ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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1-गतिमार्गणाधिकार

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विषय सूची

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अथ महादण्डकनाम द्वादशो महाधिकार:

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मंगलाचरणम्

भुजंगप्रयातछंद:-महावीरवीरं महाधीरधीरं, महालोकलोकं महाबोधबोधं।
महापूज्यपूज्यं महावीर्यवीर्यं, महादेवदेवं महन्तं महामि।।१।।
अत्र त्रिभिरधिकारै: एकोनाशीतिसूत्रैरल्पबहुत्वचूलिकानिरूपणार्थं महादण्डको नाम द्बादशो महाधिकार: कथ्यते। तत्र प्रथमेऽधिकारे मुख्यरूपेण गतिमार्गणायामल्पबहुत्वकथनत्वेन त्रिचत्वारिंशत्सूत्राणि। तदनु द्वितीयेऽधिकारे इंद्रियमार्गणायां विशेषतयाल्पबहुत्वनिरूपणत्वेनाष्टसूत्राणि। तत: परं तृतीयेऽधिकारे कायमार्गणायां प्रमुखत्वेनाष्टाविंशतिसूत्राणीति समुदायपातनिका कथिता भवति।
अथ गतिमार्गणाधिकार:
संप्रति महादण्डककथनप्रतिज्ञापनाय सूत्रमेकमवतरति-
एत्तो सव्वजीवेसु महादंडओ कादव्वो भवदि।।१।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अथाधुना एकादशाधिकारानन्तरं सर्वजीवेषु महादण्डक: कर्तव्य:-प्रतिपादयितव्यो भवति इति श्रीभूतबलिसूरिणा प्रतिज्ञायते।
अथ कश्चिदाह-एकादशानियोगद्वारेषु समाप्तेषु किमर्थमेष महादण्डक: कथयितुमारब्धो भवताचार्येण इति चेत् ?
आचार्यदेव: उच्यते-क्षुद्रकबंधकस्य एकादशानियोगद्वारे निबद्धस्य चूलिकां कृत्वा महादण्डक: कथ्यते।
चूलिका नाम किं ?
एकादशानियोगद्वारेषु सूचितार्थस्य विशेषं कृत्वा प्ररूपणा चूलिका नाम।
यद्येवं तर्हि नैषो महादण्डक: चूलिका, अल्पबहुत्वानियोगद्वारसूचितार्थं मुक्त्वान्यत्रानियोगद्वारेषु कथितार्थानामप्ररूपणात् इति चेत् ?
उच्यते-न चैष नियमोऽस्ति यत् सर्वानियोगद्वारसूचितार्थानां विशेषप्ररूपिका या सा चैव चूलिका भवेदिति, किन्तु एकेन द्वाभ्यां सर्वैर्वानियोगद्वारै: सूचितार्थानां विशेषप्ररूपणा चूलिका भवति। तेनैषो महादण्डकश्चूलिका एव, अल्पबहुत्वसूचितार्थस्य विशेषं कृत्वा प्ररूपणात्।
एवं प्रयोजनसूत्रं प्रतिज्ञासूत्रं वा प्ररूपितं।
अधुना प्रकृतार्थप्ररूपणार्थं सप्तदशसूत्राण्यवतार्यन्ते-
सव्वत्थोवा मणुसपज्जत्ता गब्भोवक्कंतिया।।२।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-गर्भजा मनुष्या: पर्याप्ता: उपरिकथ्यमानराशिमवलोक्य स्तोका: भवन्ति। कुत: ? स्वभावात्।
एते कियन्तो भवन्ति ?
मनुष्याणां चतुर्भागा: सन्ति।
मणुसिणीओ संखेज्जगुणाओ।।३।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अत्र गुणकार:-त्रीणि रूपाणि, मनुष्यगर्भजचतुर्भागेन पर्याप्तद्रव्येण तस्यैव त्रिषु चतुर्भागेषु अपवर्तितेषु त्रिरूपोपलंभात्।
सव्वट्ठसिद्धिविमाणवासियदेवा संखेज्जगुणा।।४।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अत्र गुणकार:-संख्यातसमया:। ‘अत्र केऽपि आचार्या: सप्तरूपाणि, केऽपि पुन: चत्वारि रूपाणि केऽपि सामान्येन संख्यातानि रूपाणि गुणकार’ इति भणन्ति। तेनात्र गुणकारे त्रय: उपदेशा: सन्ति। त्रयाणां मध्ये एकश्चैव जात्योपदेश:-श्रेष्ठोपदेश:, सोऽपि न ज्ञायते, विशिष्टोपदेशाभावात्। तस्मात् त्रयाणामपि संग्रह: कर्तव्य:।
अत्राचार्यदेवेन एकस्य निर्णयमकृत्वा स्वस्य पापभीरुत्वस्य परिचयो दत्त:। एतदुदाहरणं संप्रत्यपि सर्वै: विद्वद्भि: साधुभिश्च गृहीतव्यं।
बादरतेउकाइयपज्जत्ता असंखेज्जगुणा।।५।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-गतिमार्गणामुल्लंघ्य मार्गणान्तरकथनादसंबद्धमिदं सूत्रमिति न वक्तव्यं, अर्पितमार्गणां मुक्त्वान्यमार्गणानामगमनस्य एकादशानियोगद्वारेष्वेवावस्थानात्। अत्र पुन: न स नियमोऽस्ति, सर्वमार्गणाजीवेषु ‘‘महादण्डओ कादव्वो’’ इति अभ्युपगमात्।
अत्र को गुणकार: ?
असंख्याता: प्रतरावलिका:, सर्वार्थसिद्धिदेवै: बादरतेज:पर्याप्तराशौ भागे कृते असंख्यातानां प्रतरावलीनामुपलंभात्।
अणुत्तरविजय-वैजयंत-जयंत-अवराजिदविमाणवासियदेवा असंखेज्ज-गुणा।।६।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अत्र देवविशेषणं, तत्रतनपृथिवीकायिकादिप्रतिषेधार्थं वर्तते।
गुणकार:-पल्योपमस्यासंख्यातभाग: असंख्यातानि पल्योपमप्रथमवर्गमूलानि।
अणुदिसविमाणवासियदेवा संखेज्जगुणा।।७।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-गुणकार:-संख्याता: समया:, मनुष्येभ्योऽनुत्तरेषूत्पद्यमानजीवान् दृष्ट्वा तेभ्यश्चैवानुदिशविमानदेवेषूत्पद्यमानानां जीवानां संख्यातगुणानामुपलंभात्, स्वभावादेव।
उवरिमउवरिमगेवज्जविमाणवासियदेवा संखेज्जगुणा।।८।।
को गुणकार:-संख्याता: समया: सन्ति।
उवरिममज्झिमगेवज्जविमाणवासियदेवा संखेज्जगुणा।।९।।
को गुणकार: ?-संख्यातसमया:।
उवरिमहेट्ठिमगेवज्जविमाणवासियदेवा संखेज्जगुणा।।१०।।
अल्पपुण्यानां जीवानां बहूनां संभवात्।
मज्झिमउवरिमगेवज्जविमाणवासियदेवा संखेज्जगुणा।।११।।
अल्पायुष्काणां जीवानां बहूनामुपलंभात्।
मज्झिममज्झिमगेवज्जविमाणवासियदेवा संखेज्जगुणा।।१२।।
सर्वत्र मंदपुण्यजीवानां बहुत्वोपलंभात्।
मज्झिमहेट्ठिमगेवज्जविमाणवासियदेवा संखेज्जगुणा।।१३।।
मंदतपसां बहूनामुपलंभात्।
हेट्ठिमउवरिमगेवज्जविमाणवासियदेवा संखेज्जगुणा।।१४।।
हेट्ठिममज्झिमगेवज्जविमाणवासियदेवा संखेज्जगुणा।।१५।।
हेट्ठिमहेट्ठिमगेवज्जविमाणवासियदेवा संखेज्जगुणा।।१६।।
आरणच्चुदकप्पवासियदेवा संखेज्जगुणा।।१७।।
आणदपाणदकप्पवासियदेवा संखेज्जगुणा।।१८।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अत्र सर्वत्र गुणकार:-संख्याता: समया: गृहीतव्या:।

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अथ महादण्डक नामक बारहवाँ महाधिकार प्रारंभ

मंगलाचरण

श्लोकार्थ-जो महान् वीर योद्धाओं में भी वीर महावीर हैं, महान धैर्यशाली धीरों में भी धीर हैं, जो लोक और अलोक का अवलोकन करने वाले हैं, महान् ज्ञानवानों में भी ज्ञानवान् केवलज्ञानी हैं, महान गणधर आदि पूज्य पुरुषों में भी पूज्य तीर्थंकर हैं, चक्रवर्ती-राजा आदि महान् शक्तिशाली लोगों से भी अधिक अनन्तवीर्यवान् हैं और जो देवों के भी देव महादेव हैं, उन महान् तीर्थंकर भगवान् महावीर स्वामी की मैं पूजा-वंदना करता हूँ।।१।।

यहाँ तीन अधिकारों में उन्यासी सूत्रों के द्वारा अल्पबहुत्व चूलिका का निरूपण करने हेतु महादण्डक नाम का बारहवाँ महाधिकार कहा जा रहा है। उनमें से प्रथम अधिकार में मुख्यरूप से गतिमार्गणा में अल्पबहुत्व का कथन करने वाले तेंतालिस सूत्र हैं। पुन: द्वितीय अधिकार में इंद्रियमार्गणा में विशेषरूप से अल्पबहुत्व का निरूपण करने हेतु आठ सूत्र हैं। आगे तृतीय अधिकार में कायमार्गणा में प्रमुखरूप से अट्ठाइस सूत्र हैं। यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

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अथ गतिमार्गणा अधिकार

अब महादण्डक के कथन की प्रतिज्ञापना हेतु एक सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

इससे आगे सभी जीवों में महादण्डक करणीय है।।१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अब यहाँ ग्यारह अधिकारों के पश्चात् सभी जीवों में महादण्डक का कथन करना चाहिए, ऐसा श्री भूतबली आचार्य के द्वारा प्रतिज्ञा की गई है।

यहाँ कोई आशंका करता है-ग्यारह अनुयोगद्वारों के समाप्त होने पर इस महादण्डक को कहने का प्रारंभ किसलिए किया जा रहा है ?

आचार्यदेव उक्त शंका का उतर देते हैं-ग्यारह अनुयोगद्वारों में निबद्ध क्षुद्रकबंध की चूलिका करके महादण्डक कहते हैं अर्थात् चूलिका बनाकर उसे महादण्डक कहते हैं।

शंका-चूलिका किसे कहते हैं ?

समाधान-ग्यारह अनुयोगद्वारों में सूचित हुए अर्थ की विशेषता की प्ररूपणा करना चूलिका कही जाती है।

शंका-यदि ऐसा है तो यह महादण्डक चूलिका नहीं हो सकती, क्योंकि यह अल्पबहुत्वानुयोगद्वार से सूचित हुए अर्थ को छोड़कर अन्य अनुयोगद्वारों में कहे गये अर्थोें की प्ररूपणा नहीं करती हैं ?

इसका समाधान करते हैं-कि ऐसा कोई नियम नहीं है कि सर्व अनुयोगद्वारों से सूचित अर्थों की विशेष प्ररूपणा करने वाली ही चूलिका हो किन्तु एक, दो अथवा सब अनुयोगद्वारों से सूचित अर्थों की विशेष प्ररूपणा करना चूलिका है। इसलिए यह महादण्डक अधिकार चूलिका ही है, क्योंकि वह अल्पबहुत्वानुयोगद्वार से सूचित हुए अर्थ की विशेषरूप से प्ररूपणा करने वाली है।

इस प्रकार प्रयोजनसूत्र अथवा प्रतिज्ञासूत्र प्ररूपित किया गया है।

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अब प्रकृत अर्थ का प्ररूपण करने हेतु सत्रह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

गर्भोपक्रांतिक पर्याप्त मनुष्य सबसे स्तोक हैं।।२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीकागर्भज मनुष्य पर्याप्त जीव आगे कही जाने वाली सब राशियों को देखते हुए स्तोक हैं।

ऐसा क्यों है ? क्योंकि ऐसा स्वभाव से है।

शंका-ये गर्भोपक्रान्तिक मनुष्य कितने हैं ?

समाधान-मनुष्यों के चतुर्थ भागप्रमाण गर्भ जन्म लेने वाले मनुष्य होते हैं।

सूत्रार्थ-

पर्याप्त मनुष्यों से मनुष्यिनियाँ संख्यातगुणी हैं।।३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ गुणकार तीन रूप हैं, क्योंकि मनुष्य गर्भोपक्रान्तिकों के चतुर्थ भागप्रमाण पर्याप्त द्रव्य से उसी के तीन चतुर्थ भागों का अपवर्तन करने पर तीन रूप उपलब्ध होते हैं।

सूत्रार्थ-

मनुष्यिनियों से सर्वार्थसिद्धिविमानवासी देव संख्यातगुणे हैं।।४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ गुणकार संख्यात समय है। यहाँ कोई आचार्य सात रूप, कोई चार रूप और कितने ही आचार्य सामान्य से संख्यातरूप गुणकार है, ऐसा कहते हैं। इसलिए यहाँ गुणकार के विषय में तीन उपदेश हैं। तीनों के मध्य में एक ही जात्य-श्रेष्ठ उपदेश है परन्तु वह नहीं जाना जाता है, क्योंकि इस विषय में विशिष्ट उपदेश का अभाव है। इस कारण तीनों का ही संग्रह करना चाहिए।

यहाँ आचार्य ने एक का निर्णय नहीं करके अपनी पापभीरुता का परिचय दिया है। यह उदाहरण आज भी सभी विद्वानों एवं साधुओं को ग्रहण करना चाहिए।

सूत्रार्थ-

बादर तेजस्कायिक पर्याप्त जीव असंख्यातगुणे हैं।।५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-गतिमार्गणा का उल्लंघन कर मार्गणान्तर में जाने से यह सूत्र असंबद्ध है, ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि विवक्षित मार्गणा को छोड़कर अन्य मार्गणाओं में न जाने का नियम ग्यारह अनुयोगद्वारों में ही अवस्थित है। किन्तु यहाँ वह नियम नहीं है, क्योंकि ‘सर्व मार्गणाओं के जीवों में महादण्डक करना चाहिए’, ऐसा स्वीकार किया गया है।

यहाँ गुणकार क्या है ?

असंख्यात प्रतरावलियाँ गुणकार है, क्योंकि सर्वार्थसिद्धिविमानवासी देवों से बादर तेजस्कायिक पर्याप्त राशि के भाजित करने पर असंख्यात प्रतरावलियाँ उपलब्ध होती हैं।

सूत्रार्थ-

अनुत्तरों में विजय, वैजयन्त, जयन्त और अपराजित विमानवासी देव असंख्यातगुणे हैं।।६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ देव विशेषण, वहाँ स्थित पृथिवीकायिकादि जीवों के प्रतिषेधार्थ दिया है।

यहाँ गुणकार पल्योपम के असंख्यातें भाग प्रमाण है जो असंख्यात पल्योपम प्रथम वर्गमूल के बराबर है। अर्थात् यहाँ गुणकार बादर तेजस्कायिक पर्याप्त द्रव्य से गुणित वहाँ के अवहारकाल से अपवर्तित पल्योपम प्रमाण है।

सूत्रार्थ-

अनुदिश विमानवासी देव संख्यातगुणे हैं।।७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ गुणकार संख्यातसमय प्रमाण है, क्योंकि मनुष्यों में से अनुत्तरों में उत्पन्न होने वाले जीवों को देखकर उनमें से ही अनुदिशविमानवासी देवों में उत्पन्न होने वाले जीव संख्यातगुणे पाये जाते हैं, क्योंकि ऐसा स्वभाव से ही है।

सूत्रार्थ-

उपरिम-उपरिमग्रैवेयकविमानवासी देव संख्यातगुणे है।।८।।

टीका-गुणकार क्या है ? संख्यात समय प्रमाण गुणकार है।
उपरिम-मध्यम ग्रैवेयक विमानवासी देव संख्यातगुणे हैं।।९।।
टीका-गुणकार क्या है ? संख्यातसमय गुणकार है।
उपरिम-अधस्तनग्रैवेयकविमानवासी देव संख्यातगुणे हैं।।१०।।
टीका-क्योंकि यहाँ अल्प पुण्य वाले बहुत जीवों की उत्पत्ति संभव है।
उनसे मध्यम उपरिमग्रैवेयक विमानवासी देव संख्यातगुणे हैं।।११।।
टीका-क्योंकि यहाँ अल्पायु वाले बहुत जीव पाए जाते हैं।
उनसे मध्यम-मध्यमग्रैवेयकविमानवासी देव संख्यातगुणे हैं।।१२।।
टीका-क्योंकि सर्वत्र मंद पुण्य वाले जीव बहुत पाए जाते हैं।
उनसे मध्यम अधस्तन ग्रैवेयकविमानवासी देव संख्यतागुणे हैं।।१३।।
टीका-क्योंकि मंद तप वाले बहुत जीव पाए जाते हैं।
उनसे अधस्तन-उपरिमग्रैवेयक विमानवासी देव संख्यातगुणे हैं।।१४।।
उनसे अधस्तन-मध्यमग्रैवेयकविमानवासी देव संख्यातगुणे हैं।।१५।।
उनसे अधस्तन-अधस्तनग्रैवेयकविमानवासी देव संख्यातगुणे हैं।।१६।।
उनसे आरण-अच्युतकल्पवासी देव संख्यातगुणे हैं।।१७।।
उनसे आनत-प्राणतकल्पवासी देव संख्यातगुणे हैं।।१८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ सर्वत्र गुणकार संख्यातसमयप्रमाण ग्रहण करना चाहिए।

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संप्रति नारकेभ्य आरभ्य देवीपर्यन्तानामल्पबहुत्वकथनाय पंचविंशतिसूत्राण्यवतार्यन्ते-

सत्तमाए पुढवीए णेरइया असंखेज्जगुणा।।१९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-को गुणकार: ? जगच्छ्रेण्या: असंख्यातभाग: यस्तु असंख्यानि श्रेणिप्रथमवर्गमूलानि। कुत: ? आनतप्राणतद्रव्येण पल्योपमस्यासंख्यातभागेन श्रेणिद्वितीयवर्गमूलं गुणयित्वा श्रेणिमपवर्तिते गुणकार: उपलभ्यते।
छट्ठीए पुढवीए णेरइया असंखेज्जगुणा।।२०।।
गुणकार:-श्रेणितृतीयवर्गमूलम्।
सदारसहस्सारकप्पवासियदेवा असंखेज्जगुणा।।२१।।
गुणकार:-श्रेणिचतुर्थवर्गमूलं।
सुक्कमहासुक्ककप्पवासियदेवा असंखेज्जगुणा।।२२।।
गुणकार:-श्रेणिपंचमवर्गमूलं।
पंचमपुढवीएणेरइया असंखेज्जगुणा।।२३।।
गुणकार:-श्रेणिषष्ठवर्गमूलं।
लांतवकाविट्ठकप्पवासियदेवा असंखेज्जगुणा।।२४।।
गुणकार:-श्रेणिसप्तमवर्गमूलं।
चउत्थीए पुढवीए णेरइया असंखेज्जगुणा।।२५।।
गुणकार:-श्रेणि-अष्टमवर्गमूलं।
बम्ह-बम्हुत्तरकप्पवासियदेवा असंखेज्जगुणा।।२६।।
गुणकार:-श्रेणिनवमवर्गमूलं।
तदियाए पुढवीए णेरइया असंखेज्जगुणा।।२७।।
गुणकार:-श्रेणिदशमवर्गमूलं।
माहिंदकप्पवासियदेवा असंखेज्जगुणा।।२८।।
गुणकार:-श्रेण्येकादशवर्गमूलस्य संख्यातभाग:।
कश्चिदाह-सनत्कुमारमाहेन्द्रद्रव्यमेकत्रीकृत्य किन्न प्ररूपितम् ?
आचार्य: प्राह-न, यथा पूर्वोक्तयो: द्वयोद्र्वयो: कल्पयोरेक एव स्वामी भवति, तथात्र द्वयो: कल्पयोरेकश्चैव स्वामी न भवतीति ज्ञापनार्थं पृथग् निर्देशात्।
सणक्कुमारकप्पवासियदेवा संखेज्जगुणा।।२९।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-गुणकार: संख्याता: समया:।
कुत: ?
उत्तरदिशं मुक्त्वा शेषासु तिसृषु दिक्षु स्थितश्रेणिबद्ध-प्रकीर्णकनामविमानेषु सर्वेन्द्रकेषु च निवसतां देवानां ग्रहणात्।
विदियाए पुढवीए णेरइया असंखेज्जगुणा।।३०।।
गुणकार: श्रेणिद्वादशवर्गमूलंस्वकसंख्यातभागाभ्यधिकं।
मणुसा अपज्जत्ता असंखेज्जगुणा।।३१।।
गुणकार:-श्रेणिद्वादशवर्गमूलस्यासंख्यातभाग:।
क: प्रतिभाग: ?
मनुष्यापर्याप्तानामवहारकाल: प्रतिभाग:।
ईसाणकप्पवासियदेवा असंखेज्जगुणा।।३२।।
गुणकार: सूच्यंगुलस्य संख्यातभाग:।
देवीओ संखेज्जगुणाओ।।३३।।
गुणकार: संख्याता: समया:। केऽपि आचार्या: द्वात्रिंशद्रूपाणि कथयन्ति। ईशानवासिन्यो देव्यो गृहीतव्या:।
सोधम्मकप्पवासियदेवा संखेज्जगुणा।।३४।।
गुणकार: संख्यातसमया:।
देवीओ संखेज्जगुणाओ।।३५।।
अत्र सौधर्मकल्पवासिन्यो देव्य: गृहीतव्या:। गुणकार: संख्याता: समया: द्वात्रिंशद्रूपाणि वा।
पढमाए पुढवीए णेरइया असंखेज्जगुणा।।३६।।
को गुणकार: ? स्वकसंख्यातभागाभ्यधिकघनांगुलतृतीयवर्गमूलं।
भवणवासियदेवा असंखेज्जगुणा।।३७।।
गुणकार: घनांगुलद्वितीयवर्गमूलस्य संख्यातभाग:।
देवीओ संखेज्जगुणाओ।।३८।।
भवनवासिनीदेव्य: संख्यातगुणा:, संख्यातसमया: द्वात्रिंशद्रूपाणि वा।
पंचिंदियतिरिक्खजोणिणीओ असंखेज्जगुणाओ।।३९।।
गुणकार: श्रेण्या: असंख्यातभागोऽसंख्यातानि श्रेणिप्रथमवर्गमूलानि।
वाणवेंतरदेवा संखेज्जगुणा।।४०।।
गुणकार:-संख्यातसमया:। एतस्मात् सूत्रात् जीवस्थानद्रव्यव्याख्यानं न घटते इति ज्ञायते।
देवीओ संखेज्जगुणाओ।।४१।।
वानव्यन्तरदेव्य: संख्यातगुणा:। गुणकार: संख्यातसमया: द्वात्रिंशद्रूपाणि वा।
जोदिसियदेवा संखेज्जगुणा।।४२।।
गुणकार: संख्यातसमया:।
देवीओ संखेज्जगुणाओ।।४३।।
ज्योतिष्कवासिनीदेव्य: संख्यातगुणा: सन्ति। अत्रापि गुणकार: संख्यातसमया: द्वात्रिंशद् रूपाणि वा ज्ञातव्या भवति।
तात्पर्यमेतत्-अत्राल्पबहुत्वनिरूपणे मनुष्या: पर्याप्ता: सर्वस्तोका: सर्वेभ्योऽधिका: ज्योतिष्कदेव्यो सन्ति। अग्रे चतुरिन्द्रियादयोऽपि अधिका अधिका: उच्यन्ते। एतज्ज्ञात्वा मनुष्यपर्यायस्य दुर्लभत्वं निश्चित्य च सम्यग्दर्शनरत्नं संप्राप्य जिनागममभ्यस्य सम्यग्ज्ञानमाराधनीयं पुनश्च सम्यक्चारित्रमवलम्ब्य संसारसमुद्रतरणाय पुरुषार्थो विधेय:।
एवं गतिमार्गणाप्रमुखत्वेनाल्पबहुत्वकथनत्वेन त्रिचत्वारिंशत्सूत्राणि गतानि।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखंडे महादण्डकनाम-द्वादशे महाधिकारे
गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धान्तचिंतामणिटीकायां गतिमार्गणायाल्पबहुत्व-
निरूपकोऽयं प्रथमोऽधिकार: समाप्त:।

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अब नारकियों से आरंभ करके देवी पर्यन्त का अल्पबहुत्व बतलाने हेतु पच्चीस सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

सप्तम पृथिवी के नारकी असंख्यातगुणे हैं।।१९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ गुणकार क्या है ? जगत्श्रेणी के असंख्यातवें भाग प्रमाण गुणकार है, जो जगत्श्रेणी के असंख्यात प्रथम वर्गमूल प्रमाण है।

ऐसा क्यों है ?

क्योंकि, आनत, प्राणत कल्प के पल्योपम के असंख्यातवें भाग प्रमाण द्रव्य से जगत्श्रेणी के द्वितीय वर्गमूल को गुणित करके उससे जगत्श्रेणी को अपवर्तित करने पर उक्त गुणकार उपलब्ध होता है।

सूत्रार्थ-

उनसे छठी पृथिवी के नारकी असंख्यातगुणे हैं।।२०।।

यहाँ गुणकार श्रेणी के तृतीय वर्गमूल प्रमाण है।
उनसे शतार-सहस्रार कल्पवासी देव असंख्यातगुणे हैं।।२१।।
यहाँ गुणकार श्रेणी के चतुर्थ वर्गमूल प्रमाण है।
उनसे शुक्र-महाशुक्र कल्पवासी देव असंख्यतागुणे हैं।।२२।।
यहाँ गुणकार श्रेणी के पाँचवें वर्गमूल प्रमाण है।
उनसे पंचम पृथिवी के नारकी असंख्यातगुणे हैं।।२३।।
यहाँ गुणकार श्रेणी के छठे वर्गमूल प्रमाण है।
उनसे लान्तव-कापिष्ठकल्पवासी देव असंख्यातगुणे हैं।।२४।।
यहाँ गुणकार श्रेणी के सातवें वर्गमूल प्रमाण है।
उनसे चतुर्थ पृथिवी के नारकी असंख्यातगुणे हैं।।२५।।
यहाँ गुणकार श्रेणी के आठवें वर्गमूल प्रमाण है।
उनसे ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर कल्पवासी देव असंख्यातगुणे हैं।।२६।।
यहाँ गुणकार श्रेणी के नवमें वर्गमूल प्रमाण है।
उनसे तृतीय पृथिवी के नारकी असंख्यातगुणे हैं।।२७।।
यहाँ गुणकार श्रेणी के दशवें वर्गमूल प्रमाण है।
उनसे माहेन्द्रकल्पवासी देव असंख्यातगुणे हैं।।२८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ गुणकार जगत्श्रेणी के ग्यारहवें वर्गमूल का संख्यातवाँ भाग है। यहाँ कोई शंका करता है-सानत्कुमार और माहेन्द्र कल्प के द्रव्य को इकट्ठा करके क्यों नहीं कहा ? तब आचार्य समाधान देते हैं-नहीं, जिस प्रकार पूर्वोक्त दो-दो कल्पों का एक ही स्वामी होता है, उस प्रकार से यहाँ दो कल्पों का एक ही स्वामी नहीं होता है, इस बात के ज्ञापनार्थ पृथक निर्देश किया है।

सूत्रार्थ-

उनसे सानत्कुमार कल्पवासी देव संख्यातगुणे हैं।।२९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ गुणकार संख्यातसमय है।

कैसे ? क्योंकि उत्तर दिशा को छोड़कर शेष तीन दिशाओं में स्थित श्रेणीबद्ध और प्रकीर्णक नाम के विमानों में तथा सब इन्द्रक विमानों में रहने वाले देवों का यहाँ ग्रहण किया गया है।

सूत्रार्थ-

उनसे द्वितीय पृथिवी के नारकी असंख्यातगुणे है।।३०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ गुणकार अपने संख्यातवें भाग से अधिक जगत्श्रेणी का बारहवाँ वर्गमूल प्रमाण है।

सूत्रार्थ-

उनसे अपर्याप्त मनुष्य असंख्यातगुणे हैं।।३१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ गुणकार जगत्श्रेणी के बारहवें वर्गमूल का असंख्यातवाँ भाग हैं। प्रतिभाग क्या है ?

यहाँ मनुष्य अपर्याप्तों का अवहारकाल प्रतिभाग है।

उनसे ईशानकल्पवासी देव असंख्यातगुणे हैं।।३२।।

यहाँ गुणकार सूच्यंगुल का संख्यातवाँ भाग है।

उनसे ईशानकल्पवासिनी देवियाँ संख्यातगुणी हैं।।३३।।

टीका-यहाँ गुणकार संख्यात समय है कुछ आचार्य गुणकार को बत्तीस रूप कहते हैं। ईशान स्वर्ग की देवियों को भी यहाँ ग्रहण करना चाहिए।

उनसे सौधर्म कल्पवासी देव संख्यातगुणे हैं।।३४।।

यहाँ गुणकार संख्यात समय है।

उनसे सौधर्मकल्पवासिनी देवियाँ संख्यातगुणी हैं।।३५।।

यहाँ सौधर्म कल्प में निवास करने वाली देवियों को ग्रहण करना चाहिए। यहाँ गुणकार संख्यातसमय है अथवा बत्तीसरूप है।

उनसे प्रथम पृथिवी के नारकी असंख्यातगुणे हैं।।३६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-गुणकार क्या है ? अपने संख्यातवें भाग से अधिक घनांगुल का तृतीय वर्गमूल यहाँ गुणकार है।

उनसे भवनवासी देव असंख्यातगुणे हैं।।३७।।


यहाँ गुणकार घनांगुल द्वितीय वर्गमूल का संख्यातवाँ भाग हैं।

उनसे भवनवासिनी देवियाँ संख्यातगुणी हैं।।३८।।

यहाँ भवनवासिनी देवियाँ संख्यातगुणी हैं, यहाँ गुणकार संख्यातसमय अथवा बत्तीसरूप है।

उनसे पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिनी असंख्यातगुणी हैं।।३९।।

यहाँ गुणकार जगत्श्रेणी के असंख्यातवें भाग प्रमाण है, जो कि श्रेणी के प्रथम वर्गमूल प्रमाण असंख्यात हैं।

उनसे वानव्यन्तर देव संख्यातगुणे हैं।।४०।।

यहाँ गुणकार संख्यात समय है। इस सूत्र से जीवस्थान का द्रव्यव्याख्यान नहीं घटित होता है, ऐसा जाना जाता है।

उनसे वानव्यंतर देवियाँ संख्यातगुणी है।।४१।।

यहाँ वानव्यन्तर जाति की देवियाँ संख्यातगुणी होती हैं, ऐसा जानना चाहिए। यहाँ गुणकार संख्यातसमय अथवा बत्तिसरूप है।

उनसे ज्योतिषी देव संख्यातगुणे हैं।।४२।।

यहाँ गुणकार संख्यातसमयप्रमाण है।

उनसे ज्योतिषी देवियाँ संख्यातगुणी हैं।।४३।।

यहाँ ज्योतिष्कवासी देवियाँ संख्यातगुणी हैं, ऐसा जानना चाहिए। यहाँ भी गुणकार संख्यातसमय अथवा बत्तिसरूप जानना चाहिए।

तात्पर्य यह है कि-अल्पबहुत्व के निरूपण में पर्याप्त मनुष्य सबसे स्तोक-कम हैं और सबसे अधिक ज्योतिषी देवियाँ हैं, आगे चार इन्द्रिय आदि जीव भी अधिक-अधिक कहे हैं। ऐसा जानकर मनुष्य पर्याय की दुर्लभता को समझकर सम्यग्दर्शनरूपी रत्न को प्राप्त करके जिनशास्त्रों का अभ्यास-स्वाध्याय-अध्ययन करते हुए सम्यग्ज्ञान की आराधना करना चाहिए, पुनश्च सम्यक्चारित्र का अवलम्बन लेकर संसारसमुद्र को तिरने का पुरुषार्थ करना चाहिए।

इस प्रकार गतिमार्गणा की प्रमुखता से अल्पबहुत्व का कथन करने वाले तेंतालिस सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में महादण्डक नाम के बारहवें महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्त-चिंतामणिटीका में गतिमार्गणा में अल्पबहुत्व का निरूपण करने वाला प्रथम अधिकार समाप्त हुआ।