ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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092.माताजी ने ससंघ जंबूद्वीप पर वर्षायोग स्थापना की

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माताजी ने ससंघ जंबूद्वीप पर वर्षायोग स्थापना की।

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वर्षायोग स्थापना-

आषाढ़ शुक्ला १४, दिनाँक १० जुलाई १९८७ को यहाँ जम्बूद्वीप स्थल पर मैंने वर्षायोग स्थापना की। इस समय मेरे संघ में आर्यिका शिवमती व क्षुल्लक मोतीसागर जी थे।

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इन्द्रध्वज विधान-

श्रावण वदी ५, दिनाँक १५जुलाई १९८७ से महमूदाबाद की हीरामणी जी ने अपने पुत्रों आदि परिवार सहित यहाँ इन्द्रध्वज विधान शुरू किया। साथ ही दिल्ली के कमलचंद जैन ने भी इन्द्रध्वज विधान किया। एक साथ दो मंडल बनाये गये। श्रावण कृ. १४, दिनाँक २४ जुलाई को हवन होकर रथयात्रा हुई। इस विधान के मध्य दोनों पार्टियों ने अच्छा लाभ लिया, मध्यान्ह में छहढाला आदि की कक्षायें चलीं। इसी मध्य कमलचंद जैन ने कमल मंदिर के लिए ५१ हजार रुपये का दान घोषित किया। महमूदाबाद के कोमलचंद ने भी लगभग १८००० रुपये का दान बोला।

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लेखन कार्य-

मैंने इधर गर्मी में समवसरण पर लेख बनाये। सन् १९७६ में ‘कल्पतरु स्तोत्र’ नाम से संस्कृत में बनायी गई चतुर्विंशति स्तुति का अन्वय-अर्थ किया पुनः श्री पूज्यपाद स्वामी कृत पंचामृत अभिषेक का हिन्दी पद्यानुवाद किया। सकलीकरण, हवन आदि विधि-क्रियाओं के भी संस्कृत श्लोकों का संक्षिप्तीकरण करके भावरूप से पद्यानुवाद किया, मंत्रों को ज्यों का त्यों रखा। यह मंडलविधान ‘प्रारंभ विधि एवं हवन विधि’ नाम से एक पुस्तक बन गई। इसके बाद भगवान नेमिनाथ का चरित जो सन् १९८७ के प्रारंभ में लिखना शुरू किया था, वह अपूर्ण ही छोड़ दिया था, उसे पूरा किया पुनः उसके बाद लेखन कार्य में ‘मेरी स्मृतियाँ’ ही लिख रही हूँ।

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संस्थान की भावी व्यवस्था-

सन् १९८६-८७ में स्वास्थ्य लाभ होने के बाद मेरा चिंतन चलता रहता था कि- मूलाचार में साधु के छह काल माने हैं- १. दीक्षा

२. शिक्षा

३. गणपोषण

४. आत्मसंस्कार

५. सल्लेखना और

६. उत्तमार्थ।

इनमें से प्रारंभ के तीन कालों की चर्या का वर्णन मूलाचार में है और आगे के तीन कालों की चर्या का वर्णन भगवती आराधना में है। मैंने अठारह वर्ष की उम्र में दीक्षा ले ली थी। दीक्षा लेकर पठन-पाठन करते हुए अनेक ग्रंथों का स्वाध्याय किया था, यह शिक्षा काल मेरा निकल चुका। इसके बाद अनेक बालक-बालिकाओं को, महिलाओं को घर से निकाल कर संग्रह किया, उन्हें धर्मवात्सल्य से पढ़ाया, धर्म में लगाया, यहाँ तक कि अपने से भी उच्च मुनिपद ग्रहण कराया। उन पर अनुग्रह किया, गलती होने पर निग्रह भी किया। मेरे शिष्य मुनि, उपाध्याय और आचार्यपद पर प्रतिष्ठित हो चुके हैं। इसी प्रकार अनेक महिलाओं व कुमारिकाओं को आर्यिका पद पर पहुँचाया है। जिनके द्वारा मोक्षमार्ग की परम्परा चल रही है और आगे भी चलती रहेगी। यह मेरा गणपोषणकाल भी पूर्ण हो रहा है।

साथ ही मैंने सम्मेदशिखर जी, गिरनारजी, पावापुरी, चंपापुरी, श्रवणबेलगोल, मांगीतुंगी, गजपंथा, कुंथलगिरि आदि तीर्थों के दर्शन भी कर लिये हैं। आत्मविशुद्धि के लिए अनेक ग्रंथों, पुस्तक-पुस्तिकाओं को लिखा है। इन्द्रध्वज, जम्बूद्वीप, कल्पद्रुम, सिद्धचक्र, तीनलोक, सर्वतोभद्र आदि सुन्दर-सुन्दर विधान पूजन बनायी है पुनः ध्यान में उपलब्ध ऐसी जम्बूद्वीप रचना का निर्माण भी मेरी प्रेरणा से पूरा हो चुका है। अतिशय धर्मप्रभावना करते हुए ‘जंबूद्वीप ज्ञानज्योति’ का भ्रमण भी सारे भारत में कराया जा चुका है। विद्यापीठ में विद्यार्थी विद्या अध्ययन कर चारित्रचक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी की परम्परा को वृद्धिंगत कर रहे हैं। ‘सम्यग्ज्ञान’ मासिक पत्रिका से हजारों, लाखों भव्यजीव प्रतिमाह समीचीन ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं। अब मुझे इन तीन कालों से आगे बढ़ना है। अब मेरा ‘आत्म संस्कार’ नाम का चौथा काल चल रहा है। इसमें अपने को सर्व बाह्य प्रपंचों से छुड़ाकर अपनी आत्मा पर मात्र संस्कार ही डालने हैं। आत्मा को अध्यात्म भावना से ही संस्कारित करना है। इसके बाद सल्लेखना और उत्तमार्थ को साधना है।

अतः अब मुझे अपने आपको संस्थान के कार्यों में प्रेरणा देने के भार से भी मुक्त होना है। इन्हीं भावनाओं को दृढ़ करते हुए अनुकूल समय देखकर मैंने संस्थान की मीटिंग बुलाने के लिए कहा, तदनुसार श्रावण शुक्ला सप्तमी, रविवार २ अगस्त १९८७ को यहाँ हस्तिनापुर में संस्थान की बैठक हुई। उसमें मेरी सहमति से ‘नई कार्यकारिणी’ का गठन हुआ, जिसमें अट्ठावन (५८) नाम रखे गये। इसमें ब्र. रवीन्द्र कुमार जैन को अध्यक्ष बनाया चूँकि अब ये संस्थान के कार्यकलापों में सर्वाधिक कुशल हैं, सारे कार्यभार संभाल रहे हैं। जिनेन्द्र प्रसाद ठेकेदार जो कि प्रारंभ से इन मोतीचंद, रवीन्द्र कुमार के अभिन्न साथी रहे हैं। इन्हें कार्याध्यक्ष, ऐसे ही इन दोनों के अभिन्न साथी कैलाशचंद जैन, करोलबाग वालों को कोषाध्यक्ष एवं गणेशीलाल रानीवाला को महामंत्री, कु. माधुरी को मंत्री पद पर घोषित किया गया।

उसी मीटिंग में, जैसा कि मैं संस्थान के बनने से लेकर आज तक संस्थान के कार्यों में प्रेरणा व मार्गदर्शन देती रहती थी इस अपने भार को क्षुल्लक मोतीसागर जी के ऊपर डाला और उन्हें ‘पीठाधीश’ नाम से सम्बोधित करने की घोषणा कर दी पुनः भविष्य में संस्थान की गतिविधियाँ सुचारू चलती रहें, इसके लिए एक स्थायी समिति का गठन भी कर दिया, जिसमें सात महानुभावों के नाम रखे गये हैं। उस समय मीटिंग में उपस्थित सभी ने इस भावी व्यवस्था की भूरि-भूरि प्रशंसा की पुनः स्थायी समिति के सदस्यों को गोपनीयता की शपथ दिलायी गई। सबने सर्वसम्मति से निर्णय लिया कि-

‘‘यह घोषणा-पत्र ताम्र-पट्ट पर उत्कीर्ण कराकर पीठाधीश को भेंट किया जावे।’’ उसके बाद मेरा आशीर्वाद प्रवचन होकर जयकारे के साथ सभा संपन्न हुई पुनः अगले दिन- श्रावण शुक्ला अष्टमी, दिनाँक ३ अगस्त १९८७ को प्रातः क्षुल्लक मोतीसागर के पाद प्रक्षालन करके ‘स्थायी समिति’ के सदस्यों ने उन्हें नूतन वस्त्र-लंगोटी-चादर प्रदान किये। इसके बाद मैंने त्रिमूर्ति मंदिर में उन्हें पीठाधीश पद पर स्थापित करते हुए नवीन पिच्छिका प्रदान की। उन्हें संस्थान के लिए गोपनीयता की शपथ ग्रहण करायी पुनः उपस्थित सभी स्थायी सदस्यों ने अपने-अपने उद्गार व्यक्त किये। पीठाधीश ने भी अपनी लघुता प्रगट करते हुए धर्म और पद के अनुकूल कार्य करने के लिए आश्वस्त किया, पुनरपि मैंने अनेक समयोचित उपदेश के साथ-साथ मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। इस प्रकार इस दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान की भावी व्यवस्था बनाकर मानों मैं कृतकृत्य हो गई। मुझे बहुत ही प्रसन्नता एवं अपूर्व शांति का अनुभव हुआ।

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जनश्रुतियाँ-

जब मैं अस्वस्थ थी, सन् १९८५ के अक्टूबर, नवम्बर और दिसम्बर में सल्लेखना जैसे स्थिति चल रही थी। तब केवल णमोकार मंत्र, शांतिमंत्र और जिनेंन्द्रस्तुति के पाठ श्रवण के सिवाय मेरा उपयोग किसी तरफ भी नहीं था। तब भी कई एक महानुभाव यह चाहते थे और येन-केन प्रकारेण मेरे पास कदाचित् क्वचित् कुछ समाचार आ भी जाते थे कि-‘‘भविष्य में इस संस्थान की व्यवस्था कैसी रहेगी?’’ किन्तु मुझे इसकी रंचमात्र भी चिंता नहीं थी क्योंकि मैं जानती थी कि-

‘‘जिन्होंने संस्था बनायी है और जिन्होंने प्रारंभ में जमीन खरीदने से लेकर जम्बूद्वीप की प्रतिष्ठा तक इन ग्यारह वर्षों में ही नहीं, इससे पूर्व भी लगभग २० वर्ष तक अथक परिश्रम किया है, गर्मी, सर्दी, वर्षा के साथ-साथ विरोधी लोगों के अनेक वाक्प्रहार झेले हैं, इसके साथ-साथ मेरी रीति-नीति से पूर्णतया ओतप्रोत हैं, ऐसे ये दोनों मेरे औरस पुत्रतुल्य शिष्य-मोतीचंद और रवीन्द्र कुमार साथ ही इनकी लघु बहन कु. माधुरी ये तीनों ही इस संस्थान के भविष्य को बनाने में, इसे संभालने में पूर्णतया समर्थ हैं क्योंकि इन तीनों के हृदय में न तो कोई स्वार्थ हैं न कोई अनर्गल प्रवृत्तियां हैं और न ही मेरे विरुद्ध तथा आर्ष परम्परा से विपरीत धारा से चल सकते हैं अतः इन जैसे कुशल, कर्मठ और संस्थान से आत्मसात् तथा संस्थान के हानि-लाभ में दुःख-सुख का अनुभव करने वाले भला और कौन व्यक्ति हो सकते हैं? हाँ, इनके साथ जो व्याकरण के प्रत्यय ‘आगम’ के सदृश जुड़े हुए हैं, वे तो इनके साथ जुड़े ही रहेंगे और जो गुरुभक्त होकर भी,जिन्हें संस्थान के भविष्य की मेरे से अधिक चिंता है, ऐसे महानुभाव भी यदि व्याकरण के ‘आदेश प्रत्यय’ के समान हैं, तो भला उनसे संस्थान के उज्ज्वल भविष्य की क्या आशा की जा सकती है?

ऐसा सोचकर मैं अत्यधिक सीरियस (गंभीर) स्थिति में भी रंचमात्र भी संस्थान के भविष्य के बारे में चिंता नहीं करती थी। फिर भी एक दिन कतिपय महानुभावों की प्रेरणा से मैंने इन्हीं दोनों को प्रमुख कर तीनों शिष्यों का नाम लिख दिया था कि- ‘‘कदाचित् आकस्मिक मेरे न रहने पर ये ही इसके भविष्य को संभालेंगे.....इत्यादि।’ ‘‘आज कुछ चर्चायें मेरे पास आती हैं कि क्षुल्लक मोतीसागर को ही ‘पीठाधीश’ क्यों बनाया? ब्र.रवीन्द्र कुमार को ही अध्यक्ष क्यों बनाया?’’ तब मैं यही उत्तर देती हूँ कि-

‘‘यदि इनसे अधिक और योग्य विश्वस्त मुझे आज भी कोई महानुभाव मिल जावें, जो संस्थान के प्रति पूर्णतया समर्पित हों, मेरी रीति-नीति और आज्ञा शिरोधार्य करने वाले हों, सामने आवें, मैं उन्हें इनका स्थान सौंप दूँगी......।’’ दूर बैठकर चर्चा मात्र से इतनी बड़ी संस्था नहीं चलायी जा सकती है। दूसरी बात इन दोनों में जो कमी हो, सो बतलायें, मैं उसे दूर कराने का प्रयास करूँगी।

‘‘यदि इन पर अविश्वास हैै तो भाई! जिन्होंने बीस वर्ष मेरे पास रहकर मेरी पूर्णतया आज्ञा पालन कर इतने बड़े-बड़े निर्माण आदि कार्य किये हैं, यदि वे ही अविश्वस्त हैं तो भला जिन्होंने एक दिन भी यहाँ रहकर एक भी निर्माण कार्य नहीं कराया है और न यहाँ आने में, रहने में सक्षम हैं, उन पर मैं क्या विश्वास करूँ? इस संस्थान में पैसे का आय-व्यय विवरण ऑडिट होकर छप जाता है, फिर भी जिन्हें संदेह हो, यहाँ कार्यालय में आकर दो-चार दिन ही क्या, महीनों रहकर देख लेवें, संदेह दूर हो सकता है। मात्र घर बैठे चर्चा करने से भला क्या होगा?

‘‘यदि कोई कहे कि मैंने हजारों रुपये दिये हैं, दिलाये हैं, तो भाई! रुपये तो इस संस्थान में तो एक करोड़ से अधिक लग चुके हैं, जिन्हें भारतवर्ष की समस्त जैन समाज से ही लाया गया है अतः रुपये देने वालों को ही संस्थान का अध्यक्ष बना दिया जाये ऐसी तो कोई बात नहीं है, प्रत्युत् तन, मन और धन से समर्पित होने वाले निःस्वार्थ सेवाभावी इन क्षुल्लक मोतीसागर और ब्र. रवीन्द्र कुमार जैसे ही व्रतीजन इस संस्थान को संभालने और इसकी गतिविधियों को चलाने में तथा बढ़ाने में समर्थ हैं, ऐसा मुझे अनुभव आ रहा है।

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आगम और आदेश प्रत्यय-

ऊपर में जो ‘आगम’ और ‘आदेश’ नाम से व्याकरण के प्रत्यय का उदाहरण लिया है, उनके लक्षण इस प्रकार हैं-

युजेरसमासेनुर्घुटि।।२७२।। युज् शब्द को ‘नु’ का आगम अन्तिम स्वर से परे होता है।१ ‘‘मित्रवदागमः अथवा प्रकृतिप्रत्ययोरनुपघाती आगम उच्यते। शत्रुवदादेशः।’’

जो मित्रवत् हो उसे आगम कहते हैं अथवा प्रकृति और प्रत्यय को क्षति न पहुँचाकर आने वाला ‘आगम’ कहलाता है। ‘आदेश’ शत्रुवत् होता है, वह किसी को हटाकर उसके स्थान पर होता है। अतः युज् में नु प्रत्यय का आगम होकर ‘युञ्ज्’ बन गया किन्तु इससे विपरीत आदेश प्रत्यय दूसरे को हटाकर होता है। जैसे कि ‘‘जस्शसोः शिः’’।।२३९।। नपुंसक लिंग से परे जस् शस् विभक्ति को ‘शि’ आदेश हो जाता है। यह ‘शि’ आदेश जस् विभक्ति को हटाकर हुआ है अतः कुल±जस् के आने पर जस् को हटाकर ‘शि’ होने से ‘कुलानि’ बना है। आज बहुत से लोग ऐसे हैं कि जो किसी संघ या संस्था या परिवार में शामिल होकर आगम प्रत्यय के समान मित्रवत् आकर मिल जाते हैं, वहाँ रहने वाले लोगों को बाधा न पहुँचाकर उन्हीं में बन्धुत्व भाव से रहते हैं और एक ऐसे होते हैं जो आकर पहले वालों को हटाकर-निकालकर फेंक देना चाहते हैं। ऐसे लोग ही ‘आदेश’ प्रत्यय के समान हैं अतः उनसे धर्मनीति की रक्षा संभव नहीं है चूंकि उनमें स्वार्थपरता है, काष्ठांगार के समान वे धर्मनीति के शत्रु हैं। ऐसे लोगों से धर्मनिष्ठ लोगों को सदा सावधान रहना चाहिए। जो ऐसे लोगों के वाग्जाल में आ जाते हैं वे अपना सर्वस्व खो बैठते हैं। ऐसे लोगों से ही हम लोगों ने अपने मंदिर और तीर्थों को खोया है|

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पीठाधीश पद की आवश्यकता-

धर्म की परम्परा अक्षुण्ण रूप से तीर्थंकरों के तीर्थ प्रवर्तन से चलती है, उसी प्रकार से उनके अभाव में धर्म की परम्परा आचार्यपट्ट की परम्परा से चलती है। पूर्वाचार्यों ने तो तीर्थंकर भगवान् को और दिगंबर आचार्यों को ‘भट्टारक’ शब्द से संबोधित किया है। यथा-

‘तदो मूल तंतकत्ता वड्ढमाणभडारओ।

इस प्रकार मूल ग्रंथकर्ता वर्धमान भट्टारक हैं। ‘‘धरसेण भडारएण।’’

धरसेन भट्टारक ने.....। ऐसे बहुत से प्रमाण हैं, जो मैंने एक लेख में कुछ संकलित किये हैं, यहाँ दो ही दिये हैं। इस आचार्य परम्परा के साथ ही कुछ मध्यकालीन युग में धर्म परम्परा को चलाने के लिए भट्टारक परम्परा चल रही है। इसमें भट्टारक वस्त्रधारी हैं। कहीं-कहीं क्षुल्लक को भट्टारक बनाया गया है। आज भी ‘नांदणी मठ’के जिनसेन भट्टारक क्षुल्लक हैं, वे क्षुल्लक पद की चर्या पालते हुए भी संस्था-मठ विशेष के स्वामी हैं। आचार्यश्री शांतिसागर जी ने भी क्षुल्लक के लिए ‘संस्था’ की व्यवस्था संभालने का अधिकार, संस्था को चलाने का अधिकार दिया था। ‘‘आचार्यश्री शांतिसागर जी जन्मशताब्दी स्मृति ग्रंथ ’’ पाठ ३४ में बहुत ही सुन्दर प्रकरण आया है। उसे यहां ज्याँ का त्यों दिया जा रहा है। यथा-

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शास्त्रशुद्ध व्यापक दृष्टिकोण-

‘‘महाराज जी का अपना दृष्टिकोण हर समस्या को सुलझाने के लिए मूल में व्यापक ही रहता था। योगायोग की घटना है इसी चातुर्मास में कारंजा गुरुकुल आदि संस्थाओं के संस्थापक और अधिकारी ब्र. श्री देवचंद जी दर्शनार्थ ब्यावर पहुँचे। पूज्य आचार्यश्री ने क्षुल्लक दीक्षा के लिए पुनः प्रेरणा दी। ब्रह्मचारी जी का स्वयं विकल्प था ही। वे तो उसी लिए ब्यावर पहुँचे थे। साथ में और एक प्रशस्त विकल्प था कि ‘यदि संस्था संचालन होते हुए क्षुल्लक प्रतिमा का दान आचार्यश्री देने को तैयार हों, तो हमारी लेने की तैयारी है।’’ इस प्रकार अपना हार्दिक आशय ब्रह्मचारी जी ने प्रकट किया। ५-६ दिन उपस्थित पंडितों में काफी बहस हुई। पंडितों का कहना था कि क्षुल्लक प्रतिमा के व्रतधारी संस्था संचालन नहीं कर सकते। आचार्यश्री का कहना था कि पूर्व में मुनिसंघ में ऐसे मुनि भी रहा करते थे जो जिम्मेवारी के साथ छात्रों का प्रबंध करते थे और ज्ञानदानादि देते थे। यह तो क्षुल्लक प्रतिमा के व्रत-गृहस्थी के व्रत (श्रावक के व्रत) हैं। अंत में आचार्य महाराज जी ने शास्त्रों के आधार से अपना निर्णय सिद्ध किया। फलतः ब्र. श्री देवचंद जी ने क्षुल्लक पद के व्रतों को पूर्ण उत्साह के साथ स्वीकार किया। आचार्यश्री ने स्वयं अपनी आन्तरिक भावनाओं को प्रकट करते हुए दीक्षा के समय ‘‘समंतभद्र’’ इस भव्य नाम से क्षुल्लक जी को नामांकित किया और पूर्व के समंतभद्र आचार्य की तरह आपके द्वारा धर्म की व्यापक प्रभावना हो, इस प्रकार के शुभाशीर्वादों की वर्षा की। कहाँ तो बाल की खाल निकालकर छोटी-छोटी सी बातों की जटिल समस्या बनाने की प्रवृत्ति? और कहाँ आचार्यश्री की प्रहरी के समान सजग दिव्य दूर-दृष्टिता?’’

इन सब बातों को देखते हुए मुझे भी ऐसा समझ में आया कि आज भी प्रत्येक प्रसिद्ध तीर्थ और विशेष संस्थाओं में ऐसे कार्यकुशल मार्गदर्शक क्षुल्लकों की महती आवश्यकता है। वैसे ‘भट्टारक शब्द से मुझे भक्ति और प्रेम है क्योंकि प्राचीन ग्रंथों में भगवान और दिगम्बराचार्यों के लिए ‘भट्टारक’ शब्द का प्रयोग हुआ है, ऐसा समझकर वर्तमान में मैंने यहाँ क्षुल्लक के लिए ‘पीठाधीश’ शब्द चुना और-

‘‘इस दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान’ में धर्म की परम्परा को संरक्षण, संवर्धन देने के लिए क्षुल्लक के वेष में ‘पीठाधीश’ की घोषणा की है अतः यहाँ वर्तमान में क्षुल्लक मोतीसागर जी को पीठाधीश बना दिया है। आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज ने धार्मिक संस्थाओं में अनेक योग्य महानुभावों को कार्य करने की प्रेरणाएँ दी हैं। समय-समय पर कार्यकर्ताओं के प्रति लोगों के संदेह को न कुछ गिनकर उन्हें कार्य करते रहने को प्रोत्साहित किया है। इसके प्रमाण भी मौजूद हैं- देखिये-

‘आचार्य शांतिसागरजी जन्मशताब्दी स्मृति ग्रंथ’’ पृ. १६९
कार्यकर्त्याची निवड करण्याचे चातुर्य
-बालचंद देवचंद

परम पूज्य आचार्यश्रीनी सदरहु जीर्णोद्धारक संस्थेची स्थापना केली, संस्थेचा कारभार चोखा चालावा म्हणून प्रामाणिक व सेवा भावी कार्यकर्त्याची निवड करण्याचे अपूर्व चातुर्य महाराजांना होते, दोन वर्षात तीन लाखांचा धु्रवनिधि जमला, हा सर्व निधि श्री तुलजाराम चतुरचंद शहा. रा. बारामती यांना कोषाध्यक्ष नेमून त्यांचे स्वाधीन केला, मी संस्थेचा मंत्री होतो तेव्हाचा हा प्रसंग।

श्री तुलजाराम शेठ आर्थिक व्यवहारात अत्यंत चोख असत, खाजगी देवघेवीच्या व्याहाराच्या प्रसंगामुले काही मोठ्या महानुभावांनी वैयक्तिक हेव्याने बाबत समाजामध्ये कुजबुज फैलावली, ‘‘यांच्याजवड़ गोला केलेला सामाजिक निधि असून ते वैयक्ति धंधासाठी त्याचा वापर करतात’’ असा त्यांचेवर आरोप होता, वस्तुतः संस्येची शिल्लक आपल्या वहिखात्यांत पाच पैशापेक्षा जास्त असू नये व सर्व रक्कम बंकेतच जमा असावी हा त्यांचा पक्का दंडक, एवढेच नव्हे तर दातारांना स्वीकृत दान पाठवून देण्याबाबत वांरवार स्मरणपत्रे देवून त्यांचा लक्डा मागे असावयाचा, पण हा रोखठोक व्यवहारच विरोधकांना बोचला, ही कुजबुज प. पू. महाराजांचे व तसेच श्री सेठ तुलजारामचे कानावर गेली, शेठ जी महाराजांकडे सर्व वहीखाते, बैंक-बुक, रोख शिल्लक धेऊन गेले व उपस्थित समाजासमोर म्हणाले, ‘‘महाराज, हे वहीखाते! सर्व जमा रक्कम ताबडतोब बंकेत जमा झाली की नाही हे बघा! हे बैंक-बुक! माझेवाडे कैव्हाही पांच पैशांपेक्षा जास्त शिल्लक नव्हती, आज ही नाही, हा पांच पैशांचा उबार! आणि हा माझा राजीनामा!’’ महाराज हे पाहून सगदित झाले! महाराजांनी सर्व आक्षेपकांना समज देऊन त्यांचे समाधान केले व तुलजाराम शेठला म्हणाले, ‘‘अरे बाबा, तुभया हातून असे काही होणार नाही याचा मला विश्वास आहे, माझा आदेश आहे तू हा राजीनामा परत घे व हा सर्व व्यवहार सांभाल’’ महाराजांची आज्ञा अवमानण्याचे धाडस त्यानां झाले नाही, कार्यकर्त्याची पारखकरण्याचे हे चातुर्य! यानंतर आजतागायत हे काम त्यांचैकडे व त्यांचे सुपुत्र माणिकचंद भाईकडे आहे!

इसका हिन्दी भाषान्तर-
कार्यकर्ताओं के चयन करने की चतुरता
-बालचंद देवचंद

परमपूज्य आचार्यश्री ने उन दिनों जीर्णोद्धारक संस्था की स्थापना की थी, संस्था का कार्यभार अच्छी तरह से चलता रहे इसलिए प्रामाणिक और सेवाभावी कार्यकर्ताओं के चयन करने के बारे में अपूर्व चातुर्य आचार्यश्री में था। दो वर्ष में तीन लाख रुपयों की धु्रवनिधि हो गई। ये सर्व निधि ‘तुलजाराम चतुरचन्द शहा’ रा. बारामती वाले, इन्हें कोषाध्यक्ष बनाकर इनके स्वाधीन कर दिया। मैं संस्था का मंत्री था, उस समय का यह प्रसंग है।

श्री तुलजाराम सेठ आर्थिक व्यवहार में अत्यन्त कुशल थे। कुछ लेन-देन व्यवहार के प्रसंग में किन्हीं बड़े महानुभावों ने वैयक्तिक ईर्ष्या के निमित्त से समाज में चर्चा फैला दी कि ‘‘इनके पास एकत्रित हुई जो सामाजिक संपत्ति है, उसे ये वैयक्तिक कारोबार में लगाते हैं’’ ऐसा उनके ऊपर आरोप लगाया गया। वास्तव में संस्था की शिलक अपने बही खाते में पांच पैसा से अधिक रहे नहीं तथा सर्व रकम बैंक में जमा रहे, यह उनका पक्का नियम था। इतना ही नहीं बल्कि दातारों के द्वारा स्वीकृत दान भेजने के लिए बार-बार उन्हें स्मरणपत्र देकर उनके पीछे पड़ जाना परन्तु यह रोक-टोक व्यवहार ही उन विरोधीजनों को अखर गया।

यह कुजबुज चर्चा परम पूज्य महाराजश्री के और श्री सेठ तुलजाराम के कान तक पहुँच गई। सेठ जी महाराज जी के पास सब बहीखाते, कैशबुक, रोख-रोकड़, शिलक लेकर गये और उपस्थित समाज के समक्ष बोले-‘‘महाराज जी! ये हैं बहीखाते। सर्व जमा रकम तत्क्षण ही बैंक में जमा की गई या नहीं, ये देखो! यह बैंक बुक हैं, मेरे पास कभी भी पाँच पैसे से अधिक शिलक नहीं थी, आज भी नहीं है। यह पाँच पैसे की रकम और यह मेरा त्यागपत्र!’

महाराज जी यह देखकर प्रसन्न हुए पुनः महाराज जी ने सभी आक्षेपक लोगों को प्रमाण देकर उनका समाधान किया और तुलजाराम सेठ से बोले-‘‘अरे बाबा! तेरे हाथ से ऐसा कुछ हो नहीं सकता, ऐसा मुझे विश्वास है, मेरा आदेश है, तू यह त्यागपत्र वापस ले और सर्व व्यवहार-कार्यभार संभाल।’’ महाराजश्री की आज्ञा उल्लंघन करने की धृष्टता उनमें नहीं थी। ‘‘कार्यकर्ता के परख करने की यह थी चतुरता!’’ इसके बाद आज पर्यंत भी यह कार्य उनके द्वारा और उनके सुपुत्र माणिकचंद भाई के द्वारा हो रहा है।

ऐसे ही चारित्रचक्रवर्ती आचार्यश्री ने मुनिश्री समंतभद्र जी को एक स्थान कुंभोज तीर्थ में रहने की प्रेरणा दी और विशाल मूर्ति निर्माण कराकर विराजमान करने का आदेश दिया। इन उदाहरणों से मैंने जो भी जम्बूद्वीप निर्माण और ज्ञानज्योति प्रवर्तन की प्रेरणा दी है और अब विहार करने की शक्ति न होने से यहाँ रह रही हूूँ, इन सब बातों में मुझे आचार्यश्री का आदेश और आशीर्वाद परोक्षरूप में है, ऐसा मैं समझती हूँ। उसका उदाहरण देखिये- ‘‘आचार्य शांतिसागर जी जन्मशताब्दी स्मृति ग्रंथ’’ पृ. ३८। एक प्रशस्त विकल्प

‘‘वर्षों से एक प्रशस्त संकल्प चित्त में था, जैसे माँ के पेट में बच्चा हो। वह करुणा-कोमल चित्त की उद्भट चेतना थी । महाराष्ट्र की जैन जनता प्रायः कास्तकार है। धर्मविषयक अज्ञान की भी उनमें बहुलता है। आचार्यश्री का समाज के मानस का गहरा अध्ययन तो अनुभूति पर आधारित था ही। ‘‘शास्त्र-ज्ञान और तत्त्व विचार’’ की ओर इनका मुड़ना बहुत ही कठिन है। प्रथमानुयोगी जनमानस के लिए एक भगवान का दर्शन ही अच्छा निमित्त हो सकता है। इसी उद्देश्य को लेकर किसी अच्छे स्थान पर विशालकाय श्री बाहुबली भगवान की विशाल मूर्ति, कम से कम २५ फीट की, खड़ी करने का प्रशस्त विकल्प जहाँ कहीं भी आचार्यश्री पहुँचे थे, प्रगट करते थे परन्तु सिलसिला बैठा नहीं।‘‘भावावश्यं भवेदेव न हि केनापि रुध्यते।’’ होनहार होकर ही रहता है। योगायोग से इसी समय अतिशय क्षेत्र बाहुबली (कुंभोज) में वार्षिकोत्सव होने वाला था। ‘‘संभव है सत्य-संकल्प की पूर्ति हो जाये’’ इसी सदाशय से आचार्यश्री के चरण बाहुबली की ओर यकायक बढ़े। १८ मील का विहार वृद्धावस्था में पूरा करते हुए नांद्रे से महाराजश्री क्षेत्र पर संध्या में पहुँच गये। इस संकल्प के लिए कमेटी और कार्यकर्ताओं की पूर्ण स्वीकृति मिलते ही एक नया अत्यन्त पवित्र आनन्दोल्लास का वातावरण पैदा हुआ। संस्था के मंत्री श्री सेठ बालचंद जी और मुनि श्री समंतभद्र जी से संबोधन करते हुए भरी सभा में आचार्यश्री का निम्न प्रकार समयोचित और समुचित वक्तव्य हुआ। जो आचार्यश्री की पारगामी दृष्टि सम्पन्नता का ही सूचक था।

‘‘तुम ची इच्छा येथे हजारों विद्याथ्र्यानी राहावे शिकावे अशी पवित्र आहे हे मी ओडखतो, हा कल्पवृक्ष उभा करून जातो, भगवंताचे दिव्य अधिष्ठान सर्व घडवून आणील, मिडेल तितका मोठा पाषाण मिलवा व लवकर हे पूर्ण करा’’, मुनि श्री समंतभद्राक्डे वलून म्हणाले, ‘‘तुझी प्रकृति ओढखतो, हे तीर्थक्षेत्र आहे, मुनीनी विहार करावयास पाहिजे असा सर्वसामान्य नियम असला तरी विहार करूनही जे करावयाचे ते येथेच एके ठिकाणी राहून करणे, क्षेत्र आहे, एके ठिकाणी राहाण्यास काहीच हरकत नाही, विकल्प करू नको, काम लवकर पूर्ण करून घे, काम पूर्ण होईल! निश्चित होईल!! हा तुम्हा सर्वाना आशीर्वाद आहे’’,

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इसका हिन्दी भाषांतर-

आपकी आंतरिक पवित्र इच्छा, यहाँ पर हजारों विद्यार्थी धर्माध्ययन करते रहें, इसका मुझे परिचय है। यह कल्पवृक्ष खड़ा करके जा रहा हूँ। भगवान का दिव्य अधिष्ठान सब काम पूरा कराने में समर्थ है। यथासंभव बड़े पाषाण को प्राप्त कर इस कार्य को पूरा कर लीजिये। मुनिश्री समंतभद्र जी की ओर दृष्टि कर संकेत दिया-‘‘आपकी प्रकृति को बराबर जानता हूँ। यह तीर्थभूमि है। मुनियों को विहार करते रहना चाहिए, इस प्रकार सर्व सामान्य नियम है। फिर भी विहार करते हुए जिस प्रयोजन की पूर्ति करनी है, उसे एक स्थान में यहीं पर रहकर कर लो। यह तीर्थक्षेत्र है, एक जगह पर रहने के लिए कोई बाधा नहीं है। विकल्प की कोई आवश्यकता नहीं है। जिस प्रकार से कार्य शीघ्र पूरा हो सके, पूरा प्रयत्न करना। कार्य अवश्य ही पूरा होगा, सुनिश्चित पूरा होगा। आप सबको हमारा शुभाशीर्वाद है।’’

पूर्णिमा का शुभ-मंगल दिन था। शुभ संकेत के रूप में पचीस हजार रुपयों की स्वीकारता भी तत्काल हुई। काम लाखों का था। यथा काल सब काम पूर्ण हुआ। ‘‘पयसा कमलं कमलेन पयः पया कमलेन विभाति सरः।’’ पानी से कमल, कमल से पानी और दोनों से सरोवर की शोभा बढ़ती है। ठीक इस कहावत के अनुसार भगवान् की मूर्ति से संस्था का अध्यात्म वैभव बढ़ा ही है। अतिशय क्षेत्र की अतिशयता में अच्छी वृद्धि ही हुई। अब तो मूर्ति के प्रांगण में और सिद्ध क्षेत्रों की प्रतिकृतियाँ बनने से यथार्थ में अतिशयता विशेष आयी है। महाराज जी का आशीर्वाद ऐसे फलित हुआ।’’

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दशलक्षण पर्व-

इस वर्ष ईसवी सन् १९८७ के महापर्व में रवीन्द्र कुमार तलोद (गुजरात) गये। माधुरी बड़ौदा (गुजरात) गर्इं। यहाँ से पं. सुधर्मचंद, प्रवीणचंद और नरेशचंद सभी गुजरात वालों की प्रेरणा से उधर ही गये थे। अच्छी धर्म प्रभावना रही। यहाँ हस्तिनापुर में पीठाधीश क्षुल्लक मोतीसागर जी ने तत्त्वार्थसूत्र और दशलक्षण धर्म पर प्रवचन किया। मेरा भी संक्षिप्त प्रवचन हुआ।

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इन्द्रध्वज विधान-

आश्विन वदी ७, दि. १४ सितम्बर से पुतानचंद जैन फतेहपुर वालों ने सपरिवार आकर यहाँ हस्तिनापुर के त्रिमूर्ति मंदिर में बड़े उत्साह से इन्द्रध्वज विधान कराया। इससे पूर्व श्रावण में भी ये अपनी बड़ी बहन हीरामणी के विधान में आकर १० दिन यहाँ ठहरे थे। आश्विनी शु. १, दिनाँक २४ सितम्बर को पूर्णाहुति के बाद रथयात्रा निकाली गई।

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पीठाधीश की जन्मजयंती-

पीठाधीश क्षुल्लक मोतीसागर जी का ४८वां जन्मदिवस आश्विन कृ. १४, दिनाँक २१ सितम्बर १९८७ को था। इस अवसर पर उनकी माँ रूपाबाई और बहन किरणबाई यहां मौजूद थीं। छोटा सा कार्यक्रम रखा गया। विद्यापीठ के विद्यार्थियों ने प्रभात फैरी निकाली। नारे लगाने में एक नारा अच्छा लगा-‘हर मां का बेटा कैसा हो, मोतीसागर जैसा हो।’ मध्यान्ह में सभा हुई, वक्ताओं ने अपने उद्गार व्यक्त किये। मैंने आशीर्वाद देते हुए कहा कि-

‘‘जन्म जयन्तियां जो मनाते हैं, उनके गुणों की हैं न कि व्यक्ति विशेष की। क्षुल्लक मोतीसागर जी ने गुरु आज्ञा पालन में एक उदाहरण प्रस्तुत किया है।’’ माँ रूपाबाई ने लोगों को गिलास बाँटे। रात्रि में आरती, भजन आदि कार्यक्रम हुए। मोतीसागर जी ने कई बार कहा- ‘‘माताजी! आपके सामने यह मेरे जन्म दिवस का आयोजन अच्छा नहीं लगता.....।’’ मैंने कहा-‘‘बेटे-बेटियों का माता के सामने गुणगान किया जाये, अच्छा ही है, करने दो.......।’’

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५४वीं जन्मजयंती-

शरद पूर्णिमा, ७ अक्टूबर १९८७ को मेरा जन्म दिवस आ रहा था किन्तु दिल्ली वालों की नीति के अनुसार रविवार को विशेष आयोजन के साथ मनाने का निर्णय लिया गया। तदनुसार आश्विन शुक्ला १२, दिनाँक ४ अक्टूबर, रविवार को जन्मजयन्ती का कार्यक्रम रखा गया। विद्यार्थियों ने प्रभात फैरी की। क्षुल्लक जी को आगे कर श्रावकगण बाजे के साथ नशियां के दर्शन करने गये। मध्यान्ह में महिलाश्रम दिल्ली की बालिकाओं ने मंच पर एकांकी प्रस्तुत किये। विनयांजलि के बाद दूध से मेरे पादप्रक्षालन किये गये। पिच्छी और शास्त्र प्रदान किये गये। इस मंगल अवसर पर वार्षिक मेला के रूप में रथयात्रा निकाली गई। मोतीलाल कासलीवाल दिल्ली ने ५०० गिलास बाँटे। मदन लाल टिकैतनगर ने ५४ धोतियाँ बाँटी। ५४ विद्युत् दीप जलवाये गये।

मैंने आशीर्वाद प्रवचन में कहा- यह शरद पूर्णिमा मेरा सच्चा जन्म दिवस है। इसी दिन सन् १९५२ में मैंने आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत लेकर गृह का त्याग किया था अतः यह मेरा संयम दिवस है। पूर्णिमा की ज्योत्सना के समान मेरा संयम उज्ज्वल बना रहे, मैं यही भगवान से प्रार्थना करती हूँ। आप सभी भक्तों को मेरा यही आशीर्वाद है कि आप लोग धर्म में सदैव तत्पर रहें, इसी से सुख, संतति, संपत्ति की समृद्धि होती है......।’’ इसके बाद ७ अक्टूबर, शरद पूर्णिमा के दिन पुनः रवीन्द्र कुमार, माधुरी आदि ने प्रातः चरणप्रक्षाल, पूजन आदि की। ‘स्थायी समिति’ के सदस्यों ने पीठाधीश मोतीसागर को रजतप्रशस्ति भेंट की। पीठाधीश ने उसे लेकर अध्यक्ष महोदय रवीन्द्र कुमार को सौंप दिया और बोले- ‘‘इसे आप कार्यालय में रख लीजिये......।’’ रवीन्द्र कुमार ने इस प्रशस्ति को यहीं रत्नत्रय निलय में ऊपर लगा दी। मध्यान्ह में सभा हुई। उपस्थित अनेक लोगों ने विनयांजलि अर्पित की। पुनरपि रात्रि में ५४ दीपकों से आरती की गई।

वास्तव में दिल्ली वालों की सुविधा के लिए रविवार को कार्यक्रम बनाया गया था। मैंने देखा है, दिल्ली में १-१ माह पहले ही रविवार-रविवार को एक-एक स्थान पर लोग ‘महावीर जयंती’ मनाते रहते हैं पुनः चैत्र शुक्ला त्रयोदशी को सामूहिक रूप में मनाते हैं। आचार्यश्री देशभूषण महाराज जी की भी जयंती रविवार को मनाई गई है।

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इन्द्रध्वज विधान-

इस जन्मजयंती के उपलक्ष्य में जगाधरी के पुरुषोत्तम दास जैन ने आश्विन शुक्ला १०, शुक्रवार २ अक्टूबर से ही झंडारोहण करके इन्द्रध्वज विधान शुरू कर दिया था। इन्होंने कार्तिक वदी ५, दिनाँक ११ अक्टूबर को पूर्णाहुति कर विधान पूर्ण किया।

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उपदेश-

१५ अक्टूबर को यहाँ हस्तिनापुर में आये हुए कैम्प की बालिकाओं को उपदेश सुनाया। बालिकाओं को उपदेश में मैं प्रायः शीलव्रत पर जोर देते हुए सीता, अंजना आदि के उदाहरण सुना देती हूँ। मेरा कहना रहता है कि देखो! रावण ने पर-स्त्रीसेवन पाप नहीं किया, मात्र भावों से ही पाप किया था, फिर भी आज कोई भी अपने पुत्रों का नाम रावण नहीं रखना चाहते हैं ऐसे ही ‘सूर्पनखा’ ने भी परपुरुष को मात्र भावों से चाहा था, फिर भी कोई माता अपनी पुत्री का ‘सूर्पनखा’ नाम नहीं रखती हैं। सीता, अंजना तो बड़े प्रेम से रखती हैं अतः शीलव्रत ही सबसे उत्तम रत्न है।

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वेदी परिवर्तन-

कार्तिक वदी १३, २० अक्टूबर १९८७ को भगवान महावीर के मंदिर की छोटी वेदियों से जिनप्रतिमाओं को लाकर यहाँ त्रिमूर्ति मंदिर में दायीं वेदी में पीछे अस्थायी अलमारी बनाकर उसमें वेदीशुद्धि कराकर विराजमान करायी गई हैं। चूंकि महावीर मंदिर में निर्माण कार्य चल रहा है। अंदर से गोलाकार बनाकर ऊपर में कमलाकार बनाया जावेगा१।

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इन्द्रध्वज विधान-

उधर लखनऊ में कैलाशचंद जैन, टिकैतनगर वालों ने इन्द्रध्वज विधान कराया था, उसकी पूर्णाहुति भी, २० अक्टूबर को की गई थी। इस विधान से लखनऊ में बहुत अच्छी धर्मप्रभावना हुई। यहाँ से रवीन्द्र कुमार, माधुरी, पं. सुधर्मचंद जी गये थे। इसके पूर्व आश्विन शुक्ला में टिकैतनगर में रवीन्द्र के चाचा बालचंद जी के सुपुत्र वीरेन्द्र कुमार जैन ने चार सौ अट्ठावन जिनप्रतिमाओं की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा कराकर इन्द्रध्वज-विधान महोत्सव पूर्वक संपन्न कराया था। इसके बाद तत्काल ही दरियाबाद में इन्द्रध्वज-विधान हुआ था। चारों तरफ इन्द्रध्वज-विधान सुनकर मन में बहुत ही प्रसन्नता होती। भला जिनेन्द्रदेव के पूजा-विधान द्वारा धर्मप्रभावना होने से किस साधु को प्रसन्नता नहीं होगी? फिर यह तो मेरे द्वारा ही भक्ति से संजोये गये काव्यपदों की रचना है अतः प्रसन्नता होना तो स्वाभाविक है।

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निर्वाणलाडू-

कार्तिक कृ. ३०(अमावस्या), दिनाँक २२ अक्टूबर को यहाँ त्रिमूर्ति मंदिर में प्रातः ५.४५ पर निर्वाणलाडू चढ़ाया गया पुनः महावीर मंदिर में ६ बजे लाडू चढ़ाया गया। इस बार क्रम ऐसा रखा गया क्योंकि महावीर मंदिर में निर्माण काम के निमित्त से अंदर बहुत सी बल्लियाँ बंधी हुई थीं। हमेशा तो पहले महावीर मंदिर में लाडू चढ़ेगा पुनः त्रिमूर्ति मंदिर में चढ़ेगा। अनन्तर गोष्ठी एवं उपदेश हुआ। सायंकाल दीपावली मनायी गई। इससे पूर्व श्री गणधरदेव और केवलज्ञान महालक्ष्मी की पूजाएँ की गर्इं।

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जंबूद्वीप मंडल विधान-

कार्तिक शुक्ला ५, दिनाँक २७ अक्टूबर १९८७ को आनन्द प्रकाश जैन-दिल्ली वालों ने यहाँ जम्बूद्वीप-विधान के लिए झंडारोहण किया। इस विधान में मंदिर में मंडल नहीं बनाया गया था। जंबूद्वीप के ठीक सामने पांडाल बनाया गया था। वहाँ पर मंच बनाकर उस पर पूजन करने वाले बैठकर पूजा करते थे। इसमें १००८ अघ्र्य हैं जो कि यथास्थान इस बने हुए जंबूद्वीप पर चढ़ाये जा रहे थे। उसमें बड़ा आनंद आता था। इस प्रकार यथास्थान १००८ अघ्र्य और जयमाला में श्रीफल चढ़ाये जा रहे थे। अनेक श्रावकों ने विधान में भाग लिया। इस अवसर पर आचार्य श्रीसुबाहुसागर जी संघ सहित आये हुए थे, उन्होंने भी विधान देखा और उपदेश दिया।

इस विधान में एक बात उल्लेखनीय है कि कई महीनों से आनन्द प्रकाश ने कहा था कि-‘‘मैं कार्तिक अष्टान्हिका में जंबूद्वीप विधान करूँगा पुनः इस समय दीपावली के पूर्व वे सहसा मना करने के लिए आ गये। मैंने पूछा-‘‘क्यों?’’ उन्होंने कहा-‘‘माताजी! मैं लगभग एक माह तक अक्टूबर में संघों के दर्शन करने, आहारदान देने गया था, वहाँ मुझे भी ज्वर आ गया था, मेरी धर्मपत्नी भी बीमार हो गई थी अतः अभी बैठने की शक्ति नहीं है।’’ मैंने कहा-‘‘चिंता मत करो, विधान में बैठने की शक्ति अपने आप आ जावेगी।’’ आनन्द प्रकाश बोले-‘‘ठीक है, आपका आशीर्वाद चाहिए।’’

मेरा आशीर्वाद लिया, विधान की सामग्री की लिस्ट ली और सारी व्यवस्था बनाकर चले गये। वास्तव में जिनभक्ति से उन्हें कोई भी कष्ट नहीं हुआ बल्कि खूब उत्साह से दौड़-दौड़कर जंबूद्वीप के भरतक्षेत्र में, कभी ऐरावत क्षेत्र में, कभी विदेह क्षेत्र में, कभी जिनमंदिरों की पूजा के लिए और कभी देवभवनों में अघ्र्य चढ़ाने के लिए जाते रहते थे। मध्यान्ह में १-२ बजे तक पूजा करते थे और आनन्द लेते थे। कार्तिक शु. १४, ४ नवम्बर १९८७ को पूर्णाहुति करके रथयात्रा निकाली गई। इस अवसर पर वहाँ बड़े मंदिर में क्षेत्र-कमेटी की मीटिंग में साहू अशोक कुमार जी आये हुए थे। वे यहाँ भी आये, साथ ही नरेश चंद जी मादीपुरिया दिल्ली और डालचंद जी जैन, सागर, संसद सदस्य भी थे। सामयिक चर्चायें हुर्इं। निर्मलकुमार जी सेठी भी इसी मीटिंग के निमित्त से आये हुए थे। वर्तमान में दिगम्बर जैन सम्प्रदाय में जो मतभेद हो गये हैं, उसके बारे में कई प्रश्न सामने आये। मैंने आगम के अनुसार चलने के लिए इन सभी कार्यकर्ताओं को प्रेरणा दी।

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वार्षिक मेला-

कार्तिक शुक्ला १५, दिनाँक ५ नवम्बर १९८७ को वार्षिक मेला था। इधर भी महिलाश्रम दिल्ली की बालिकाओं द्वारा ‘नेमिनाथ का वैराग्य’ नाटक खेला गया। यहाँ त्रिमूर्ति मंदिर में श्री सरस्वती देवी और श्री पद्मावती देवी की वेदियाँ बन गई थीं, अतः उन वेदियों में सौ. श्रीमती जैन, बहराइच और कु. माधुरी ने श्री सरस्वती देवी को और श्री पद्मावती देवी को विराजमान किया। मध्यान्ह में बड़े मंदिर से रथयात्रा निकाली। वह जंबूद्वीप के सामने से होकर नशिया जाती है। उस समय यहाँ जंंबूद्वीप के लोग भगवान की आरती करके गुप्तभंडार में भेंट चढ़ाते हैं। मैंने भी उस समय दर्शन के लिए जंबूद्वीप के बाहर जाकर भगवान का दर्शन किया।

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उपदेश कार्यक्रम-

यहाँ प्रातः काल मेरे सानिध्य में पीठाधीश मोतीसागर और रवीन्द्र कुमार नियमसार प्राभृत (स्याद्वादचंद्रिका टीका सहित) और लब्धिसार पढ़ते हैं। यहाँ स्वाध्याय का क्रम हमेशा चलता रहता है। आगंतुक यात्री भी इसमें लाभ लेते रहते हैं। इसके अतिरिक्त यात्रियों की बसें यहाँ आती ही रहती हैं। उस निमित्त से मध्यान्ह में भी सभा का कार्यक्रम आयोजित होने से मेरा उपदेश भी होता रहता है। बहुत से यात्री कहने लगते हैं-

‘‘एक-दो वर्ष पूर्व मैं आया था, तब प्रयत्न करने पर भी आप के दर्शन नही हो सके थे, आज अपके दर्शन करके मन प्रसन्न हो रहा है।’’ वास्तव में सन् १९८५-८६ में ८-१० माह की लम्बी बीमारी में दर्शन का समय बंधा हुआ था, उस नियत समय से अतिरिक्त हर समय दर्शन देने में असुविधा ही थी अतः आज तक भी लोगों की शिकायतें होती रहती हैं। अनेक यात्री कहते-

‘‘हम लोगों ने पहली बार दर्शन किये हैं। जम्बूद्वीप का दर्शन कर हमें बहुत ही हर्ष हो रहा है। वास्तव में ऐसे दर्शन दुनियाँ में आज कहीं भी नहीं हैं। यह नूतन रचना जन-जन के आकर्षण, भक्ति और आनन्द का केन्द्र बनी हुई है।’’ बहुत से लोग तो यहाँ तक कह देते थे कि- ‘‘मेरा रुपया सवाया होकर फला है। मैंने जो ज्योति-प्रवर्तन में बोलियों के माध्यम से दान दिया था, उसकी सफलता देखकर हृदय गद्गद हो रहा है।’’ इस प्रकार भाक्तिक गण अपनी-अपनी भावनाएँ व्यक्त किया करते। इस जंबूद्वीप के दर्शन निमित्त से यहाँ जैन की अपेक्षा अजैन लोग बहुत ही आते रहते हैं।

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भिंडर में जंबूद्वीप विधान-

कु. माधुरी और कु. आस्था १५ जनवरी को भिंडर से आर्इं, वहाँ पर आचार्यश्री अजितसागर जी महाराज के सानिध्य में जंबूद्वीप मंडल विधान हो रहा था। आचार्य श्री स्वयं विधान पूजन के मंत्र पढ़ते थे। अच्छी धर्मप्रभावना हो रही थी। वास्तव में जब श्री पूज्यपादस्वामी जैसे महान् आचार्यों ने जिनेन्द्र अभिषेक पाठ आदि रचे हैं, तब आचार्य, मुनि, आर्यिका आदि इन विधान-पूजन को पढ़ें, सुनें और रुचि लेवें तो अच्छा ही है। यह शुभोपयोग का एक प्रकार ही है। चारित्र चक्रवर्ती आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज भी प्रातः जिनेन्द्रदेव का पंचामृत अभिषेक नित्य प्रति बहुत ही रुचि से देखते थे, मैने स्वयं सन् १९५५ में यह दृश्य कुंथलगिरि में देखा है।

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हस्तिनापुर में केशलोंच-

फाल्गुन वदी १, दिनाँक ३ फरवरी को यहाँ जंबूद्वीप स्थल पर रत्नत्रय निलय के आँगन में मेरा केशलोंच हुआ। यहाँ के बालाश्रम के करीब दो-तीन सौ बालक आये थे। महावीर जी क्षेत्र से कपूरचंद पाटनी आदि आ गये थे। अनेक बालकों के भजन हुए, कई वक्ताओं के प्रवचन हुए। कपूरचंद ने अपने वक्तव्य में कहा- ‘‘कबीर ने नेत्रहीन का ‘नयनसुख’ नाम आदि देकर कह दिया था कि नाम के अनुरूप व्यक्ति में गुण नहीं दिखते हैंं। काश! यदि आज वे होते या स्वर्ग से देखें, तो उन्हें अवश्य ही संतोष हो जाता कि माताजी यथा नाम तथा गुण ‘ज्ञानमती’ हैं......।’’

मैं केशलोंच करते-करते ही उनका वक्तव्य सुनकर सोच रही थी-‘‘मेरे में तो ज्ञान का जो एक बिंदुमात्र अंश है, वह केवल गुरुदेव की कृपा और सरस्वती माता का ही प्रसाद है अथवा गुरुवर्य श्री वीरसागर जी ने जो मेरा नाम ‘ज्ञानमती’ रखा था, उसी का फल है। वास्तव में द्वादशांगरूप जिनवाणी तो आज है ही नहीं, उसका आज जितना भी अंश उपलब्ध है, उस अंश का शतांश क्या, करोड़वाँ अंश भी तो मुझमें नहीं है। फिर भी हे भगवान ! मेरे में जो भी ज्ञान की कणिका है, वह मेरे मोक्षमार्ग के लिए दीपक का काम करती रहे, यही मेरी अंतरंग भावना है.......। केशलोंच के बाद मैंने भी मंगल आशीर्वादात्मक अपना प्रवचन दिया। फाल्गुन कृष्णा ४, रविवार ७ फरवरी १९८८ को यहाँ तक ये ‘मेरी स्मृतियाँ’ लिखी गई हैं।