ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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090.अनावृत यक्ष एवं क्षेत्रपाल स्थापना

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अनावृत यक्ष एवं क्षेत्रपाल स्थापना

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मंगल महोत्सव-

फाल्गुन शु. ३, दिनाँक २ मार्च १९८७ को प्रतिष्ठा समिति के प्रमुख लोगों ने पं. शिखरचंद जैन प्रतिष्ठाचार्य को आचार्य निमंत्रण दिया। उसके बाद प्रतिष्ठा के लिए बनाये गये नूतन विशाल ‘श्री विमल मंडप’ के सामने ध्वजारोहण की क्रियायें प्रारंभ की गर्इं। आचार्यसंघ वहाँ विराजा था। मेरठ के श्री प्रेमचंद जैन, तेल वालों ने आचार्यश्री का आशीर्वाद लेकर झंडारोहण किया। फाल्गुन शु. ४, दिनाँक ३ मार्च को मध्यान्ह में रथयात्रा निकाली गई पुनः जिनप्रतिमा को ‘श्री विमलमंडप’ की वेदी में विराजमान करके विधान-पूजन, जाप्यानुष्ठान आदि क्रियायें प्रारंभ की गयीं। मृत्तिकानयन, अंकुरारोपण होकर पंचपरमेष्ठी विधान प्रारंभ हुआ।

फाल्गुन शु. ५-६, दिनाँक ४-५ मार्च को इसी मंडप में पूजन-विधान आदि हुआ। फाल्गुन शु० ७, दिनाँक ६ मार्च को यागमंडल विधान होकर मध्यान्ह में पांडाल में भगवान चन्द्रप्रभ का निर्वाणलाडू चढ़ाया गया। इसी दिन सनावद के श्रीचंद जैन और उनकी धर्मपत्नी सरला जैन, जो कि भगवान पार्श्वनाथ के पिता अश्वसेन और माता वामादेवी बनने का सौभाग्य प्राप्त कर रहे थे, उनका जुलूस निकाला गया।

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एक शुभ संकल्प-

ये श्रीचंद जैन सनावद में मोतीचंद के परममित्र थे। जब मोतीचंद घर से निकलकर मेरे साथ आने को तैयार हो चुके थे, तब इन्होंने हंसी में कहा था- ‘जिस दिन आप दीक्षा लेंगे, उस दिन मैं ब्रह्मचर्य व्रत ले लूँगा।’’ यहां शरद पूर्णिमा १९८६ के दिन यह बात श्रीचंद ने कही और बोले कि- ‘‘माताजी! अब मैं ब्रह्मचर्य व्रत ले लूँगा।’’ इसी त्याग भावना से इन्हें भगवान के माता-पिता बनने का अवसर दिया गया।

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दीक्षार्थी का सम्मान-

फाल्गुन शु. ८, दिनाँक ७ मार्च १९८७ को मध्यान्ह में आचार्यश्री ने दीक्षार्थी मोतीचंद से गणधरवलय विधान कराया। इसी दिन मध्यान्ह में पांडाल में दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान के कार्यकर्ताओं ने मोतीचंद का सम्मान किया। इसी अवसर पर मोतीचंद जी की मां रूपाबाई का सम्मान करके उनके भाई प्रकाशचंद आदि सभी का माल्यार्पण से सम्मान किया गया। १ मार्च से आचार्य श्री ने मोतीचंद को कटोरे में भोजन का पूर्वाभ्यास शुरू करा दिया था। प्रतिदिन मोतीचन्द की बिन्दोरी (शोभायात्रा) लोग निकाल रहे थे। १ मार्च से लेकर सभी कार्यक्रम आचार्यश्री विमलसागर जी, उपाध्याय मुनिश्री भरतसागर जी आदि सर्व चतुर्विध संघ की उपस्थिति में ही सम्पन्न हो रहे थे। प्रतिदिन प्रातः अभिषेक पूजन, मध्यान्ह में मुनि-आर्यिकाओं के प्रवचन, सायंकाल आरती-भजन और विद्वानों के भाषण आदि कार्यक्रम चल रहे थे। आचार्यसंघ जब १० बजे आहारचर्या के लिए निकलता था, तब यहाँ का दृश्य देखते ही बनता था।

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गर्भकल्याणक-जन्मकल्याणक-

फाल्गुन शु. ८, दिनाँक ७ मार्च को भगवान पार्श्वनाथ की गर्भकल्याणक क्रियाएँ हुर्इं। यहाँ सौधर्म इन्द्र बनने का सौभाग्य ज्ञानचंद जैन, बम्बई वालों ने प्राप्त किया था पुनः फाल्गुन शु. ९, दिनाँक ८ मार्च रविवार को प्रातः भगवान का जन्मकल्याणक मनाया गया। विशाल जुलूस निकला, उसमें आचार्यश्री चतुर्विध संघ सहित चल रहे थे। अनंतर ८४ फुट ऊँचे सुमेरुपर्वत पर भगवान पार्श्वनाथ का १००८ कलशों से जन्माभिषेक हुआ। वायुयान द्वारा पुष्पवृष्टि की गई।

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दीक्षा समारोह-

भगवान का जन्माभिषेक सम्पन्न होते ही दीक्षार्थी मोतीचंद को बग्घी पर बैठाकर भव्य शोभायात्रा निकाली गई पुनः श्री विमलमंडप में आकर मोतीचन्द ने श्रीफल लेकर आचार्यश्री के समक्ष पुनः हजारों की जनता के बीच में दीक्षा के लिए प्रार्थना की। संस्थान के पदाधिकारी और प्रतिष्ठा समिति के कार्याध्यक्ष के कार्यभार से मुक्त होने के लिए अपना भाषण किया और बोले कि- ‘‘आज यह जो मंगल दिवस मुझे प्राप्त हुआ है, वह सब पूज्य आर्यिका श्री ज्ञानमती माताजी की ही देन है। गुरु गोविन्द दोनों खड़े, काके लागूं पाय, बलिहारी गुरुदेव की, जिन गोविन्द दियो बताय।’’ इसके बाद मोतीचंद ने अपनी मां से, परिवार के लोगों से क्षमा याचना करके दीक्षा के लिए अनुमति माँगी तथा संस्थान की भावी व्यवस्था की सारी जिम्मेदारी अपने अभिन्न साथी रवीन्द्र कुमार को सौंपते हुए कुतूहल में अपनी चाबी उन्हें दे दी। यह दृश्य सभा में एक रोमांचकारी दृश्य था। इसके बाद आचार्यश्री ने इन्हें मंगल चौक पर बैठने की आज्ञा दी।

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श्री माधवराव सिंधिया का आगमन-

इस मंगल अवसर पर माधवराव सिंधिया रेलमंत्री, श्री जे.के. जैन संसद सदस्य हेलीकॉप्टर से पधारे। सर्वप्रथम वे भगवान् महावीर स्वामी का दर्शन कर रत्नत्रय निलय में आये। यहाँ मेरे दर्शन किये, मैंने भी उन्हें मंगल आशीर्वाद देकर कुछ विशेष शिक्षाएँ प्रदान कीं, जैसा कि मुझे मालूम हुआ कि ये राजघराने के महापुरुष हैं। इनकी सात्त्विक प्रवृत्ति देखकर मैं बहुत प्रसन्न हुई पुनः ये मुख्य अतिथि सभा में पधारे, सभा के लोगों ने इनका स्वागत किया। इन्होंने आचार्यश्री आदि के दर्शन किये पुनः दीक्षा विधि प्रारंभ हो गई। मैं वहीं एक पाटे पर निकट में बैठ गई। सर्वप्रथम आचार्यश्री ने मोतीचंद के पगड़ी, कोट, कुर्ता आदि उतराये, उनके पाँच स्थान पर केशलोंच किये पुनः लंगोट और चादर पहना कर पिच्छी, कमंडलु और शास्त्र उपकरण दिये। एक कटोरा दिया, जिसमें ये आहार ग्रहण करेंगे। मस्तक पर क्षुल्लक दीक्षा के योग्य मंत्र संस्कार करते समय उपाध्याय श्री भरतसागर जी मंंत्रोच्चारण कर रहे थे। आचार्यश्री ने दीक्षा विधि सम्पन्न कर इनका नाम ‘मोतीसागर’ घोषित किया। उस समय पांडाल में उपस्थित समुदाय ने ‘क्षुल्लक मोतीसागर जी महाराज’ की जयकार से जंबूद्वीप को मुखरित कर दिया।

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पारमार्थिक ट्रस्ट-

उस समय मोतीचंद के भ्राता प्रकाशचंद ने पच्चीस हजार रुपये का दान घोषित करते हुए जंबूद्वीप के अंतर्गत धार्मिक ट्रस्ट बनाने की भावना प्रकट की। इसके बाद श्री माधवराव सिंधिया ने अपने भाषण में कहा कि- ‘‘अठारह वर्ष की अवस्था से ब्रह्मचर्य व्रत लेकर इस जंबूद्वीप जैसे महान् निर्माण कार्य आदि कार्यों को सम्पन्न करके मोतीचंद जी ने जो आज यह दीक्षा ली है, यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण है......’’ श्री जे.के. जैन ने भी अपने भाषण में जंबूद्वीप ज्ञान ज्योति आदि के द्वारा होने वाले महान् उपकार का उल्लेख किया एवं राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री तथा मोहसिना किदवई के संदेशों को पढ़कर सुनाया।

रेलमंत्री जी एवं जे.के. जैन को एक-एक रजतमंगल कलश प्रदान किये गये एवं दोनों महानुभावों को शॉल ओढ़ाकर सम्मान किया गया। मैंने मेरे आशीर्वाद प्रवचन में सिंधियाजी को क्षत्रियोचित देश और धर्म की रक्षा तथा अहिंसा की रक्षा के लिए प्रेरणा दी और धर्म में लगे रहने का आशीर्वाद दिया। मैंने कहा-‘‘मैंने सनावद में अमोलकचंद जैसे सागर से मोती को लिया था और आचार्यश्री ने पुनः मोती को सागर से जोड़कर उन्हें क्षुल्लक मोतीसागर बना दिया है।’’ उपाध्याय श्री ने कहा था-‘‘दीक्षाएँ तो बहुत होती हैं किन्तु इस ऐतिहासिक तीर्थक्षेत्र पर मोतीचंद की दीक्षा एक ऐतिहासिक दीक्षा है। जिस प्रकार चक्रवर्ती छह खण्ड पर दिग्विजय करके पुनः उस वैभव को छोड़कर दीक्षा लेते हैं, उसी प्रकार से मोतीचंद जी ने सारे भारत में जंबूद्वीप ज्ञान ज्योति को घुमाकर, धर्म की ध्वजा लहरा कर, दिग्विजय करके यह दीक्षा ग्रहण की है।.....।’’

पूज्य आचार्यश्री ने भी मंगल आशीर्वाद देते हुए कहा- ‘‘आप लोग कंधे से कंधा मिलाकर सन्मार्ग का प्रचार करें, अहिंसा को दृढ़ करें।’’....जिस प्रकार मोतीचंद ने अपने जीवन में चारित्र के ग्रहण का नमूना प्रस्तुत किया है उसी प्रकार आप सभी अपना आत्मबल बढ़ाकर चारित्र में उन्नति करें यही मेरा आशीर्वाद है। अन्त में रवीन्द्र कुमार ने कहा-‘‘यह संस्थान सारे भारत वर्ष के जैन समाज की है। इसकी चाबी संभालने का दायित्व केवल व्यवस्था रूप में मुझ पर है। अभी माताजी की आज्ञा न मिलने से जब तक मैं दीक्षा नहीं ले रहा हूँ तभी तक इस संस्थान की देख-रेख करता रहूँगा। सारी जैन समाज का सहयोग मेरे साथ है और रहेगा ही.....।’’ इसके बाद रेलमंत्री जी हेलीकॉप्टर से दिल्ली को रवाना हो गये।

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भगवान् का पालना आदि-

रात्रि में भगवान का पालना झुलाना आदि कार्यक्रम एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए।

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९ मार्च को ९ साधु का आहार-

यहाँ माँ रूपाबाई एवं कु. माधुरी ने ९ मार्च, फाल्गुन शु. ९ को आचार्यश्री विमलसागर जी, उपाध्याय श्री भरतसागर जी, मुझे (आर्यिका ज्ञानमती) तथा नव दीक्षित क्षुल्लक श्री मोतीसागर जी आदि नव साधुओं का पड़गाहन कर एक साथ नौ साधुओं को आहार दान दिया।

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भगवान का दीक्षा कल्याणक-

९ मार्च को मध्यान्ह में भगवान पार्श्वनाथ का दीक्षा कल्याणक महोत्सव संपन्न हुआ। आचार्यश्री ने जिनप्रतिमा के मस्तक पर लगे हुए चंदन का औपचारिक विधि से केशलोंच सम्पन्न किया और दीक्षा कल्याणक क्रियाएँ कीं।

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संस्थान का अधिवेशन-

रात्रि में दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान के अधिवेशन में संस्थान के मंत्री एवं प्रतिष्ठा समिति के महामंत्री रवीन्द्र कुमार ने सन् १९७४ से लेकर सन् १९८६ तक १२ वर्ष के आय-व्यय की ऑडिट रिपोर्ट प्रस्तुत की। जिसमें लगभग सवा करोड़ रुपये दिगम्बर जैन समाज से प्राप्त होकर, इस जम्बूद्वीप रचना, ग्रंथ प्रकाशन आदि कार्यों में लगाये जा चुके हैं। नव दीक्षित क्षुल्लक मोतीसागर जी ने संस्थान को प्रथम आशीर्वाद देते हुए कहा-जैसे हम सभी लोग अभी तक पूज्य माताजी की आज्ञानुसार कार्य करते आये हैं, ऐसे ही अब आप सभी को कार्य करना है। अपने पद के अनुरूप मैं भी संस्थान को यथायोग्य सहयोग देता रहूँगा।’’

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केवलज्ञान कल्याणक-

फाल्गुन शु. १०, दिनाँक १० मार्च को भगवान का केवलज्ञान कल्याणक हुआ। आचार्यश्री और उपाध्यायश्री ने सोने की कलम से सभी प्रतिमाओं में अंकन्यास विधि करके नेत्रोन्मीलन क्रिया की और सूरिमंत्र प्रदान किया। यह इन युगल मुनियों की क्रिया और उत्साह मेरे लिए तो एक अभूतपूर्व था क्योंकि आचार्यश्री विमलसागर जी के सानिध्य में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा देखने का मेरे लिए यह पहला ही अवसर था।

इसी दिन जंबूद्वीप पुस्तकालय का उद्घाटन कराया गया। पांडाल में भगवान पार्श्वनाथ के समवसरण की रचना में आचार्यश्री प्रथम गणधर थे और उपाध्याय श्री द्वितीय गणधर थे। मुझे भगवान के समवसरण में गणिनी का स्थान प्राप्त हुआ। हम सभी के संक्षिप्त प्रवचन हुए थे। रात्रि में अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन युवा परिषद का अधिवेशन सम्पन्न हुआ।

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निर्वाण कल्याणक-

फाल्गुन शु. ११, दिनाँक ११ मार्च को प्रातः भगवान के मोक्ष कल्याणक की क्रियाएँ सम्पन्न हुर्इं। इधर त्रिमूर्ति मंदिर में आजू-बाजू की वेदी में बहुत ही सुन्दर कमल बनवाये गये थे। उन कमलों पर भगवान नेमिनाथ और सहस्रफणा भगवान पार्श्वनाथ की सवा चार फुट ऊँची पद्मासन मूर्तियाँ विराजमान की गई थीं। उनकी प्रतिष्ठा विधि सम्पन्न हुई।

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सुमेरु पर्वत पर कलशारोहण-

इसके बाद लगभग साढ़े ग्यारह बजे आचार्यश्री आदि मुनिगण सुमेरु पर्वत के ऊपर पांडुक वन में पहुँच गये। वहाँ एक नव निर्मित सीढ़ी से चढ़कर अनेक महानुभावों ने सुमेरु के ऊपर चूलिका के समान स्वर्ण कलश चढ़ाये। आचार्यश्री ने प्रथम मंत्रोच्चारण पूर्वक कलश में हाथ लगाकर चढ़वाया। उपाध्याय जी ने भी हाथ लगाया और मैंने भी मंत्रोच्चारण करते हुए हाथ लगाकर कलशारोहण कराया। इस स्वर्ण कलशारोहण का श्रेय ११ महानुभावों ने ५०-५० हजार रुपये की दान राशि बोल कर लिया था। उनमें से शाह कोदरलाल हुकमचंद परिवार तलोद आदि महानुभाव हैं। जिनके नाम यहाँ जंबूद्वीप के प्रवेश के निकट शिलालेख में लिखे गये हैं। इसके बाद प्रतिष्ठा समापन के लिए रथयात्रा निकाली गई। इस प्रकार यह २ मार्च से ११ मार्च तक भगवान पार्श्वनाथ की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा सम्पन्न हुई। सुमेरु पर्वत पर स्वर्ण कलशारोहण कराया गया और मोतीचंद की क्षुल्लक दीक्षा सम्पन्न हुई।

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सम्मान एवं आभार प्रदर्शन-

फाल्गुन शु. १२, दिनाँक १२ मार्च को त्रिमूर्ति मंदिर में प्रतिष्ठाचार्य पं. शिखर चंद जी, उनके सहयोगी पं. राजकुमार जैन एवं पं. सुधर्मचंद जैन तिवरी का सम्मान किया गया। मुख्य प्रतिष्ठाचार्य को प्रशस्ति पत्र भेंट किया गया।

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युगप्रतिक्रमण एक महान् कार्य-

मेरी बहुत दिनों से इच्छा थी कि पंचवर्षीय युगप्रतिक्रमण की परम्परा प्रकाश में लाई जावे। सन् १९८५ की प्रतिष्ठा में भी मेरी इच्छा थी किन्तु आचार्यश्री धर्मसागर जी के नहीं आ पाने से वह इच्छा पूर्ण नहीं हो पाई थी। इस बार आचार्यश्री विमलसागर जी से निवेदन करने पर उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर इस लुप्त परम्परा को पुनजीर्वित कर दिया। फाल्गुन शुक्ला १४, दिनाँक १४ मार्च १९८७ का यह दिन एक ऐतिहासिक दिवस बन गया। यहां त्रिमूर्ति मंदिर में चतुर्विध संघ सहित आचार्यश्री ने और मैंने अपने संघ सहित बैठकर युगप्रतिक्रमण किया। आचार्यश्री से सभी ने प्रायश्चित माँगा और आचार्यश्री ने प्रायश्चित प्रदान किया पुनः मेरी इच्छानुसार आचार्यश्री ने घोषणा की कि- ‘‘आगे ५-५ वर्ष में इसी तरह युगप्रतिक्रमण किया जावेगा।’’

इस महान मंगल अवसर पर मैंने आचार्यश्री को ‘‘तीर्थोद्धारक चूड़ामणि’’ पद से गौरवान्वित किया। इसी प्रकार उपाध्याय मुनि में उपशम गुण विशेष देखकर उन्हें ‘प्रशममूर्ति’ पद से विभूषित किया। संघस्थ आर्यिका स्याद्वादमती में अच्छी वत्तृत्व कला देखकर उन्हें ‘प्रवचन प्रभाकर’ पद से विभूषित किया। इन पदवियों को चतुर्विध संघ के सभी साधु-साध्वियों ने एवं उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं ने गद्गद हो जयकारे के साथ अनुमोदित किया।

मैंने एक दिन आचार्यश्री को अपने द्वारा रचित कल्पदु्रम विधान, सर्वतोभद्र विधान, तीन लोक विधान की फाइलें दिखायी थीं। आचार्यश्री ने एक रात्रि में ही उन्हें देखकर प्रसन्नता व्यक्त की थी अतः इस समय आचार्यश्री ने मुझे ‘‘विधान वाचस्पति’’ कहकर गौरवान्वित किया।

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अनावृत यक्ष एवं क्षेत्रपाल-

चैत्र कृ. १ दिनाँक १६ मार्च को आचार्यश्री के करकमलों द्वारा जंबूद्वीप के प्रवेश द्वार में बार्इं ओर बाजू में बनी हुई वेदी में क्षेत्रपाल स्थापित किये गये। इससे पूर्व ११ मार्च को ही इसी द्वार के दायीं ओर बनी हुई वेदी में अनावृत यक्ष के देव भवन में ऊपर में मैंने सिद्धप्रतिमा विराजमान करायी थीं और देव भवन में नीचे के भाग में अनावृत यक्ष की प्रतिमा विराजमान कराई थीं। इसी चैत्र कृ. १, दिनाँक १६ मार्च को यहाँ जंबूद्वीप स्थल पर ध्यान केन्द्र के भवन का शिलान्यास आचार्य संघ के सानिध्य में संपन्न हुआ। कई वर्षों से ध्यान केन्द्र स्थापना की भावना मन में चल रही थी। मुझे ह्रीं का ध्यान प्रिय है, इसके लिए ‘ह्रीं’ की मूर्ति स्थापित करने की इच्छा है।

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संघ पूजन-

इसी दिन मध्यान्ह एक बजे त्रिमूर्ति मंदिर में आचार्यसंघ की पूजन की व्यवस्था रखी गई। आचार्यश्री और उपाध्याय श्री के दूध से चरण प्रक्षालन कर आचार्यश्री की पूजा करके आरती की गई पुनः आचार्यश्री आदि के मंगल प्रवचन हुए।

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संघ विहार-

चैत्र कृ. २, दिनाँक १७ मार्च १९८७ को सभा में आचार्यश्री की मंगल आरती व मंगल आशीर्वाद के बाद आचार्यसंघ ने मेरठ की ओर मंगल विहार कर दिया। यहाँ भगवान नेमिनाथ और पार्श्वनाथ की प्रतिष्ठा होने के बाद से प्रतिदिन आचार्यसंघ के समक्ष दूध, दही आदि से पंचामृत अभिषेक होता था। आचार्यश्री को अभिषेक देखने की और गंधोदक लेने की बहुत ही रुचि रही है।

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मेरा अनुभव-

आचार्यसंघ के यहाँ रहने पर उनके वात्सल्य को देखकर पुराना संस्मरण सन् १९६६ के सोलापुर का याद आ गया कि जब वहाँ ब्र. सुमतीबाई ‘शरद पूर्णिमा’ को मेरी जन्मजयन्ती मनाना चाहती थीं, मैं मना कर रही थी। इस पर आचार्यश्री ने बड़े प्रेम से मेरी जन्मजयंती का आयोजन करवाया था और स्वयं आकर सभा में संघ सहित विराजे थे, अंत में बार-बार मंगल आशीर्वाद दिया था।

यहाँ एक दिन ६ मार्च को आहार के लिए उठने के समय अकस्मात् मेरे सीने में जोर की दर्द उठ गई, तब मैं आकर अंदर पाटे पर लेट गई, माधुरी ने घी लगाया, आराम नहीं होने से आचार्यश्री को सूचना दी, वे शीघ्र ही उपाध्याय भरत सागर को लेकर आ गये और करीब १५-२० मिनट तक यहाँ बैठे-बैठे मंत्र सुनाते रहे। उसके बाद दर्द में कुछ कमी होने से मैं आहार को उठ पायी।

आचार्यश्री यहाँ प्रतिष्ठा में प्रतिदिन प्रत्येक कार्यक्रम को अपना समझकर, उसमें रुचि से उपस्थित होकर विराजते थे और मंगल आशीर्वाद देते थे। साथ ही मुझे भी बुलवाते रहते थे। उनके इस व्यवहार से यह नहीं पता चलता था कि आचार्यश्री मेहमान (अतिथि) हैं। आचार्यश्री के साथ ही उपाध्याय श्री भरतसागर जी तथा और भी अन्य मुनिगण, आर्यिकाश्री नन्दामती जी, आदिमती जी, स्याद्वादमती जी आदि सभी बहुत ही प्रसन्न रहते थे। ब्र. चित्राबाई का प्रेम और यहाँ के प्रति तथा मेरे प्रति भक्ति अद्भुत ही रही। कोई ऐसी कल्पना भी नहीं कर सके थे कि वे इतनी खुश और इतनी उदार रहेंगी। एक दिन उनके चौके मेंं भी आचार्यश्री, उपाध्यायश्री, मैं (ज्ञानमती), क्षुल्लक मोतीसागर जी आदि अनेक साधु एक साथ आहार के लिए गये थे। आहार के बाद हर्षातिरेक में उन्होंने मेरे ऊपर गुलाब के फूलों की वर्षा की थी।

ब्र. चित्राबाई ने मुझे पिच्छी प्रदान करने के लिए ३५ हजार रुपये की बोली ली थी, यह उनकी विशेष भक्ति और उदारता का ज्वलंत उदाहरण था। मोतीचंद की दीक्षा में मेरी भावना- जब सनावद में मैंने सन् १९६७ में मोतीचंद को घर से निकलने की एवं संघ में रहने की प्रेरणा दी थी। तब वे बोले थे -‘‘माताजी! मैं त्याग कुछ भी नहीं करूँगा, इस शर्त पर चलूँगा।’’

इसके बाद संघ में आकर मेरे पास अध्ययन कर शास्त्री और न्यायतीर्थ की परीक्षाएँ उत्तीर्ण कीं। अपने वचन के अनुसार जंबूद्वीप निर्माण कार्य में जुट गये। दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान को बनाया और वृद्धिंगत किया। इस संस्थान में मेरी आज्ञा से ये सर्वप्रथम ‘कोषाध्यक्ष’ रहे हैं, बाद में मंत्री रहे हैं पुनः सन् १९८५ में ज्ञानज्योति प्रवर्तन समिति के महामंत्री रहे हैं। पश्चात् सन् १९८५ की जंबूद्वीप प्रतिष्ठापना समिति के अध्यक्ष पद के भार को संभाला है पुनः इस प्रतिष्ठा में मेरी आज्ञा से ‘कार्याध्यक्ष’ पद के भार को संभाला है। जैसे दक्षिण में महामना चामुंडराय ने अपनी माता के नियम को पूर्ण करने के लिए भगवान बाहुबली की मूर्ति स्थापित की थी, ऐसे ही मेरे नियम को पूर्ण करने के लिए मोतीचंद ने सुदर्शन मेरु की प्रतिष्ठा और जंबूद्वीप की रचना का कार्य किया है अतः ये ‘अभिनव चामुंडराय’ हैं। ये अब क्षुल्लक मोतीसागर बनकर इस संस्थान के ‘पीठाधीश’ के भार को संभाल रहे हैं।

इस प्रकार एक योग्य शिष्य से जितनी मुझे आशाएँ थीं, वे सब इन्होंने पूरी की हैं, आगे भी मेरे जीवन में मेरी आज्ञा पालन करते रहें और भविष्य में अपनी आत्म साधना के साथ-साथ खूब जैनधर्म की प्रभावना करते रहें, यही मेरी मंगल भावना है। ईसवी सन् १९८७ के मार्च में यहाँ पर १. आचार्यश्री विमलसागर जी

२. उपाध्याय श्री भरतसागर जी

३. मुनिश्री अरहसागर जी

४. मुनिश्री बाहुबली सागर जी

५. मुनिश्री उदयसागर जी

६. मुनिश्री श्रवणसागर जी

७. मुनिश्री निरंजन सागर जी

८. आर्यिका आदिमती जी

९. आर्यिका सूर्यमती जी

१०. आर्यिका पार्श्वमती जी

११. आर्यिका नन्दामती जी

१२. आर्यिका सुपार्श्वमती जी

१३. आर्यिका गोम्मटमती जी

१४. आर्यिका स्याद्वादमती जी

१५. ऐलक श्री मधुसागर जी

१६. ऐलक देवसागर जी

१७. ऐलक सुहागसागर जी

१८. क्षुल्लक चन्द्रसागर जी

१९. क्षुल्लक सन्मतिसागर जी (ज्ञानानंद)

२०. क्षुल्लक कामविजयनन्दि जी

२१. क्षुल्लक स्याद्वादसागर जी

२२. क्षुल्लक सोमप्रभजी

२३. क्षुल्लक अकंपनसागर जी

२४. क्षुल्लक विष्णुसागर जी

२५. क्षुल्लक जितेन्द्र सागर जी

२६. क्षुल्लक पवित्रसागर जी

२७. क्षुल्लक नवीनसागर जी

२८. ऐलक ध्यानसागर जी

२९. क्षुल्लिका शीतलमती जी

३०. क्षुल्लिका श्रीमती जी

३१. क्षुल्लिका धैर्यमती जी

३२. क्षुल्लिका मनोवती जी

३३. क्षुल्लिका भरतमती जी

३४. क्षुल्लिका धवलमती जी ये ३४ साधु-साध्वी आचार्यसंघ में थे।

१. आर्यिका कल्याणमती जी आई थीं।

२. आर्यिका अभयमती जी आई थीं।

३. इनके साथ क्षुल्लिका शांतिमती जी थीं।

मेरे पास यहाँ आर्यिका शिवमती जी थीं। कुल ३४±३±२·३९ साधु-साध्वी थे। क्षुल्लक मोतीसागर जी की दीक्षा के बाद ८ मार्च से ४० साधु-साध्वी हो गये थे। इस जंबूद्वीप स्थल पर यह एक स्वर्णिम अवसर आया था।