ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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097.गणिनी आर्यिका ज्ञानमती माताजी का ससंघ हस्तिनापुर से विहार

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गणिनी आर्यिका ज्ञानमती माताजी का ससंघ हस्तिनापुर से विहार

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मंगल विहार-

कई वर्षों से सरधना, बड़ौत आदि के श्रावक मेरे विहार के लिए बहुत ही आग्रह कर रहे थे। सन् १९८७ में गर्मी में एक बार मैंने बड़ौत समाज के आग्रह पर अर्ध स्वीकृति भी दे दी थी पुनः गर्मी की वजह से स्वास्थ्य अनुकूल न देखकर मैंने मना कर दिया था। तत्काल में १५ अक्टूबर ८९ के दिन मंच पर ही बड़ौत के भक्तगण श्रीफल चढ़ाकर प्रार्थना कर चुके थे और मैंने स्वीकृति भी दे दी थी। तदनुसार कार्तिक शुक्ला १, वीर नि. सं. २५१६ दिनाँक ३० अक्टूबर १९८९ को लगभग ३ बजे मैंने संघ सहित यहाँ जंबूद्वीप से विहार कर दिया। उस दिन यहीं टाउन में श्री अनंतवीर जैन की कोठी पर चैत्यालय के दर्शन किये और वहीं ठहर गई। २ नवम्बर को इन्होंने मेरे सानिध्य में अपने यहाँ शांति विधान किया पुनः कार्तिक शु. ५, दिनाँक ३ नवम्बर को वहाँ से विहार कर मार्ग में लगभग ३ किलोमीटर दूर गणेशपुर में विश्राम किया। प्रातः वहाँ से विहार कर मवाना के पास ही गोशाला में चौके की व्यवस्था थी वहीं आहार कर करीब मध्यान्ह ४ बजे मवाना पहुँच गई। वहाँ पर मेरठ से विहार कर आचार्य कल्याणसागर जी मुनि पधार चुके थे। मंदिर जी में ही दोनों का मिलन हुआ। छोटी-मोटी सभा बन गई। आचार्य कल्याण सागर की प्रेरणा से मैंने कुछ प्रवचन किया पुनः कल्याणसागर जी महाराज ने भी अपने वक्तव्य में कहा-‘‘मैं हस्तिनापुर माताजी से कुछ चर्चा करके कुछ ज्ञान ग्रहण करने के लिए जा रहा हूँ किन्तु माताजी तो बड़ौत के लिए जा रही हैं.....।’’

मैंने महाराज जी से अलग से बैठकर कुछ सामयिक चर्चाएँ कीं। रात्रि मवाना ही विश्राम था। प्रातः श्री कल्याणसागर जी महाराज हस्तिनापुर की ओर विहार करने वाले थे। वे लगभग ७ बजे यहाँ धर्मशाला में स्वयं आ गये और मेरे से लगभग १ घंटे कुछ चर्चाएँ कीं। उस समय वहाँ क्षुल्लक मोतीसागर, आर्यिका चंदनामती भी उपस्थित रहीं। इस एकांत की चर्चा में मैंने मुनिश्री से यही निवेदन किया कि-

‘‘आगम के अनुकूल चलते हुए आप णमोकार मंत्र का प्रचार-प्रसार करेंगे, तो हम सभी साधु-साध्वियों का पूरा-पूरा समर्थन आपको मिलेगा.......इत्यादि।’’ ६ नवम्बर को मध्यान्ह में विहार करके मैंने नई फैक्ट्री पर रात्रि में विश्राम किया। वहाँ से प्रातः विहार कर छोटे मवाना पहुँची, वहाँ आहार हुआ। इस प्रकार मैं एक-एक टाइम में ३, ३.५० या ४ किलोमीटर अर्थात् दिन में ७ या ८ किलोमीटर चलते हुए भगवानपुरा, लावड़, दौराला, बेगमाबाद होते हुए ११ नवम्बर को सायंकाल में सरधना गाँव के बाहर ही श्रेयांसकुमार की पावरलूम फैक्ट्री पर ठहर गई। प्रातः वहाँ से विहार कर कार्तिक शु. १४, दिनाँक १२ नवम्बर को सरधना शहर में मंगल प्रवेश हुआ। यहाँ के श्रावकों का अच्छा उत्साह था। जुलूस के साथ-साथ रास्ते में १०-१२ मकानों के सामने पाद प्रक्षालन एवं आरती करते हुए मंदिर जी पहुँच गये, वहाँ जुलूस सभा के रूप में परिवर्तित हो गया। क्षुल्लक मोतीसागर व आर्यिका चंदनामती ने समयोचित प्रवचन किये। मैंने भी अपने आशीर्वादात्मक प्रवचन में कहा कि-

‘‘सरधना में मेरा आगमन उधार रूप था। एक बार मैं १९८३ में सरधना के लिए विहार कर मात्र ३.५० किलोमीटर गणेशपुर आई थी। वहाँ आर्यिका रत्नमती जी का स्वास्थ्य अत्यधिक बिगड़ जाने से उनकी विहार की स्थिति न देखकर, वापस हस्तिनापुर चली गई थी पुनः सन् १९८५ में उनकी समाधि के बाद गर्मी के दिनों में मैं स्वयं अस्वस्थ हो गई थी। यही कारण था कि विहार नहीं हो पाया था। अब मैं सरधना आकर यहाँ के समाज का आग्रह पूरा कर चुकी हूँ......।’’इत्यादि।

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लश्कर गंज में कार्यक्रम-

स्व. कैलाशचंद जैन खद्दर वालों के सुपुत्र पवन कुमार विनोद कुमार जैन ने अपने स्कूल का वार्षिक उत्सव रखा था। उसमें नेहरू शताब्दी, आर्यिका संघ स्वागत आदि कार्यक्रम भी जोड़ दिये थे। उनके आग्रह से १४ नवम्बर को मैं ससंघ लश्करगंज पहुँची। मंदिर के दर्शन कर आहार के बाद स्कूल के कार्यक्रम में बैठी। अनंतर आशीर्वाद प्रवचन देकर उसी दिन वापस शहर में आ गई। कार्यक्रम में विनोद कुमार की सुुपुत्री ने मेरे प्रति भक्ति-गीत प्रस्तुत करते हुए नृत्य करके सभा का अच्छा अनुरंजन किया था।

१५ नवम्बर, मगसिर वदी ३ को प्रातः से ही मेरा स्वास्थ्य बिगड़ गया। जुकाम के प्रकोप के साथ ही अतिसार शुरू हो गये। १६ तारीख को मेरठ से हकीम शेफुद्दीन को बुलाया गया। इन्होंने कहा-‘‘माताजी का स्वास्थ्य अब चलने लायक नहीं है। आप लोगों ने इन्हें चलाकर अन्याय किया है, अब लीवर पर सूजन आ गई है-इत्यादि।’’ ३-४ दिन अतिसार चलते रहे पुनः एक दिन वमन भी हो गया। संघ के सब लोग घबरा गये कि ‘‘कहीं पहले सन् १९८५ जैसी ही स्थिति न हो जावे’’ पुनः चंदनामती ने वही पुरानी औषधि-कासनी के बीज की ठंडाई आदि शुरू कर दी। ४-५ दिन में स्वास्थ्य में कुछ सुधार दिखा, तब बड़ौत वालों के आग्रह के अनुसार पुनः बड़ौत के लिए विहार करने का भाव बनाया गया।

बड़ौत में तीन लोक मंडल विधान मगसिर वदी १४, दिनाँक २७ नवम्बर को झंडारोहण होकर पौष वदी २, दिनाँक १४ दिसम्बर तक पूर्ण होना था। इसी विधान में पहुँचने हेतु बड़ौत के श्रावकों ने मेरा विहार कराया था। मार्ग में व्यवस्था संभालने हेतु राजकुमार व अनिल जैन थे। इन्होंने एक किलोमीटर भी अधिक चलने का आग्रह नहीं किया प्रत्युत् जितना-जितना चलना मेरे अनुकूल हुआ, उतने-उतने पर ही स्थान, कुएँ आदि का निरीक्षण करते रहे और धीरे-धीरे साथ चलते रहे।

ये बड़ौत के भक्तगण तो जब प्रार्थना करने आये थे, तब ऐसा बोले थे कि ‘‘माताजी! दो-दो किलोमीटर चलेंगी तो भी हम व्यवस्था बनायेंगे।’’ मैंने कहा था-चौके हेतु कुआ की व्यवस्था कैसे होगी?’’ तब ये बोले थे कि ‘‘जहाँ आप ठहरेंगे, हम लोग वहीं कुआ खोद देंगे।’’ तब हम सभी हंस पड़े थे। मार्ग में इन लोगों की व्यवस्था संतोषप्रद रही थी, फिर भी मेरा शरीर अब काम नहीं कर रहा था। यहाँ प्रतिदिन आर्यिका चंदनामती, क्षुल्लक मोतीसागर के उपदेश हो रहे थे, मैं भी कभी-कभी प्रवचन करती थी।

मैं यहाँ सरधना में शरीर की इस स्थिति को देखकर सोचने लगी-गिरनार की यात्रा में संघ के साथ मैं प्रतिदिन प्रायः १५-१७ मील अर्थात् २४-२५ किलोमीटर चलती थी। सन् १९६२-६३ में सम्मेदशिखर की यात्रा के समय भी प्रायः २०-२५ किलोमीटर सहज ही हो जाता था और सन् १९६३ के शिखरजी से कलकत्ता विहार के समय तो ३२-३२ किलोमीटर चली हूँ। आज शरीर की कमजोरी से ४-५ मील (७-८ किलोमीटर) में ही अस्वस्थ हो गई।

वास्तव में अस्वस्थता से, उम्र से, मौसम से और प्रान्त से बहुत बड़ा अन्तर पड़ जाता है। आज भी बम्बई, महाराष्ट्र व कर्नाटक में मौसम इतना ठंडा नहीं है। जब वर्तमान में अपने ही जीवन में कहाँ ३२ किलोमीटर की चलाई और कहाँ ८ किलोमीटर में ही अस्वस्थता? कहाँ इतनी ठंडी और कहाँ अन्य प्रांत में आज भी गर्मी? इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि-‘‘चतुर्थकाल में उत्तम संहनन होने से और द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की अनुकूलता होने से परीषहों, उपसर्गों की सहनशीलता आ जाती थी और मुक्ति सुलभ थी। आज विषमता होने से मुक्तिमार्ग बहुत ही कठिन हो रहा है......। अस्तु हे भगवान ! मेरे ३८ वर्ष के संयमी जीवन में रोगादि के संकट आने पर भी जैसी मेरी दृढ़ता बनी रही है, आगे भी बनी रहे और अंत में सल्लेखनापूर्वक मरण हो, जिससे कि मैं अपनी संयमनिधि के साथ ही शरीर छोड़कर जीवनभर भावित भावना के अनुसार पुनः तीसरे भव में पूर्ण संयम को प्राप्त कर आत्मसिद्धि कर लेऊँ।’’ ऐसी भावना मन में अनेक बार आती ही रहती है।

सरधना में अस्वस्थ होने पर मैंने यह सोचा था कि-‘‘अब एक-दो माह यहीं विश्राम कर आगे हस्तिनापुर में महामहोत्सव होने से वापस हस्तिनापुर की ओर विहार कर जाऊँगी’’ किन्तु बड़ौत की जैन समाज की भक्ति को देखकर संघ के सभी लोगों ने यही कहा कि-‘‘माताजी! आप को हम लोग पैदल विहार नहीं करने देंगे क्योंकि शास्त्र में तो मुनियों को भी अस्वस्थता में डोली में बैठकर विहार करने का विधान है तथा आपने स्वयं संघ के मुनियों व आर्यिकाओं को डोली में बैठकर विहार करते देखा है अतः अब बड़ौत के लिए यदि विहार हुआ था, तो एक बार बड़ौत ही चलो.....।’’

मैंने भी संघ में गिरनार यात्रा में आर्यिका सुमतिमती जी, आर्यिका पार्श्वमती को डोली से विहार करते देखा था पुनः संघ में भी सन् १९६८ में श्री महावीर जी जाते समय मुनि श्री सुबुद्धिसागर जी का पैर पक जाने से डोली से विहार कराया गया था। सन् १९७६ में आचार्यकल्प श्री श्रुतसागर जी हस्तिनापुर आ रहे थे, तब कमर की दर्द के निमित्त से वे भी डोली में बैठकर आये थे। इत्यादि उदाहरण स्मरणकर मैंने आगे का विहार कर लिया। यद्यपि अब तक कभी डोली में नहीं बैठी थी अतः एक बार तो बहुत ही अखरा, फिर जैसे-तैसे मन मसोसकर डोली से विहार की स्वीकृति दे दी।

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बड़ौत की ओर विहार-

मगसिर वदी १०, दिनाँक २२ नवम्बर को मैं सरधना से विहार कर सरूरपुर के स्कूल में ठहरी। वहाँ सड़क से अंदर लगभग एक किलोमीटर दूर पर ‘ढार’ नाम का एक गाँव है। वहाँ के श्रावक-स्त्री पुरुष व छोटे-छोटे बालक-बालिकाएँ स्कूल में आ गये, प्रातः गाँव में चलकर आहारचर्या करने के लिए बहुत निवेदन किया किन्तु मैंने यह आना-जाना स्वीकार नहीं किया। महिलाएँ रात्रि में वैयावृत्ति करके चली गर्इं पुनः प्रातः सभी लोग आ गये। इन श्रावकों की भक्ति विशेष देखकर मैंने सोचा-‘‘आज भी छोटे-छोटे गाँवों में श्रावक गुरुओं के लिए तरसते रहते हैं, इन जैसों को संघ के ले जाने का व भक्ति करने का योग कम ही मिल पाया है’’ पुनः इन लोगों को क्षुल्लकजी ने व चंदनामती ने उपदेश सुनाया। यहाँ से ‘हर्रा’ होते हुए बरनावा पहुँची। वहाँ खूब बारिश हुई पुनः मध्यान्ह में वर्षा रुकते ही बिनोली की तरफ विहार कर दिया। वहाँ ज्ञानसागर जी महाराज मिले। अगले दिन आहार कर अंगदपुर के मंदिर में विश्राम किया। यहाँ की गंदी गलियाँ देखकर गाँवों की दयनीय स्थिति पर आश्चर्य के साथ बहुत ही दुःख हुआ।

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बड़ौत शहर में प्रवेश-

अंगदपुर से विहार कर मगसिर वदी १३, दिनाँक २६ नवंबर को मध्यान्ह लगभग ३ बजे बड़ौत के अतिथिभवन में पहुँच गई। यहाँ गणधराचार्य श्री कुंथुसागर जी महाराज यहाँ ठहरे हुए थे। इनका चातुर्मास यहीं हुआ था। अतिथिभवन के प्रांगण में सभा हुई। आचार्य महाराज बोले-‘‘यदि माताजी न आती, तो मैं लेने के लिए पहुँच जाता आदि......।’’ दोनों संघों का मिलन अच्छा रहा।

यहाँ मैं ससंघ ‘गेस्ट हाउस’ में ठहर गई। प्रातः २७ नवम्बर को वृहत् तीन लोक विधान का झंडारोहण हुआ। ‘दिगम्बर जैन कालेज ए फिल्ड’ में विशाल पांडाल बनाकर तीन लोक के आकार का ही यह मण्डल विधान बनाया गया था। २८ नवम्बर, मगसिर वदी अमावस्या से ही यह विधान प्रारंभ हो गया था। एक-दो दिन मुझे मार्ग की थकान विशेष रही पुनः धीरे-धीरे स्वास्थ्य सामान्य हुआ। मैं प्रायः विधान के पांडाल में प्रातः९ बजे जाती थी। कई बार मेरे १०-१५ मिनट प्रवचन हुए थे। सभी लोग आर्यिका चंदनामती से पूजन बुलवाने के लिए आतुर रहते हैं क्योंकि पहले ब्रह्मचारिणी अवस्था में वे यहाँ इन्द्रध्वज विधान व कल्पद्रुम विधान में पूजन पढ़ चुकी थीं अतः लोग प्रतिदिन इनके मुख से पूजन सुनना चाहते थे। लोगों के आग्रह से चंदनामती प्रायः एक घण्टा बोलती थीं। इस विधान में पेज अधिक होने से सभी पूजन जल्दी-जल्दी करानी पड़ती थी।

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अष्टसहस्री ग्रंथ का स्वाध्याय-

मगसिर शु. २, दिनाँक ३० नवम्बर को मैं अतिथिभवन में सभी साधुओं की सभा में बैठी थी। उपाध्याय जी ने प्रश्नोत्तर शुरू किये। अनन्तर चर्चा के मध्य यह बात आई कि ‘‘माताजी यहाँ ठहरेंगी अतः इनसे कुछ अध्ययन-स्वाध्याय आदि किया जावे।’’ आचार्य संघ का विहार यद्यपि १४ दिसम्बर के विधान के अनन्तर १५ दिसम्बर को ही होने वाला था किन्तु अध्ययन के निमित्त से विहार भी स्थगित कर दिया गया पुनः निर्णय यह रहा कि ‘‘अष्टसहस्री ग्रंथ का स्वाध्याय चलाया जावे।’’ मेरे घुटने में दर्द होने से ऊपर सीढ़ी चढ़कर जाना कठिन होने से पूरे संघ ने यहीं गेस्ट हाउस में आने का निर्णय बना लिया।

मगसिर सुदी ३, दिनाँक १ दिसम्बर को प्रातः आचार्य सहित मुनिगण व आर्यिकाएँ गेस्टहाउस में पधार गये। यहाँ संघ के चैत्यालय में जिनेन्द्रदेव का पंचामृत अभिषेक हुआ। पुनः अष्टसहस्री ग्रन्थ का स्वाध्याय शुरू हो गया। उपाध्याय जी आदि अनेक मुनियों को बहुत ही आनन्द आया, बीच-बीच में चर्चायें-शंका-समाधान भी होते रहे। सभी के आग्रह विशेष से मध्यान्ह में ३ बजे से ४.३० बजे तक भी ऊपर अतिथिभवन में अष्टसहस्री का ही स्वाध्याय रखा गया।

५ दिसम्बर को ही मेरे सिर में दर्द शुरू हो गया। तब ६ दिसम्बर से मध्यान्ह का स्वाध्याय बंद करना पड़ा पुनः मगसिर शु. ११, दिनाँक ९ दिसम्बर को तो इतना स्वास्थ्य बिगड़ा कि प्रातः का भी स्वाध्याय बंद करना पड़ा। ११,१२ दिसम्बर को तो बहुत ही गड़बड़ रही, रात्रि में पेट में दर्द होकर अतिसार शुरू हो गये। संघस्थ चंदनामती , क्षुल्लक मोतीसागर आदि चिंतित हो गये। रवीन्द्रकुमार भी हस्तिनापुर से आ गये। मेरठ से हकीम शेफ जी को बुलाया गया.....।

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आचार्य सुमतिसागर जी का ससंघ आगमन-

१२ दिसम्बर को आचार्य सुमतिसागर जी महाराज अपने संघ सहित बड़ौत शहर में आ गये। १३ दिसम्बर को विधान पूर्ण होकर १४ दिसम्बर को प्रातः हवन हुआ। मध्यान्ह में रथयात्रा में वहाँ उपस्थित तीनों संघ साथ-साथ चले, बहुत ही अच्छा लगा। थकान हो जाने से मैं रथयात्रा के बीच से ही वापस आ गई। कुल मिलाकर यह वृहत् विधान का आयोजन अच्छी सफलता से सानन्द सम्पन्न हुआ पुनः १५ दिसम्बर को बड़ौत से तीन बसें हस्तिनापुर यात्रा के लिए गर्इं। प्रायः इस प्रांत में यह परम्परा देखी जाती है कि विधान के बाद लोग हस्तिनापुर की यात्रा अवश्य करते हैं।

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शिक्षिण शिविर-

यहाँ लोगों के आग्रह से १७ दिसम्बर से ७-८ दिन के लिए एक छोटा सा शिक्षण शिविर रखा गया, जिसमें कुन्दकुन्द मणिमाला, सामायिक विधि व ध्यान की कक्षाएँ चलाई गर्इं। दिन में चंदनामती जी कक्षाएँ चलाती थीं एवं रात्रि में क्षुल्लक मोतीसागर जी पढ़ाते थे। प्रातः कक्षा के बाद मैं भी ५-१० मिनट कुछ प्रवचन कर देती थी किन्तु मौसम की अति ठण्डी व वर्षा आदि के निमित्त से शिविर में विशेष आनन्द नहीं आया।

अष्टसहस्री का स्वाध्याय बंद करने के बाद भी लगभग १५ दिन तक मेरे सिर की नसों में दर्द होता रहा, तब मैं सोचने लगी- ‘‘चाकसू-निवाई, जयपुर, टोंक आदि गांवों में सन् १९६९, ७०, ७१ में मैंने ५-६ घण्टे राजवार्तिक, मूल से अष्टसहस्री, जैनेन्द्रप्रक्रिया, गद्यचिंतामणि, यशस्तिलकचंपू आदि विषयों का अध्ययन कराया है और साथ ही प्रातः से लेकर रात्रि १०-११ बजे तक विश्राम न लेकर अध्यापन से समय निकालकर २-३ घंटे तक अष्टसहस्री ग्रंथ का अनुवाद भी करती थी। अपर-रात्रि से लेकर सोने तक अपनी दैनिक चर्या-आवश्यक क्रियायें भी करती थी। प्रायः रात्रि में ४-५ घंटे ही निद्रा लेती थी, तब भी मेरे सिर की नसों में ऐसा दर्द कभी नहीं होता था और अब ५६ वर्ष की उम्र में ही इतनी जल्दी स्वास्थ्य बिगड़ जाता है कि सिर में दर्द होकर घबराहट भी हो जाती है। कभी-कभी तो आँख खोलकर, उठकर बैठना भी कठिन हो जाता है। इस स्थिति में बार-बार रवीन्द्र कुमार भी यही कहने लगे कि- ‘‘माताजी! ४-५ वर्षों से आप आधा घण्टे भी अध्ययन नहीं कराती थीं पुनः डेढ़-डेढ़ घंटे दो बार और फिर इतना क्लिष्ट अष्टसहस्री ग्रंथ? भला आपका मस्तिष्क अब इतना श्रम कैसे झेल सकता था?......’’

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ठण्डी विशेष से विहार स्थगित-

मोदीनगर से सुशील कुमार, सूरजभान आदि अनेक महानुभाव कई बार यहाँ आकर अति आग्रह करके मोदीनगर में इन्द्रध्वज विधान मेरे सानिध्य में करने का निर्णय ले गये थे। १८ जनवरी १९९० से वहाँ के विधान का विचार बनाया गया था अतः मैंने बड़ौत से २७ दिसम्बर को विहार करने के लिए कहा था। इधर २३ दिसम्बर को रात्रि भर वर्षा होती रही, खूब ठण्ड हो गई। तब २४ तारीख को प्रातः नरेशचंद आदि अनेक श्रावक आये, उन लोगों ने अति आग्रह व सत्याग्रह करके मेरे २७ तारीख के विहार का प्रोग्राम स्थगित कराया। तब मैंने २ जनवरी तक रुकने के लिए कह दिया। रविवार के दिन युवा क्रान्तिदल के बालकोें ने बहुत ही उत्साह से कौशल भवन के हॉल में जिनगुणसंपत्ति विधान किया।

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बड़ौत से विहार-

मौसम अनुकूल देखकर गणधराचार्य श्री कुंथुसागर जी के, सर्व मुनियों और आर्यिकाओं के सौहार्दपूर्ण वातावरण में हमने अपने संघ सहित पौष सु. ९, दिनाँक ५ जनवरी १९९० के दिन मध्यान्ह के ३ बजे यहाँ से विहार कर नरेशचंद जैन के आग्रह से उनके कोल्डस्टोर पर ठहरी। ६ जनवरी को वहाँ से विहार कर कच्चे मार्ग से पोयस गांव में पहुँची, यहाँ जैन मंदिर था तथा ४-५ घर भी जैनियों के थे।

यहां ब्र.रवीन्द्र कुमार, अनुपम जैन, जापान के दो अतिथियों के साथ आये। ये जापान के जोबू विश्वविद्यालय के गणित के प्राध्यापक प्रो. योशीमाशा मिचिवाकी एवं उनकी पुत्री कु. मुत्सुको मिचिवाकी थे। ये पहले सन् १९८५ के अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार में जंबूद्वीप पर आ चुके थे।

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अमीनगर सराय प्रवेश-

यहाँ से विहार कर ७ जनवरी को कच्चे रास्ते से चलते हुए सायंकाल अमीनगरसराय पहुँच गई। यहाँ के धनराज जैन ४-५ वर्षों से जंबूद्वीप के सभी कार्यक्रमों के मुहूर्त निकालते हैं, ये अच्छे गुरुभक्त हैं और मेरे भी अनन्य भक्तों में हैं। यहाँ ७ दिन ठहरने का रहा। यहाँ ८ जनवरी के दिन धनराज ने कन्या पाठशाला में प्रवचन कराया। क्षुल्लक मोतीसागर ने, आर्यिका चंदनामती ने अच्छा प्रवचन किया पुनः मैंने आशीर्वाद देते हुए अपना प्रवचन सुनाया। पुनः १० जनवरी के दिन अध्यापिका ब्रजकुमारी की प्रेरणा से वहाँ के इण्टर कालेज में हम लोगों के प्रवचन हुये। यहाँ बहुत से विद्यार्थियों ने अहिंसा प्रधान उपदेश श्रवणकर अपने जीवन को प्रशस्त बनाया। ११ जनवरी, पौष शु. १५ के दिन यहाँ सभा में स्व. आचार्य श्रीधर्मसागर जी महाराज का जन्म-दिवस मनाया गया।

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केशलोंच समारोह-

१२ जनवरी, माघ कृ. १ के दिन मैंने उपवास करके अपने केशलोंच का निर्णय किया था। यहाँ कन्या पाठशाला की बालिकाओं और बैंड-बाजों के साथ मुझे संघ सहित मंदिर के निकट बनाये गये पंडाल में ले गये। वहीं मैने लगभग २ बजे अपना केशलोंच शुरू कर दिया। कन्याओं ने स्वागतगीत, श्री मोतीराम जैन ने भक्ति भजन आदि प्रस्तुत किये। ब्र. रवीन्द्र कुमार , क्षुल्लक मोतीसागर और चंदनामती ने प्रवचन किये। पुनः केशलोंच के बाद मैंने भी प्रवचन करके शुभाशीर्वाद प्रदान किया। इस दिन बड़ौत के व आसपास के श्रावक लोग आ गये थे। १३ जनवरी के दिन मध्यान्ह में मंदिरजी में शांति विधान हुआ। अनेक श्रावक, श्राविकाओं ने विधान किया। लोगों को बहुत ही आनन्द आया। यहाँ की भक्तसमाज चाहती थी कि-‘‘माताजी अभी कम से कम एक माह यहाँ ठहरें’’ किन्तु मोदीनगर में इन्द्रध्वज का निश्चय हो चुका था और यह मेरा विहार भी मोदीनगर के लिए ही हुआ था अतः ठहरने का प्रोग्राम नहीं बन पाया।

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दिल्ली के लिए आग्रह-

१३ जनवरी को दिल्ली से जिनेन्द्रप्रसाद जी ठेकेदार, कैलाशचंद करोलबाग, राजेन्द्रप्रसाद जी (कम्मोजी), मोतीचंद कासलीवाल आदि भक्त श्रावकगण आये थे। इन लोगों ने दिल्ली विहार करने के लिए अथक प्रयास किया किन्तु मैंने स्वीकृति नहीं दी।

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अमीनगर सराय में लाभ-

यहाँ सराय में प्रतिदिन प्रातः उपदेश होता था। २५ से अधिक महिलाओं ने व कई एक पुरुषों ने भी पाँच अणुव्रत ग्रहण किये, परिग्रह का परिमाण लिखकर व्रत लिया। कई एक महिलाओं ने रोहिणी आदि व्रत ग्रहण किये, अच्छी धर्मप्रभावना रही। आर्षपरम्परा से भटक रही अनेक श्राविकाओं ने धूप खेना आदि आगमोक्त विषय समझकर दुराग्रह छोड़कर आर्षग्रंथों के स्वाध्याय का संकल्प किया। प्रतिदिन व केशलोंच के दिन भी यहाँ आगंतुक दर्शनार्थियों के भोजन की व्यवस्था धनराज जैन ने की थी, वे बहुत ही उत्साही रहे थे।

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मोदीनगर की ओर विहार-

१४ जनवरी, माघ वदी ३ को मध्यान्ह में मैंने अमीनगर सराय से विहार कर दिया और शाम को बालेनी गांव में पहुँच गई। यहाँ एक श्रावक का घर है, यह अच्छा बड़ा परिवार है। ये लोग यहाँ जिनेन्द्रदेव के दर्शन से सदा ही वंचित रहते हैं। मैंने इन्हें गृहचैत्यालय बनाने के लिए बहुत प्रेरणा दी किन्तु ये लोग राजी नहीं हुए। मुझे बहुत ही आश्चर्य हुआ।

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गृह चैत्यालय -

वास्तव में दक्षिण में आज भी घर-घर में जिनचैत्यालय है। उत्तर प्रान्त में भी जयपुर राजस्थान में लगभग डेढ़ सौ गृह चैत्यालय होंगे, (आरा-बिहार) में भी अनेक गृह चैत्यालय हैं। शास्त्रों में तो गृहचैत्यालय के लिए प्रमाण मिलते ही हैं। यथा- मथुरा में राजा शत्रुघ्न को श्री सुरमन्यु महामुनि उपदेश देते हुए कहते हैं-हे राजन्!

स्थाप्यंतां जिनबिंबानि, पूजितानि गृहे गृहे।

अभिषेकाः प्रवर्त्यंतां, विधिना पाल्यंतां प्रजाः।।७३।।

घर-घर में जिनप्रतिमाएँ स्थापित की जावें, उनकी पूजाएँ हों, अभिषेक हो और विधिपूर्वक आप लोग प्रजा का पालन करें।.....राजन् ! जिस घर में अंगुष्ठ प्रमाण भी जिनप्रतिमा विराजमान रहेंगी, उस घर में मारी आदि रोगों का प्रकोप नहीं हो सकेगा। जैसे कि सर्पिणी गरुड़ के सामने नहीं आ पाती है। हैदराबाद चातुर्मास में मेरी प्रेरणा से श्रीनन्दलाल जैन ने अपने घर में चैत्यालय बनाया था। वहाँ श्रावकों के घर मंदिरों से दूर-दूर होने से अनेक परिवार प्रतिदिन जिनदर्शन से वंचित रहते थे अतः एक चैत्यालय के हो जाने से कई परिवार नित्य दर्शन का लाभ लेने लगे थे। सनावद चातुर्मास में मेरी प्रेरणा से ऋषभदास जैन कमलाबाई ने, विमलचंद जैन ने एवं श्रीचंद जैन ने अपने-अपने घर में जिनप्रतिमाएँ विराजमान करके चैत्यालय बनाये थे। ये खास कर विधिवत् अभिषेक-पूजा करने के भाव से ही बनाए थे क्योंकि मंदिरों में पंथवाद से थोड़ी पराधीनता रहती है।

इधर दिल्ली में कमलचंद जैन हाथरस वालों ने और जिनेन्द्रप्रसाद जैन ठेकेदार ने वृद्धावस्था में पिता को भगवान के दर्शन होते रहें, इस भावना से गृह-चैत्यालय बनाये हैं। ऐसे ही हस्तिनापुर टाउन में भी अनन्तवीर जैन ने मेरी प्रेरणा से ही जिनचैत्यालय बना लिया है क्योंकि मंदिर जी एक किलोमीटर दूर होने से वे भी सपरिवार यहां दर्शन करने नहीं आ पाते थे।