकृता, तं भगवन्तं नमस्कृत्य तां च अनन्तानंततीर्थकर-जन्मभूमिं शाश्वतीमयोध्यापुरीमपि नमाम:।
अनन्तानन्ततीर्थेशां, जन्मभूमिर्मतागमे। अयोध्याख्या पुरी पूता-ऽजन्मने तां नुमो वयम्।।१।।
इति श्रीमद्भगवत्पुष्पदन्तभूतबलिप्रणीतषट्खण्डागमस्य प्रथमखण्डे षष्ठग्रन्थे श्रीमद्भूतबलिसूरि-विरचितजीवस्थानचूलिकायां श्रीवीरसेनाचार्यरचितधवलाटीकाप्रमुखनानाग्रन्थाधारेण विरचितायां विंशतितमे शताब्दौ प्रथमाचार्य: चारित्रचक्रवर्तिश्रीशांतिसागर: तस्य प्रथमपट्टाधीश: श्रीवीरसागराचार्य: तस्य शिष्या जंबूद्वीपरचनाप्रेरिकागणिनी-ज्ञानमतीकृतसिद्धान्तचिंतामणिटीकायां सम्यक्त्वोत्पत्ति चूलिका-पर्यंताष्टचूलिका समन्वितोऽयं प्रथमो महाधिकार: समाप्त:।

[सम्पादन]
अब अघातिकर्मों की जघन्यस्थिति का प्रतिपादन करने के लिए सूत्र अवतार लेता है-

सूत्रार्थ-

सम्पूर्ण चारित्र को प्राप्त करने वाला क्षपक वेदनीय की बारह मुहूर्त, नाम व गोत्र कर्मों की आठ मुहूर्त और शेष कर्मों की भिन्न मुहूर्त अर्थात् अन्तर्मुहूर्त मात्र स्थिति को स्थापित करता है।।१६।।

सिद्धांतचिंतामणिटीका-यह सूत्र एवं पूर्व का भी सूत्र, ये दोनों भी देशामर्शक हैं।

संपूर्ण चारित्र को प्राप्त करने वाले महायति के अपूर्वकरण आदि गुणस्थानों में स्थितिकाण्डक, अनुभागकाण्डक आदि क्रियाओं के द्वारा कर्मों का क्षपण होता है। इसको जानने की यदि विशेष इच्छा है तो धवला टीका का अभ्यास करना चाहिए एवं लब्धिसार ग्रंथ को भी पढ़ना चाहिए।

जिस समय महामुनि अन्तिमसमयवर्ती सूक्ष्मसाम्परायिक होता है, उस समय में नाम व गोत्र कर्मों का स्थितिबंध आठ मुहूर्त वेदनीय का स्थितिबंध बारह मुहूर्त और तीन घातिया कर्मों का स्थितिबंध अन्तर्मुहूर्त मात्र होता है। इन्हीं तीन घाितया कर्मों का स्थितिसत्व भी अन्तर्मुहूर्त मात्र होता है। नाम, गोत्र व वेदनीय इनका स्थितिसत्व असंख्यात वर्षप्रमाण होता है। मोहनीय का स्थितिसत्व वहाँँ नष्ट हो जाता है।

चारित्रमोहनीय के क्षय के अनन्तर समय में प्रथम समयवर्ती क्षीणकषाय होता है। उसी समय में ही सब कर्मों की स्थिति और अनुभाग का अबंधक होता है।

विशेषार्थ-कर्मों की स्थिति और अनुभाग के बंध का कारण कषाय है। अतएव कषाय के क्षीण हो जाने पर कारण के अभाव में कार्याभाव के न्यायानुसार, उक्त दोनों बंधों का भी अभाव हो जाता है। किन्तु प्रकृतिबंध केवल योग के निमित्त से होता है और क्षीणकषाय हो जाने पर भी योग की प्रवृत्ति रहती ही है। अतएव यहाँ प्रकृतिबंध का निषेध नहीं किया गया। जयधवलानुसार प्रदेशबंध का भी व्युच्छेद स्थिति व अनुभाग के बंधव्युच्छेद के साथ ही हो जाता है।

इस प्रकार एक समय अधिक आवलिमात्र छद्मस्थ काल के शेष रहने पर तीन घातिया कर्मों का उदीरक होता है। इसके पश्चात् द्विचरम समय में निद्रा और प्रचला के उदय व सत्त्व की व्युच्छित्ति हो जाती है। तदनन्तर एक समय में ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय, इनके उदय व सत्त्व की व्युच्छित्ति होती है। पश्चात् अनन्तर समय में अनन्त केवलज्ञान, केवलदर्शन और अनन्त वीर्य से युक्त जिन, केवली, सर्वज्ञ एवं सर्वदर्शी होकर सयोगिजिन प्रतिसमय असंख्यातगुणित श्रेणी से कर्मप्रदेशाग्र की निर्जरा करते हुए धर्मप्रवर्तन के लिए विहार करते हैं।

शंका-किन-किन गुणस्थानों में कौन-कौन सी प्रकृतियों का क्षय होता है ?

समाधान-इसे बताते हैं-कर्म का अभाव दो प्रकार का है-यत्नसाध्य और अयत्नसाध्य। इनमें से चरम देह वाले के नरकायु, तिर्यंचायु और देवायु का अभाव यत्नसाध्य नहीं होता, क्योंकि चरम देह वाले के उनका सत्व नहीं उपलब्ध होता। आगे यत्नसाध्य अभाव कहते हैं-असंयतसम्यग्दृष्टि आदि चार गुण्स्थानों में से किसी एक गुणस्थान में सात प्रकृतियों का क्षय करता है। पुन: निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला, स्त्यानगृद्धि, नरकगति, तिर्यंचगति, एकेन्द्रिय जाति, द्वीन्द्रियजाति, त्रीन्द्रियजाति, चतुरिन्द्रियजाति, नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, तिर्यंचगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, आतप, उद्योत, स्थावर, सूक्ष्म और साधारण नाम वाली सोलह कर्मप्रकृतियों का अनिवृत्तिबादरसाम्पराय गुणस्थान में एक साथ क्षय करता है। इसके बाद उसी गुणस्थान में आठ कषायों का नाश करता है। पुन: वहीं पर नपुंसकवेद और स्त्रीवेद का क्रम से क्षय करता है तथा छह नोकषायों को एक ही प्रहार के द्वारा गिरा देता है। तदनन्तर पुरुषवेद, संज्वलनक्रोध, संज्वलनमान और संज्वलनमाया का वहाँ पर क्रम से अत्यन्त क्षय करता है तथा लोभसंज्वलन सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थान के अंत में विनाश को प्राप्त होता है। निद्रा और प्रचला क्षीणकषाय वीतरागछद्मस्थगुणस्थान के उपान्त्य समय में प्रलय को प्राप्त होते हैं। पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण और पाँच अन्तराय कर्मों का उसी गुणस्थान के अंतिम समय में क्षय होता है।

इसके अनंतर ज्ञान-दर्शन स्वभाव केवलपर्याय जो कि अकल्पित ऐसी विभूति विशेष है, उसे प्राप्त कर लेता है।

ये केवली भगवान समवसरण के मध्य चार अंगुलि अधर विराजमान होते हैं। वे भगवान अठारह महाभाषा और सात सौ लघु भाषाओं में दिव्यध्वनि के द्वारा द्वादशगणों को-द्वादशसभा में स्थित असंख्य भव्यों को उपदेश देते हैं। योग निरोध से पूर्व ये भगवान आर्यखण्ड में श्रीविहार करते हैं और असंख्य भव्यजीवों को धर्मरूपी अमृत की वृष्टि से संतर्पित करते हैं।

पश्चात् अन्तर्मुहूर्तमात्र आयु के शेष रहने पर केवलिसमुद्घात को करते हैं। इसमें प्रथम समय में दण्डसमुद्घात को करते हैं। उस दण्डसमुद्घात में वर्तमान होते हुए आयु को छोड़कर शेष तीन अघातिया कर्मों की स्थिति के असंख्यात बहुभाग को नष्ट करते हैंं। इसके अतिरिक्त क्षीणकषाय के अंतिम समय में घातने से शेष रहे अप्रशस्त प्रकृतिसंबंधी अनुभाग के अनन्त बहुभाग को भी नष्ट करते हैं। द्वितीय समय में कपाटसमुद्घात को करते हैं। उस कपाटसमुद्घात में वर्तमान रहकर शेष स्थिति के असंख्यात बहुभाग को नष्ट करते हैं तथा अप्रशस्त प्रकृतियों के शेष अनुभाग के भी अनन्त बहुभाग को नष्ट करते हैं। पश्चात् तृतीय समय में प्रतर नाम वाले मंथसमुद्घात को करते हैं। इस समुद्घात में भी स्थिति व अनुभाग को पूर्व के समान ही नष्ट करते हैं तत्पश्चात् चतुर्थ समय में अपने सब आत्मप्रदेशों से सब लोक को पूर्ण करके लोकपूरणसमुद्घात को प्राप्त होते हैं। लोकपूरणसमुद्घात में समयोग हो जाने पर योग की एक वर्गणा हो जाती है।

विशेषार्थ-लोकपूरणसमुद्घात में वर्तमान केवली के लोकप्रमाण समस्त जीवप्रदेशों में योग के अविभागप्रतिच्छेद वृद्धि-हानि से रहित होकर सदृश हो जाते हैं। अतएव सब जीव प्रदेशों के परस्पर में समान होने से उन जीवप्रदेशों की एक वर्गणा हो जाती है।

इस अवस्था में भी स्थिति और अनुभाग को पूर्व के ही समान नष्ट करते हैं। लोकपूरणसमुद्घात में आयु से संख्यातगुणी अन्तर्मुहूर्तमात्र स्थिति को स्थापित करता है। इन चार समयों में अप्रशस्त कर्मों के अनुभाग की प्रतिसमय अपवर्तना होती है। एक-एक समय में एक-एक स्थितिकांडक का घात होता है। पुन: समुद्घात संकोच के समय-उतरने के प्रथम समय से लेकर शेष स्थिति के संख्यात बहुभाग को तथा शेष अनुभाग के अनन्त बहुभाग को भी नष्ट करता है। लोकपूरणसमुद्घात के अनन्तर समय से लेकर स्थितिकांडक और अनुभागकांडक का अन्तर्मुहूर्तमात्र उत्कीरणकाल प्रवर्तमान रहता है।

यहाँ से अन्तर्मुहूर्त जाकर बादर काययोग से बादर मनोयोग का निरोध करता है। तत्पश्चात् अन्तर्मुहूर्त से बादर काययोग से बादर वचनयोग का निरोध करता है। पुन: अन्तर्मुहूर्त से बादर काययोग बादर उच्छ्वास-नि:श्वास का निरोध करता है। पुन: अन्तर्मुहूर्त से बादर काययोग से उसी बादर काययोग का निरोध करता है। तत्पश्चात् अन्तर्मुहूर्त जाकर सूक्ष्म काययोग से सूक्ष्म मनोयोग का निरोध करता है। पुन: अन्तर्मुहूर्त जाकर सूक्ष्म वचनयोग का निरोध करता है। पुन: अन्तर्मुहूर्त जाकर सूक्ष्म काययोग से सूक्ष्म उच्छ्वास-नि:श्वास का निरोध करता है।

पुन: अन्तर्मुहूर्त जाकर सूक्ष्म काययोग से सूक्ष्म काययोग का निरोध करता हुआ इन कारणों को करता है-प्रथम समय में पूर्वस्पद्र्धकों के नीचे अपूर्वस्पद्र्धकों को करता है। पूर्वस्पद्र्धकों से जीवप्रदेशों का अपकर्षण करके अपूर्वस्पद्र्धकों को करता हुआ पूर्वस्पद्र्धकों की प्रथम वर्गणा के अविभागप्रतिच्छेदों के असंख्यातवें भाग का अपकर्षण करता है, जीवप्रदेशों के भी असंख्यातवें भाग का अपकर्षण करता है। इस प्रकार अन्तर्मुहूर्तकाल तक अपूर्वस्पद्र्धकों को करता है। इन अपूर्वस्पद्र्धकों को प्रतिसमय असंख्यातगुणी हीन श्रेणी के क्रम से करता है। परन्तु जीवप्रदेशों का अपकर्षण असंख्यातगुणित श्रेणी के क्रम से होता है। ये सब अपूर्वस्पद्र्धक जगश्रेणी के असंख्यातवें भाग, श्रेणि वर्गमूल के भी असंख्यातवें भाग और पूर्वस्पद्र्धकों के भी असंख्यातवें भागमात्र होते हैं।

अपूर्वस्पद्र्धकों को करने के पश्चात् अन्तर्मुहूर्त काल तक कृष्टियों को करता है। कृष्टिकरण के समाप्त होने पर उसके अनन्तर समय में पूर्वस्पद्र्धकों और अपूर्वस्पद्र्धकों को नष्ट करता है। अन्तर्मुहूर्त काल तक कृष्टिगत योग वाला होता है। उस समय केवली भगवान सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाती शुक्लध्यान को ध्याते हैं। सयोगिकेवलीगुणस्थान के अंतिम समय में कृष्टियों के असंख्यात बहुभागों को नष्ट करते हैं। योग का निरोध हो जाने पर नाम, गोत्र व वेदनीय, ये तीन अघातिया कर्म आयु के सदृश हो जाते हैं।

इसके बाद अन्तर्मुहूर्त में योग का अभाव हो जाने से सम्पूर्ण आस्रवों का निरोध हो गया, तब वे शैलेश्य अवस्था को प्राप्त कर लेते हैं-अठारह हजार शीलों के स्वामी हो जाते हैं। तब ये अयोगिकेवली भगवान समुच्छिन्नक्रियानिवृत्ति नाम के शुक्लध्यान के ध्याता हो जाते हैं।

पुन: अयोगिकेवली के द्विचरम समय में तिहत्तर प्रकृतियों का सत्त्वविच्छेद क्षय अर्थात् निर्मूल विनाश हो जाता है। उनके नाम-देवगति, पाँच शरीर, पाँच शरीरबंधन, पाँच शरीरसंघात, छह संस्थान, छह संहनन, तीन आंगोपांग, पाँच वर्ण, दो गंध, पाँच रस, आठ स्पर्श, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, देवगत्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, प्रशस्तविहायोगति, अप्रशस्त विहायोगति, प्रत्येक शरीर, अपर्याप्त, स्थिर-अस्थिर, शुभ-अशुभ, सुस्वर-दुस्वर, दुर्भग, अनादेय, अयश:कीर्ति, निर्माण, नीचगोत्र और दोनों वेदनीयों में से अनुदयप्राप्त एक वेदनीय, इन तिहत्तर प्रकृतियों के सत्त्व की व्युच्छित्ति अयोगिकाल के द्विचरम समय में हो जाती है।

पुन: इन्हीं अयोगिकेवली भगवान के अंतिम समय में शेष एक वेदनीय, मनुष्यगति, मनुष्यायु, पंचेन्द्रियजाति, त्रस, बादर, पर्याप्त, सुभग, आदेय, यश:कीर्ति, तीर्थंकर और उच्चगोत्र, ये बारह प्रकृतियाँ अयोगिकाल के अंतिम समय में व्युच्छिन्न हो जाती हैं। तब सर्व कर्मों से विमुक्त होकर आत्मा एक समय में सिद्धि को प्राप्त करता है।

इस प्रकार दो सूत्रों से सूचित अर्थ की प्ररूपणा करने पर सम्पूर्ण चारित्र की प्राप्ति का विधान प्ररूपित होता है।

शंका-किन-किन तीर्थंकर भगवन्तों ने कितने-कितने दिनों का योग निरोध किया है ?

समाधान-इसे ही कहते हैं-

प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव ने चौदह दिन का योग निरोध किया है। वर्धमान भगवान ने दो दिन का योग निरोध किया है एवं शेष बाईस तीर्थंकर एक-एक मास का योग निरोध करके सम्पूर्ण कर्मबंधन से छूटकर योगरहित-अयोगी केवली हुए हैं।।

यद्यपि यहाँ पर यह अधिकतम योगनिरोधकाल एक मासपर्यंत कहा है फिर भी समवसरण के विघटन का काल ही वह योग निरोधकाल है। क्योंकि बादर काययोग के निरोधकाल से लेकर सूक्ष्मकाय निरोधकाल पर्यंत काल पृथक्-पृथक् अन्तर्मुहूर्त हैं फिर भी वे सब मिलकर अन्तर्मुहूर्त ही हैं, ऐसा जानना चाहिए।

ये तीर्थंकर आदि केवली भगवान जिस आसन से योग निरोध करते हैं, उसी ही आसन से मोक्ष प्राप्त करते हैं।

कहा भी है-श्री ऋषभदेव, श्रीवासुपूज्य भगवान और श्री नेमिनाथ ये तीन तीर्थंकर पद्मासन से मोक्ष गये हैं एवं शेष इक्कीस तीर्थंकर भगवान कायोत्सर्ग आसन से मोक्ष गये हैं।।

दिगम्बर जैनशासन में खड्गासन अथवा पद्मासन इन दो आसनों से ही मोक्ष प्राप्त करते हैं अन्य किसी भी आसन से नहीं, यह बात ध्यान रखना है।

शंका-‘‘संपुण्णं चारित्तं’’ इस वाक्य से कौन सा चारित्र विवक्षित है, क्योंकि छठे-सातवें गुणस्थानवर्ती मुनियों के चारित्र को भी ‘‘सकल चारित्र’’ कहा गया है ?

समाधान-आपने ठीक कहा है, क्योंकि छठे आदि गुणस्थानवर्ती मुनियों के सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहारविशुद्धि और सूक्ष्मसांपराय चारित्र होते हैं और ये पाँच पापों के पूर्ण त्याग से महाव्रत की अपेक्षा से ही हैं किन्तु चारित्र की पूर्णता तो यथाख्यात चारित्र में ही है। ये यथाख्यात चारित्र भी उपशांतकषाय नाम के ग्यारहवें गुणस्थान से लेकर अयोगिकेवली नाम के गुणस्थान तक होता है और वहाँ भी इस चौदहवें गुणस्थान के अंतिम समय में ही इस चारित्र की पूर्णता कही गई है। यहाँ धवला टीका में और श्लोकवार्तिकालंकार ग्रंथ में ऐसा कथन है। इसे ही देखिए-

निश्चयनय से अयोगिकेवली का चरमसमयवर्ती रत्नत्रय मुक्ति का हेतु व्यवस्थित है।

यह सकलचारित्र सर्वसावद्य योग की निवृत्ति की अपेक्षा से ‘‘सामायिक चारित्र’’ नाम से एक है। छेदोपस्थापना की अपेक्षा भेद का आश्रय लेकर तेरह प्रकार का और अट्ठाईस मूलगुणरूप से अट्ठाईस भेदरूप हो जाता है। यह कर्मभूमि के मनुष्यों के ही संभव है न कि भोगभूमियों के। आर्यिकाओं के भी यह उपचार महाव्रत रूप से सुना जाता है-आचारसार आदि ग्रंथों में वर्णित है। यह चारित्र अतीव दुर्लभ है। इस दु:षमकाल में बड़े प्रयत्न से इस महाव्रतरूप चारित्र को प्राप्त करके हम सभी को सर्वप्रयत्नपूर्वक इसकी रक्षा करना चाहिए। इस चारित्र का माहात्म्य महर्षियों ने भी कहा है, यह महान फलदायी है, ऐसा जानना चाहिए।

[सम्पादन]
श्री गौतम स्वामी ने सकल चारित्र को वृक्ष संज्ञा दी है-

वीरभक्ति में कहा है-

व्रतों का समुदाय मूल-जड़ है, संयम स्कंध-तना है, शील शाखाएँ हैं, जो कि यम और नियमरूपी जल से बढ़ रही हैं, समितियाँ कलिया हैं, गुप्तियाँ प्रवाल-कोंपल हैं, गुणरूपी पुष्पों की सुगंधि फैल रही है, समीचीन तपश्चरण-चित्र-विचित्र पत्ते हैं, ये ऐसा उत्तम चारित्ररूपी वृक्ष मोक्षरूपी फल को देने वाला है। शुभ क्रियाओं में प्रवृत्त ऐसे भव्य मोक्ष पथिकों के खेद को-श्रम को दूर करने में यह समर्थ है चूँकि यह दयारूपी छाया से प्रशंसनीय है। पापरूपी सूर्य से उत्पन्न हुए ताप को समाप्त करने वाला है, ऐसा यह चारित्ररूपी वृक्ष हम सभी के भव-संसार की परम्परा को नष्ट करने वाला होवे।।

ये चारित्र पाँच भेदों से युक्त है-सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसांपराय और यथाख्यात ये पाँच भेद हैं, इन सभी पाँचों विध चारित्र को हम नमस्कार करते हैं। गणधरदेव भी इनको नमस्कार करते हैं एवं पाँचवें चारित्र की याचना करते हैं।

इसे ही कहते हैं-सभी जिनेन्द्र भगवन्तों ने इन चारित्र को पाला है और सभी शिष्यों के लिए इनका उपदेश दिया है। इनमें से पाँचवें चारित्र को प्राप्त करने के लिए हम इन पाँचों प्रकार के चारित्र को नमस्कार करते हैं।।

सम्यग्दर्शन की पूर्णता क्षायिक सम्यग्दर्शन में या परमावगाढ नाम के सम्यक्त्व में होती है। ज्ञान की पूर्णता केवलज्ञान में होती है और सम्यक् चारित्र की पूर्णता अयोगिकेवली भगवान के अंतिम समय में होती है, इसलिए हम भी श्रीजिनेन्द्रदेव के पादकमल के निकट अपने रत्नत्रय की पूर्णता के लिए प्रार्थना करते हैं।

श्री पद्मनंदि आचार्यदेव ने भी अपने पद्मनंदिपंचविंशतिका नाम के ग्रंथ में ऐसी ही प्रार्थना की है-

हे भगवन्! मैंने इस संसार में भ्रमण करते हुए बहुत बार तो इन्द्रपद पाया है और इस मध्य बहुत बार निगोद अवस्था को-पर्याय को प्राप्त किया है। इस मध्य इन्द्रपद और निगोद पर्याय के मध्य जितनी भी योनियाँ हैं-पर्याय हैं, उन सबको भी इस अनंत संसार में चिरकाल तक अनंत-अनंत बार प्राप्त किया है। हे नाथ! इस संसार में अब मेरे लिए कुछ भी अपूर्व-पूर्व में नहीं प्राप्त किया हो जिसे, ऐसी कोई भी पर्याय नहीं है, इसलिए अब मैं संपूर्ण विकल्पों को छोड़कर आपसे याचना करता हूँ कि-

हे देव! सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र की जो पदवी है, उसे ही पूर्ण करो।।

इस प्रकार सातवेें स्थल में घाती-अघाती कर्मों की जघन्य स्थिति और कर्मों के नाश की विधि से सिद्धपद की प्राप्तिपर्यंत को सूचित करते हुए दो सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार षट्खण्डागम के प्रथम खण्ड में इस छठे ग्रंथ में गणिनी ज्ञानमती कृत सिद्धान्त-चिंतामणिटीका में ‘सम्यक्त्वोत्पत्तिचूलिका’’ नाम का यह आठवाँ चूलिकाधिकार समाप्त हुआ।

जिन आदिब्रह्मा भगवान श्री ऋषभदेव ने हुण्डावसर्पिणी काल के दोष से ‘‘तीन वर्ष, आठ माह, एक पक्ष अधिक चौरासी लाख पूर्व वर्ष’’ पहले अयोध्या नगरी में जन्म लेकर उसे पवित्र किया है, उन भगवान श्री ऋषभदेव को नमस्कार करके अनंतानंत तीर्थंकर भगवन्तों की जन्मभूमि शाश्वत तीर्थ अयोध्यापुरी को भी हम नमन करते हैं।

जो जैनागम में अनंतानंत तीर्थंकरों की जन्मभूमि मानी है, ऐसी पावन अयोध्यापुरी को हम अजन्मा पद-पुनर्जन्मरहित पद प्राप्त करने के लिए नमस्कार करते हैं। केशरियाजी तीर्थ पर मैंने यह प्रकरण लिखा था। इसलिए ‘श्री ऋषभदेव’ नाम से प्रसिद्ध इस तीर्थ पर उनकी जन्मभूमि की भी वंदना की है।

इस प्रकार श्रीमान् भगवान पुष्पदंत-भूतबली प्रणीत षट्खण्डागम ग्रंथ के प्रथम खण्ड में छठे ग्रंथ में श्रीमान् भूतबली सूरि विरचित जीवस्थान चूलिका में श्री वीरसेनाचार्य रचित धवला टीका प्रमुख अनेक ग्रंथों के आधार से विरचित, बीसवीं शताब्दी के प्रथमाचार्य चारित्र-चक्रवर्ती श्री शांतिसागर जी महाराज, उनके प्रथम पट्टाधीश श्री वीरसागर आचार्य, उनकी शिष्या मैं जम्बूद्वीप रचना की पावन प्रेरिका गणिनी ज्ञानमती मेरे द्वारा कृत सिद्धान्तचिंतामणि टीका में सम्यक्त्वोत्पत्ति चूलिका पर्यंत आठ चूलिकाओं से समन्वित यह प्रथम महाधिकार पूर्ण हुआ।