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093.जंबूद्वीप स्थल पर सर्वप्रथम कल्पदु्रम विधान महोत्सव

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जंबूद्वीप स्थल पर सर्वप्रथम कल्पद्रुम विधान महोत्सव

कल्पद्रुम विधान-

यहाँ जंबूद्वीप स्थल पर त्रिमूर्ति मंदिर के सामने कल्पद्रुम विधान मंडल के लिए प्रातः ७.१५ पर झंडारोहण किया गया। यह शुभ तिथि फाल्गुन शुक्ला ८, वीर नि. सं. २५१४ ईस्वी सन् २४ फरवरी १९८८ थी। त्रिमूर्ति मंदिर में सुन्दर गोलाकार मंडल बनाया गया, रंग-बिरंगी रांगोली से इस पर समवसरण की रमणीय रचना बनाई गई और चन्द्रोपक, चंवर, छत्र आदि उपकरणों से मंडल को सजाया गया, मध्य में गंधकुटी के अन्दर चारों दिशा में मुख करके चार जिनप्रतिमाएँ विराजमान की गर्इं। रवीन्द्रकुमार ने समवसरण में रखने के लिए मानस्तंभ, तोरणद्वार, धर्मचक्र, ध्वजाएँ आदि धातु के बनवाये थे, वे सभी प्रथम बार यथास्थान रखे गये। इनमें चैत्यवृक्ष, सिद्धार्थवृक्ष भी थे। इन सबसे यह समवसरण का मंडल जगमगाने लगा। विधान के यजमान प्रद्युम्नकुमार जैन (छोटीशाह), टिकैतनगर आदि महानुभाव थे। पाँच इन्द्र-इन्द्राणी थे। शेष और भी स्त्री, पुरुष थे। प्रद्युम्नकुमार जैन टिकैतनगर, शांतिप्रसाद जैन टिकैतनगर, शिखरचंद जैन हापुड़, विमलकुमार जैन डालीगंज-लखनऊ, प्रेमचंद जैन महमूदाबाद ये पाँच श्रावक सपत्नीक चक्रवर्ती बनकर इस विधान को करने वाले थे। सकलीकरण, मंडप प्रतिष्ठा, अभिषेक, नित्य-पूजन आदि पूर्वक यहाँ महामंडल विधान प्रारंभ हुआ।

विधानकर्ता यजमान-

आषाढ़ शुक्ला, २ वीर नि. सं. २५१२, (ईस्वी सन् १९८६) के दिन मैंने यह कल्पद्रुम-विधान लिखना शुरू किया था। पुण्ययोग से साढ़े तीन माह पश्चात् आश्विन शुक्ला पूर्णिमा, वीर नि. सं. २५१२ के दिन प्रातः मंगलमय बेला में मैंने इस विधान को पूर्ण किया। विधान रचना के मध्य प्रद्युम्नकुमार जैन टिकैतनगर वालों ने कहा था-‘‘माताजी! इस महाविधान को मैं ही प्रकाशित कराऊँगा-छपवाऊँगा और मैं ही पहले आपके सानिध्य में यहीं जंबूद्वीप स्थल पर कराऊँगा पुनः शरद पूर्णिमा के मेले पर मेरे जन्मदिवस के दिन श्रीजी की रथयात्रा में ये प्रद्युम्नकुमार इस कल्पद्रुम विधान की हस्तलिखित प्रति को हाथ में लेकर रथ में बैठे थे। अब यह विधान मुद्रित होकर आ चुका था और प्रद्युम्नकुमार की भावना के अनुसार उन्हें पहली बार इसको करने का श्रेय भी मिल गया था।

अद्भुत योग-

इस विधान में तीर्थंकर जिनेन्द्र के समवसरण वैभव की पूजा के साथ-साथ तीर्थंकरों की अन्तरंग-बहिरंग लक्ष्मी विभूति की विशेष रीति मेें उपासना की गई है। इसमें २४२४ अर्घ, ७२ पूर्णार्घ्य, २४ पूजाएँ, २४ अक्षरी मंत्र, मंगलस्तोत्र में २४ काव्य एवं अंतिम जयमाला-चूलिका में २४ काव्य हैं। इस प्रकार कुल मिलाकर इसमें २४ की संख्या १०८ बार आई है। यद्यपि इस विधान को कराने के लिए पहले माघ में पुनः चैत्र में मुहूर्त निकाले गये थे किन्तु अकस्मात् इस आष्टान्हिक पर्व में ही करने का योग आया। प्रसन्नता तो तब बहुत हुई कि जब विधान प्रांरभ करने के बाद ध्यान गया कि आज २४ फरवरी है और पूजकों की संख्या देखी, तो उस दिन ४८ व्यक्ति पूजन में बैठे थे। मेरे मुख से सहसा निकल पड़ा। ‘‘अहो! इस विधान में २४ की संख्या १०८ बार आई है, मालूम पड़ता है इसलिए बिना विचारे आज २४ तारीख के दिन इसके प्रारंभ का योग आया है और ४८ व्यक्तियों की संख्या से यह दिख रहा है कि यहाँ भी २४ की संख्या ३ बार आ गई है। इस २४ के अंक के ३ बार आ जाने से मुझे बहुत ही प्रसन्नता हुई और अद्भुत योग बहुत ही महत्वपूर्ण व अतिशायि प्रतीत हुआ। २४ तीर्थंकरों के श्रीचरणों में बार-बार नमस्कार करके, मैंने अपने इस अप्रतिम महाविधान को साक्षात् ‘कल्पतरु’ ही समझा।

चतुर्विध दान-

इस विधान की भूमिका में लिखे अनुसार विधानकर्ताओं ने यहाँ पर प्रतिदिन गरीबों को भोजन कराया, उन्हें थाल बाँटे, औषधियाँ वितरित की गर्इं और धार्मिक पुस्तकें भी बाँटी गर्इं। (लगातार आठ दिन तक ५०० से अधिक लोगों को भोजन कराया गया और ५५० थाल बाँटे गये।) शास्त्र में वर्णित है कि ‘‘किमिच्छक दान देते हुए चक्रवर्ती के द्वारा जो जिनेन्द्र देव की महापूजा की जाती है, उसे ही ‘कल्पद्रुम’ पूजा कहते हैं। आज यहाँ पंचमकाल में चक्रवर्ती तो हैं नहीं, फिर भी जैसे तीर्थंकर भगवान की प्रतिमाओं की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा के समय श्रावकगण सौधर्म इन्द्र आदि बनकर भगवान के पंचकल्याणक महोत्सव को मनाते हैं, वैसे ही श्रावक चक्रवर्ती बनकर अपने द्रव्य के अनुसार आहार, औषधि, ज्ञान और अभयदान इन चार प्रकार के दानों को करते हुए यह विधान संपन्न करें इसलिए इस विधान का नाम ‘कल्पद्रुम’ यह सार्थक है। यहाँ जंबूद्वीप स्थल पर त्रिमूर्ति मंदिर में मेरे सानिध्य में यह विधान प्रथम बार हुआ है। इसी आष्टाह्निक पर्व में यह कल्पद्रुम विधान तेजपुर (आसाम) में भी हुआ था, जिसका समाचार यहाँ आया था। कल्पद्रुम विधान का विषय- नन्दीश्वर भक्ति में एक श्लोक आया है-

जिनपतयस्तत्प्रतिमास्तदालयास्तन्निषद्यकास्थानानि।

ते ताश्च ते च तानि च भवंतु भवघातहेतवो भव्यानाम्।।३६।।

जिनेन्द्र देव-तीर्थंकर महापुरुष, उनकी प्रतिमाएँ, उनके मंदिर और उनके निषद्या स्थान-निर्वाण क्षेत्र या पंचकल्याणक क्षेत्र ये चारों ही महान् वंद्य हैं। वे जिनेन्द्रदेव, वे प्रतिमाएँ, वे जिनमंदिर और वे निर्वाण आदि तीर्थस्थल भव्यजीवों के संसार का अंत करने में कारण होवें। यह श्लोक मुझे अतिशय प्रिय है। इसमें यह स्पष्ट हो जाता है कि जिनकी प्रतिमाएँ, जिनके मंदिर व जिनसे स्पर्शित क्षेत्र भी पूज्य हो जाते हैं पुनः वे जिनदेव तीर्थंकर भगवान कितने पूज्य होंगे! संसार में तीर्थंकर भगवान से पूज्य न तो कोई हुआ है और न होगा ही। इसी हेतु से मैंने इस विधान में समवसरण वैभव सहित तीर्थंकर देव की पूजाएँ रची हैं क्योंकि यह कल्पद्रुम विधान भी सब विधानों में शिरोेमणि है, इसे वैभव में सर्व प्रधान, सबसे महान चक्रवर्ती ही सम्पन्न करते हैं।

विधान रचना के समय स्वाध्याय और ध्यान-

विधान रचना के समय तिलोयपण्णत्ति ग्रंथ आदि का बहुत ही सुन्दर स्वाध्याय तो होता ही था, साथ में उपयोग की तन्मयता-एकाग्रता होने से धर्मध्यान भी हो जाता था। मेरा स्वयं का अनुभव है कि लिखते समय-काव्य रचना के समय मन का उपयोग जितना अच्छा हो सकता है, उतना सुन्दर उपयोग अन्य किसी समय भी संभव नहीं हो सकता है। मैंने दो वर्ष पूर्व इस विधान की जयमालाओं को कु. माधुरी शास्त्री से टेप के कैसेट में भरवा लिया था। सायंकाल सामायिक के बाद कई बार नींद न आने से माधुरी इसके कैसेट को टेपरिकार्डर में लगा देती, जिसे सुनते-सुनते जिनेन्द्र देव के गुणों का स्मरण करते-करते मुझे नींद आ जाती। मेरे स्वास्थ्य-लाभ के लिए पूजन की ये जयमालाएँ बहुत बड़ी औषधि का काम करती रही हैं।

सन् १९८५ में पीलिया की बीमारी के समय भी संघ के मोतीचंद, रवीन्द्र कुमार तथा माधुरी, बीना और आर्यिका शिवमती आदि ने मेरे पास में इन्द्रध्वज-विधान की जयमालाएँ खूब सुनाई हैं और मुझे भी इन जयमालाओं के सुनने में इतनी शांति मिली है कि जो कलम से लिखी नहीं जा सकती है। मैं कितने ही अस्वस्थ श्रावक-श्राविकाओं को या मानसिक अशांति से पीड़ित लोगों को यह प्रेरणा दिया करती हूँ कि ‘‘आप लोग आधुनिक यंत्रों का, टेपरिकार्डर का उपयोग करें। धार्मिक स्तुतियाँ, इन नूतन विधानों की जयमालाएँ और गुरुओं के उपदेश टेपकैसेट में भराकर उसको सुनें, रात्रि में भी नींद के अभाव में बजाए, नींद के लिए गोलियाँ खाने के, आप यह भगवान की भक्ति की भावना से ओतप्रोत कैसेट को सुनने की आदत डालें। यह सर्वोत्तम औषधि है, आप स्वयं अनुभव करके देखें। इस विधान में कई एक पंक्तियाँ बहुत ही हृदयस्पर्शी हैं। जैसे-

तीन रत्न के हेतु मैं, नमूं अनंतों बार।

ज्ञानमती की याचना, पूरो नाथ अबार।। (पूजा नं.८)
यथा च-पाँच कल्याणक पुण्यमय, हुए आप के नाथ।
बस एकहि कल्याण मुझ, कर दीजे हे नाथ।।२५।। (पूजा नं. २०)

इस विधान के करने वाले, पढ़ने वाले, सुनने वाले भगवान की भक्ति में कितने विभोर हो जाते हैं, यह तो उस समय प्रत्यक्षदर्शी ही अनुभव कर सकते हैं। मैं समझती हूँ इस विधान के करने कराने से जैन वाङ्मय का स्वाध्याय तो होता ही है, साथ ही महान् पुण्य का संचय भी हो जाता है। अस्तु! इस विधान में जो कुछ भी विशेषताएँ हैं, वे सब जिनेन्द्र देव की भक्ति के प्रसाद से ही हैं, इसमें मेरा अपना कुछ भी नहीं है। श्री मानतुंगाचार्य ने कहा भी है-

मत्वेति नाथ! तव संस्तवनं मयेद-मारभ्यते तनुधियापि तव प्रभावात्।

चेतो हरिष्यति सतां नलिनीदलेषु, मुक्ताफलद्युतिमुपैति ननूदबिन्दुः।।८।।

अर्थात् हे नाथ! अल्प बुद्धि भी जो मैं आपका स्तवन कर रहा हूँ, वह आपके प्रभाव से सज्जन पुरुषों के चित्त को हरण करने वाला होगा, जैसे कि जल-बिन्दु कमल-पत्र पर पड़ने से मोती के समान दिखने लगती है। भक्तिरस में मुझे बहुत ही आनन्द आता है, तब मैं सोचा करती हूँ-‘‘आचार्य जिनसेन ने महापुराण में जिनेन्द्र देव की भक्ति में विभोर होकर स्वयंभुवे नमस्तुभ्यं’’ आदि श्लोकों द्वारा एक हजार आठ नामों से जिनेन्द्रदेव का स्तवन किया है। श्री इंद्रनन्दि आचार्य ने प्रतिष्ठा-पाठ आदि पूजा ग्रन्थ रचे हैं। श्री पूज्यपाद स्वामी, श्री गुणभद्राचार्य, श्री अभयनंदिसूरि आदि अनेक आचार्यों ने जिनेन्द्रदेव की अभिषेक विधि-पंचामृत अभिषेक पाठ रचा है। श्री पद्मनन्दि आचार्य ने भी अपने ‘पद्मनन्दिपंचविंशतिका’ ग्रंथ में जिनेन्द्र देव की पूजा का अष्टक लिखा है। वास्तव में आज पंचम काल में वीतराग चारित्र तो है नहीं, सराग चर्या वाले सरागसंयमी मुनि ही होते हैं। जब उनके लिए भी जिनेन्द्रदेव की भक्ति आदि सराग क्रियायें प्रधान हैं और जिनेन्द्रदेव की पूजा, उपदेश देना आदि प्रधान है जैसा कि-श्री कुन्दकुन्ददेव ने कहा है-

‘‘चरिया य सरागाणां जिणिंद पूजोवदेसो य।’’ (प्रवचनसार) तब मैं तो आर्यिका ही हूूँ। इस अवस्था में तो सराग चर्या और जिनभक्ति आदि क्रियायें ही आत्मा की विशुद्धि और धर्मध्यान में स्थिरता के कारण हैं। ऐसा सोचकर ही मैं सदा जिनभक्ति में लगे रहने की भावना भाया करती हूँ और भक्तों को भी यही प्रेरणा दिया करती हूँ। मैंने जीवन में कई ऐसे प्रसंग देखे हैं कि कई एक अध्यात्मवादियों ने आत्मा का चिन्तन करते हुए बीमारी आदि संकट के समय जिनेन्द्रदेव की भक्ति का सहारा नहीं लिया है, तो प्रायः चारित्र से भ्रष्ट होकर अंत समय हास्पिटल में मरकर सल्लेखना मरण से वंचित हो गये हैं किन्तु जिन्होंने जिनेन्द्रभक्ति का सहारा लिया है, वे हजारों संकटों से छुटकारा पाकर मनुष्य भव को सफल कर चुके हैं।

योगासन-

फूलचंद योगी, ये जैन हैं, छतरपुर के निवासी हैं, इन्हें सैकड़ों प्रकार के योगासन आते हैं। यहाँ जंबूद्वीप स्थल पर कई दिनों तक योगासन की इन्होंने कक्षायें चलार्इं। विधान में आने वाले श्रावकों ने अच्छी रुचि ली। किस-किस योगासन से कौन-कौन से शारीरिक रोगों में लाभ होता है? इस विषय पर भी ये फूलचंद जैन बताते रहते थे।

सामायिक विधि में योगासन-

जयधवला, आचारसार, मूलाचार, अनगार धर्मामृत आदि ग्रंथों में साधुओं के लिए देववंदना का जो वर्णन आता है, वही सामायिक विधि है। उनमें चार प्रकार की मुद्राओं का प्रयोग करना होता है-जिनमुद्रा, योगमुद्रा, मुक्ताशुक्तिमुद्रा और वंदनामुद्रा। खड़े होकर कायोत्सर्ग करने में जिनमुद्रा होती है, पद्मासन या अर्धपद्मासन से बैठकर कायोत्सर्ग करने में योगमुद्रा होती है, सामायिक दण्डक, थोस्सामि स्तव के पढ़ते समय हाथों को चिपकाकर जोड़ने से मुक्ताशुक्ति मुद्रा होती है और चैत्यभक्ति, पंचगुरुभक्ति के पढ़ते समय मुकुलित हाथ जोड़कर जो मुद्रा होती है, उसे ही वंदनामुद्रा कहते हैं।

एक कायोत्सर्ग के करने में कृतिकर्म विधि की जाती है, इसमें बारह आवर्त, चार शिरोनति और दो प्रणाम होते हैं। इनके करते समय भी योगासन हो जाते हैं। जैसे जुड़े हुए हाथों को तीन बार घुमाने से तीन आवर्त होते हैं, इसमें हाथ की कलाई के आसन हो जाते हैं, मुकुलित अंजलि पर मस्तक को रखकर नमस्कार-शिरोनति करने से गर्दन का आसन हो जाता है। गवासन से या घुटने टेक कर पंचांग नमस्कार करने से कमर, पीठ तथा पेट का व्यायाम हो जाने से कमर, पेट आदि के रोगों में लाभ होता है। योगमुद्रा से कायोत्सर्ग और ध्यान करने में अस्थिबंधन ठीक होता है और कर्मबंधन शिथिल हो जाते हैं। ऐसे ही जिनमुद्रा से कायोत्सर्ग करने में भी शरीर के अवयव दृढ़ होते हैं और कर्मबंधन शिथिल हो जाते हैं। फूलचंद योगी को जब मैंने विधिवत् सामायिक विधि बताई तब उन्होंने भी इस विधि से योगासन का होना और शारीरिक स्वस्थता का होना सिद्ध किया। यही कारण है, मैं कहा करती हूँ कि-

‘‘मुनि, आर्यिकाएँ, क्षुल्लक और क्षुल्लिकाएँ यदि प्रतिदिन तीनों काल की सामायिक विधिवत् करते रहें तो निसर्गतः योगासन भी हो जाते हैं तथा स्वास्थ्य लाभ के साथ-साथ कर्मबंधन भी झड़ते रहते हैं। आज प्रायः यह कृतिकर्म विधि सामायिक में लुप्त होती जा रही है, फिर भी आगम के आधार से इस विधि का समादर सभी साधुओं को करना चाहिए।’’ पं. पन्नालाल जी सोनी ने भी आचार्य श्री शांतिसागर महाराज की आज्ञा से और संघस्थ अन्य भी साधुओं की प्रेरणा से ‘क्रिया कलाप’ नाम से ग्रंथ छपाया था, उसमें भी सामायिक की यही विधि छपी हुई है। यहाँ वीर ज्ञानोदय ग्रंथमाला से भी यह ‘सामायिक’ नाम से पुस्तक छप चुकी है, इसका हिन्दी पद्यानुवाद भी ‘सामायिक पाठ’ नाम से छप चुका है। श्रावकों को भी इसी विधि से सामायिक करना चाहिए।

आज का मानव अनेक प्रकार के रोगों से ग्रसित होता जा रहा है। शारीरिक रोगों की अपेक्षा भी मानसिक तनाव अधिक बढ़ता जा रहा है। इस मानसिक अशान्ति को दूर करने के लिए और शारीरिक स्वस्थता को बनाये रखने के लिए योगासन भी बहुत ही उपयोगी है। साथ ही आत्मा की शुद्धि और सिद्धि के लिए, पापबंध से बचकर, पुण्यबंध का संचय करने के लिए सामायिक, देवपूजा, गुरुपासना आदि क्रियायें भी बहुत ही उपयोगी हैं। दिगम्बर जैन मुनि, आर्यिकायें दिन में एक बार ही आहार लेते हैं, उसी समय जल, दूध, मट्ठा, रस आदि भी लेते हैं पुनः दूसरी बार कुछ भी नहीं ले सकते हैं। कभी अंतराय, कभी उपवास आदि से प्रायः शरीर में वायुप्रकोप (गैस) की बीमारी, घुटनों व कमर आदि में भी दर्द हो जाता है। इन सबके लिए यह योगासन बहुत ही आवश्यक है। यह एक प्रकार से हल्का-फुल्का व्यायाम ही है। श्रावक-श्राविकाओं में तो प्रायः आज शारीरिक कार्य-व्यायाम व पानी भरना, चक्की पीसना आदि नहीं रहा है अतः शरीर को स्वस्थ रखने के लिए यह योगासन करना ही चाहिए। शीतकाल में रोहतक से एस.के. जैन को भी रवीन्द्र कुमार ने बुलाया था, उन्होंने भी तीन दिन अच्छी तरह से अनेक योगासन यहाँ लोगों को सिखाये थे।

श्री ऋषभ जयंती-

चैत्र शुक्ला नवमी भगवान ऋषभदेव का जन्मदिवस है। यहाँ क्षेत्र पर १०८ कलशों से भगवान का अभिषेक कराते हैं पुनः मध्यान्ह में प्रवचन और गोष्ठी आदि का आयोजन करके संक्षेप में भगवान की जयंती मना लेते हैं। मेरा कहना रहता है कि इस ऋषभजयंती को भी जैन समाज में सर्वत्र विशाल स्तर पर मनाना चाहिए क्योंकि ये भगवान ही तो युग के आदि प्रवर्तक हैं तथा जो लोगों में भ्रांति है कि ‘भगवान महावीर ने जैनधर्म को चलाया है’ यह भ्रांति भी दूर हो जाती है और ‘जैनधर्म अनादि निधन है’ यह बात सिद्ध हो जाती है।

उपदेश-

चैत्रवदी १०, रविवार को यहाँ होमगार्ड के लोग आये, उनके लिए मेरा उपदेश हुआ। ऐसे लोगों के बीच उपदेश होने से कुछ न कुछ लोग माँस, मदिरा, अण्डे आदि का त्याग अवश्य कर देते हैं। कुछ लोग महीने में कुछ-कुछ दिनों के लिए माँस-मदिरा का त्याग कर देते हैंं। यहाँ जंबूद्वीप स्थल पर हर महीने प्रायः ऐसे-ऐसे लोगों में उपदेश देना व अभक्ष्य भक्षण से दूर करना यह कार्य होता ही रहता है। इस तरह अजैनों द्वारा मांस, मदिरा के त्याग से मन में अत्यधिक प्रसन्नता हो जाती है। प्रतिदिन भी अनेक अजैन लोग आते हैं और कुछ न कुछ समस्या सुनाते हैं तब मैं उनसे माँस, अण्डा व मदिरा का त्याग कराकर उन्हें ‘ॐ नमः’ यह छोटा सा मंत्र दे देती हूँ जिसके फलस्वरूप अनेक लोग वापस आकर कहते देखे जाते हैं कि- ‘‘माताजी! आपके द्वारा दिये गये मंत्र से एवं आपके आशीर्वाद से मेरा कार्य बन गया है, मुझे स्वास्थ्य लाभ हो गया है, इत्यादि। मैं सोचा करती हूँ-‘‘वास्तव में मद्य, माँस, मधु का त्याग कर देना, यह सबसे बड़ा धर्मलाभ है। उत्तरपुराण में श्री गुणभद्राचार्य ने ‘पुरुरवा’ भील को ‘धर्मलाभोऽस्तु’ आशीर्वाद दिया था पुनः इन तीन मकारों का त्याग करना, यही धर्मलाभ है, ऐसा समझाया था।’’

अजैन लोगों से तो ऐसा त्याग कराना कोई आश्चर्यकारी नहीं होता है किन्तु जब किसी जैन को यंत्र-मंत्र देते समय कदाचित् अंडे अथवा मदिरा को त्याग करने को कहना पड़ता है तब बहुत ही आश्चर्य होता है, साथ ही हृदय में एक वेदना सी उठती है। मन में विचार आता है-‘‘अहो! विरासत में इन्हें जैनधर्म-अहिंसा धर्म मिला है, पूर्वजन्म में कई भवों में इन्होंने जो पुण्य संचित किया होगा, जिसके फलस्वरूप उत्तम कुल को प्राप्त किया है, फिर भी यह महाअभक्ष्य के भक्षण का पाप इन्हें आगे किस दुर्गति में ले जायेगा?’’ खैर, जैन बंधु तो प्रायः ऐसे दुर्व्यसनों को छोड़ ही देते हैं, शायद कोई ही ऐेसे अभागे होते हैं कि जो नही छोड़ते हैं।

विक्रम संवत् का नववर्ष-

१८ मार्च १९८८, शुक्रवार, चैत्रशुक्ला १, विक्रम संवत् २०४५ के दिन कांतिलाल मोहोत वाले (सोलापुर महाराष्ट्र) ने शांति विधान किया। महाराष्ट्र में इस विक्रम सं. के प्रथम दिन को ‘गुड़ी पाड़वा’ कहते हैं और मैसूर प्रांत में इसे ‘युगादी अब्बा’ कहते हैं। वैसे इसे वर्ष का प्रथम दिन मानकर विधान आदि धर्म-अनुष्ठान करना अच्छा ही है। जैन समाज को दीपावली के अगले दिन कार्तिक शुक्ला एकम् को वर्ष का प्रथम दिन मानना चाहिए क्योंकि वह विक्रम संवत् से प्राचीन है।

महावीर जयंती-

प्रातः प्रभातफैरी निकाली गई। ७ बजे भगवान महावीर स्वामी का १०८ कलशों से अभिषेक हुआ। मध्यान्ह में सभा का आयोजन रखा गया। यहाँ यात्रियों के आ जाने से उपदेश का कार्यक्रम हो जाता है, फिर भी विशेष धर्मप्रभावना के आयोजन नहीं बन पाते हैं।

यह चैत्र मास तो महापुरुषों को जन्म देने से गौरवान्वित है ही, चैत्र वदी ९ को भगवान ऋषभदेव के जन्म और तप ये दो कल्याणक हुए हैं, इसी नवमी के दिन भगवान के प्रथम पुत्र भरत सम्राट का भी जन्म हुआ था। चैत्र सुदी नवमी रामचन्द्र के जन्म से रामनवमी नाम से जगप्रसिद्ध है। चैत्र सुदी तेरस भगवान महावीर स्वामी की जन्मतिथि है और चैत्र सुदी पूर्णिमा महापुरुष हनुमान की जन्मतिथि है।

आज भारत देश में सर्वत्र दिगम्बर और श्वेताम्बर आदि चारों जैन सम्प्रदायों में महावीर जयंती का महोत्सव अच्छे प्रभावनापूर्ण समारोह से मनाया जाता है, सो ठीक ही है क्योंकि हम और आप सभी भगवान महावीर के शासन में ही रह रहे हैं।

आज बहुत से लोगों का यह कहना है कि जैनधर्म के संस्थापक भगवान महावीर हैं। उन लोगों को समझाने के लिए यदि हम अपने ऋषभदेव आदि चौबीसों तीर्थंकरों की जयंती एवं निर्वाण दिवस न मना सके तो न सही, कम से कम इस युग के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव का जन्मजयंती समारोह और माघ कृष्ण चतुर्दशी को भगवान ऋषभदेव का निर्वाण महोत्सव अवश्य ही मनावें।

रथयात्रा, सभा, प्रवचन, धार्मिक नाटक आदि के माध्यम से जैन-अजैन को जैनधर्म का, अहिंसा धर्म का बोध कराते हुए अपनी भावी पीढ़ी के कर्णधार नवयुवकों और बालकों में भी धर्म का बीजारोपण करते रहें। ये जयंती आदि के कार्यक्रम इसीलिए तो मनाये जाते हैं।

भिंडर में कल्पद्रुमविधान-

निर्मलकुमार जी सेठी ने आचार्यश्री अजितसागर जी के सानिध्य में अच्छे समारोह के साथ कल्पद्रुमविधान ८ अप्रैल १९८८ से (वैशाख कृ. ६ से) शुरू किया। इस अवसर पर वहाँ आर्यिका विशुद्धमती जी के नेतृत्व में पं. हंसमुखजी के मार्गदर्शन में समवसरण की सुन्दर रचना बनायी गयी थी। यहाँ हस्तिनापुर में गंधकुटी, धर्मचक्र आदि धातु के जो उपकरण कल्पद्रुम विधान के लिए ही बनवाये गये थे, वे ले जाये गये थे।

पहले यह विधान सेठी जी के द्वारा यहीं हस्तिनापुर में चैत्र मास में करने का निर्णय लिया जा चुका था किन्तु कारणवश मैंने उन्हें मना कर दिया था और तब मैंने यहाँ यही कहा था कि सेठी जी यह विधान आचार्यश्री अजितसागर जी के सानिध्य में कर लें, तो अच्छा रहेगा।

सेठी जी के विशेष आग्रह पर यहाँ से कु. माधुरी जी विधान के अवसर पर वहाँ गई थीं और रवीन्द्र कुमार भी गये थे। विशाल समारोह के साथ यह विधान वहाँ सम्पन्न हुआ था। वहाँ का यह विधान तीसरा था क्योंकि प्रथम यह विधान यहाँ जंबूद्वीप स्थल पर २४ फरवरी से एवं द्वितीय विधान तेजपुर आसाम में भी २४ फरवरी से हो चुका था। वहाँ विधान के अवसर पर आर्यिकाओं की पूजा की चर्चा आई, पुनः विद्वान् पं. मोतीलाल जी फल्टन आदि के द्वारा यह समाधान प्रस्तुत किया गया कि ‘‘जब आर्यिकायें उपचार से महाव्रती हैं और आहार के समय उनकी अष्टद्रव्य से पूजा की जाती है तो पुनः उनकी पूजा में क्या ऊहापोह करना? और इस विधान में उन ब्राह्मी-सुन्दरी से लेकर चंदना के संघ की आर्यिकाओं तक-चौबीसोंं तीर्थंकरों के समवसरण में स्थित आर्यिकाओं की पूजा है......।’’

अक्षयतृतीया मेला-

यहाँ जंबूद्वीप स्थल से प्रतिवर्ष इस अवसर पर रथयात्रा निकाली जाती है। तदनुसार इस बार भी रथयात्रा निकाली गई। श्वेतांबर लोगों का वर्षी तप के पारणा के निमित्त से बहुत बड़ा मेला भरता है। मेरी प्रारंभ से ही यह इच्छा रही है कि ‘‘यह हस्तिनापुर भगवान ऋषभदेव के आहार के निमित्त से तीर्थ बना है अतः यह अक्षयतृतीया पर्व अच्छे स्तर से मनाया जावे किन्तु दिगम्बर जैन अभी इधर रुचि नहीं ले रहे हैं। अस्तु.......छोटे मोटे रूप में इस जंबूद्वीप पर यह मेला मना लिया जाता है, हो सकता है आगे भविष्य में कभी यह पर्व दिगम्बर जैन समाज में भी अच्छे समारोह से मनाया जावे.....।’’

वैशाख शु. ७ को सुमेरु प्रतिष्ठापना दिवस, पुनः वैशाख शु. १२ को जम्बूद्वीप प्रतिष्ठापना दिवस संक्षेप में मनाया गया। जिनप्रतिमाओं का अभिषेक करके मध्यान्ह में सभा का आयोजन किया गया एवं रात्रि में आरती की गयी।