ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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09. बलदेव बलभद्र एवं श्रीकृष्ण नारायण

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बलदेव बलभद्र एवं श्रीकृष्ण नारायण

भगवान नमिनाथ के बाद शौरीपुर के राजा अंधकवृष्टि की सुभद्रा महारानी के दश पुत्र हुए, जिनके नाम- (१) समुद्रविजय

(२) अक्षोभ्य

(३) स्तिमितसागर

(४) हिमवान

(५) विजय

(६) अचल

(७) धारण

(८) पूरण

(९) अभिचन्द्र और

१०. वसुदेव तथा सुभद्रा महारानी के दो पुत्रियाँ थीं, जिनके कुंती और माद्री नाम थे।

राजा अंधकवृष्टि ने समुद्रविजय को राज्य प्रदान कर सुप्रतिष्ठ केवली के पादमूल में दीक्षा ले ली। राजा समुद्रविजय की महारानी शिवादेवी थीं। वसुदेव कंस आदि को धनुर्विद्या की शिक्षा दे रहे थे।

राजगृही के राजा जरासंध बहुत ही प्रतापी थे। इनकी आयुधशाला में चक्ररत्न उत्पन्न हुआ था, जिससे ये तीन खण्ड को जीतकर शासन कर रहे थे। किसी समय जरासंध राजा ने घोषणा की कि-‘जो सिंहपुर के राजा सिंहरथ को जीवित पकड़ कर मेरे आधीन करेगा, उसे मैं अपनी पुत्री जीवद्यशा को और इच्छित देश के राज्य को देऊँगा।’ वसुदेव ने जीवित सिंहरथ राजा को पकड़ लिया एवं कंस से उसे बंधवा दिया और कंस ने यह कार्य किया है ऐसा घोषित कर दिया। राजा जरासंध ने कंस का कुल-गोत्र जानना चाहा, तब कौशाम्बी की मंजोदरी माता को बुलाया गया, उसने एक मंजूषा लाकर दे दी और कहा-राजन्! मैंने यमुना के प्रवाह में बहती हुई इस मंजूषा में इसे पाया है। तब उस मंजूषा में एक मुद्रिका मिली, उसमें लिखा था-

‘यह राजा उग्रसेन की रानी पद्मावती का पुत्र है, यह गर्भ में ही उग्र था अत: इसे छोड़ा गया है।’

तब जरासंध अर्धचक्री ने अपनी पुत्री उसे ब्याह दी और बहुत सी संपदा से सहित कर दिया तथा कंस की इच्छा के अनुसार उसे मथुरा का राज्य दे दिया। कंस मथुरा पहुँचकर तथा ‘‘पिता ने मुझे मंजूषा में रखकर नदी में छोड़ा है’’, ऐसा वैर बाँधकर मथुरा के उग्रसेन राजा से युद्ध कर उन्हें बंदी बनाकर मथुरा नगर के मुख्यद्वार के ऊपर उन्हें कैद कर दिया।

पुन: वसुदेव के उपकार का आभार होने से उन्हें आग्रह से मथुरा बुलाकर अपनी बहन देवकी का उनके साथ विवाह कर दिया। इससे पूर्व वसुदेव की रोहिणी रानी से बलभद्र हुए थे।

एक दिन कंस के बड़े भाई अतिमुक्तक मुनिराज राजमहल में आहार के लिए आये, तब जीवद्यशा ने नमस्कार करके देवकी के विषय में कुछ शब्द कहे। तभी मुनिराज ने मौन छोड़कर व भोजन का अंतराय मानकर बोले-

अरे मूढ़! इस देवकी के गर्भ से जो पुत्र होगा, वह तेरे पति और पिता दोनों को मारने वाला होगा। इतना सुनते ही घबराई हुई जीवद्यशा पति के पास गई व सारे समाचार सुना दिए, तभी कंस ने कुछ विचार कर वसुदेव के पास जाकर निवेदन किया-

हे देव! आपने जो मुझे वर दिया था, वह धरोहर में है, मैं आज उसे माँगने आया हूँ। वसुदेव की स्वीकृति पाकर वह बोला-‘प्रसूति के समय देवकी का निवास मेरे महल में ही हो, भाई के घर में बहन को भला क्या कष्ट होगा? ऐसा सोचकर सरल बुद्धि से वसुदेव ने वर दे दिया पुन: जब वसुदेव को मुनिराज के वचनों का पता चला, तो वे बहुत ही दु:खी हुए और आम्रवन में विराजमान चारणऋद्धिधारी श्री अतिमुक्तक मुनि के समीप पहुँचे, साथ में देवकी रानी भी थीं। दोनों ने गुरु को नमस्कार किया, मुनि ने आशीर्वाद दिया।

तब वसुदेव ने प्रश्न किया-भगवन्! मेरे पुत्र द्वारा कंस का घात होगा आदि, सो मैं आपके श्रीमुख से सुनना चाहता हूँ। तब मुनिराज ने अवधिज्ञान से जानकर कहना प्रारंभ किया। जिसका संक्षेप सार यह है कि तुम्हारे छह युगलिया पुत्र चरमशरीरी होंगे। भगवान नेमिनाथ के समवसरण में दीक्षा लेकर मोक्ष प्राप्त करेंगे तथा सातवाँ पुत्र नारायण का अवतार होगा। उसी के द्वारा कंस का एवं जरासंध प्रतिनारायण का वध होगा। सुनकर शंकारहित होकर वसुदेव अपने स्थान पर आ गए।

पुन: राजा कंस के आग्रह से वसुदेव अपनी रानी देवकी के साथ मथुरा आकर कंस के महल में रहने लगे। क्रम से देवकी गर्भवती हुई, नवमाह के बाद देवकी के युगल पुत्र उत्पन्न हुए, उसी क्षण उन पुत्रों के पुण्य से इंद्र की आज्ञा से सुनैगम नाम के देव ने दोनों पुत्रों को उठाकर सुभद्रिलनगर के सेठ सुदृष्टि की अलका सेठानी के पास पहुँचा दिया। उसी क्षण अलका सेठानी के भी युगलिया पुत्र हुए थे परन्तु भाग्यवश वे उत्पन्न होते ही मर गये थे। नैगम देव ने उन मृतक पुत्रों को लाकर देवकी के प्रसूतिगृह में रख दिया और अपने स्थान स्वर्गलोक को चला गया।

कंस को जब पता चला कि देवकी को पुत्र हुए हैं, वह बहन के प्रसूतिगृह में प्रवेश कर दोनों मृतक पुत्रों को देखता है और व्रूर परिणामी होकर उनके पैर पकड़कर शिलातल पर पछाड़ देता है। इसी तरह समय-समय पर देवकी के दो बार और दो-दो युगलिया पुत्र हुए हैं, उन्हें भी सुनैगमदेव ने अलका सेठानी के पास पहुँचाया है और उनके मृतक युगलिया पुत्रों को लाकर प्रसूतिगृह में रखा है तथा व्रूर कंस उन मृतक युगलों को शिलातल पर पछाड़-पछाड़ कर मारता गया है।

इन देवकी के पुत्रों के पुण्य के प्रभाव से ही उनकी देव द्वारा रक्षा की गई है अत: ये तीनों युगलिया-छहों भाई अलका सेठानी के पास सुखपूर्वक पाले जा रहे थे, उनके नाम- (१) नृपदत्त

(२) देवपाल

(३) अनीकदत्त

(४) अनीकपाल

(५) शत्रुघ्न और

(६) जितशत्रु थे।

अनंतर एक दिन श्वेत भवन में शयन करती हुई देवकी ने पिछली रात्रि में अभ्युदय को सूचित करने वाले ऐसे सात स्वप्न देखे-

(१) उगता हुआ सूर्य

(२) पूर्ण चन्द्रमा

(३) आकाश से उतरता हुआ विमान

(४) बड़ी-बड़ी ज्वालाओं से युक्त अग्नि

(५) हाथियों द्वारा अभिषेक को प्राप्त हो रही लक्ष्मी

(६) ऊँचे आकाश में रत्नों से युक्त देवों की ध्वजा और

(७) मुख में प्रवेश करता हुआ सिंह।

इन स्वप्नों को देखकर जागकर विस्मय को प्राप्त हुई देवकी प्रात:कालीन स्नान आदि से निवृत्त होकर मंगलीक वस्त्र अलंकार धारणकर पति के निकट पहुँचकर अपने स्वप्न निवेदित कर उनका फल पूछने लगी।

वसुदेव ने कहा-हे प्रिये! तुम्हारे एक ऐसा पुत्र होगा, जो समस्त पृथ्वी का स्वामी होगा, महाप्रतापी और निर्भय होगा, अनंतर वह गर्भवती हुई। देवकी के गर्भ वृद्धि के साथ-साथ पृथिवी पर समस्त मनुष्यों का सौमनस्य बढ़ता जाता था किन्तु कंस का क्षोभ निरंतर बढ़ता जा रहा था।

वह अलक्ष्यरूप से गर्भ के महीनों को गिनता रहता था तथा बहन के प्रसव की प्रतीक्षा करता हुआ उसकी पूर्ण देख-रेख रखता था। सभी बालक नवमाह में उत्पन्न होते हैं परन्तु ये कृष्ण भाद्रमास में सातवें मास में ही उत्पन्न हो गए। उस समय बालक के पुण्यप्रभाव से स्नेही बंधुओं के यहाँ अच्छे-अच्छे निमित्त प्रगट हुए एवं शत्रुओं के घरों में भय उत्पादक निमित्त प्रकट हुए। उन दिनों सात दिनों से लगातार घनघोर वर्षा हो रही थी, फिर भी उसकी रक्षा के लिए बलदेव ने बालक कृष्ण को उठा लिया और वसुदेव ने उन पर छत्ता तान दिया एवं रात्रि के समय ही दोनों शीघ्र ही घर से बाहर निकल पड़े। उस समय नगरवासी सो रहे थे, कृष्ण के सुभट भी गहरी निद्रा में निमग्न थे। गोपुरद्वार पर आए तो किवाड़ बंद थे परन्तु बालक के चरणस्पर्श करते ही उनमें निकलने योग्य संधि हो गई, जिससे वे बाहर निकल गए।

उस समय पुत्र के पुण्य से नगरदेवता विक्रिया से एक बैल का रूप बनाकर उनके आगे हो गया, उस बैल के दोनों सींगों पर देदीप्यमान मणियों के दीपक रखे हुए थे, जिनसे रात्रि का घोर अंधकार दूर होता जा रहा था। जैसे ही यह मुख्य गोपुरद्वार से बाहर निकले, पानी की एक बूंद बालक की नाक में चली जाने से जोर से उसे छींक आ गई। तभी ऊपर से उग्रसेन ने कहा-अरे! कौन है ? तभी बलभद्र ने कहा-आप इस रहस्य की रक्षा करें, यह बालक ही आगे आपको बंधन से मुक्त करेगा। तब उग्रसेन ने खूब आशीर्वाद दिया-‘तू चिरंजीवी हो।’ यह हमारे भाई की पुत्री का पुत्र शत्रु से अज्ञात रहकर वृद्धि को प्राप्त हो।

ये पिता-पुत्र बालक को लेकर आगे बढ़ते जा रहे थे, यमुना के किनारे पहुँचे कि कृष्ण के पुण्य से यमुना नदी के महाप्रवाह दो भाग में हो गए, बीच में मार्ग बन गया। वे नदी को पार कर वृंदावन की ओर गए, वहाँ गाँव के बाहर सिरका में अपनी यशोदा पत्नी के साथ सुनंद गोप रहता था, वह वंश परम्परा से चला आया इनका अतिविश्वासपात्र था।

बलदेव और वसुदेव ने रात्रि में उसे देखकर पुत्र को सौंपकर कहा-देखो भाई! यह पुत्र महान पुण्यशाली है, इसे अपना पुत्र समझकर बढ़ाओ और यह रहस्य किसी को भी ज्ञात न हो। अनंतर उसी समय जन्मी यशोदा की पुत्री को लेकर ये दोनों शीघ्र ही वापस आकर देवकी रानी के पास पुत्री को रखकर गुप्तरूप से अपने स्थान पर चले गए।

प्रात: बहन की प्रसूति का समाचार पाकर निर्दयी कंस प्रसूतिगृह में घुसकर कन्या को देखकर कुछ शांत हुआ किन्तु सोचने लगा, क्या पता इसका पति मुझे मारने वाला हो ? इस शंका से आकुल हो उसने उस कन्या की नाक मसल दी पुन: उसने समझ लिया कि अब इसके संतान नहीं होगी, अत: कुछ शांतचित्त हो रहने लगा।

उधर बालक का जातसंस्कार कर उसका नाम कृष्ण रखा गया। वह बालक ब्रजवासियों के तथा माता-पिता, यशोदा व नंदगोप के अभूतपूर्व आनंद को बढ़ाता हुआ वृद्धि को प्राप्त हो रहा था।

अनंतर किसी एक दिन कंस के हितैषी वरुण नाम के निमित्तज्ञानी ने कहा कि राजन्! यहाँ कहीं या वन में आपका शत्रु बढ़ रहा है, उसकी खोज करना चाहिए। तब कंस ने तीन दिन का उपवास किया, उस समय पूर्व भव में इसके साधु समय के प्रभाव से जो विद्यादेवियाँ आई थीं और इसने कहा था ‘अभी आवश्यकता नहीं है, समय पर आपको याद करूँगा, तब सहायता करना’ ऐसी वे देवियाँ आकर पूछने लगीं- कहिए! राजन्! क्या कार्य है ?

उसने कहा-मेरा शत्रु कहीं बढ़ रहा है, तुम सभी उसे मार डालो। तब उन देवियों में से कोई देवी पूतना बनकर विष भरे स्तनपान कराने लगी, कोई भयंकर पक्षी बनकर चोंच मारने लगी किन्तु बालक के पुण्य से वे सभी निष्फल रहीं। वह बालक अद्भुत-अपूर्व शक्ति का धारक सभी मायामयी प्रकोपों को क्षणभर में दूर भगा देता था।

एक समय बलदेव माता देवकी को लेकर बालक के पास आए। माता ने यशोदा को सराहते हुए बालक पर हाथ फेरा कि उसके स्तन से दूध झरने लगा, यह गोप्य किसी को मालूम न हो, अत: बलदेव ने दूध के घड़ों से माता को नहला दिया पुन: बालक को लाड़-प्यार का अनेक आशीर्वाद देकर माता वापस आ गर्इं।

यह बालक बढ़ते हुए किशोरावस्था में आ गया था और अपनी अद्भुत सुंदरता से सभी के हर्ष व प्रेम को वृद्धिंगत करता रहता था। किसी समय एक देवी ने भयंकर वर्षा से कृष्ण को मारना चाहा और सारे गोकुल व गायों को संकट में डाल दिया, तभी श्रीकृष्ण ने अपनी दोनों भुजाओं से गोवद्र्धन पर्वत को बहुत ऊँचा उठाकर उसके नीचे सबकी रक्षा की।

इधर इन लोकोत्तर क्रियाकलापों से प्रभावित बलदेव वहाँ आ-आकर श्रीकृष्ण को सम्पूर्ण विद्या व कलाओं में निष्णात कर रहे थे। ये कृष्ण नीलवर्ण के थे, पीत वस्त्र पहनते थे, माथे पर मयूरपंख की कलगी लगाए रहते थे। वे गोप बालकों के साथ तथा गोप बालिकाओं के साथ भी क्रीड़ा करते रहते थे फिर भी वे सदा निर्विकार ही रहते थे जैसे अंगूठी में जड़ा हुआ श्रेष्ठ मणि स्त्री के हाथ की अंगुली का स्पर्श करता हुआ भी निर्विकार रहता है, उसी प्रकार वे रासलीला के समय गोप बालिकाओं को नचाते हुए भी निर्विकार रहते थे।

किसी समय मथुरा में जैन मंदिर के समीप पूर्व दिशा के दिक्पाल के मंदिर में श्रीकृष्ण के पुण्य के प्रभाव से नागशय्या, धनुष व शंख ये तीन रत्न उत्पन्न हुए। देवता उनकी रक्षा करते थे। कंस ने उन्हें देखकर डरते हुए वरुण नाम के ज्योतिषी से पूछा-

इनका फल क्या है ? ज्योतिषी ने कहा-राजन्! जो विधिवत् इन तीनों रत्नों को सिद्ध करेगा, वही चक्ररत्न से सुरक्षित राज्य करेगा। कंस ने प्रयत्न किया किन्तु असफल रहा। तब उसने नगर में घोषणा करा दी-‘जो बलवान नागशय्या पर चढ़कर एक हाथ से शंख बजाएगा और दूसरे हाथ से धनुष को अनायास ही चढ़ा देगा, उसे राजा अपनी पुत्री प्रदान करेगा।’

घोषणा सुनकर अनेक लोगों के साथ कृष्ण वहाँ आए और सहज में नागशय्या पर चढ़कर शंख फूककर धनुष को चढ़ा दिया और बलदेव आदि की प्रेरणा से शीघ्र ही ‘ब्रज’ वापस चले गए। कंस को निर्णय नहीं हो सका कि किसने यह कार्य किया है ? कंस ने अनेक उपायों से अपने उस शत्रु को खोजने का प्रयास किया किन्तु सफल नहीं हो सका, तब उसने नंदगोप को सूचना भेजी कि तुम सभी लोग मथुरा में आवो, मल्लयुद्ध में भाग लेवो।

इस भयंकर मल्लयुद्ध में बलदेव के संकेतानुसार श्रीकृष्ण ने बहुत देर तक मल्लयुद्ध में कौशल दिखाते हुए पहले तो ‘चाणूर’ नाम के मल्ल को मार गिराया पुन: कंस के कुपित होकर रंगभूमि में प्रवेश करने पर श्रीकृष्ण ने उसके पैर पकड़ पक्षी की तरह उसे आकाश में घुमाया और पुन: जमीन पर पटककर यमराज के पास भेज दिया। उसी समय आकाश से फूल बरसने लगे, देवों ने नगाड़े बजाए, तभी वसुदेव की सेना में क्षोभ होने लगा। वीरशिरोमणि बलदेव ने विजयी श्रीकृष्ण को आगे कर विरुद्ध राजाओं पर आक्रमण कर दिया और सभी को पराजित कर दिया।

पुन: उग्रसेन राजा को बंधन से मुक्त कर नंदगोप आदि को सम्मानित किया। उस समय सभी नगरवासी व देशवासी यह जान गए कि ये श्री वसुदेव के पुत्र हैं, कंस के भय से ब्रज में नंदगोप के यहाँ बढ़ रहे थे।

इधर श्रीकृष्ण बलदेव के साथ अपने पिता वसुदेव व माता देवकी से मिले, नमस्कार कर उन्हें संतुष्ट किया। उसी समय श्रीसमुद्रविजय आदि भी श्रीवसुदेव की प्रेरणा से वहाँ आए हुए थे। सभी परिवार से मिलकर प्रसन्न हुए पुन: मथुरा का राज्यभार श्रीउग्रसेन राजा को सौंपकर अपने कुटुम्बीजनों के साथ शौरीपुर चले गए।

भगवान नेमिनाथ-

शौरीपुर में महाराजा समुद्रविजय राज्य संचालन कर रहे थे। इन्द्र की आज्ञा से कुबेर ने शौरीपुर में महाराजा समुद्रविजय के महल में महारानी शिवादेवी के आंगन में तीर्थंकर के गर्भ में आने के छह माह पूर्व से रत्नों की वर्षा करना प्रारंभ कर दिया, वह रत्नवृष्टि दिन में तीन बार साढ़े तीन करोड़ प्रमाण थी। दिक्कुमारी देवियाँ माता शिवादेवी की सेवा कर रही थीं।

माता ने एक दिन रात्रि के पिछले प्रहर में सोलह स्वप्न देखे, प्रात: पतिदेव के मुख से उनका फल सुनकर प्रसन्न हुर्इं कि आपके गर्भ में तीर्थंकर बालक आ गया है। इन्द्रों ने आकर गर्भकल्याणक महोत्सव मनाया व माता-पिता की पूजा-भक्ति आदि करके अपने-अपने स्थान चले गए, यह तिथि कार्तिक शुक्ला षष्ठी प्रसिद्ध हुई है।

तदनंतर माता शिवादेवी ने श्रावण शुक्ला षष्ठी को जिनबालक को जन्म दिया। इन्द्रों के आसन कंपते ही असंख्य देवपरिवार के साथ इन्द्र ने आकर शची द्वारा प्रसूतिगृह से बालक को प्राप्त कर सुमेरुपर्वत पर ले जाकर प्रभु तीर्थंकर बालक का जन्माभिषेक महोत्सव सम्पन्न कर शौरीपुर आकर माता-पिता को तीर्थंकर बालक को सौंप दिया पुन: शौरीपुर में भी सुमेरुपर्वत के सदृश जन्माभिषेक महोत्सव करके दिखाया। बालक का नाम इन्द्र ने ‘नेमिनाथ’ रखा। क्रमश: तीर्थंकर बालक अपनी बालक्रीड़ा से वृद्धिंगत हो रहे थे। हरिवंशपुराण में भगवान के जन्माभिषेक का बहुत ही विस्तार से वर्णन है।

द्वारावती रचना-किसी समय राजगृह के स्वामी जरासंध इन हरिवंशी राजाओं को नष्ट करने के उत्सुक थे। चूँकि उनकी पुत्री जीवद्यशा ने अपने पति कंस के मरने के समाचार सुनाए थे, तभी से वे कुपित थे ही, पुन: अनेक कारणों से कुपित हुए जरासंध ने विशाल सेना लेकर शौरीपुर की ओर प्रस्थान किया।

उस समय वसुदेव, बलदेव आदि ने मिलकर मंत्रणा की कि यद्यपि तीर्थंकर नेमिनाथ व जरासंध प्रतिनारायण को मारने वाले श्रीकृष्ण नारायण हैं, फिर भी अभी कुछ समय की प्रतीक्षा करना है अत: ये यदुकुल अर्थात् हरिवंशी राजागण मथुरा व शौरीपुर छोड़कर अपरिमित धन व अठारह करोड़ यादवों को-हरिवंशी राजा, महाराजाओं को साथ लेकर उत्तम तिथि आदि उत्तम मुहूर्त में शौरीपुर से बाहर निकले और धीरे-धीरे पड़ावों से विंध्याचल के निकट पहुँचे। मार्ग में पीछे-पीछे जरासंध आ रहा है, सुनकर ये लोग युद्ध की प्रतीक्षा करने लगे। इधर समय और भाग्य के नियोग से अर्ध भरतक्षेत्र में निवास करने वाली देवियों ने अपनी विक्रिया से बहुत सी चिताएँ रच दीं, उन्हें अग्नि की ज्वालाओं से व्याप्त कर दिया। तब जरासंध का मार्ग रुक गया, उसने एक वृद्धा से पूछा-यह किसका विशाल कटक जल रहा है, उस वृद्धा ने कहा-हे राजन्! राजगृह के प्रतापी राजा जरासंध हरिवंशी, कुरुवंशी आदि राजाओं के पीछे लगा हुआ है, ऐसा जानकर ये हरिवंशी आदि राजागण मंत्रिणों के साथ इस अग्नि में प्रविष्ट हो गये हैं, इत्यादि।

जरासंध ने ऐसा सुनकर व इन हरिवंशी राजाओं का नाश मानकर वापस चला गया।

इधर ये समुद्रविजय, वसुदेव आदि राजागण पश्चिम समुद्र के तट पर पहुँच गए और समुद्र के किनारे जाकर समुद्र की शोभा देखने लगे। तब श्रीकृष्ण बलदेव के साथ पंचपरमेष्ठियों की भक्ति-स्तुति करके तीन उपवास के साथ आसन पर स्थित थे।

उसी समय श्रीकृष्ण के पुण्य व श्रीनेमिनाथ तीर्थंकर की सातिशय भक्ति से कुबेर ने वहाँ शीघ्र ही द्वारिकापुरी नाम से समुद्र के मध्य में सुंदर नगरी की रचना कर दी। ये बारह योजन लंबी, नव योजन चौड़ी, परकोटे से युक्त व समुद्र की परिखा से घिरी हुई थी। इसमें अठारह खंडों से युक्त नारायण का महल था। स्वर्ण व रत्नों के महलों से शोभायमान ये नगरी स्वर्गपुरी के समान दिख रही थी। तभी कुबेर ने श्रीकृष्ण के लिए मुकुट, हार, कौस्तुभ मणि, दो पीत वस्त्र, नाना आभूषण, गदा, शक्ति, नंदक नाम का खड्ग, शाङ्र्ग धनुष, दो तरकश, वङ्कामय बाण, दिव्यरथ, चंवर, छत्र आदि प्रदान किए तथा बलदेव के लिए दो नील वस्त्र, माला, मुकुट, गदा, हल, मूसल, धनुष बाणों से युक्त तरकश, दिव्यरथ, छत्र आदि दिए एवं भगवान नेमिनाथ के लिए उनके योग्य वस्त्र, अलंकार आदि सामग्री प्रदान कर इन सभी से इस द्वारिका नगरी में प्रवेश के लिए प्रार्थना की और स्वयं अपने स्थान चला गया। तब सभी राजाओं ने मिलकर तीर्थंकर नेमिनाथ, बलदेव व श्रीकृष्ण के साथ बहुत ही वैभव से उस नगरी में प्रवेश किया। ये सब यथास्थान रहकर सुखपूर्वक वहाँ निवास कर रहे थे। कुबेर की आज्ञा से यक्ष देवों ने वहाँ साढ़े तीन दिन तक अटूट धन, धान्यादि की वर्षा की थी।

इस शौरीपुर नगरी में कुबेर ने सर्वप्रथम एक हजार शिखरों से सुशोभित देदीप्यमान बहुत बड़ा एक जिनमंदिर बनाया था।

महासंग्राम-किसी समय राजगृही के राजा जरासंध पुन: किसी कारण से कुपित हो युद्ध के लिए प्रस्थान कर देते हैं। कौरव आदि राजागण उनके साथ हो जाते हैं और पाण्डव आदि राजागण श्रीकृष्ण के साथ हो जाते हैं। कुरुक्षेत्र में महासंग्राम शुरू हो जाता है, लाखों-लाखों लोग मारे जाते हैं।

उत्तरपुराण में कहा है कि ‘मनुष्यों का जो आगम में अकालमरण बतलाया गया है, उसकी अधिक से अधिक संख्या यदि हुई थी, तो उसी युद्ध में हुई थी।

अंत में क्रोध से भरे अर्धचक्री जरासंध ने अपना चक्ररत्न श्रीकृष्ण के ऊपर चला दिया, वह भी श्रीकृष्ण की तीन प्रदक्षिणा देकर उनकी दाहिनी भुजा पर ठहर गया तब उसी चक्र से श्रीकृष्ण ने जरासंध का शिर छेद डाला। उसी समय आकाश से पुष्प बरसने लगे और देवों द्वारा वाद्य बजाए जाने लगे।

उस समय श्रीकृष्ण नवमें नारायण-तीनखण्ड के स्वामी प्रसिद्ध हो गए और बलदेव नवमें बलभद्र हो गए। हजारों राजाओं, विद्याधरों से सेवित पुन: ये सभी द्वारावती में रहते हुए तीन खण्डों की प्रजा पर एकछत्र सार्वभौम शासन करने लगे।

श्रीकृष्ण की आयु एक हजार वर्ष की थी, दश धनुष (१०²४·४० हाथ) ऊँचा शरीर था, नील वर्ण था। चक्ररत्न, शक्ति, गदा, शंख, धनुष, दण्ड और नंदक नाम का खड्ग ये सात रत्न थे। रुक्मिणी, सत्यभामा आदि ८ पट्टरानियाँ व सोलह हजार रानियाँ थीं। बलदेव के रत्नमाला, गदा, हल, मूसल ये चार महारत्न थे एवं आठ हजार रानियाँ थीं। दो भाई परस्पर अखंड प्रेम धारण कर समस्त वसुधा पर शासन कर रहे थे।

भगवान नेमिनाथ-

किसी समय भगवान नेमिनाथ विवाह हेतु करोड़ों हरिवंशियों के साथ जूनागढ़ पहुँचे थे। वहाँ पशुओं के बंधन को देखकर विरक्त हुए और लौकांतिक देवोें द्वारा स्तुत्य दीक्षा लेकर तपश्चरण करने लगे। प्रभु ने गिरनार के सहस्राम्रवन में श्रावण शुक्ला षष्ठी के दिन बांस वृक्ष के नीचे दीक्षा ली थी। इन्होंने वहीं आश्विन शुक्ला प्रतिपदा के दिन केवलज्ञान प्राप्त किया है।

भगवान के समवसरण में समय-समय पर श्रीकृष्ण, बलदेव आदि जा-जाकर प्रभु के धर्मोपदेश को श्रवण करते रहते थे। किसी समय समवसरण में भगवान को नमस्कार कर हाथ जोड़कर प्रश्न किया- भगवन्! आज मेरे महल में दो मुनियों का युगल तीन बार आया और फिर-फिर से उन्होंने तीन बार आहार लिया, प्रभो! जब मुनियों की आहार बेला एक है, एक बार ही वे भोजन लेते हैं, तो तीन बार कैसे आये ? अथवा वे तीन मुनियों का युगल अत्यंत रूप की सदृशता से मुझे भ्रम हो रहा हो। प्रभो! आश्चर्य इस बात का है कि उन सभी में मेरा पुत्रों के समान स्नेह उमड़ रहा था।

देवकी रानी के इस प्रश्न के बाद प्रभु की दिव्यध्वनि खिरी और गणधरदेव श्रीवरदत्त ने कहा-महारानी! वे छहों ही मुनि तुम्हारे ही पुत्र हैं। श्रीकृष्ण के पहले तीन बार युगलिया पुत्र जन्मे थे, कंस के भय से देव ने इन्हें भद्रिलपुर के सुदृष्टि सेठ की सेठानी अलका यहाँ पहुँचाया था। वे छहों ही भाई मेरे समवसरण में दीक्षित होकर मुनि हुए हैं। वे इसी जन्म से मोक्ष को प्राप्त करेंगे। यही कारण है कि तुम्हारा उनमें पुत्रत्व प्रेम उमड़ रहा था। अनंतर देवकी रानी ने वहीं समवसरण में विराजमान उन पुत्ररूप मुनियों को नमस्कार किया तथा श्रीकृष्ण आदि ने भी उन्हें नमस्कार कर उनकी स्तुति की।

भगवान के समवसरण में श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न आदि ने व अनेक रानियों ने व अनेक राजा, महाराजाओं ने दीक्षा ली है। भगवान नेमिनाथ के गर्भ व जन्मकल्याणक शौरीपुर में हुए हैं तथा दीक्षा, केवलज्ञान व मोक्ष ये तीन कल्याणक गिरनार में हुए हैं।

श्री बलभद्र-बलदेव भी आगे तपश्चरण करके महाशुक्र स्वर्ग में देव हुए हैं। ये भी आगे भविष्य में तीर्थंकर होंगे तथा श्रीकृष्ण भी आगे इसी भरतक्षेत्र में सोलहवें तीर्थंकर श्री निर्मलनाथ नाम के होवेंगे। इन भावी तीर्थंकरों को भी मेरा नमस्कार होवे।

नाभेयादि-जिनाधिपास्त्रिभुवनख्याताश्चतुर्विंशति:

श्रीमन्तो भरतेश्वरप्रभृतयो ये चक्रिणो द्वादश।
ये विष्णु-प्रतिविष्णु-लाङ्गलधरा: सप्तोत्तरा विंशति-
स्त्रैकाल्ये प्रथितास्त्रिषष्टिपुरुषा: कुर्वन्तु ते (मे) मङ्गलम्।।

यहाँ तक नव बलभद्र, नव नारायण, नव प्रतिनारायण का वर्णन करने वाला चौथा अधिकार पूर्ण हुआ।