ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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09. नवमी अध्याय

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विषय सूची

[सम्पादन]
नवमी_अध्याय (९)

[सम्पादन]
—अनुष्टुप् छंद—

स्वामी ‘त्रिकालदर्शी’ हो, सभी पदार्थ देखते।

नाम मंत्र नमूं प्रीत्या, आत्म सौख्य सुधा मिले।।८०१।।

प्रभो! ‘लोकेश’ माने हो, तीन लोक प्रभु कहे।
नाम मंत्र नमूं प्रीत्या, आत्म सौख्य सुधा मिले।।८०२।।

‘लोकधाता’ तुम्हीं माने, तीनों जगत् पोषते।
नाम मंत्र नमूं प्रीत्या, आत्म सौख्य सुधा मिले।।८०३।।

हो ‘दृढव्रत’ व्रतों में, स्थैर्य धारते।
नाम मंत्र नमूं प्रीत्या, आत्म सौख्य सुधा मिले।।८०४।।

‘सर्वलोकातिग’ स्वामिन्! सभी जग में श्रेष्ठ हो।
नाम मंत्र नमूं प्रीत्या, आत्म सौख्य सुधा मिले।।८०५।।

पूजा के योग्य हो स्वामिन्! ‘पूज्य’ माने सभी सदा।
नाम मंत्र नमूं प्रीत्या, आत्म सौख्य सुधा मिले।।८०६।।

अभीष्ट मेें पहुँचाते, ‘सर्वलोवैकसारथी’।
नाम मंत्र नमूं प्रीत्या, आत्म सौख्य सुधा मिले।।८०७।।

प्राचीन सबमें ही हो, माने ‘पुराण’ आपको।
नाम मंत्र नमूं प्रीत्या, आत्म सौख्य सुधा मिले।।८०८।।

गुणों को श्रेष्ठ आत्मा के, पाया ‘पुरूष’ आप हैं।
नाम मंत्र नमूं प्रीत्या, आत्म सौख्य सुधा मिले।।८०९।।

सर्वप्रथम होने से, ‘पूर्व’ माने तुम्हीं प्रभो!।
नाम मंत्र नमूं प्रीत्या, आत्म सौख्य सुधा मिले।।८१०।।

अंग पूर्वादि विस्तारे, ‘कृतपूर्वांग-विस्तर:’।
नाम मंत्र नमूं प्रीत्या, आत्म सौख्य सुधा मिले।।८११।।

देवों में मुख्य होने से, ‘आदिदेव’ तुम्हीं कहे।
नाम मंत्र नमूं प्रीत्या, आत्म सौख्य सुधा मिले।।८१२।।

‘पुराणाद्य’ प्रभो! माने, प्राचीनों में सुआदि हो।
नाम मंत्र नमूं प्रीत्या, आत्म सौख्य सुधा मिले।।८१३।।

‘पुरुदेव’ तुम्हीं माने, श्रेष्ठ देव महान हो।
नाम मंत्र नमूं प्रीत्या, आत्म सौख्य सुधा मिले।।८१४।।

देवों के देव होने से, तुम्हीं हो ‘अधिदेवता’।
नाम मंत्र नमूं प्रीत्या, आत्म सौख्य सुधा मिले।।८१५।।

‘युगमुख्य’ युगादी के, माने प्रधान आप हैं।
नाम मंत्र नमूं प्रीत्या, आत्म सौख्य सुधा मिले।।८१६।।

‘युगज्येष्ठ’ कहे स्वामी, युग में सर्व श्रेष्ठ हो।
नाम मंत्र नमूं प्रीत्या, आत्म सौख्य सुधा मिले।।८१७।।

युगादी में उपदेशा, ‘युगादिस्थितिदेशक:’।
नाम मंत्र नमूं प्रीत्या, आत्म सौख्य सुधा मिले।।८१८।।

‘कल्याणवर्ण’ कांती से, सुवर्ण सम हो तुम्हीं।।
नाम मंत्र नमूं प्रीत्या, आत्म सौख्य सुधा मिले।।८१९।।

नाथ! ‘कल्याण’ भव्यों के, हितकर्ता प्रसिद्ध हो।
नाम मंत्र नमूं प्रीत्या, आत्म सौख्य सुधा मिले।।८२०।।

‘कल्य’ नीरोग होने से, तत्पर मुक्ति हेतु हो।
नाम मंत्र नमूं प्रीत्या, आत्म सौख्य सुधा मिले।।८२१।।

लक्षण हितकारी हैं, अत: ‘कल्याणलक्षण:’।
नाम मंत्र नमूं प्रीत्या, आत्म सौख्य सुधा मिले।।८२२।।

‘कल्याणप्रकृती’ स्वामी, हो कल्याण स्वभाव ही।
नाम मंत्र नमूं प्रीत्या, आत्म सौख्य सुधा मिले।।८२३।।

स्वर्णवत् प्रभु दीप्तात्मा, ‘दीप्रकल्याणआतमा’।
नाम मंत्र नमूं प्रीत्या, आत्म सौख्य सुधा मिले।।८२४।।

‘विकल्मष’ तुम्हीं स्वामी, कालिमाकर्म शून्य हो।
नाम मंत्र नमूं प्रीत्या, आत्म सौख्य सुधा मिले।।८२५।।

[सम्पादन]
—चंपकमाला छंद—

कर्म कलंकादी निरमुक्ता, हो ‘विकलंका’ कर्म हरो मे।

वंदन करते सौख्य मिलेगा, आतम ज्ञानानंद बढ़ेगा।।८२६।।

देह कला से हीन रहे हो ,नाथ! ‘कलातीते’ जग में हो।
वंदन करते सौख्य मिलेगा, आतम ज्ञानानंद बढ़ेगा।।८२७।।

हो ‘कलिलघ्न’ तुम्हीं अघ हीना, पाप हमारे क्षालन कीजे।
वंदन करते सौख्य मिलेगा, आतम ज्ञानानंद बढ़ेगा।।८२८।।

नाथ! ‘कलाधर’ सर्व कला से, पूर्ण तुम्हीं हो सर्व गुणों से।
वंदन करते सौख्य मिलेगा, आतम ज्ञानानंद बढ़ेगा।।८२९।।

‘देवदेव’ हो तीन जगत् में, नाथ! सुदेवों के अधिदेवा।
वंदन करते सौख्य मिलेगा, आतम ज्ञानानंद बढ़ेगा।।८३०।।

नाथ! ‘जगन्नाथा’ जगस्वामी, जन्म मरण के दु:ख हरोगे।
वंदन करते सौख्य मिलेगा, आतम ज्ञानानंद बढ़ेगा।।८३१।।

आप ‘जगद्बंधू’ भवि बंधू, भव्यजनों के पूर्ण हितैषी।
वंदन करते सौख्य मिलेगा, आतम ज्ञानानंद बढ़ेगा।।८३२।।

आप ‘जगद्विभु’ तीन भुवन में, पालक हो सामथ्र्य समेता।
वंदन करते सौख्य मिलेगा, आतम ज्ञानानंद बढ़ेगा।।८३३।।

‘जगत्’ हितैषी तीन जगत में, सर्वजनों को सौख्य दिया है।
वंदन करते सौख्य मिलेगा, आतम ज्ञानानंद बढ़ेगा।।८३४।।

आप कहे ‘लोकज्ञ’ जगत् को, जान लिया है पूर्ण तरह से।
वंदन करते सौख्य मिलेगा, आतम ज्ञानानंद बढ़ेगा।।८३५।।

‘सर्वग’ तीनों लोक सभी में, व्याप्त हुये ये ज्ञान किरण से।
वंदन करते सौख्य मिलेगा, आतम ज्ञानानंद बढ़ेगा।।८३६।।

हो ‘जगदग्रज’ ज्येष्ठ जगत में, सर्व दुखों को दूर करोगे।
वंदन करते सौख्य मिलेगा, आतम ज्ञानानंद बढ़ेगा।।८३७।।

नाथ! ‘चराचरगुरु’ कहे हो, स्थावर त्रस के पालक भी हो।
वंदन करते सौख्य मिलेगा, आतम ज्ञानानंद बढ़ेगा।।८३८।।

‘गोप्य’ मुनी रक्खें मन में ही, नाथ! करो रक्षा अब मेरी।
वंदन करते सौख्य मिलेगा, आतम ज्ञानानंद बढ़ेगा।।८३९।।

हे प्रभु ‘गूढ़ात्मा’ तुम आत्मा, गोचर इन्द्री के नहिं होती।
वंदन करते सौख्य मिलेगा, आतम ज्ञानानंद बढ़ेगा।।८४०।।

‘गूढ़ सुगोचर’ गूढ़ तुम्हीं हो, योगिजनों के गम्य तुम्हीं हो।
वंदन करते सौख्य मिलेगा, आतम ज्ञानानंद बढ़ेगा।।८४१।।

हे प्रभु ‘सद्योजात’ कहे हो, तत्क्षण जन्में रूप रहे हो।
वंदन करते सौख्य मिलेगा, आतम ज्ञानानंद बढ़ेगा।।८४२।।

आप ‘प्रकाशात्मा’ मुनि मानें, ज्ञान सुज्योती रूप बखानें।
वंदन करते सौख्य मिलेगा, आतम ज्ञानानंद बढ़ेगा।।८४३।।

नाथ! ‘ज्वलज्ज्वलनसप्रभ’ हो, अग्निप्रभा सी कांति धरे हो।
वंदन करते सौख्य मिलेगा, आतम ज्ञानानंद बढ़ेगा।।८४४।।

रविवत् ‘आदित्यवरण’ स्वामी, हो प्रभु तेजस्वी जग नामी।
वंदन करते सौख्य मिलेगा, आतम ज्ञानानंद बढ़ेगा।।८४५।।

स्वर्ण छवी ‘भर्माभ’ कहाये, देह दिपे भास्वत् शरमाये।
वंदन करते सौख्य मिलेगा, आतम ज्ञानानंद बढ़ेगा।।८४६।।

‘सुप्रभ’ शोभे कांति तुम्हारी, सूर्य शशी क्रोड़ों लजते हैं।
वंदन करते सौख्य मिलेगा, आतम ज्ञानानंद बढ़ेगा।।८४७।।

हो ‘कनकप्रभ’ स्वर्ण प्रभा सी, कांति दिखे उत्तुंग तनु हो।
वंदन करते सौख्य मिलेगा, आतम ज्ञानानंद बढ़ेगा।।८४८।।

नाथ ‘सुवर्णवर्ण’ सुर गायें, देह सुवर्णी दीप्ति धराये।
वंदन करते सौख्य मिलेगा, आतम ज्ञानानंद बढ़ेगा।।८४९।।

आप प्रभो! ‘रुक्माभ’ कहाये, स्वर्ण छवी सी दीप्ति करो मे।
वंदन करते सौख्य मिलेगा, आतम ज्ञानानंद बढ़ेगा।।८५०।।

[सम्पादन]
—मदाक्रांता छंद—

‘सूर्यकोटीसमप्रभ’ विभो! क्रोड़ सूरज लजाते।

दीप्ती ऐसी तुम तनु विषे आत्मदीप्ती अनोखी।।
वंदूं नामावलि तुम प्रभो! सर्वव्याधी निवारो।
ज्ञानज्योती प्रगटित करो मोहशत्रू भगाके।।८५१।।

तप्ते सोने सदृश ‘तपनीयनिभ’ दीप्ती धरे हो।
कर्मों का भी मल सब हटा स्वात्म निर्मल किया है।।वंदूं.।।८५२।।

ऊँचीदेही धर कर विभो! ‘तुंग’ माने गये हो।
ऊँचे भावों सहित तुमही मोक्ष प्रासाद पाया।।वंदूं.।।८५३।।

‘बालार्काभो’ प्रभु तनु धरा ऊगते सूर्य कांती।
मेरी आत्मा सुवरण करो कर्म पंकील१धो दो।।वंदूं. ।।८५४।।

आत्मा शुद्ध्या ‘अनलप्रभ’ हो अग्नि कांती सदृश हो।
मेरी आत्मा निरमल करो श्रेष्ठ तप से तपाके।।वंदूं.।।८५५।।

संध्यालाली सदृश छवि है नाथ!‘संध्याभ्रबभ्रू’।
भक्ती लाली शुभ तम रहे नाथ मेरे ह्रदै में।।वंदूं.।।८५६।।।

आत्मा निर्मल सुवरण तनू आप ‘हेमाभ’ मानें।
रागादी को हृदयगृह से दूर कीजे अभी ही।।वंदूं.।।८५७।।

‘तप्तचामीकरप्रभ’ तपे स्वर्ण जैसी प्रभा है।
मेरी आत्मा अतिशय धुला कर्म से मुक्त होवे।।वंदूं.।।८५८।।

शुद्धात्मा हो जिनवृषभ! ‘निष्टप्तकनकच्छाय’ हो।
कांती धारी अद्भुत महादीप्त त्रैलोक्य स्वामी।।वंदूं.।।८५९।।

देदीप्यात्मा जिनवर ‘कनत्कांचनासन्निभ’ देही।
वैवल्यात्मा चमचम करे नाथ! कीजे अबे ही।।वंदूं.।।८६०।।

मुक्तीकांतावर प्रभु ‘हिरण्यवर्ण’ इंद्रादि गायें।
दीजे शक्ती निजसम खिले चित्तपंकज सुहाये।।वंदूं.।।८६१।।

सोने जैसी छवि तुमहिं ‘स्वर्णाभ’ साधु जनों में।
व्याधी हीना मुझ तनु बने रत्नत्रै साध लू मैं।।वंदूं.।।८६२।।

भव्यों को भी करत शुचि भो! ‘शांतवुंâभनिभप्रभ’ हो।
मेरी आत्मा स्वपर विद हो ज्ञानज्योती जला दो।।वंदूं.।।८६३।।

सुन्दर सोने सदृश तनु है आप ‘द्युम्नाभ’ स्वामी।
दीजे सिद्धी निजसुख मिले ना पुनर्भव कभी हो।।
वंदूं नामावलि तुम प्रभो! सर्वव्याधी निवारो।
ज्ञानज्योती प्रगटित करो मोहशत्रू भगाके।।८६४।।

जन्मे जैसे विकृति रहिते ‘जातरुपाभ’ स्वामी।
रागादी मुझ विकृति हरिये दीजिये मुक्ति लक्ष्मी।।वंदूं.।।८६५।।

‘तप्तजाम्बूनदद्युति’ प्रभो! श्रेष्ठ स्वर्णिम शरीरी।
दीजे शक्ती द्विदश तपसे आत्म शुद्धी करूँ मैं।।वंदूं.।।८६६।।

धोये उज्ज्वल कनक से हो पाप क्षालो हमारे।
दीपे आत्मा जिनवर ‘सुधौतकलधौतश्री’ हो।।वंदूं.।।८६७।।

दीपे देही जिनरवि ‘प्रदीप्त’ आप लोकाग्र राजें।
जो भी पूजें सकल दुख भी नाशते सौख्य देते।।वंदूं.।।८६८।।

स्वामी हो ‘हाटकुद्युति’ तनू स्वर्ण दीप्ती लजाते।
मैं भी ध्याऊँ हृदय धरके आपको शीश नाऊँ।।वंदूं.।।८६९।।

स्वामी सौ भी सुरपति जजें आप ‘शिष्टेष्ट’ मानें।
प्रीती से शिष्ट जन सब तुम्हें इष्ट भगवान् मानें।।वंदूं.।।८७०।।

पुष्टी कर्ता त्रिभुवन जनों आप ‘पुष्टिद’ कहे हो।
स्वामिन्! पोषो दुखित मुझको पास आया इसी से।।वंदूं.।।८७१।।

परमौदारिक तनुधर प्रभो! ‘पुष्ट’ हो सौख्यभृत हो।
मेरी पुष्टी तुरत करिये रोेग शोकादि हरके।।वंदूं.।।८७२।।

केवलज्ञानी युगपत् तुम्हीं लोक को जानते हो।
कर्मों का मुझ तुरत क्षय हो ‘स्पष्ट’ स्वामी तुम्हीं से।।वंदूं.।।८७३।।

वाणी प्रभु की विशद अतिशै ‘स्पष्टाक्षर’ इसी से।
मेरी वाणी हितकर करो दिव्यवाणी बने भी।।वंदूं.।।८७४।।

सामथ्र्यात्मा प्रभु ‘क्षम’ तुम्हीं मोह शत्रू हना है।
शत्रू मृत्यू अति दुख दिया नाथ! नाशो इसे ही।।वंदूं.।।८७५।।

[सम्पादन]
—आर्या छंद—

कर्म शत्रु को मारा, इसीलिये ‘शत्रुघ्न’ सुरेंद्र कहें।

नाममंत्र मैं वंदूं, पाप हरो शुभ करो स्वामी।।८७६।।

प्रभु ‘अप्रतिघ’ तुम्हीं हो, शत्रु न कोई रहा यहाँ जग में।
नाममंत्र मैं वंदूं, पाप हरो शुभ करो स्वामी।।८७७।।

प्रभु ‘अमोघ’ हो नित ही, स्वयं सफल हो किया सफल सबको।
नाममंत्र मैं वंदूं, पाप हरो शुभ करो स्वामी।।८७८।।

नाथ! ‘प्रशास्ता’ तुम हो, सर्वोत्तम उपदेश दिया तुमने।
नाममंत्र मैं वंदूं, पाप हरो शुभ करो स्वामी।।८७९।।

प्रभो ‘शासिता’ तुमही, रक्षा करते सदैव भक्तों की।
नाममंत्र मैं वंदूं, पाप हरो शुभ करो स्वामी।।८८०।।

‘स्वभू’ स्वयं जन्मे हो, मात पिता बस निमित बने सच में।
नाममंत्र मैं वंदूं, पाप हरो शुभ करो स्वामी।।८८१।।

‘शांतिनिष्ठ’ प्रभु तुमहो, पूर्ण शांति को पाया पाप हना।
नाममंत्र मैं वंदूं, पाप हरो शुभ करो स्वामी।।८८२।।

प्रभु ‘मुनिज्येष्ठ’ कहाते, गणधर मुनि में बड़े तुम्हीं माने।
नाममंत्र मैं वंदूं, पाप हरो शुभ करो स्वामी।।८८३।।

प्रभु ‘शिवताति’ जगत में, सब कल्याण परंपरा देते।
नाममंत्र मैं वंदूं, पाप हरो शुभ करो स्वामी।।८८४।।

‘शिवप्रद’ नाथ तुम्हीं हो, भविजन को सब सुख शिवसुख भी देते।
नाममंत्र मैं वंदूं, पाप हरो शुभ करो स्वामी।।८८५।।

‘शांतिद’ नाथ सभी को, शांति दिया है सुख भरपूर दिया।
नाममंत्र मैं वंदूं, पाप हरो शुभ करो स्वामी।।८८६।।

नाथ! ‘शांतिकृत्’ जग में, शांति करो मुझको भी शांति करो।
नाममंत्र मैं वंदूं, पाप हरो शुभ करो स्वामी।।८८७।।

प्रभो! ‘शांति’ हो जगमें, त्रिभुवन में भी शांति करो भगवन् ।
नाममंत्र मैं वंदूं, पाप हरो शुभ करो स्वामी।।८८८।।

‘कांतिमान्’ प्रभु मानें, सर्व कांतियुत सभामध्य तेजस्वी।
नाममंत्र मैं वंदूं, पाप हरो शुभ करो स्वामी।।८८९।।

‘कामितप्रद’ भगवंता, भक्तों के मनरथ पूर्ण किया है।
नाममंत्र मैं वंदूं, पाप हरो शुभ करो स्वामी।।८९०।।

‘श्रेयोनिधि’ जिनराजा, भविजन के हित तुम सब सुख के दाता।
नाममंत्र मैं वंदूं, पाप हरो शुभ करो स्वामी।।८९१।।

‘अधिष्ठान’ तुमही हो, त्रिभुवन में दयाधर्म आधारा।
नाममंत्र मैं वंदूं, पाप हरो शुभ करो स्वामी।।८९२।।

‘अप्रतिष्ठ’ हो भगवन्! परकृत बिना प्रतिष्ठा के पूजित हो।
नाममंत्र मैं वंदूं, पाप हरो शुभ करो स्वामी।।८९३।।

नाथ! ‘प्रतिष्ठित’ जग में, नर सुरगण में महायशस्वी हो।
नाममंत्र मैं वंदूं, पाप हरो शुभ करो स्वामी।।८९४।।

प्रभु ‘सुस्थिर’ त्रिभुवन में, अतिशय थिरता मिली तुम्हें निज में।
नाममंत्र मैं वंदूं, पाप हरो शुभ करो स्वामी।।८९५।।

नाथ ! तुम्हीं ‘स्थावर’ हो, समवसरण में गमन रहित राजें।
नाममंत्र मैं वंदूं, पाप हरो शुभ करो स्वामी।।८९६।।

नाथ! ‘स्थाणु’ कहाये, अचल रूपधर यहीं विराजे हो।
नाममंत्र मैं वंदूं, पाप हरो शुभ करो स्वामी।।८९७।।

‘प्रथीयान्’ प्रभु मानें, अतिशय विस्तृत कहें सुरासुर भी ।
नाममंत्र मैं वंदूं, पाप हरो शुभ करो स्वामी।।८९८।।

भगवन्! ‘प्रथित’ तुम्हीं हो, त्रिभुवन में भी प्रसिद्ध अतिशायी|
नाममंत्र मैं वंदूं, पाप हरो शुभ करो स्वामी।।८९९।।

‘पृथु’ ज्ञानादि गुणों से, गणि मुनिगण में महान हो प्रभुजी ।
नाममंत्र मैं वंदूं, पाप हरो शुभ करो स्वामी।।९००।।

[सम्पादन]
—शंभु छंद—

प्रभु त्रिकालदर्शी से लेकर, नाम शतक अतिशायी हैं।

गणधर मुनिगण चक्रवर्ति भी, नाम जपें सुखदायी हैं।।
सुरपति खगपति पूजन करते, वदंन कर शिर नाते हैं।
हम भी वंदे शीश नमाकर, निज समकित गुण पाते हैं।।९।।

इति श्रीत्रिकालदर्श्यादिशतम।