ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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096.जंबूद्वीप पर त्रैलोक्य विधान-जंबूद्वीप विधान

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जंबूद्वीप पर त्रैलोक्य विधान-जंबूद्वीप विधान।

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त्रैलोक्य विधान-

टिकैतनगर से आये प्रकाशचंद ने आषाढ़ वदी १, २० जून १९८९ से त्रैलोक्य विधान शुरू किया। मैंने सर्वतोभद्र विधान, (बड़ा तीन लोक विधान) तीन लोक विधान नाम से मध्यम तीनलोक विधान और त्रैलोक्य विधान नाम से लघु तीन लोक विधान, ऐसे तीन लोक के तीन विधान बनाये थे। सन् १९८७ की फरवरी में मोतीचंद ने दीक्षा लेने से पूर्व मध्यम तीन लोक विधान हस्तलिखित कापी से ही किया था। बड़ा तीन लोक विधान-सर्वतोभद्र विधान को वीरेन्द्र कुमार, ब्र. माधुरी, विजेन्द्र कुमार आदि ने सन् १९८८ में कार्तिक की आष्टान्हिका में किया था। अब प्रकाशचंद जैन यह लघु तीन लोक विधान प्रथम बार ही कर रहे थे। इसे इन्होंने अपना बहुत बड़ा सौभाग्य समझा था। विधान की पूजा पढ़ते समय ये इतने निमग्न हो जाते थे कि भावविभोर होकर गद्गद वाणी में जिनेन्द्र भक्ति की प्रशंसा करने लगते थे। विधान सम्पन्न कर ग्रीष्मावकाश में आये अपने अकलंक, निकलंक, इन्दु, माला,जाग्रति आदि पुत्र-पुत्रियों को साथ लेकर घर चले गये। वास्तव में माँ मोहिनी ने अपने पुत्र-पुत्रियों पर जो संस्कार डाले थे, उन्हीं के फलस्वरूप आज उनके तीनों गृहस्थाश्रम के पुत्रों ने अपने घर में जिनचैत्यालय बनाये हुए हैं। ये सभी प्रतिदिन अपने चैत्यालय में जिन अभिषेक और पूजा करते ही हैं।

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जंबूद्वीप विधान-

ताराचंद जैन (नरपतिया) भरतपुर से आये थे। उन्होंने आषाढ़ सुदी ८, ११ जुलाई १९८९ की आष्टान्हिका में यहाँ जंबूद्वीप विधान करना प्रारंभ किया। विधान सानन्द चल रहा था। आषाढ़ शु. १३, १६ जुलाई के दिन मध्यान्ह में गणेशीलाल जी रानीवाला, जिनेन्द्र प्रसाद जी ठेकेदार, रवीन्द्र कुमार जी आदि मेरे निकट बैठे हुए थे। जंबूद्वीप की प्रगति पर और आगे जंबूद्वीप महोत्सव किया जाये, इस विषय पर चर्चा चल रही थी। मैंने उचित समय देखकर सहसा घोषित कर दिया- ‘‘ब्र. माधुरी की दीक्षा होगी, श्रावण शु. ११, दिनाँक १३ अगस्त का मुहूर्त है।’’ सुनते ही रवीन्द्रकुमार कुछ क्षण के लिए स्तब्ध हो गये पुनः जब देख लिया कि माताजी ने पूर्ण निर्णय ले लिया है, अब संशोधन की कुछ गुंजाइश नहीं है, तब वे बोले- ‘‘ठीक है, जब दीक्षा होनी ही है, तो ठाठ-बाट से बढ़िया ही होगी, हम उत्साह से कार्यक्रम बनायेंगे.......।’’ उनके इन शब्दों से मुझे बहुत ही प्रसन्नता हुई और माधुरी की तो प्रसन्नता का कहना ही क्या था......बात यह थी कि लगभग दो वर्ष पूर्व से माधुरी के भाव दीक्षा लेने के हो रहे थे। मैंने जब-जब रवीन्द्रकुमार से बात की थी, वे मना कर देते थे। मैंने अच्छी तरह समझ लिया कि इसमें मोहनीय कर्म का उदय ही प्रमुख कारण है अतः जब स्वयं माधुरी में दृढ़ता है, मैं दृढ़ हूँ, तो भला ये कब तक रोकते रहेंगे? अतः इनसे पूछने के बजाए अब निर्णय करके सूचना कर दो, जो होगा सो होगा किन्तु माधुरी के पुण्य से उस समय सब अनुकूलता हो गई। रवीन्द्र कुमार आदि ने यही निर्णय किया कि- ‘‘अच्छी प्रभावना से दीक्षा कराई जावे।’’

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दीक्षा हेतु प्रार्थना-

आषाढ़ शु. १४, दिनाँक १७ जुलाई १९८९ के दिन मध्यान्ह में दिल्ली आदि अनेक स्थानों से आये हुए श्रावक-श्राविकाओं ने सभा में श्रीफल चढ़ाकर मुझसे चातुर्मास स्थापना के लिए प्रार्थना की। इसी सभा में त्रिमूर्ति मंदिर में ४.३० बजे माधुरी ने श्रीफल लेकर मुझसे प्रार्थना की- ‘‘हे माताजी! मुझे संसार समुद्र से पार करने वाली ऐसी आर्यिका दीक्षा प्रदान कीजिये’’ पुनः समयोचित कुछ अपने उद्गार भी सभा में व्यक्त किये। मैंने कु. माधुरी को दीक्षा के लिए स्वीकृति दी पुनः चातुर्मास यहीं हस्तिनापुर में करने हेतु स्वीकृति दी। जनता के वैराग्य के साथ-साथ माधुरी के प्रति ममता के भाव प्रबल हो उठे....। रात्रि में मैंने यहाँ पर अपने संघ सहित वर्षायोग स्थापित किया। माधुरी का सम्मान व शोभायात्रा- उसी समय हापुड़ से आये शिखरचंद ने माधुरी को साथ ले जाने के लिए प्रार्थना की और बोले कि-‘‘हापुड़ में हम लोग कल ही माधुरी जी का सम्मान करके इनकी शोभा यात्रा निकालेंगे।’’ तदनुसार पहला सम्मान यह दीक्षा के पूर्व का हापुड़ से शुरू हो गया।

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शांति-विधान आदि-

मेरा यह कहना रहता है कि दीक्षा से पूर्व दीक्षार्थी तीर्थों की यात्राएँ कर लें, विधान पूजन और आहार दान आदि करके दीक्षा लेवें, जिससे दीक्षा लेते ही यात्रा आदि की उत्कंठा न होवे और संघ में स्थिरता से रह सके। दूसरी बात यह भी है कि रेल, मोटर आदि से यात्राएँ जितनी सरल हैं, उतनी पद विहार से सरल नहीं हैं। इस नीति के अनुसार माधुरी ने यात्राएँ तो प्रायः पहले ही सब कर ली थीं। ज्ञानज्योति भ्रमण के समय बुंदेलखंड के तीर्थ भी कर लिए थे अतः अब उसने २१, २२, २३ जुलाई, श्रवण कृ. ३, ४, ५, के दिन क्रम से पंचकल्याणक विधान, मृत्युंजय विधान और शांतिविधान किये।

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सम्मान के कार्यक्रम-

दीक्षा का निर्णय होते ही रवीन्द्र कुमार ने अपने घर, महमूदाबाद आदि परिवारजनों में पत्र डाल दिये थे, सनावद तथा अन्य विशेष भक्त लोगों व कमेटी के लोगों में भी सूचना पहुंचा दी। टिकैतनगर से सुभाषचंद जैन श्रावण वदी ५ को आ गये, इन्होंने माधुरी को टिकैतनगर ले जाने के लिए निवेदन किया। साथ में ब्र.रवीन्द्र कुमार, माधुरी, पं. नरेश चंद आदि को ले गये।

२४ जून को दरियाबाद में उनकी बहन कामिनी जी ने व समाज के लोगों ने माधुरी का स्वागत किया। २५ जून को टिकैतनगर मेंं सभी जैन समाज के बुजुर्ग लोगों से लेकर आबालगोपाल ने शोभायात्रा निकालकर अच्छा सम्मान किया। जैनेतर लोगों ने भी अपनी गाँव की बिटिया को बड़े प्यार से बिटिया कहकर अश्रुपूर्ण नेत्रों से सम्मान किया और घर के लोग क्या, सारे प्रबुद्ध श्रावक-श्राविकाओं ने रोेते हुए विदाई दी। बात यह है कि माधुरी यद्यपि सन् १९७१ से मुझसे ब्रह्मचर्य व्रत लेकर मेरे संघ में ही रह रही थीं, फिर भी कई बार घर जाती ही रहती थीं। तीस वर्षों से गृहत्याग कर दिया था, फिर भी विधान आदि के निमित्त से गांव के लोग टिकैतनगर ले जाते रहते थे। अब सबको यह निर्णय हो गया कि आर्यिका दीक्षा लेकर यह माधुरी बिटिया नहीं रहेंगी, ये तो हम सबकी क्या, जगत की माताजी बन जायेंगी तो पुनः पद विहार में यहाँ गाँव में पता नहीं कब आयेंगी? पहले तो वहाँ के बुजुर्गोें ने दीक्षा से भी रोकने का विशेष आग्रह किया पुनः दृढ़ता देखकर सम्मान आदि करके नाना प्रकार की शुभकामनाएँ और शुभ आशीषों की वर्षा करते हुए विदाई दी।

वहाँ से निकलकर २६ जून को प्रातः बहराइच में सम्मान किया गया। इसी दिन शाम को लखनऊ में बहन शांतिदेवी ने सम्मान किया पश्चात् २७ जून को महमूदाबाद में कु. माधुरी के मामा आदि ने तथा वहाँ की समाज ने विशेष शोभायात्रा, स्वागत आदि पूर्वक सम्मान किया पुनः माधुरी रवीन्द्र कुमार के साथ हस्तिनापुर आ गयीं। टिकैतनगर से आकर माधुरी ने मुझे बताया कि माताजी! टिकैतनगर पहुँचते ही पहले तो गाँव के सभी बुजुर्ग लोग, कैलाश भाई साहब जी के घर पर आकर एकांत में मुझे समझाने लगे कि अभी थोड़े दिन और रुक जाओ, तुम्हारे बिना हम लोगों को पूजा विधान कराने में आनंद नहीं आएगा। बेटी! तुम यहीं ठहरो, हम लोग माताजी के पास जाकर अभी दीक्षा स्थगित कराए देते हैं। कई लोगों ने विधान करने के लिए हामी भर दी और हमसे स्वीकृति माँगने लगे। मैंने कहा-कोई भी कार्य किसी के बिना रुकता नहीं है, आप लोगों के प्रलोभन अब मुझे दीक्षा से रोक नहीं सकते। अब तो आप सब मुझे आशीर्वाद दें ताकि मैं अपनी जन्मभूमि का नाम दिग्दिगन्त में प्रकाशित कर सकूं। मैंने सोचा, यह सब मोहकर्म का ही खेल है। दिल्ली में २९ जुलाई को प्रातः आठ बजे लाल मंदिर के प्रांगण में आचार्य सुधर्मसागर के सानिध्य में खचाखच भरी जैन समाज के मध्य स्वागत किया गया पुनः१० बजे से चांदनी चौक, दरीबाकला होते हुए शोभायात्रा निकाली गई। मार्ग में व धर्मशाला में अनेक स्त्री-पुरुषों ने कु. माधुरी की गोद भरी। ३० जुलाई को बड़ौत में गणधराचार्य श्री कुन्थुसागर जी महाराज ससंघ के सानिध्य में स्वागत किया गया। आचार्य महाराज आदि साधुओं ने विशेष आशीर्वाद दिया। यहाँ भी भव्य जुलूस निकाला गया और जगह-जगह भक्तों ने गोद भरी।

पुनः सनावद (क्षुल्लक मोतीसागर जी की जन्मभूमि) में विशेष आग्रहवश भेजना ही पड़ा। वहाँ भी १ अगस्त को शोभायात्रा का कार्यक्रम हुआ, अनन्तर सभा हुई। समयाभाव से रवीन्द्र कुमार, माधुरी को लेकर वहाँ से तत्क्षण ही चल पड़े। वहाँ से आते हुए ये लोग सोनागिरि उतरकर आचार्यश्री विमलसागर जी के दर्शन कर उनका आशीर्वाद व ब्र.चित्राबाई की मंगलकामना लेकर वापस हस्तिनापुर आ गये।

इस शोभायात्रा व सम्मान के कार्यक्रम में माधुरी की रुचि न होते हुए भी लोगों के अतीव आग्रह व वात्सल्य से जाना ही पड़ता था, अब वह थकान महसूस कर अन्यत्र जाने के लिए तैयार नहीं हुई तो पुनः अहमदाबाद से आये हुए हीरालालजी आदि अनेक श्रावकों के कार्यक्रम स्थगित करने पड़े। रिजर्वेशन कराकर भी समयाभाव से लोहारिया आचार्यश्री अजितसागर जी के दर्शनार्थ न जा पाई, जिसका मुझे खेद भी रहा। ९ अगस्त को प्रातः सरधना में, सायंकाल कमलानगर, मेरठ में स्वागत समारोह रखा गया।

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परिवार के लोगों का आगमन-

इस बीच माधुरी के भाई-भावज, बहन, बहनोई, भतीजे, भानजे आदि आ गये। सनावद से मांँ श्री रूपाबाई जी, श्री इन्द्रचन्द चौधरी आदि भी आ गए। ये लोग भी माधुरी को अपनी पुत्री व बहन ही मानते रहे हैं। सभी भौजाइयों ने मिलकर कु. माधुरी को घेर लिया और शुभशकुन रूप में उसके हाथों में मेंहदी रचाने लगीं, माधुरी को यह सब श्रृंगारिक वातावरण न रुचते हुए भी वर्तमान की परम्परा के अनुसार मौन रखना पड़ा। हां! मेरी आज्ञानुसार इतना अवश्य रहा कि माधुरी ने सबके अत्यधिक आग्रह व प्यार में भी रंगीन साड़ी नहीं पहनी। बहुतों ने कहा कि ‘कुमारिका हैं क्या होता है?’’ किन्तु माधुरी को स्वयं अरुचि होने से तथा मेरी आज्ञा न होने से वे श्वेत साड़ी में ही रहीं। लोगों ने बग्घी, कार आदि में शोभायात्रा निकाली हैं। यहाँ हस्तिनापुर टाउन के निवासी अनन्तवीर जैन ने ११ जुलाई को भव्य स्वागत करके शोभायात्रा निकाली। १२ जून को खतौली आदि के अनेक भक्तों ने शोभायात्रा करके गोद भरी। इधर कु. माधुरी ने १० अगस्त से गणधर वलय विधान व पंचपरमेष्ठी विधान सम्पन्न किया। इधर ब्र. सुभाष जैन बंडा से श्रावण शुक्ला १ से श्रावण शु. १५ तक सोलह दिन शांति विधान कराया गया है।

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भोजन परित्याग व करपात्र में आहार का पूर्वाभ्यास-

११ अगस्त को भोजन के पश्चात् मैंने कु. माधुरी को थाली आदि बर्तनों में भोजन करने का शास्त्रोक्त विधिपूर्वक त्याग कराया। १२ अगस्त को हम सभी साधुओं को आहार दान देने के पश्चात् कु. माधुरी को पूर्वाभ्यास के रूप में करपात्र में आहार कराया गया। उस दिन आहार देने और देखने वालों की बहुत भीड़ थी। ब्र. रवीन्द्र कुमार ने स्वयं व्यवस्थित ढंग से आहार कराया। उसके पश्चात् सभी भाई-बहनों ने अश्रुपूरित नेत्रों से गोद भरी।

अनन्तर जब रवीन्द्र कुमार भोजन के लिए बैठे, तो उनके अश्रुओं की कुछ सीमा ही न रही। वे सिसक-सिसक कर खूब रोये, मानो अपनी बहन को ससुराल भेज रहे हों। वे कह रहे थे-अब मैं अकेला बैठकर भोजन कैसे करूँ? जैसे-तैसे सभी बहनों ने समझा-बुझाकर उन्हें थोड़ा-सा भोजन कराया। इस दीक्षा के प्रसंग में रवीन्द्र कुमार कई बार भावविह्वल होकर रो पड़ते थे, तब मैं उन्हें यही समझाती थी कि दीक्षा तो तुम्हें भी एक दिन धारण करनी ही है, संसार में न जाने कितने भाई-बहन बनाए छोड़े गये हैं? तुम घर का त्याग कर संघ में रह रहे हो, भला तुम्हें इतना रोना कैसे शोभेगा? तुम्हें तो घर में रहने वाले मोही भाई-बहनों को रोने से मना करके धैर्य बंधाना चाहिए......।

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दीक्षा से पूर्व शोभायात्रा-

१३ अगस्त १९८९, श्रावण शुक्ला ११, रविवार को प्रातः १० बजे से जंबूद्वीप स्थल से कु. माधुरी की गोद भर कर विशाल रूप में शोभायात्रा निकाली गई। यहाँ से दिगम्बर जैन बड़ा मंदिर जाकर, वापस आकर, जंबूद्वीप स्थल पर बने विशाल पांडाल में सभा रूप में परिवर्तित हो गई। सबसे अधिक विशेषता यह रही कि रात्रि ३ बजे से मेघकुमार वृष्टि कर रहे थे। प्रातः १० बजे तक खूब बरसते रहे हैं, बाद में कार्यक्रम को सफल संपन्न करने के लिए ही मानों वे शांत हो गये-वर्षा रुक गई थी, जो कि पुनः दिन भर नहीं हुई।

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लम्बे-लम्बे केशों का लोंच-

सर्वप्रथम मैंने विशाल सभा में बने मंच पर मंगल भक्तिपाठपूर्वक १२.१५ बजे कु. माधुरी के सिर के लम्बे-लम्बे केशों का लोच करना प्रारंभ कर दिया। मंच पर कु. माधुरी के परिवार के ७०-८० लोग, भाई-बहन, उनके पुत्र-पुत्री आदि बैठे हुए थे। मैंने पहले ही इन सबसे कह दिया था कि ‘‘जो कोई भाई-बहन या बालक-बालिकाएँ सभा में रोयेंगे, हम उसे वहाँ से हटा देंगे, सभा में नहीं बैठने देंगे’’ अतः मेरी आज्ञानुसार ये सभी लोग धैर्यपूर्वक वहाँ केशलोंच देख रहे थे। कोई-कोई रोते भी तो पीछे ही पीछे आंसू पोंछ लेते थे। परिवारजनों की ममता तो जो थी, सो थी अन्य श्रावकों-श्राविकाओं का रोना देखकर मुझे आश्चर्य हो रहा था। निर्मल कुमार सेठी की माँ बहुत ही रो रही थीं, तो उधर सनावद के इन्दरचन्द चौधरी के अश्रु ही नहीं बंद हो रहे थे। मैं, आर्यिका अभयमती और शिवमती भी केशलोंच कर रहे थे, कभी-कभी स्वयं माधुरी भी अपने हाथों से अपने लम्बे-लम्बे केश उखाड़कर अपने वैराग्य भाव का , शरीर से निर्ममता का परिचय दे रही थी।

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राखी बांधना-

केशलोंच के बाद माधुरी के भाई-भतीजे राखी लेकर खड़े हो गये, माधुरी ने उनकी कलाई में भाई-बहन के प्यार की राखी बाँधी। पं. विमल कुमार सोंरया ने मंगलाचरण करके माधुरी की प्रशंसा की पुनः डा. श्रेयांस कुमार ने अपने वक्तव्य में माधुरी के चार भाई एवं आठ बहनों का परिचय दिया।

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जिनेन्द्रदेव का अभिषेक-

केशलोंच का कार्यक्रम २.१५ बजे लगभग पूर्ण हो गया। तब चंदारानी, ज्ञानादेवी, सुषमा, श्रीमती आदि सौभाग्यवती महिलाओं ने माधुरी को मंंगल स्नान कराकर दीक्षा के समय की आठ गज की साड़ी पहनाई पुनः माधुरी ने मंच पर आकर सिंहासन पर विराजमान श्री जिनेन्द्रदेव का पंचामृत अभिषेक किया।

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माधुरी द्वारा दीक्षा हेतु प्रार्थना-

हम सभी को गंधोदक देकर कु. माधुरी ने सभा में खड़े होकर मंगलाचरण करके अपने परिवार के भाई-बहन आदि से दीक्षा की स्वीकृति मांगते हुए सबसे क्षमायाचना की और सबके प्रति क्षमाभाव व्यक्त किये पुनः मुझसे प्रार्थना की- ‘‘हे माताजी! चतुर्गति के दुःखों से छुटकारा पाने हेतु आप मुझे जैनेश्वरी-आर्यिका दीक्षा देकर मेरे जीवन को सफल कीजिये’’ पुनः माधुरी के बड़े भ्राता कैलाशचंद जी ने खड़े होकर अपने सभी परिवार की ओर से माधुरी से क्षमा मांगी और दीक्षा की अनुमोदना की। श्री इन्दरचंद चौधरी, श्री निर्मल कुमार सेठी आदि ने भी खड़े होकर माधुरी के वैराग्य की प्रशंसा की।

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दीक्षा के संस्कार-

मैंने कु. माधुरी की प्रार्थना सुनकर सबसे पहले उनके परिवारजनों से पूछा- ‘‘कु. माधुरी आर्यिका दीक्षा माँग रही है, देऊँ क्या? आप सभी की स्वीकृति है क्या?’’ तब सभी पारिवारिक जनों ने अश्रुपूरित नेत्रों से स्वीकृति दी पुनः मैंने पांडाल में उपस्थित समस्त दिगम्बर जैन समाज से पूछा- ‘‘कु. माधुरी का आप लोगों को लगभग सन् १९७१ से १८ वर्षों से परिचय है। ये आज आर्यिका दीक्षा लेने के लिए आई हैं। यह दीक्षा खांडे की धार के समान अत्यन्त कठोर है, मैं दीक्षा देऊँ क्या?’’ इतना सुनकर सारी जैन समाज ने मुक्त कंठ से जय जयकारा बोलते हुए तालियों की गड़गड़ाहट से स्वीकृति दी और बोले भी- ‘‘इन्हें दीक्षा दीजिये, हम सभी की स्वीकृति है.....।’’ तब मैंने कु. माधुरी से यह संकल्प कराया कि-

‘‘तुम्हें चारित्रचक्रवर्ती आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज (दक्षिण) व उनके पट्टाधीश मेरे दीक्षा गुरु आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज, उनकी शिष्या मुझ गणिनी आर्यिका ज्ञानमती माताजी की परम्परा के अनुसार चलना होगा। लोकानुरंजन व ख्याति, लाभ, पूजा आदि के लिए भी गुरु परम्परा का उल्लंघन नहीं करना होगा।’’ माधुरी ने कहा-‘‘हे माताजी! मुझे आपकी आज्ञा सहर्ष स्वीकार है।’’ इस लोकोपचार के बाद मैंने तीन बजे के समय माधुरी को सौभाग्यवती महिलाओं द्वारा पूरे गये मंगलचौक पर बिठाया और मैंने दीक्षा की क्रिया प्रारंभ कर दी।

इसी मध्य पं. सुधर्मचंद एवं रवीन्द्र कुमार ने दीक्षार्थी के लिए पिच्छी, कमंडलु, शास्त्र दान देने के लिए बोलियाँ शुरू कीं। पिच्छी प्रदान करने की बोली इन्दरचन्द कैलाशचंद जैन चौधरी, सनावद वालों ने ली। कमंडलु की बोली कमल चंद जैन खारीबावली दिल्ली वालों ने ली। शास्त्रदान की बोली पूनमचंद गजराज गंगवाल झरिया वालों ने ली। दीक्षा के बाद आरती के लिए बोली दिलीप चंद सुरेशचंद कोटड़िया ने ली एवं केशों के विसर्जन की बोली बंबई के ज्ञानचंद मुन्नालाल जैन ने ली। बोली लेने वाले श्रावकों ने पिच्छी, कमंडलु और शास्त्र मुझे दिये। पुनः मैंने माधुरी के मस्तक पर आर्यिका दीक्षा के संस्कार करके मंत्र बोलते हुए नवदीक्षिता को पिच्छी, कमंडलु और शास्त्र यह संयम का उपकरण, शौच उपकरण और ज्ञान का उपकरण प्रदान किया पुनः ‘चंदनामती’ नामकरण करके सभा में घोषित कर दिया। तब समस्त जैन समाज ने उच्च स्वर से तीन बार ‘आर्यिका चंदनामती’ की जय बोलते हुए सारे जंबूद्वीप स्थल को गुंजा दिया। अनन्तर आरती की बोली लेने वालों ने नवदीक्षिता आर्यिका चंदनामती की आरती उतारी।

दीक्षार्थी को व्रत देते समय उनकी अंगुली में पीले चावल भरकर उस पर हल्दी, सुपाड़ी, लौंग, श्रीफल रख देते हैं पुनः जब गुरु अट्ठाईस मूलगुण दे देते हैं, तब उस हाथ के श्रीफल आदि को प्रमुख दीक्षादायक-दीक्षा दिलाने वाले दंपती के अंचल में दिला दिया जाता है। वर्तमान में उन्हें दीक्षार्थी के माता-पिता के नाम से सम्बोधित किया जाता है। कु. माधुरी की दीक्षा में यह मंगल वस्तु प्राप्त करके माता-पिता बनने का सौभाग्य उन्हीं के बड़े भाई कैलाशचंद व चन्दारानी ने प्राप्त किया था।

इस अवसर पर आर्यिका अभयमती जी (कु. माधुरी की बड़ी बहन) ने मंगल प्रवचन में अपना आशीर्वाद प्रदान किया। अन्य वक्ताओं ने भी अपने-अपने उद्गार व्यक्त किये। सनावद के श्रीमान इन्दरचंद चौधरी ने रुंधे कंठ से अपने वक्तव्य में कहा-‘‘आज बहन माधुरीजी दीक्षा लेकर चंदनामती बन गर्इं हैं। वे हम सभी के द्वारा पूज्य हो गई हैं, इनके आदेशों पर आर्ष परम्परा की रक्षा के लिए हम सब कृतसंकल्प रहेंगे तथा धर्म की रक्षा के लिए आवश्यकता पड़ने पर अपने खून का कतरा-कतरा देने को भी तैयार रहेंगे।’’ उनके इन वचनों को सभा में करतल ध्वनि से समर्थन मिला था।

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जनता की उमंग-

ब्र. रवीन्द्र कुमार ने लगभग ३००० दर्शनार्थियों के लिए पांडाल बनवाया था किन्तु जनता लगभग १५-२० हजार थी। जंबूद्वीप स्थल पर चारों तरफ भीड़ ही भीड़ नजर आ रही थी। लोगों के मुख से यही निकला था कि-पांडाल छोटा पड़ गया। सबसे अच्छा तो यह रहा कि मेघराज रात्रि तीन बजे से बरस रहे थे, दिन में भी १० बजे तक बरसते रहे थे। पुनः शोभायात्रा से लेकर दीक्षा का कार्यक्रम सम्पन्न होने तक वे शांतमुद्रा से मानो कार्यक्रम ही देख रहे थे-पुनः वर्षा नहीं हुई, इस विषय को तमाम भक्त लोगों ने चमत्कार ही माना था। इस दिन प्रीतिभोज का आयोजन सेठ श्रीनिवास, कंवरीलाल बड़जात्या मद्रास वालों ने किया था।

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१४ अगस्त को कार्यक्रम-

दीक्षा के अगले दिन १४ अगस्त, श्रावण शु. १२ को प्रातः त्रिमूर्ति मंदिर में एक सभा का आयोजन किया गया। आगंतुक मेहमान तथा कुछ यात्रीगण भी थे। लोगों ने सभा में आर्यिका चंदनामती के उपदेश की मांग, की तब मैंने हंसकर कहा-‘‘भाई! कल का उपवास था, आज रोटी खिलाये बगैर भूखे पेट ही चंदनामती से आप उपदेश चाहते हैं, देखो न! श्रावक कितने स्वार्थी होते हैं......।’’ सब हंस पड़े। फिर भी उन सबकी अपेक्षा देखकर मैंने चंदनामती को आज्ञा दी, वे १०-१५ मिनट तक बोलीं, भक्तलोग बहुत ही प्रसन्न हो गये। रवीन्द्र कुमार ने पं. जमुनाप्रसाद जी, कटनी, पं. बाबूलाल जैन, महमूदाबाद, श्रीमान साहेबलाल जैन, टिकैतनगर का पुष्पमाला से स्वागत किया। मैंने अपने प्रवचन में उपस्थित श्रावकों को आर्ष परम्परा की रक्षा एवं सज्जाति की रक्षा के लिए दृढ़ संकल्प रहने का आदेश दिया। सभी ने इसे शिरोधार्य करते हुए शुभ भावना व्यक्त की। कई लोगों ने यह नियम लिया कि ‘‘शास्त्र की गद्दी पर मुनि निंदा नहीं होने देंगे इत्यादि.......।’’ इसी बीच में मेरे द्वारा लिखित छपकर आये हुए ‘‘ज्ञानामृत’ ग्रंथ का श्री विमलचंद जैन, सनावद ने विमोचन किया। यह ग्रंथ सभी के स्वाध्यायोपयोगी है, इसमें ‘समयसार का सार’ आदि अनेक विषयों का अच्छा संकलन है।

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आहारचर्या-

१० बजे के समय मैं आहार के लिए निकली, वृत्ति-परिसंख्यान लेने से कैलाशचंद, प्रकाशचंद, सुभाषचंद जैन टिकैतनगर वालों के चौके में नियम मिल जाने से मेरा पड़गाहन हो गया। साथ ही नवदीक्षिता चंदनामती माताजी का भी मेरे साथ ही पड़गाहन हो गया था। तमाम भक्तों ने नवदीक्षिता को आहार देकर अपना जीवन धन्य माना। क्षुल्लक मोतीसागर जी व ब्र. रवीन्द्र कुमार ने आहार के समय अच्छी व्यवस्था बनाई। सभी साधु-साध्वियों के निरंतराय आहार होने से सबको प्रसन्नता रही। कुल मिलाकर पूरा समारोह आशातीत सफलता के साथ सम्पन्न हुआ।

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मेरा अनुभव-

परिवार के लोगों के सिवाय अन्य श्रावकोंं ने, निर्मलकुमार जी सेठी की माँ ने बार-बार यही कहा-‘‘माताजी! माधुरी बहुत कमजोर है, यह ऐसी कठोर चर्या कैसे झेलेंगी?.....’’ मैंने कहा-‘‘शारीरिक बल की अपेक्षा भी मनोबल विशेष ही महत्व रखता है। देखो न! जब मैंने सन् १९५५ में घर छोड़ा था, तब मेरा शरीर ऐसा था कि २-४ मील चलने से ही बुखार आ जाता था और एक दिन अन्तराय हो जाने से दूसरे दिन आँख खोलकर बैठना, खड़े होना कठिन हो जाता था लेकिन मनोबल अच्छा था। यही कारण है कि आज तक मैंने इस जीर्ण-शीर्ण-कमजोर शरीर से भी दशों हजार किलोमीटर की पदयात्रा करके श्री सम्मेदशिखर, श्रवण-बेलगोल, माँगीतुंगी, सिद्धवरकूट आदि तीर्थ यात्राएँ की हैं। शिष्य-शिष्याओं को अध्ययन आदि कराकर, लगभग २४ वर्षों से लगातार लेखन कार्य करते हुए लगभग डेढ़ सौ ग्रंथ छोटे-छोटे अनुवादित किये व लिखे हैं। यह सब कार्य मुख्य रूप से मनोबल से ही संभव हुआ है। शरीर तो हमेशा विश्राम ही चाहता है, हाँ! जब वह बिल्कुल काम करने को तैयार नहीं होता है, तब चुपचाप णमोकार का स्मरण करते हुए सो जाती हूँ। मेरा अनुभव है कि कु. माधुरी का भी मनोबल अच्छा है अतः उन्होंने शरीर की कमजोरी को नगण्य समझकर यह कठोर चर्या ग्रहण की है......। भाई! मैंने जबरदस्ती यह दीक्षा नहीं दी है प्रत्युत् इनके विशेष आग्रह से ही दीक्षा का निर्णय लिया गया था। अब तो इनके लिए मेरा यही मंगल आशीर्वाद है कि- इनका मनोबल दिन दूना-रात चौगुना वृद्धिंगत होता रहे और अपनी चर्या में, संयम साधना में यह अपने जीवन को धन्य मानते हुए अपने कृतसंकल्प में दृढ़ बनी रहें। आप लोग भी इनके प्रति यह भावना भायें कि इनका संयम निराबाध पलता रहे इत्यादि।’’ मैं देख रही हूँ आज भी चंदनामती प्रसन्न हैं, दीक्षा लेकर अपने जीवन को सफल अनुभव कर रही हैं। कई बार इनके मुख से यह निकल जाता है-‘‘अहो! यदि मैंने आर्यिका रत्नमती माताजी के सामने दीक्षा ले ली होती, तो उन्हें कितनी प्रसन्नता हुई होती?....’’

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संक्षिप्त जीवन परिचय-

अवध प्रांत के बाराबंकी जिले में टिकैतनगर गाँव है। वहाँ के श्रेष्ठी लाला छोटेलाल के घर में माता मोहिनी जी ने सन् १९५८ में ज्येष्ठ कृ. अमावस्या के दिन एक कन्या को जन्म दिया। इसका नाम माधुरी रखा गया। यह मोहिनी जी की तेरह संतानों में से बारहवीं थी। सन् १९६९ में यह बालिका अपने भाई प्रकाशचंद के साथ जयपुर में आचार्य धर्मसागर के संघ में रहते हुए मेरे दर्शनार्थ आई। तब मैंने इसे गोम्मटसार जीवकांड की ३८ गाथाएँ याद कराई थीं, और इसे अपने पास में रहने के लिए बहुत समझाया किन्तु ११ वर्षीया यह बालिका उस समय न रुक सकी, भाई के साथ घर चली गइ। पुनः सन् १९७१ में अजमेर के चातुर्मास में अपनी माँ के साथ आई, तब मैंने इसकी भावना के अनुसार जिनमंदिर में ले जाकर सुगंध दशमी के दिन इसे आजन्म ब्रह्मचर्यव्रत दे दिया। बाद में नवम्बर में माँ मोहिनी की आर्यिका दीक्षा के समय उन्हें यह बात बतला दी थी। परिवार के मोह, ममता से टक्कर लेते हुए इस बालिका ने दो प्रतिमा के व्रत लेकर सप्तम प्रतिमा के व्रत लिए, पुनः सन् १९८७ में गृह का त्याग कर दिया। अब १३ अगस्त १९८९ के दिन आर्यिका दीक्षा लेकर ‘चंदनामती’ बन गई हैं। इन्होंने मेरे पास ही व्याकरण, न्याय, धर्म, सिद्धान्त, कोष, अलंकार आदि पढ़कर ‘विद्यावाचस्पति’ की उपाधि प्राप्त की थी। ये सदा ज्ञानाराधना में मग्न रहते हुए मेरे गुरु की परम्परा को अक्षुण्ण बनावें, यही मेरा हार्दिक शुभाशीर्वाद है।

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व्रत प्रतिमा ग्रहण-

कु. माधुरी की दीक्षा के दिन श्री शिखरचंद जैन और उनकी धर्मपत्नी शकुन्तला ने मुझे दो प्रतिमा के व्रत ग्रहण किये थे। ये सात्विक दम्पति यहाँ के हर एक धर्मकार्य में रुचि से भाग लेते रहते हैं और महिने में १-२ बार आकर आहारदान देते रहते हैं। कार्तिक कृ. एकम् को मेरी जन्मजयंती के उपलक्ष्य में शिखरचंद व उनकी पत्नी शकुन्तला ने मुझसे सप्तम प्रतिमा के व्रत लिये।

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अगले चातुर्मास के लिए प्रार्थना-

आगे सन् १९९० के मेरे चातुर्मास के लिए टिकैतनगर, सनावद, दिल्ली, बड़ौत, हापुड़ व मेरठ आदि के श्रावकों ने अभी से श्रीफल चढ़ाकर प्रार्थना की। इन लोगों में से प्रत्येक गाँव के लोगों का अभिप्राय यही था कि नवदीक्षिता आर्यिका श्री चन्दनामती माताजी का पहला चातुर्मास हमारे यहाँ होवे। इससे पूर्व इनकी दीक्षा का निर्णय होते ही पहले बड़ौत वालों ने आकर मेरे पास श्रीफल चढ़ाकर प्रार्थना की थी कि ‘‘माताजी! कु. माधुरी की दीक्षा के बाद इनके सहित आपका अगला चातुर्मास बड़ौत में ही होना चाहिए। तब मैंने हँसकर कहा था-‘‘अभी यह चातुर्मास तो पूरा होने दो, अभी तो यहाँ यह सन् १९८९ का चातुर्मास प्रारंभ ही हुआ है, आगे के लिए एक वर्ष बाकी है।’’ टिकैतनगर, सनावद तथा दिल्ली वालों का तो यही कहना था कि- ‘‘जो भी हो, अगर आप १-१, २-२ किलोमीटर भी चलेंगी, तो भी हम लोग साथ में रहेंगे और आपको संघ सहित ले चलेंगे.....इत्यादि।’’ मैं समझती हूँ, यह इन श्रावकों की गुरुभक्ति ही थी तथा कु. माधुरी के पुण्य का भी प्रतीक थी।

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अद्भुत स्वप्न-

माधुरी की दीक्षा के तीन दिन पूर्व मोक्ष सप्तमी-श्रावण शुक्ला सप्तमी की पिछली रात्रि में-श्रावण शु. अष्टमी के प्रभात के पूर्व मैंने एक स्वप्न देखा कि ‘‘विदेह क्षेत्र से श्रीगणधर देव या चारणऋद्धि महामुनि आकाशमार्ग से यहाँ आये हैं, उनके साथ आचार्य धर्मसागर जी महाराज भी हैं। इन्होंने उच्चासन पर विराजे हुए मुझसे दीक्षा की सारी विधि सम्पन्न कराई है पुनः ये जाने लगे, तब मैंने उनके चरण पकड़कर आग्रह किया- भगवन्! अब यहीं भरतक्षेत्र में विराजिये, किन्तु वे जाने ही लगे, तब मैंने निवेदन किया-भगवन्! यह महाग्रंथ आप मुझे दे दीजिये.....। उन्होंने वह ग्रंथ मुझे दे दिया है, तभी मैंने रवीन्द्र कुमार से कहकर एक डेढ़ फुट का बड़ा सा सिंहासन मंगवाकर उसमें ग्रंथराज को विराजमान करा दिया और मैं बोली कि-‘‘अब मैं प्रतिदिन इस ग्रंथ की पूजा कराऊँगी...इत्यादि।’’ प्रातः ४.३० (साढ़े चार) बजे जब आँख खुली स्वप्न ज्यों की त्यों याद था। मैंने आवश्यक क्रियाओं के बाद कु. माधुरी को यह स्वप्न सुनाया, वह बहुत प्रसन्न हुई, बोली-कुछ भी हो माताजी! यह स्वप्न आप डायरी में जरूर लिखो! मैंने लिख लिया था। आज मेरी स्मृतियाँ लिखते समय आर्यिका चंदनामती ने अतीव आग्रह से मेरे द्वारा यह स्वप्न का विषय लिखाया है।

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आर्यिका द्वारा आर्यिका दीक्षा-

सन् १९५७ में खानिया (जयपुर) में आचार्यश्री महावीर कीर्ति जी के सामने एक बार यह चर्चा आई कि ‘‘आर्यिकाओं द्वारा आर्यिका दीक्षा की परम्परा चलनी चाहिए।’’ चर्चा में प्रमुख थे, ब्र. चांदमल जी नागौर वाले। उस समय हम लोगों ने प्रथमानुयोग के ग्रंथों का इसी दृष्टि से अवलोकन किया। तब पढ़ने में यही आया कि ‘ब्राह्मी-सुन्दरी’, चन्दना आदि प्रमुख आर्यिकाओं ने तो समवसरण में दीक्षा ली है। बाद में अन्य महिलाओं ने उन गणिनी आर्यिका से ही दीक्षा ली है।

भरतस्यानुजा ब्राह्मी दीक्षित्वा गुर्वनुग्रहात् ।

गणिनीपदमार्याणां सा भेजे पूजितामरैः१।।१७५।।

भरत की छोटी बहन ब्राह्मी भी गुरुदेव की कृपा से दीक्षित होकर आर्यिकाओं के बीच में गणिनी-स्वामिनी के पद को प्राप्त हुई थी। वह आर्यिका ब्राह्मी सर्व देवों के द्वारा पूजित हुई थी। ‘‘भगवान ऋषभदेव के समवसरण में श्री जयकुमार के दीक्षित हो जाने पर सुलोचना ने भी गणिनी ब्राह्मी आर्यिका के पास आर्यिका दीक्षा ले ली।’’ पद्मपुराण में लिखा है-‘‘भरत के मुनि बन जाने पर माता कैकेयी ने भी विरक्त होकर तीन सौ स्त्रियों के साथ ‘पृथ्विीमती’ आर्यिका के पास जाकर आर्यिका दीक्षा ले ली।’’ ‘‘महासती सीता ने भी सर्वभूषण केवली के समसरण में जाकर पृथ्वीमती आर्यिका के पास में आर्यिका दीक्षा ले ली।’’ मैंने सन् १९६४ में आचार्यश्री शिवसागर जी से आज्ञा मँगाकर, कु. मनोवती को क्षुल्लिका दीक्षा दी थी। आज प्रसन्नता की बात है कि गणिनी आर्यिका सुपार्श्वमती, गणिनी आर्यिका विजयमती, गणिनी आर्यिका विशुद्धमती आदि भी कई आर्यिकाएं, क्षुल्लिका, आर्यिकादि दीक्षाएँ दे चुकी हैं। अब तो यह आर्यिका द्वारा आर्यिका दीक्षा मार्ग प्रशस्त हो गया है। सो अच्छी बात है। आर्यिका से दीक्षा लेकर आर्यिकाओं में माँ, बेटी जैसा अप्रतिम-सहज वात्सल्य बना रहता है। ऐसी अनुभव की बात है।

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भाद्रपद में दशलक्षण पर्व-

मोदीनगर से सुशील कुमार जैन एवं उनकी पत्नी सुशीला जैन ने (मवाना वाले) यहांँ दशलक्षण पर्व में इन्द्रध्वज विधान कराया। मोदीनगर के सूरजभान जैन, दिल्ली के जयकुमार जैन, धर्मपत्नी सरला जैन, हापुड़ के शिखरचंद जैन, शकुन्तला जी आदि इस विधान में सम्मिलित हुए थे। प्रातः अभिषेक, पर्वपूजा के बाद विधान पूजा होती थी। मध्यान्ह में ‘सरस्वती पूजा’ ‘तत्त्वार्थसूत्र पूजा’, एक-एक अध्याय का अर्थ सहित वाचन व एक-एक धर्म पर प्रवचन करते थे। मैं भी अंत में थोड़ा सा धर्म पर विवेचन करके एक-एक धर्म के मंत्र बुलवाती थी। रात्रि में कु. आस्था, कु. बीना, रमेशचंद आदि एक-एक धर्म पर प्रवचन करते थे। शकुन्तला जी ने बादाम का पानी लेकर दस दिन के व्रत किये थे। फिर भी ये उत्साह से पूजन में नृत्य आदि किया करती थीं। यहाँ इन्द्रध्वज विधान के निमित्त से अच्छी प्रभावना होती रहती है।

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शरद पूर्णिमा एवं क्षुल्लिका दीक्षा-

यद्यपि शरद पूर्णिमा (आसोज शु. १५) , १४ अक्टूबर १९८९ को थी किन्तु दिल्ली के लोगों के आग्रहवश यह मेरा जन्मदिवस कार्यक्रम १५ अक्टूबर, कार्तिक कृ. १ रविवार के दिन मनाना निश्चित किया गया अतः १३, १४ और १५ अक्टूबर तक तीन दिन का कार्यक्रम बनाया गया। इधर संघस्थ ब्र. श्यामाबाई ने ८ दिन पूर्व दीक्षा के लिए नारियल चढ़ाकर प्रार्थना की थी अतः१५ अक्टूबर को ही इन्हें क्षुल्लिका दीक्षा देने का भी निर्णय लिया गया। दिनाँक १३, १४ अक्टूबर को पंचपरमेष्ठी विधान एवं गणधरवलय विधान सम्पन्न हुए।

१५ अक्टूबर को प्रातः ७ बजे प्रतिवर्ष की तरह मेले के उपलक्ष्य में रथयात्रा निकाली गई। इसी मध्य दीक्षार्थी ब्र. श्यामाबाई की शोभायात्रा भी हुई। टिकैतनगर से उनके पुत्र-पुत्रवधुएँ तथा बाराबंकी आदि से उनकी पुत्रियाँ, जमाई आदि परिवार के लोग आ गये थे। दिल्ली, बड़ौत, मेरठ, सरधना, हैदराबाद आदि से अनेक भक्तगण आ गये थे। मध्यान्ह १२.३० (साढ़े बारह) बजे मैं संघसहित पांडाल में पहुँच गई।

इस समारोह के मुख्य अतिथि सांसद श्री रामचन्द्र विकल एवं भूतपूर्व संसद सदस्य श्री रामगोपाल रेड्डी थे। सभा के अध्यक्ष श्री त्रिलोकचंद कोठारी, कोटा थे। मेरे ५६वें जन्मदिवस के उपलक्ष्य में मुख्य अतिथियों के स्वागत आदि के पश्चात् भी रामचंद्र विकल ने ५६ विद्युत बल्बों को जलाया। आर्यिका अभयमती जी, आर्यिका चंदनामती, क्षुल्लक मोतीसागर ने मेरा परिचय देते हुए विनयांजलि अर्पित की। प्रतिष्ठाचार्य शिखरचंद, श्री निर्मलकुमार सेठी आदि ने विनयांजलि समर्पित की। पिच्छी, कमण्डलु, शास्त्र ये नूतन उपकरण मुझे प्रदान किए गये। श्रीरामचन्द्र विकल ने भी जैन साध्वी की चर्या को समझकर अपने भक्ति के उद्गार व्यक्त किये तथा श्री रामगोपाल रेड्डी ने भी अपना संक्षिप्त भाषण प्रस्तुत किया।

इसके बाद दीक्षा का कार्यक्रम शुरू हुआ। ब्र. श्यामाबाई का केशलोंच पहले ही रत्नत्रय निलय में कर दिया गया था। मंगल स्नान के बाद मंच पर विराजमान जिनेन्द्रदेव का इन्होंने अभिषेक किया अनन्तर दीक्षा के लिए प्रार्थना की। तब अपने परिवारजनों से क्षमा याचना करके स्वीकृति ली। मैंने भी उनके परिवारजन व जैन समाज से स्वीकृति लेकर इन्हें सौभाग्यवती महिलाओं द्वारा पूरे गये मंगल चौक पर बिठाया एवं इनके मस्तक पर दीक्षा के संस्कार शुरू किये। इसी बीच आदिकुमार जैन, गणेशपुर, अनन्तवीर जैन हस्तिनापुर और लवप्रकाश जैन, बाराबंकी वालों ने दीक्षार्थी को देने के लिए जो पिच्छी, कमंडलु व शास्त्र की बोली ली थी, उन्होंने मुझे वे उपकरण दे दिये। मैंने मंत्रोच्चारण पूर्वक दीक्षा के मध्य इन्हें ये संयम, शौच, ज्ञान के उपकरण प्रदान करके इनका नाम क्षुल्लिका ‘श्रद्धामती’ रखा।

बात यह है कि सर्वप्रथम दीक्षा के समय पिच्छी, कमण्डलु व शास्त्र दीक्षागुरु ही शिष्य को देते हैं। आगे पिच्छी बदलाने के समय बोली लेने वाले श्रावक भी अपने हाथ से पिच्छी आदि दे देते हैं। चूँकि उनके पास पहले से तो पिच्छी आदि उपकरण है ही हैं अतः श्रावक नई पिच्छी देकर पुरानी ले लेते हैं किन्तु दीक्षा के समय तो मस्तक पर संस्कार और पिच्छी, कमंडलु, शास्त्र का दान श्रावक नहीं कर सकते हैं, यह गुरु का ही काम है।

बाद में मैंने सभी को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। इसके बाद सभा का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। इस दिन आगत समाज के लिए मांगीलाल पहाड़े, हैदराबाद वालों ने प्रीतिभोज का आयोजन किया था। ये मांगीलाल जी पहाड़े, जब से मेरा सन् १९६४ में हैदराबाद चातुर्मास हुआ था, तभी से अनन्य भक्त हैं। हमेशा हर कार्यक्रमों में रुचिपूर्वक तन, मन, धन से भाग लेते रहते हैं।

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ब्र. श्यामाबाई-

ये ब्र. श्यामाबाई सन् १९८५ से मेरे संघ में रह रही हैंं। ये आरा के श्री राजेन्द्रचंद और उनकी पत्नी चन्दा की सुपुत्री थीं और टिकैतनगर के सेठ पुत्तीलाल के पुत्र नन्हूमल जैन से ब्याही गई थीं। इन्होंने गार्हस्थ्य जीवन में रहते हुए तीन पुत्र, तीन पुत्रियों को जन्म देकर उनके ब्याह आदि से निवृत्त होकर, दीक्षा लेकर अपने मनुष्य जीवन को सफल किया है।

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गुरुदेव की शिक्षा-

गुरुदेव आचार्य वीरसागर जी महाराज कहा करते थे कि कोई भी शिष्य दीक्षा लेना चाहे, तो कम से कम छह महीने उसे संघ में रखकर, उसके स्वभाव आदि का अवश्य अनुभव कर लो, तब दीक्षा देवो। शिष्य-संग्रह में जल्दी नहीं करनी चाहिए......।’’ गुरुदेव की यह दीर्घदर्शिता अच्छी ही थी। यही कारण था कि उनके शिष्य-शिष्याएँ संघ से निकलकर गये हों, ऐसे उदाहरण कम थे और संघ से जाकर गुरु की निन्दा, अवहेलना आदि करें, ऐसे उदाहरण तो एक भी नहीं हुए हैं।’’ मैंने भी गुरुदेव की शिक्षा को अपने हृदय पटल पर अंकित कर लिया था। जिन्हें भी घर से निकालकर दीक्षा दिलाई है, उन्हें कम से कम छह महीने अपने पास में अवश्य रखा है। कई एक शिष्याएँ ऐसी आर्इं, उन्होंने कहा-‘‘माताजी! आप हमें दीक्षा दे दीजिए, तभी हम संघ में रहेंगे, नहीं तो नहीं.....। मैंने उपर्युक्त प्रकार की गुरुदेव की आज्ञा के बिना उन्हें दीक्षा की स्वीकृति नहीं दी थी। ये ब्र. श्यामाबाई तो मेरे संघ में पाँच वर्ष से रह रही थीं। इनके स्वभाव को व प्रकृति को मैं अच्छी तरह समझ चुकी थी और ये भी संघ के अनुशासन आदि से परिचित हो चुकी थीं अतः लगभग ६३ वर्ष की उम्र होते हुए भी इनका वैराग्य, धर्मप्रेम व सरलता आदि को देखकर इन्हें क्षुल्लिका दीक्षा दे दी है।

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प्रतिष्ठाचार्यों की संगोष्ठी-

मेरी प्रेरणा से यहाँ त्रिदिवसीय प्रतिष्ठाचार्यों की संगोष्ठी रखी गई। १५ अक्टूबर १९८९ को श्री निर्मलकुमार सेठी ने दीप प्रज्वलित कर इसका उद्घाटन किया। गोष्ठी में प्रतिष्ठाचार्य पं. फतहसागर जी उदयपुर, पं. श्री शिखरचंद जैन भिंड, पं. हंसमुखजी डागरिया, धरियावद पं. अमरचंद जी शाहपुर, पं. प्रदीपकुमार कुसुम्बा महाराष्ट्र आदि ने भाग लिया। प्रतिदिन प्रातः व मध्यान्ह २-२ घण्टे से अधिक समय तक चर्चाएँ चलती थीं। इस गोष्ठी में आर्यिका चंदनामती, क्षुल्लक मोतीसागर, ब्र. रवीन्द्र कुमार, ब्र. कमलेश कुमार भी उपस्थित रहते थे।

मेरा खासकर यह कहना रहा कि-‘‘पाषाण को भगवान बनाने के लिए प्रतिष्ठाचार्यों की बहुत बड़ी जिम्मेदारी रहती है अतः प्राचीन आचार्यों द्वारा रचित जितने भी प्रतिष्ठा पाठ हैं, उनमें से ही किसी एक को लेकर प्रतिष्ठा विधि करानी चाहिए। पं. हंसमुख ने अपनी सूची दिखाई, जिससे ज्ञात हुआ कि चौबीस प्रतिष्ठा पाठ ग्रंथ आज उपलब्ध हैं, जिनमें कई एक प्रकाशित भी हैं। मैंने बार-बार यही कहा कि ‘‘आज जो चर्चा सुनने में आ रही है कि अनेक प्रतिष्ठापाठों के आधार से एक नया प्रतिष्ठापाठ तैयार किया जाये, उसके आधार से प्रतिष्ठा कराई जाये, सो मुझे नहीं जंचता है क्योंकि संकलन में हो सकता है कि कोई खास मंत्र छूट भी जाये....। दूसरी बात यह है कि किन्हीं भी प्रतिष्ठापाठ के रचयिता ने अधूरा प्रतिष्ठापाठ बनाया हो, ऐसा हम कैसे कह सकते हैं? ‘नेमिचंद्र प्रतिष्ठातिलक’ ग्रंथ अपने आप में सर्वांगीण है-पूर्ण है, उन्हीं ग्रंथों को पढ़कर, पढ़ाकर प्रतिष्ठाचार्य तैयार होना चाहिए। यह मेरा कथन उपस्थित सभी विद्वानों को जंचा और सभी ने यह निर्णय लिया कि ‘नया प्रतिष्ठापाठ ग्रंथ’ न बनाया जावे और प्राचीन ग्रंथों के आधार से ही विधि सम्पन्न की जावे। उस समय इन उपस्थित विद्वानों में शांतिपूर्ण चर्चा होकर निम्नलिखित सात निर्णय एकमत से लिये गये थे-

१. प्रतिष्ठाचार्य को संस्कृत, व्याकरण, सिद्धान्त, शिल्प एवं ज्योतिष का ज्ञान होना अति आवश्यक है।

२. प्राचीन आचार्यों के द्वारा रचित प्रतिष्ठा पाठों के आधार पर क्रियाकांड की विधि कराना चाहिए। किसी भी नवीन प्रतिष्ठा पाठ के संकलन प्रकाशन की आवश्यकता नहीं है।

३. वर्तमान में समाज में तेरहपंथ व बीसपंथ के रूप में दो धाराएँ प्रचलित हैं। उनको ध्यान में रखते हुए विधि-विधान के कार्यक्रम को सम्पन्न कराया जाये किन्तु प्राचीन प्रतिष्ठा पाठों के आधार पर किसी भी विधि को अपूर्ण नहीं रखी जाये।

४. प्रतिष्ठा के लिए दो प्रतिष्ठाचार्य हों, तो अधिक श्रेष्ठ है। एक प्रतिष्ठाचार्य पंचकल्याणक की बहिरंग क्रियाओं को मंच पर सम्पन्न कराये तथा दूसरा प्रतिष्ठाचार्य अंतरंग की क्रियायें, मंत्रोच्चारण, यज्ञ, विधान, संस्कार विधि आदि सम्पन्न कराये, तो पंचकल्याणक प्रतिष्ठा अच्छी होगी। इसके लिए दो-तीन सहायक पंडित भी रखे जावें।

५. वर्ष में एक बार भारत के सभी प्रतिष्ठाचार्यों का सम्मेलन हो, तो परस्पर में ज्ञान का आदान-प्रदान होगा और मैत्रीभाव बना रहेगा।

६. जाति-कुल की शुद्धि को ध्यान में रखते हुए प्रतिष्ठाचार्यों, माता-पिता एवं इंद्रों की नियुक्ति की जाये। अंतर्जातीय, विजातीय एवं विधवा विवाह के दोषों से मुक्त होना आवश्यक है।

७. प्रतिष्ठा एवं विधान आदि में दीप जलाना, अग्नि में धूप से हवन कराना आगमानुकूल ही होना चाहिए।

इसके बाद बहुत ही सौहार्दपूर्ण वातावरण में गोष्ठी का समापन हुआ।

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जंबूद्वीप महामहोत्सव की घोषणा-

इसी बीच विद्वानों के द्वारा महामहोत्सव के लिए तिथियाँ निश्चित की गर्इं। वैशाख शु. ३ को झंडारोहण का कार्यक्रम तथा वैशाख शुक्ला ९ से १३, दिनाँक ३ मई से ७ मई १९९० तक पंचकल्याणक प्रतिष्ठा का निर्णय हुआ पुनः ये तिथियाँ सम्यग्ज्ञान में प्रकाशित करा दी गर्इं।

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वर्षायोग समापन-

कार्तिक कृ. अमावस्या के दिन प्रभात से पूर्व ही रात्रि में शास्त्र विधि के अनुसार वर्षायोग समापन की क्रिया सम्पन्न की। बाद में भगवान महावीर के मंदिर में निर्वाणलाडू चढ़ाया गया। सायंकाल में प्रतिवर्ष की तरह गणधर देव पूजा, केवलज्ञान महालक्ष्मी पूजा कराई गई। जंबूद्वीप में रहने वाले श्रावकों ने दीपकों को जलाकर जंबूद्वीप, सुमेरु पर्वत आदि को जगमगा दिया। यद्यपि शास्त्र की आज्ञा है कि कार्तिक कृ. १४ की पिछली रात्रि में वर्षायोग समाप्त हो जाता है, फिर भी विहार करने की आज्ञा कार्तिक शु. ५ को ही है। इसी दृष्टि से मैंने हस्तिनापुर टाउन से कार्तिक शु. ५, दिनाँक ३ नवम्बर को विहार किया है।