ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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09. सिख विवाह

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सिख विवाह

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सिख विवाह परंपरागत रूप से जोश के साथ, संगीत और नाच गाने के मध्य उत्सवपूर्वक सम्पन्न होते हैं। सिख विवाह को आनंद कारज कहा जाता है, जिसका अर्थ है आनंद व उल्लास का कार्य, सिख गुरुओं की सीख के अनुसार पारिवारिक जीवन बहुत महत्त्वपूर्ण होता है, इसलिए विवाह को एक शुभ कार्य का दर्जा प्राप्त है।

सगाई — सिख समाज में प्रचलित परंपराओं के अनुसार, विवाह तय हो जाने पर, दुल्हन के माता—पिता व रिश्तेदार लड़के के घर जाकर, उसे अंगूठी कड़ा, कृपाण आदि उपहार में भेंट करते हैं। लड़का, दुल्हन के घर से लाया हुआ छुआरा खाकर, अपनी सहमति व्यक्त करता है। यह आयोजन अधिकतर संगत में, पवित्र गुरु ग्रंथ साहिब के समक्ष, संपन्न होता है। आयोजन की समाप्ति पर ‘सिर वर्ण’ अर्थात् लड़के के सर से रुपये घुमाकर दान किए जाते हैं तथा ‘अरदास’ होती है।

मिलनी — सिख विवाह अधिकतर गुरुद्वारों में संपन्न होते हैं। प्राय: दूल्हे के घरवाले बारात लेकर पहुँचते हैं, जहाँ मिलनी की रस्म होती है। विवाह अकसर दिन में ही संपन्न होते हैं।

विवाह — दूल्हा, गुरु ग्रंथ साहिब के समक्ष बैठता है और दुल्हन आकर, बायीं ओर अपना स्थान ग्रहण करती है। प्रारम्भ में ईश्वर से प्रार्थना की जाती है कि वह इस दैवीय संगम को आशीर्वाद प्रदान करें। इसके पश्चात् सिख संत अथवा जो भी बुजुर्ग विवाह सम्पन्न करा रहे हों, युगल जोड़ी को विवाह, उनके कत्र्तव्यों व इसके दायित्व का बखूबी निर्वाह करने की सलाह देते हैं।

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लवण या लावा — दुल्हन के पिता केसरिया रंग की पगड़ी का एक सिरा दूल्हे के कंधे पर रखते हैं व दूसरा सिरा दुल्हन के हाथ में दिया जाता है। इस तरह, नव—युगल गुरु ग्रंथ साहिब के चार फेरे लेते हैं जिसे लवण, लावा या फेरा कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि सिखों के चौथे गुरु, गुरु रामदासजी ने इस आत्मा व परमात्मा के मिलन का चित्रित करते हुए लिखा था कि ‘एक जोत, दो मूर्ति’। लवण के चार फेरे, जीवन के चार अहम पहलुओं की व्याख्या करते हैं।

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पहला लवण

दूसरा लवण — यह एक दूसरे के प्रति समर्पण भाव को दर्शाता है। इसमें कहा गया है कि सच्चे गुरु से यह मिलान है और हृदय के स्वार्थ के भाव को बाहर निकाल देना चाहिए।

तीसरा लवण — इस लवण में वैराग्य के भावों को दर्शाया गया है, इसमें कहा गया है कि ईश्वर के नाम से हमारी आत्मा मुक्ति प्राप्त करती है। नाम के हृदय में गुंजित होने की बात भी कही गई है।

चौथा लवण — चौथा और अंतिम लवण आत्मा के उस मिलन को इंगित करता है जहाँ निश्च्छल प्रेम, ईश्वर से मिलन का मार्ग प्रशस्त करता है। आत्मा को परमात्मा की संगिनी निरूपित किया गया है तभा भक्ति से दोनों का अलौकिक मिलन होता है, जिससे हृदय में ‘नाम’ बस जाता है। लवण के पश्चात् आनंद साहिब का पाठ होता है तथा अरदास किया जाता है। आयोजन के अंत में आयोजित लंगर में सामूहिक भोज का आयोजन होता है।

शुभेच्छा भाव : मंगल भाव

स्वस्त्यस्तु ते कुशलमस्तु
चिरायुरस्तु, ऐश्वर्यमस्तु
धन—धान्य समृद्धिरस्तु, कीर्तिरस्तु,
सन्नीतिरस्तु, बलमस्तु, यशोऽस्तु, रिपुक्षयोऽस्तु
वंशे सदैव भवतां भव भक्तिरस्तु


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