ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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1. चौदह मार्गणाओं में भागाभाग की प्ररूपणा

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चौदह मार्गणाओं में भागाभाग की प्ररूपणा

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अथ भागाभागानुगमो दशमो महाधिकार:

मंगलाचरणम्
उत्सर्पिण्यवसर्पिण्योऽनन्तातीतासु येऽत्र वै।
तीर्थंकरा मुनीन्द्राश्चा-नन्ता मुक्ता नमामि तान्।।१।।
चतुर्गत्यादिचतुर्दशमार्गणारहिता ये त्रैकालिकसिद्धा भगवन्तस्तान् सर्वान् वंदामहे वयम् सिद्धपद-प्राप्तुकामा: सन्ततम्।
अथ षड्भि: अधिकारै: गत्यादिमार्गणासु अष्टाशीति सूत्रै: भागाभागानुगमो नाम दशमो महाधिकार: प्रारभ्यते। तत्र तावत् प्रथमेऽधिकारे गतिमार्गणायां भागाभागकथनत्वेन ‘‘भागाभागानुगमेण’’ इत्यादिना दश सूत्राणि। तदनु द्वितीयेधिकारे इन्द्रियमार्गणायां भागाभागनिरूपणत्वेन ‘‘इंदियाणुवादेण’’ इत्यादिना द्वादश सूत्राणि। तत: परं तृतीयेऽधिकारे कायमार्गणायां भागाभागनिरूपणत्वेन ‘‘कायाणुवादेण’’ इत्यादिना द्वादशसूत्राणि। तत्पश्चात् चतुर्थेधिकारे योगमार्गणायां भागाभागप्रतिपादनत्वेन ‘‘जोगाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रदशकं। ततश्च पंचमेऽधिकारे वेद-कषाय-ज्ञान-संयम-मार्गणासु भागाभागकथनपरत्वेन ‘‘वेदाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रअष्टादश। तत: पुन: षष्ठेऽधिकारे दर्शन-लेश्या-भव्य-सम्यक्त्व संज्ञि-आहारमार्गणासु भागाभागकथनत्वेन ‘‘दंसणाणुवादेण’’ इत्यादि-षड्विंशतिसूत्राणि, इति समुदायपातनिका सूचिता भवति।

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अथ भागाभागानुगम नामक दशवाँ महाधिकार प्रारंभ

मंगलाचरण

श्लोकार्थ-अनन्त उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी कालों में जो यहाँ अतीत-भूतकाल के अनन्तानन्त तीर्थंकर और मुनिगण मोक्ष को प्राप्त हुए हैं, उन सभी को मेरा नमस्कार है।।१।।

चतुर्गति आदि चौदह मार्गणाओं से रहित जो त्रैकालिक सिद्ध भगवान हैं, उन सभी को हम सिद्धपद प्राप्ति की इच्छा से सतत नमस्कार करते हैं। अब चौदह अधिकारों में गति आदि मार्गणाओं में अट्ठासी (८८) सूत्रों के द्वारा भागाभागानुगम नाम का दशवाँ महाधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथम अधिकार में गति मार्गणा में भागाभाग का कथन करने वाले ‘‘भागाभागानुगमेण’’ इत्यादि दश सूत्र हैं। उसके बाद द्वितीय अधिकार में इन्द्रियमार्गणा में भागाभाग के निरूपण हेतु ‘‘इंदियाणुवादेण’’ इत्यादि बारह सूत्र हैं। पुन: तृतीय अधिकार में कायमार्गणा में भागाभाग को निरूपित करने वाले ‘‘कायाणुवादेण’’ इत्यादि बारह सूत्र हैं। तत्पश्चात् चतुर्थ अधिकार में योगमार्गणा में भागाभाग का प्रतिपादन करने वाले ‘‘जोगाणुवादेण’’ इत्यादि दश सूत्र हैं। आगे पंचम अधिकार में वेद-कषाय-ज्ञान और संयममार्गणा में भागाभाग का कथन करने वाले ‘‘वेदाणुवादेण’’ इत्यादि अठारह सूत्र हैं उसके बाद छठे अधिकार में दर्शन-लेश्या-भव्य-सम्यक्त्व-संज्ञी और आहारमार्गणा में भागाभाग का कथन करने हेतु ‘‘दंसणाणुवादेण’’ छब्बीस सूत्र हैं। यह महाधिकार के प्रारंभ में सूत्रों की समुदायपातनिका सूचित की गई है।

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अथ गतिमार्गणाधिकार:

अधुना गतिमार्गणायां चातुर्गतिकजीवानां भागाभागनिरूपणाय दशसूत्राण्यवतार्यन्ते-

भागाभागाणुगमेण गदियाणुवादेण णिरयगदीए णेरइया सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।१।।
अणंतभागो।।२।।
एवं सत्तसु पुढवीसु णेरइया।।३।।
तिरिक्खगदीए तिरिक्खा सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।४।।
अणंता भागा।।५।।
पंचिंदियतिरिक्खा पंचिंदियतिरिक्खपज्जत्ता पंचिंदियतिरिक्खजोणिणी पंचिंदियतिरिक्खअपज्जत्ता, मणुसगदीए मणुसा मणुसपज्जत्ता मणुसिणी मणुसअपज्जत्ता सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।६।।
अणंतभागो।।७।।
देवगदीए देवा सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।८।।
अणंतभागो।।९।।
एवं भवणवासियप्पहुडि जाव सव्वट्ठसिद्धिविमाणवासियदेवा।।१०।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-भागाभागस्यार्थ उच्यते-अनन्तभाग-असंख्यातभाग-संख्यातभागाहाराणं भागसंज्ञा अस्ति, अनन्तस्य बहुभागा: असंख्यातस्य बहुभागा: संख्यातस्य बहुभागा एतेषां अभागसंज्ञा। भागश्च अभागश्च ‘‘भागाभागा:’ तेषामनुगमो भागाभागानुगम: तेन भागाभागानुगमेनात्राधिकार इति भणितं भवति।
सूत्रे सर्वजीवानां कियद्भागप्रमाणं नरकगतौ नारका: निरंतरं वसंतीति पृच्छा कृता भवति।
किमनन्तिमभाग: किमनन्तस्य बहुभागा: किमसंख्यातबहुभागा: किमसंख्यातभाग: किं संख्यातभाग: किं संख्यातबहुभागा: इति प्रश्ने सति तन्निर्णयार्थमुत्तरसूत्रं भणितम्-
नरकगतौ नारका: अनन्तभागप्रमाण: सर्वजीवानामिति।
तत्कथमिति चेत् ?
घनांगुलद्वितीयवर्गमूलमात्रश्रेणिप्रमाणै: नारकै: सर्वजीवराशौ भागे कृते अनन्तानि सर्वजीवराशि-प्रथमवर्गमूलानि आगच्छंति। लब्धं विरलय्य सर्वजीवराशिं समखण्डं कृत्वा रूपं प्रति दत्ते तत्र एकरूपधरितं नारकराशिप्रमाणं भवति तेन नारका: सर्वजीवानामनन्तभाग इत्युक्तं भवति।
एवं सप्तसु पृथिवीषु नारका: सन्ति।
तिर्यञ्च: सर्वजीवानां किमनन्तिमभाग: इत्यादिषड्विकल्पेषु एकस्यैव ग्रहणार्थमुत्तरसूत्रं भणितं-
सामान्येन तिर्यञ्च: सर्वजीवानां अनन्तबहुभागप्रमाणा: सन्ति। तद्यथा-सिद्धै: शेषत्रिगतिस्थितजीवैश्च सर्वजीवराशिमपवत्र्य लब्धं विरलय्य सर्वजीवराशिं समखण्डं कृत्वा रूपं प्रति दत्ते एकरूपधरितं सिद्धजीव-त्रिगतिजीवप्रमाणं भवति। तत्र एकरूपधरितं मुक्त्वा शेषबहुभागा येन तिरश्चां प्रमाणं भवति तेन तिर्यञ्च: सर्वजीवानामनन्तबहुभागा सन्ति।
पंचेन्द्रियतिर्यञ्च: पंचेन्द्रियतिर्यक्पर्याप्ता: पंचेन्द्रियतिर्यग्योनिमत्य: पंचेन्द्रियतिर्यगपर्याप्ताश्चतुर्विधा:, मनुष्यगतौ सामान्यमनुष्या: पर्याप्तमनुष्या: मानुषिन्य: लब्ध्यपर्याप्तमनुष्याश्चतुर्विधा: इमे अष्टविधा: अपि जीवा: सर्वजीवराशीनामनन्तभागप्रमाणा: सन्ति।
देवगतौ देवा: सर्वजीवानामनन्तभागप्रमाणा: सन्ति। एवं भवनवासिदेवादारभ्य सर्वार्थसिद्धिविमान-वासिदेवपर्यन्ता: सर्वजीवराशेरनन्तभागा एवेति ज्ञातव्यं।
एवं गतिमार्गणायां भागाभागकथनत्वेन दश सूत्राणि गतानि।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे भागाभागानुगमनाम-महाधिकारे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धान्तचिंतामणिटीकायां गतिमार्गणानाम प्रथमोऽधिकार: समाप्त:।

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गतिमार्गणाधिकार:

अब गतिमार्गणा में चारों गतियों के जीवों का भागाभाग निरूपण करने हेतु दश सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

भागाभागानुगम में गतिमार्गणा के अनुसार नरकगति में नारकी जीव सर्वजीवों की अपेक्षा कितने भागप्रमाण हैं ?।।१।।

नरकगति में नारकी जीव सब जीवों के अनन्तवें भाग प्रमाण हैं।।२।।

इसी प्रकार सातों पृथिवियों में नारकी जीव सर्व जीव राशि के अनन्तवें भाग प्रमाण हैं।।३।।

तिर्यंचगति में तिर्यंच जीव सर्व जीवों के कितने भाग प्रमाण हैं ?।।४।।

तिर्यंच जीव सब जीवों के अनन्त बहुभाग प्रमाण हैं।।५।।

पंचेन्द्रिय तिर्यंच, पंचेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त, पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिमती और पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपर्याप्त जीव तथा मनुष्यगति में मनुष्य, मनुष्य पर्याप्त, मनुष्यिनी और मनुष्य अपर्याप्त जीव सर्व जीवों के कितने भाग प्रमाण हैं ?।।६।।

उक्त जीव सर्व जीवों के अनन्तवें भाग प्रमाण हैं।।७।।

देवगति में देव सब जीवों के कितने भाग प्रमाण हैं ?।।८।।

देव सब जीवों के अनन्तवें भाग प्रमाण हैं।।९।।

इसी प्रकार भवनवासियों से लेकर सर्वार्थसिद्धिविमानवासी देवों तक भागाभाग कम है।।१०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ सर्वप्रथम भागाभाग का अर्थ कहते हैं-अनन्तवाँ भाग, असंख्यातवाँ भाग और संख्यातवाँ भाग, भागहारों की ‘भाग’ संज्ञा है तथा अनन्त का बहुभाग, असंख्यात का बहुभाग और संख्यात का बहुभाग इनकी ‘अभाग’ संज्ञा है। ‘भाग और अभाग’ इस प्रकार द्वन्द समास होकर भागाभाग पद बना है। उन भागाभागों का जो अनुगम अर्थात् ज्ञान है, इसी भागाभागानुगम से यहाँ भागाभागानुगम नाम का अधिकार कहा गया है।

सूत्र में ‘सर्वजीवों के कितने भाग प्रमाण नारकी नरकगति में निरन्तर रहते हैं’ यह प्रश्न किया गया है। क्या अनन्तवें भाग, क्या अनन्त का बहुभाग, क्या असंख्यात का बहुभाग, क्या असंख्यातवें भाग का संख्यातवें भाग और क्या संख्यात का बहुभाग प्रमाण नारकी जीव वहाँ रहते हैं ? ऐसा पूछने पर उसके निर्णयार्थ उत्तर सूत्र कहा है-

नरकगति में नारकी जीव सभी जीवों के अनन्तवें भागप्रमाण हैं।

प्रश्न-वह कैसे है ?

उत्तर-घनांगुल के द्वितीय वर्गमूल से गुणित जगश्रेणीप्रमाण नारकियों का सर्व जीवराशि में भाग देने पर अनन्त सर्वजीवराशि के प्रथम वर्गमूल प्रमाण आते हैं। लब्धराशि का विरलन करके सर्वजीवराशि को समखण्ड कर प्रत्येक एक के प्रति देने पर उसमें एकरूप के प्रति जितनी राशि प्राप्त हो तत्प्रमाण राशि नारकियों का प्रमाण होती है। इस कारण ‘नारकी जीव सर्वराशि के अनन्तवें भाग प्रमाण हैं’ ऐसा कहा गया है।

इसी प्रमाण से सातों पृथिवियों में नारकी हैं।

तिर्यंच जीव क्या समस्त जीवों के अनन्तिम-अनन्तवें भागप्रमाण हैं ? इत्यादि छह विकल्पों में से एक के ही ग्रहण करने हेतु उत्तर सूत्र कहा है-सामान्य से तिर्यंच जीव सभी जीवों के अनन्त बहुभाग प्रमाण हैं। वह कथन इस प्रकार है-सिद्ध और तीन गतियों के जीवों से सर्वजीव राशि को अपवर्तित कर जो लब्ध आवे उसका विरलन करके सर्व जीवराशि को समखण्ड करके एक-एक के प्रति समान खंड करके देने पर एकरूप प्राप्त सिद्ध और तीन गतियों के जीवों का प्रमाण होता है। उसमें एकरूपधरित राशि को छोड़कर शेष बहुभाग जिस हेतु से तिर्यंचों का प्रमाण होता है, उसी हेतु से तिर्यंच सर्व जीवों के अनन्त बहुभागप्रमाण हैं’, ऐसा जानना चाहिए।

पंचेन्द्रिय तिर्यंच, पंचेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त, पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिमती, पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपर्याप्त ये चार प्रकार के तिर्यंच जीव तथा मनुष्यगति में सामान्य मनुष्य, पर्याप्त मनुष्य, मनुष्यिनी एवं लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्य ये आठों प्रकार के जीव सर्वजीवराशि के अनन्तवें भाग प्रमाण हैं।

देवगति में देव सर्वजीवराशि के अनन्तवें भाग प्रमाण हैं। इस प्रकार भवनवासी देवों से लेकर सर्वार्थसिद्धि विमानवासी देवों तक सर्वजीवराशि के अनन्तवें भागप्रमाण ही हैं, ऐसा जानना चाहिए।

इस प्रकार गतिमार्गणा में भागाभाग का कथन करने वाले दश सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में भागाभागानुगम नाम के महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में गतिमार्गणा नाम का प्रथम अधिकार समाप्त हुआ।

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अथ इन्द्रियमार्गणाधिकार:

इदानीमिन्द्रियमार्गणायां भागाभागनिरूपणाय द्वादशसूत्राण्यवतार्यन्ते-

इंदियाणुवादेण एइंदिया सव्वजीवाणं केवडिओ भागो।।११।।
अणंता भागा।।१२।।
बादरेइंदिया तस्सेव पज्जत्ता अपज्जत्ता सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।१३।।
असंखेज्जदिभागो।।१४।।
सुहुमेइंदिया सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।१५।।
असंखेज्जा भागा।।१६।।
सुहुमेइंदियपज्जत्ता सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।१७।।
संखेज्जा भागा।।१८।।
सुहुमेइंदियअपज्जत्ता सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।१९।।
संखेज्जदिभागो।।२०।।
बीइंदिय-तीइंदिय-चउरिंदिय-पंचिंदिया तस्सेव पज्जत्ता अपज्जत्ता सव्वजीवाणं केवडिओ भागो।।२१।।
अणंतो भागो।।२२।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सामान्येन एकेन्द्रिया: जीवा: सिद्धराशि-त्रसजीवराशिभि: सर्वजीवराशिमपहृत्य लब्धशलाकामात्रसर्वजीवराशिं खण्डयित्वा तत्र एकभागं मुक्तवा शेषबहुभागेषु गृहीतेषु येनैकेन्द्रियप्रमाणं भवति तेन सर्वजीवानामनन्तबहुभागा एकेन्द्रिया भवन्तीति सूत्रे कथितं।
बादरैकेन्द्रिया: पर्याप्ता अपर्याप्ताश्च सर्वजीवेभ्योऽसंख्यातभागप्रमाणा: सन्ति। विवक्षितबादरैकेन्द्रियै: सर्वजीवराशिमपवर्तिते असंख्याता लोका आगच्छन्ति। तान् विरलय्य सर्वजीवराशिं रूपं प्रति समखण्डं कृत्वा दत्ते इच्छितबादरैकेन्द्रियप्रमाणं भवति। तस्मात् त्रयोऽपि बादरैकेन्द्रिया: सर्वजीवानामसंख्यातभागमात्रा: प्ररूपिता:।
सूक्ष्मैकेन्द्रिया: सामान्येन सर्वजीवानामसंख्यातबहुभागप्रमाणा: सन्ति। सूक्ष्मैकेन्द्रियपर्याप्ता: सर्वजीवानां संख्यातबहुभागा:, सूक्ष्मैकेन्द्रियापर्याप्ताश्च सर्वजीवानां संख्यातभागप्रमाणा एव।
द्वीन्द्रियादिपंचेन्द्रियपर्यन्ता: तेषां पर्याप्ता अपर्याप्ताश्चेमे द्वादशधा जीवा: सर्वजीवराशेरनन्तभागप्रमाणा: सन्ति।
कुत: ?
जगत्प्रतरस्यासंख्यातभागमात्रजीवै: सर्वजीवराशौ भागे कृते तत्रोपलब्धस्यानन्त्यात्।
एवं इंद्रियमार्गणायां भागाभागनिरूपणत्वेन द्वादश सूत्राणि गतानि।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे भागाभागानुगमनाम-महाधिकारे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धान्तचिंतामणिटीकायां इन्द्रियमार्गणानाम द्वितीयोऽधिकार: समाप्त:।

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अथ इन्द्रियमार्गणा अधिकार

अब इन्द्रियमार्गणा में भागाभाग का निरूपण करने हेतु बारह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

इन्द्रियमार्गणा के अनुसार एकेन्द्रिय जीव सर्वजीवों के कितने भागप्रमाण हैं ?।।११।।

एकेन्द्रिय जीव सर्व जीवों के अनन्त बहुभाग प्रमाण हैं।।१२।।

बादर एकेन्द्रिय जीव और उनके ही पर्याप्त व अपर्याप्त जीव सर्व जीवों के कितने भाग प्रमाण हैं ?।।१३।।

उक्त जीव सर्व जीवों के असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं।।१४।।

सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीव सर्व जीवों के कितने भाग प्रमाण हैं ?।।१५।।

सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीव सर्व जीवों के असंख्यात बहुभागप्रमाण हैं।।१६।।

सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्याप्त जीव सर्व जीवों के कितने भाग प्रमाण हैं ?।।१७।।

सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्याप्त जीव सर्व जीवों के संख्यात बहुभाग प्रमाण हैं।।१८।।

सूक्ष्म एकेन्द्रिय अपर्याप्त जीव सर्व जीवों के कितने भाग प्रमाण हैं ?।।१९।।

सूक्ष्म एकेन्द्रिय अपर्याप्त जीव सर्व जीवों के संख्यातवें भाग प्रमाण हैं।।२०।।

द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, पंचेन्द्रिय और उन्हीं के पर्याप्त व अपर्याप्त जीव सर्व जीवों के कितने भाग प्रमाण हैं ?।।२१।।

पूर्वोक्त द्वीन्द्रियादि जीव सर्व जीवों के अनन्तवें भाग प्रमाण हैं।।२२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सामान्य से एकेन्द्रिय जीव सिद्धराशि और त्रस जीवों की राशि से सर्वजीवराशि को अपहृत करके लब्ध शलाका प्रमाण सर्व जीवराशि को खण्डित करके उनमें एक भाग को छोड़कर शेष बहुभागों के ग्रहण करने पर चूँकि एकेन्द्रिय जीवों का प्रमाण होता है, इसलिए सर्व जीवों के अनन्त बहुभाग प्रमाण एकेन्द्रिय जीव होते हैं, ऐसा सूत्र में कहा है।

बादर एकेन्द्रिय पर्याप्त और अपर्याप्त जीव सभी जीवों से असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं। विवक्षित बादर एकेन्द्रियों से सर्व जीवराशि को अपवर्तित करने पर असंख्यात लोक आते हैं। उनका विरलन कर सर्व जीवराशि को रूप के प्रति समखण्ड करके देने पर इच्छित बादर एकेन्द्रियों का प्रमाण होता है। उसमें तीनों ही बादर एकेन्द्रिय जीव सर्व जीवों के असंख्यातवें भागमात्र कहे गये हैं।

सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीव सामान्य से सर्व जीवों से असंख्यात बहुभागप्रमाण हैं। सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्याप्त जीव सर्वजीवों के संख्यातबहुभागप्रमाण हैं, सूक्ष्म एकेन्द्रिय अपर्याप्त जीव सर्व जीवों के संख्यातवें भाग प्रमाण हैं।

दो इन्द्रिय से पंचेन्द्रिय पर्यन्त जीव और उनके पर्याप्त-अपर्याप्तक भेदों से बारह प्रकार के जीव सर्वजीवराशि के अनन्तवें भाग प्रमाण हैं। कैसे ?

जगत् प्रतर के असंख्यातवें भाग मात्र जीवों से सर्वजीवराशि में भाग देने पर वहाँ जो राशि उपलब्ध होती है, वह अनन्त है।

इस प्रकार से इन्द्रियमार्गणा में भागाभाग का निरूपण करने वाले बारह सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में भागाभागानुगम महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में इन्द्रियमार्गणा नाम का द्वितीय अधिकार समाप्त हुआ।

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अथ कायमार्गणाधिकार:

कायमार्गणायां भागाभागप्रतिपादनाय द्वादशसूत्राण्यवतार्यन्ते-

कायाणुवादेण पुढविकाइया आउकाइया तेउकाइया वाउकाइया बादरा सुहुमा पज्जत्ता अपज्जत्ता बादरवणप्फदिकाइयपत्तेयसरीरा पज्जत्ता अपज्जत्ता तसकाइया तसकाइयपज्जत्ता अपज्जत्ता सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।२३।।
अणंतभागो।।२४।।
वणप्फदिकाइया णिगोदजीवा सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।२५।।
अणंता भागा।।२६।।
बादरवणप्फदिकाइया बादरणिगोदजीवा पज्जत्ता अपज्जत्ता सव्वजी-वाणं केवडिओ भागो ?।।२७।।
असंखेज्जदिभागो।।२८।।
सुहुमवणप्फदिकाइया सुहुमणिगोदजीवा सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।२९।।
असंखेज्जा भागा।।३०।।
सुहुमवणप्फदिकाइय-सुहुमणिगोदजीवपज्जत्ता सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।३१।।
संखेज्जा भागा।।३२।।
सुहुमवणफ्फदिकाइय-सुहुमणिगोदजीवअपज्जत्ता सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।३३।।
संखेज्जदिभागो।।३४।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-पृथिवी-जल-अग्नि-वायुकायिका: चतुर्विधा: इमे प्रत्येकं नवनवविधा: सर्वे मिलित्वा षट्त्रिंशद्विधा: सन्ति। बादरवनस्पतिप्रत्येकशरीरा सामान्येन पर्याप्तापर्याप्तभेदेन त्रिविधा:। त्रसकायिकाश्च त्रिविधा: सर्वे, द्विचत्वारिंशत् विधा जीवा: सर्वजीवानामनन्तभागप्रमाणा: सन्ति।
वनस्पतिकायिका निगोदजीवा: सर्वजीवराशेरनन्तबहुभागप्रमाणा:। बादरवनस्पतिकायिकास्त्रिविधा:, बादरनिगोदजीवास्त्रिविधा: सर्वजीवराशेरसंख्यातभागप्रमाणा: सन्ति, एतै: सर्वजीवराशौ भागे कृते असंख्यातलोकप्रमाणोपलंभात्।
सूक्ष्मवनस्पतिकायिका: सूक्ष्मनिगोदजीवा: सर्वजीवानामसंख्यातबहुभागप्रमाणा: सन्ति। इमे द्विविधा अपि पर्याप्ता: संख्यातबहुभागा: सर्वजीवराशेरिति।
‘‘अत्र सूक्ष्मवनस्पतिकायिकान् भणित्वा सूक्ष्मनिगोदजीवानपि पृथग् भणति, एतेन ज्ञायते यथा सर्वे सूक्ष्मवनस्पतिकायिकाश्चैव सूक्ष्मनिगोदजीवा न भवन्तीति।’’
कश्चिदाह-यद्येवं तर्हि ’सर्वे सूक्ष्मवनस्पतिकायिका निगोद एव’ इत्येतेन वचनेन सह एतत्कथनं विरुध्यते ?
आचार्य: प्राह-उक्तवचनेन सह एतद्वचनं न विरुध्यते, किंच-सूक्ष्मनिगोदजीवा: सूक्ष्मवनस्पति-कायिकाश्चैवेति अवधारणाभावात्।
पुनरप्याशंकते-सूक्ष्मवनस्पतिकायिकान् मुक्त्वा के पुनस्ते अन्ये सूक्ष्मनिगोदजीवा: ?
आचार्य: समाधत्ते-नैतद् वक्तव्यं, सूक्ष्मनिगोदेषु इव तदाधारेषु वनस्पतिकायिकेष्वपि सूक्ष्मनिगोद-जीवत्वसंभवात्। तत: सूक्ष्मवनस्पतिकायिकाश्चैव सूक्ष्मनिगोदजीवा न भवन्तीति सिद्धम्।
कश्चिद् भव्य: शिष्य: पुनरप्याशंकां करोति-
सूक्ष्मनामकर्मोदयेन यथा जीवानां वनस्पतिकायिकादीनां सूक्ष्मत्वं भवति तथा निगोदनामकर्मोदयेन निगोदत्वं भवति। न च निगोदनामकर्मोदयो बादरवनस्पतिप्रत्येकशरीराणामस्ति येन तेषां ‘‘निगोदसंज्ञा’’ भवति इति चेत् ?
तस्य समाधानं करोत्याचार्यदेव: श्रीवीरसेन:-
नैतद् वक्तव्यं, तेषामपि वनस्पतिकायिकप्रत्येकशरीराणां आधारे आधेयोपचारेण निगोदत्वाविरोधात्।
कथमेतज्ज्ञायते ?
निगोदप्रतिष्ठितानां बादरनिगोदजीवा इति निर्देशात्, वनस्पतिकायिकानामुपरि ‘‘णिगोदा विसेसाहिया’ इति भणितवचनाच्च ज्ञायते।
सूक्ष्मवनस्पतिकायिका: अपर्याप्ता: सूक्ष्मनिगोदजीवा अपर्याप्ताश्च सर्वजीवानां संख्यातभागप्रमाणा: सन्ति। एतै: सर्वजीवराशौ भागे कृते संख्यातरूपाणामुपलंभात्। अत्रापि सूक्ष्मवनस्पतिकायिकापर्याप्तेभ्य: पूर्वमिव सूक्ष्मनिगोदापर्याप्तानां भेद: वक्तव्य:।
निगोदेषु जीवन्ति निगोदभावेन वा जीवन्ति इति निगोदजीवा एवं तत्त: भेदो वक्तव्य:।
कश्चिदाह-निगोदा: सर्वे वनस्पतिकायिकाश्चैव नान्ये, एतेनाभिप्रायेण कान्यपि भागाभागसूत्राणि स्थितानि, किंच-सूक्ष्मवनस्पतिकायिक-भागाभागस्य त्रिष्वपि सूत्रेषु निगोदजीवनिर्देशाभावात्। तत: तै: सूत्रै: एतेषां सूत्राणां विरोधो भवति इति चेत् ?
श्रीवीरसेनाचार्य: प्राह-‘‘जदि एवं तो उवदेसं लद्धूण इदं सुत्तं इदं चासुत्तमिदि आगमणिउणा भणंतु, ण च अम्हे एत्थ वोत्तुं समत्था, अलद्धोवदेसत्तादो।’’
अनया पंक्त्या श्रीवीरसेनाचार्यवर्यस्य पापभीरुत्वं दृश्यते। वर्तमानकालेऽपि साधव: साध्व्य: श्रावका: श्राविकाश्च एतदुदाहरणमनुसर्तव्यम्।
एवं कायमार्गणायां भागाभागनिरूपणत्वेन द्वादश सूत्राणि गतानि।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे भागाभागानुगमनाममहाधिकारे गणिनी-ज्ञानमतीकृत-सिद्धान्तचिंतामणिटीकायां कायमार्गणानामतृतीयोऽधिकार: समाप्त:।

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कायमार्गणाधिकार

अब कायमार्गणा में भागाभाग का प्रतिपादन करने हेतु बारह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

कायमार्गणा के अनुसार पृथिवीकायिक, पृथिवीकायिक पर्याप्त, पृथिवीकायिक अपर्याप्त, बादर पृथिवीकायिक, बादर पृथिवीकायिक पर्याप्त, बादर पृथिवीकायिक अपर्याप्त, सूक्ष्म पृथिवीकायिक, सूक्ष्म पृथिवीकायिक पर्याप्त, सूक्ष्म पृथिवीकायिक अपर्याप्त, इसी प्रकार नौ अप्कायिक, नौ तेजस्कायिक, नौ वायुकायिक, बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येक-शरीर व उनके पर्याप्त और अपर्याप्त तथा त्रसकायिक, त्रसकायिक पर्याप्त और त्रसकायिक अपर्याप्त जीव सब जीवों के कितने भाग प्रमाण हैं ?।।२३।।

उक्त जीव सर्व जीवों के अनन्तवें भाग प्रमाण हैं।।२४।।

वनस्पतिकायिक व निगोद जीव सर्व जीवों के कितने भाग प्रमाण हैं ?।।२५।।

वनस्पतिकायिक व निगोद जीव सर्व जीवों के अनन्त बहुभाग प्रमाण हैं।।२६।।

बादर वनस्पतिकायिक, बादर वनस्पतिकायिक पर्याप्त, बादर वनस्पतिकायिक अपर्याप्त, बादर निगोद जीव, बादर निगोद जीव पर्याप्त, बादर निगोद जीव अपर्याप्त सर्व जीवों के कितने भाग प्रमाण हैं ?।।२७।।

उक्त जीव सर्व जीवों के असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं।।२८।।

सूक्ष्म वनस्पतिकायिक व सूक्ष्म निगोद जीव सर्व जीवों के कितने भाग प्रमाण हैं ?।।२९।।

उक्त जीव सर्व जीवों के असंख्यात बहुभाग प्रमाण हैं।।३०।।

सूक्ष्म वनस्पतिकायिक पर्याप्त व सूक्ष्म निगोद जीव पर्याप्त सर्व जीवों के कितने भाग प्रमाण हैं ?।।३१।।

उक्त जीव सर्व जीवों के संख्यात बहुभाग प्रमाण हैं।।३२।।

सूक्ष्म वनस्पतिकायिक व सूक्ष्म निगोद जीव अपर्याप्त सर्व जीवों के कितने भागप्रमाण हैं ?।।३३।।

उक्त जीव सर्व जीवों के संख्यातवें भाग प्रमाण हैं।।३४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-पृथ्वी, जल, अग्नि और वायुकायिक चारों प्रकार के ये प्रत्येक जीव नौ-नौ भेद वाले होते हैं, अत: सभी मिलाकर इन चारों के छत्तीस भेद हो जाते हैं। बादर वनस्पति प्रत्येक शरीर वाले जीव सामान्य और पर्याप्त-अपर्याप्त के भेद से तीन प्रकार के हैं और त्रसकायिक जीव भी तीन प्रकार के हैं, ये सभी ब्यालिस (४२) प्रकार के जीव इन समस्त जीवराशि में भाग करने पर सर्वजीवों की राशि के अनन्तवें भागप्रमाण होते हैं।

वनस्पतिकायिक निगोदिया जीव सर्वजीवराशि के अनन्त बहुभाग प्रमाण हैं। बादर वनस्पतिकायिक जीव तीन प्रकार के हैं, तीन प्रकार के बादर निगोदिया जीव सर्वजीवराशि से असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं। क्योंकि इन सभी से सर्वजीवराशि में भाग देने पर असंख्यात लोकप्रमाण संख्या उपलब्ध होती है।

सूक्ष्म वनस्पतिकायिक, सूक्ष्म निगोदिया जीव सर्वजीवराशि के असंख्यात बहुभाग प्रमाण हैं। इन दोनों प्रकार के पर्याप्त भेद वाले जीव सर्वजीवराशि से संख्यात बहुभाग प्रमाण हैं।

यहाँ सूक्ष्मवनस्पतिकायिक जीवों का कथन करके पुन: सूक्ष्म निगोदिया जीवों को भी पृथक् कहा है, इससे ज्ञात होता है कि सब सूक्ष्मवनस्पतिकायिक जीव ही सूक्ष्म निगोदिया जीव नहीं होते हैं, ऐसा समझना।

यहाँ कोई शंका करता है कि-यदि ऐसा है तो ‘सर्वसूक्ष्म वनस्पतिकायिक निगोद ही हैं’ इस वचन के साथ इस कथन का विरोध आता है ? आचार्य इसका समाधान देते हैं कि-उक्त वचन के साथ यह वचन विरोध को प्राप्त नहीं होता है, क्योंकि सूक्ष्म निगोद जीव सूक्ष्म वनस्पतिकायिक ही हैं, ऐसा उक्त सूत्र में अवधारण नहीं किया है।

पुन: इसमें शंका होती है कि-तो फिर सूक्ष्म वनस्पतिकायिक को छोड़कर अन्य सूक्ष्म निगोद जीव कौन से हैं ?

तब आचार्य समाधान करते हैं कि-ऐसा नहीं कहना चाहिए क्योंकि, सूक्ष्म निगोद जीवों के समान उन निगोद जीवों के आधारभूत वनस्पतिकायिकों में भी सूक्ष्म निगोद जीवपने की संभावना है। इस कारण ‘सूक्ष्म वनस्पतिकायिक ही सूक्ष्म निगोद जीव नहीं होते’ यह बात सिद्ध होती है। कोई भव्य शिष्य पुन: शंका करता है कि-सूक्ष्म नामकर्म के उदय से जिस प्रकार वनस्पतिकायिकादिक जीवों के सूक्ष्मपना होता है, उसी प्रकार निगोद नामकर्म के उदय से निगोदपना होता है और बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येक शरीर जीवों के निगोद नामकर्म का उदय नहीं है, जिससे कि उनकी ‘निगोद’ संज्ञा होवे ?

उसका समाधान करते हुए श्री वीरसेनाचार्य ने कहा है कि-ऐसा नहीं कहना चाहिए, क्योंकि बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येक शरीर जीवों के भी आधार में आधेय का उपचार करने से निगोदपना होने में कोई विरोध नहीं आता है।

शंका-यह कैसे जाना जाता है ?

समाधान-एक को निगोद जीवों से प्रतिष्ठित वनस्पतिकायिक जीवों के बादर निगोद जीव इस प्रकार का निर्देश पाया जाता हैं, दूसरे वनस्पतिकायिकों के आगे निगोद जीव विशेष अधिक हैं। इस प्रकार के कहे गये सूत्र वचन से यह बात जानी जाती है।

सूक्ष्म वनस्पतिकायिक अपर्याप्त और सूक्ष्मनिगोदिया अपर्याप्त जीव सर्वजीवराशि के संख्यातवें भागप्रमाण हैं, क्योंकि इनसे सर्वजीवराशि में भाग देने पर संख्यातरूप वाली राशि प्राप्त होती है। यहाँ भी सूक्ष्मवनस्पतिकायिक अपर्याप्त जीवों से सूक्ष्म निगोदिया अपर्याप्त जीवों का भेद पूर्व के समान ही कहना चाहिए।

जो निगोदों में जीते हैं, अथवा निगोद भाव से जो जीते हैं, वे निगोद जीव कहलाते हैं, इस प्रकार इन दोनों में भेद जानना चाहिए।

यहाँ कोई शंका करता है कि-

‘‘निगोद जीव सर्व वनस्पतिकायिक ही हैं अन्य नहीं हैं’ इस अभिप्राय से कितने ही भागाभाग सूत्र स्थित हैं, क्योंकि सूक्ष्म वनस्पतिकायिक भागाभाग के तीनों ही सूत्रों में निगोद जीवों के निर्देश का अभाव है। इसलिए उन सूत्रों से इन सूत्रों का विरोध होता है ?

श्री वीरसेनाचार्य इनका समाधान देते हुए कहते हैं कि-यदि ऐसा है तो उपदेश को प्राप्त कर ‘यह सूत्र है और यह सूत्र नहीं है’ ऐसा आगम निपुण जन कह सकते हैं। किन्तु हम यहाँ कहने के लिए समर्थ नहीं है, क्योंकि हमें वैसा उपदेश प्राप्त नहीं है।

इस पंक्ति से श्री वीरसेनाचार्यवर्य की पापभीरुता देखने को मिलती है। वर्तमानकाल में भी सभी साधु-साध्वी (मुनि-आर्यिका आदि) और श्रावक-श्राविकाओं को भी इस उदाहरण का अनुसरण करना चाहिए।

इस प्रकार कायमार्गणा में भागाभाग का निरूपण करने वाले बारह सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में भागाभागानुगम महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में कायमार्गणा नाम का तृतीय अधिकार समाप्त हुआ।

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अथ योगमार्गणाधिकार:

इदानीं योगमार्गणायां भागाभागनिरूपणाय सूत्रदशकमवतार्यते-

जोगाणुवादेण पंचमणजोगि-पंचवचिजोगि-वेउव्वियकायजोगि-वेउव्वियमिस्सकायजोगि-आहारकायजोगि-आहारमिस्सकायजोगी सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।३५।।
अणंतो भागो।।३६।।
कायजोगी सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।३७।।
अणंता भागा।।३८।।
ओरालियकायजोगी सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।३९।।
संखेज्जा भागा।।४०।।
ओरालियमिस्सकायजोगी सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।४१।।
संखेज्जदिभागो।।४२।।
कम्मइयकायजोगी सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।४३।।
असंखेज्जदिभागो।।४४।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-मनोयोगिन: पंचविधा: वचनयोगिन: पंचविधा:, वैक्रियिक-आहारक-तन्मिश्रयोगिनश्च चतुर्विधा: इमे सर्वजीवराशीनां अनन्तभागप्रमाणा:। सामान्येन काययोगिन: एकेन्द्रियादारभ्य आपंचेन्द्रियतिर्यंच: मनुष्याश्च सर्वजीवराशीनामनंतबहुभागप्रमाणा:। औदारिककाययोगिन: सर्वजीवानां संख्यातबहुभागप्रमाणा:, तन्मिश्रयोगिन: संख्यातभागा:, कार्मणकाययोगिनोऽसंख्यात-भागप्रमाणा: सन्ति।
एवं योगमार्गणायां भागाभागनिरूपणत्वेन दशसूत्राणि गतानि।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे भागाभागानुगमनाममहाधिकारे गणिनी-ज्ञानमतीकृत-सिद्धान्तचिंतामणिटीकायां योगमार्गणानाम चतुर्थोऽधिकार: समाप्त:।

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अथ योगमार्गणा अधिकार

अब योगमार्गणा में भागाभाग का निरूपण करने हेतु दश सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

योगमार्गणा के अनुसार पाँच मनोयोगी, पाँच वचनयोगी, वैक्रियिककाययोगी, वैक्रियिकमिश्रकाययोगी, आहारककाययोगी और आहारकमिश्रकाययोगी जीव सब जीवों के कितने भाग प्रमाण हैं ?।।३५।।

उक्त जीव सब जीवों के अनन्तवें भाग प्रमाण हैं।।३६।।

काययोगी जीव सब जीवों के कितने भाग प्रमाण हैं ?।।३७।।

काययोगी जीव सब जीवों के अनन्त बहुभागप्रमाण हैं।।३८।।

औदारिक काययोगी जीव सर्व जीवों के कितने भागप्रमाण हैं ?।।३९।।

औदारिककाययोगी जीव सब जीवों के संख्यात बहुभागप्रमाण हैं।।४०।।

औदारिकमिश्रकाययोगी जीव सब जीवों के कितने भाग प्रमाण हैं ?।।४१।।

औदारिकमिश्रकाययोगी जीव सब जीवों के संख्यातवें भाग प्रमाण हैं।।४२।।

कार्मणकाययोगी जीव सब जीवों के कितने भाग प्रमाण है ?।।४३।।

कार्मणकाययोगी जीव सब जीवों के असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं।।४४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-पाँचों प्रकार के मनोयोगी, पाँचों प्रकार के वचनयोगी, वैक्रियिक काययोगी, वैक्रियिकमिश्रकाययोगी, आहारक काययोगी और आहारकमिश्रकाययोगी ये चार काययोगी ये सभी जीव सर्वजीवराशि के अनन्तवें भाग प्रमाण हैं। सामान्य से काययोगी जीव एकेन्द्रिय से लेकर पंचेन्द्रिय तिर्यंच और मनुष्य सर्वजीवराशि के अनन्तबहुभागप्रमाण हैं। औदारिककाययोगी जीव सर्वजीवों से संख्यातबहुभागप्रमाण हैं, औदारिकमिश्रकाययोगी संख्यातभाग प्रमाण हैं और कार्मणकाययोगी जीव सर्वजीवराशि से असंख्यातभाग प्रमाण हैं।

इस प्रकार योगमार्गणा में भागाभाग बतलाने वाले दश सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में भागाभागानुगम नामक महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में योगमार्गणा नाम का चतुर्थ अधिकार समाप्त हुआ।

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अथ वेदकषायज्ञानसंयममार्गणाधिकारा:

इदानीं वेद-कषाय-ज्ञान-संयममार्गणासु अष्टादशसूत्राण्यवतार्यन्ते-

वेदाणुवादेण इत्थिवेदा पुरिसवेदा अवगदवेदा सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।४५।।
अणंतो भागो।।४६।।
णवुंसयवेदा सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।४७।।
अणंता भागा।।४८।।
कसायाणुवादेण कोधकसाई माणकसाई मायकसाई सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।४९।।
चदुब्भागो देसूणा।।५०।।
लोभकसाई सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।५१।।
चदुब्भागो सादिरेगो।।५२।।
अकसाई सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।५३।।
अणंतो भागो।।५४।।
णाणाणुवादेण मदिअण्णाणि-सुदअण्णाणी सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।५५।।
अणंता भागा।।५६।।
विभंगणाणी आभिणिबोहियणाणी सुदणाणी ओहिणाणी मणपज्ज-वणाणी केवलणाणी सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।५७।।
अणंतभागो।।५८।।
संजमाणुवादेण संजदा सामाइयच्छेदोवट्ठावणसुद्धिसंजदा परिहारसुद्धि-संजदा सुहुमसांपराइयसुद्धिसंजदा जहाक्खादविहारसुद्धिसंजदा संजदासंजदा सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।५९।।
अणंतभागो।।६०।।
असंजदा सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।६१।।
अणंता भागा।।६२।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमो वर्तते। नपुंसकवेदिनो मत्यज्ञानिन: श्रुताज्ञानिन:, असंयता:, इमे जीवा: एकेन्द्रियविकलेन्द्रियापेक्षया अनंतबहुभागप्रमाणा: सर्वजीवराशीनां भवन्ति। क्रोधमानमायाकषाय-सहिता: जीवा: प्रत्येकं किंचिन्न्यूनएकचतुर्थभागप्रमाणा:। लोभकषायसहिता: सर्वजीवानां साधिकचतुर्थभागप्रमाणा: सन्ति।
एवं वेदादिसंयममार्गणान्तां जीवानां भागाभागनिरूपणत्वेनाष्टादशसूत्राणि गतानि।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे भागाभागानुगमनाममहाधिकारे गणिनी-ज्ञानमतीकृत-सिद्धान्तचिंतामणिटीकायां वेदादिसंयममार्गणापर्यंत पंचमोऽधिकार: समाप्त:।

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अथ वेद-कषाय-ज्ञान-संयममार्गणा अधिकार

अब वेद-कषाय-ज्ञान और संयममार्गणा में भागाभाग कथन करने वाले अठारह सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

वेदमार्गणा के अनुसार स्त्रीवेदी, पुरुषवेदी और अपगतवेदी जीव सर्व जीवों के कितनें भागप्रमाण हैं ?।।४५।।

उक्त जीव सर्व जीवों के अनन्तवें भाग प्रमाण हैं।।४६।।

नपुसंकवेदी जीव सर्वजीवों के कितने भागप्रमाण हैं ?।।४७।।

नपुंसकवेदी जीव सब जीवों के अनन्त बहुभागप्रमाण हैं।।४८।।

कषायमार्गणा के अनुसार क्रोधकषायी, मानकषायी और मायाकषायी जीव सब जीवों के कितने भागप्रमाण हैं ?।।४९।।

उक्त जीव सब जीवों के कुछ कम एक चतुर्थ भागप्रमाण हैं।।५०।।

लोभकषायी जीव सब जीवों के कितने भागप्रमाण हैं ?।।५१।।

लोभकषायी जीव सब जीवों के साधिक चतुर्थ भागप्रमाण हैं।।५२।।

कषायरहित जीव सब जीवों के कितने भागप्रमाण हैं ?।।५३।।

कषायरहित जीव सब जीवों के अनन्तवें भागप्रमाण हैं।।५४।।

ज्ञानमार्गणा के अनुसार मतिअज्ञानी और श्रुतअज्ञानी जीव सब जीवों के कितने भागप्रमाण हैं ?।।५५।।

मतिअज्ञानी और श्रुतअज्ञानी जीव सब जीवों के अनन्त बहुभागप्रमाण हैं।।५६।।

विभंगज्ञानी, आभिनिबोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी, अवधिज्ञानी, मन:पर्ययज्ञानी और केवलज्ञानी जीव सब जीवों के कितने भागप्रमाण है ?।।५७।।

उक्त जीव सब जीवों के अनन्तवें भागप्रमाण हैं।।५८।।

संयममार्गणा के अनुसार संयत, सामायिकछेदोपस्थापनाशुद्धिसंयत, परिहारशुद्धिसंयत, सूक्ष्मसाम्परायिकशुद्धिसंयत, यथाख्यातविहारशुद्धिसंयत और संयतासंयत जीव सब जीवों के कितने भागप्रमाण हैं ?।।५९।।

उक्त जीव सब जीवों के अनन्तवें भागप्रमाण हैं।।६०।।

असंयत जीव सब जीवों के कितने भागप्रमाण हैं ?।।६१।।

असंयत जीव सब जीवों के अनन्त बहुभागप्रमाण हैं।।६२।।

'सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त समस्त सूत्रों का अर्थ सुगम है। नपुंसकवेदी, मतिअज्ञानी-कुमतिज्ञानी, कुश्रुतज्ञानी, असंयत ये सभी जीव एकेन्द्रिय और विकलेन्द्रियों की अपेक्षा सर्वजीवराशि के अनन्तबहुभागप्रमाण होते हैं। क्रोध-मान-माया-कषाय से सहित प्रत्येक जीव कुछ कम एक बटे चार भागप्रमाण हैं। लोभकषायसहित जीव सर्वजीवराशि से भाग देने पर कुछ अधिक चतुर्थभागप्रमाण हैं।

इस प्रकार वेदमार्गणा से लेकर संयममार्गणा तक के जीवों का भागाभाग निरूपण करने वाले अठारह सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में भागाभागानुगम नामक महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में वेदादि संयममार्गणा पर्यन्त यह पाँचवाँ अधिकार समाप्त हुआ।

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अथ दर्शनलेश्या भव्यसम्यक्त्व संज्ञिआहार मार्गणाधिकार:

इदानीं दर्शन-लेश्या-भव्य-सम्यक्त्व-संज्ञि-आहारमार्गणासु जीवानां भागाभागप्रतिपादनार्थं षड्विंशति-सूत्राण्यवतार्यन्ते-

दंसणाणुवादेण चक्खुदंसणी ओहिदंसणी केवलदंसणी सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।६३।।
अणंतभागो।।६४।।
अचक्खुदंसणी सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।६५।।
अणंता भागा।।६६।।
लेस्साणुवादेण किण्हलेस्सिया सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।६७।।
तिभागो सादिरेगो।।६८।।
णीललेस्सिया काउलेस्सिया सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।६९।।
तिभागो देसूणो।।७०।।
तेउलेस्सिया पम्मलेस्सिया सुक्कलेस्सिया सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।७१।।
अणंतभागो।।७२।।
भवियाणुवादेण भवसिद्धिया सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।७३।।
अणंता भागा।।७४।।
अभवसिद्धिया सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।७५।।
अणंतो भागो।।७६।।
सम्मत्ताणुवादेण सम्माइट्ठी खइयसम्माइट्ठी वेदगसम्माइट्ठी उवसमसम्माइट्ठी सासणसम्माइट्ठी सम्मामिच्छाइट्ठी सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।७७।।
अणंतो भागो।।७८।।
मिच्छाइट्ठी सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।७९।।
अणंता भागा।।८०।।
सण्णियाणुवादेण सण्णी सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।८१।।
अणंतभागो।।८२।।
असण्णी सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।८३।।
अणंता भागा।।८४।।
आहाराणुवादेण आहारा सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।८५।।
असंखेज्जा भागा।।८६।।
अणाहारा सव्वजीवाणं केवडिओ भागो ?।।८७।।
असंखेज्जदिभागो।।८८।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमोऽस्ति। अचक्षुर्दर्शनिन:, भव्या:, मिथ्यादृष्ट्य:, असंज्ञिनश्च एकेन्द्रियाद्यपेक्षया सर्वजीवराशीनां अनन्तबहुभागप्रमाणा: सन्ति। कृष्णलेश्या: जीवा: सर्वजीवराशीषु भागे कृते साधिकएकत्रिभागा:, नील-कापोतलेश्या: जीवा: किंचिन्न्यूनएकत्रिभागा:, त्रिकशुभलेश्यावन्त: सर्वजीवानां अनन्तभागप्रमाणा:। अभव्या अपि अनन्तभागप्रमाणा:। आहारका जीवा असंख्यातबहुभागा:, अनाहारजीवा: असंख्यातभागाश्च सन्तीति ज्ञातव्यं।
एवं नवमादिचतुर्दशपर्यन्तमार्गणास्थितजीवानां भागाभागप्रतिपादनत्वेन षड्विंशतिसूत्राणि गतानि।
तात्पर्यमेतत्-भव्यजीवान्तर्गतानन्तबहुभागप्रमाणजीवेषु मम गणनास्ति, सम्यक्त्वप्रभावेण भव्या-भव्यत्वमतीत्य सिद्धिगति: प्राप्तव्या मयेति ज्ञात्वानन्तज्ञानदर्शनसुखवीर्यस्वरूपानन्तचतुष्टयं प्रकटयितुं रत्नत्रयमाराधनीयं निरन्तरं एष एव स्वाध्यायस्य सारो गृहीतव्य: सर्वभव्यपुंगवैरपि।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे भागाभागानुगमनाम महाधिकारे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धान्तचिंतामणिटीकायां दर्शनादि-आहारमार्गणा-पर्यंत मार्गणानाम षष्ठोऽधिकार: समाप्त:।

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अथ दर्शन-लेश्या-भव्यत्व-सम्यक्त्व-संज्ञी और आहारमार्गणा अधिकार

अब दर्शन-लेश्या-भव्य-सम्यक्त्व-संज्ञी और आहारमार्गणाओं में जीवों का भागाभाग प्रतिपादित करने हेतु छब्बीस सूत्रों का अवतार करते हैं-

सूत्रार्थ-

दर्शनमार्गणानुसार चक्षुदर्शनी, अवधिदर्शनी और केवलदर्शनी जीव सब जीवों के कितने भागप्रमाण हैं ?।।६३।।

उक्त जीव सर्व जीवों के अनन्तवें भागप्रमाण हैं।।६४।।

अचक्षुदर्शनी जीव सब जीवों के कितने भागप्रमाण हैं ?।।६५।।

अचक्षुदर्शनी जीव सब जीवों के अनन्त बहुभागप्रमाण हैं।।६६।।

लेश्यामार्गणा के अनुसार कृष्णलेश्या वाले जीव सब जीवों के कितने भागप्रमाण हैं ?।।६७।।

कृष्ण लेश्या वाले जीव सब जीवों के साधिक एक त्रिभागप्रमाण हैं ?।।६८।।

नीललेश्या वाले और कापोतलेश्या वाले जीव सब जीवों के कितने भागप्रमाण हैं ?।।६९।।

नील और कापोतलेश्या वाले जीव सब जीवों के कुछ कम एक त्रिभागप्रमाण हैं।।७०।।

तेजोलेश्या वाले, पद्मलेश्या वाले और शुक्ललेश्या वाले जीव सब जीवों के कितने भाग प्रमाण हैं ?।।७१।।

उक्त जीव सब जीवों के अनन्तवें भाग प्रमाण हैं।।७२।।

भव्यमार्गणा के अनुसार भव्यसिद्धिक जीव सब जीवों के कितने भाग प्रमाण हैं ?।।७३।।

भव्यसिद्धिक जीव सब जीवों के अनन्त बहुभागप्रमाण हैं।।७४।।

अभव्यसिद्धिक जीव सब जीवों के कितने भागप्रमाण हैं ?।।७५।।

अभव्यसिद्धिक जीव सब जीवों के अनन्तवें भाग प्रमाण हैं।।७६।।

सम्यक्त्वमार्गणा के अनुसार सम्यग्दृष्टि, क्षायिकसम्यग्दृष्टि, वेदकसम्यग्दृष्टि, उपशमसम्यग्दृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीव सब जीवों के कितने भाग प्रमाण हैं ?।।७७।।

उक्त जीव सब जीवों के अनन्तवें भाग प्रमाण हैं।।७८।।

मिथ्यादृष्टि जीव सब जीवों के कितने भाग प्रमाण हैं ?।।७९।।

मिथ्यादृष्टि जीव सब जीवों के अनन्त बहुभागप्रमाण हैं।।८०।।

संज्ञिमार्गणानुसार संज्ञी जीव सब जीवों के कितने भागप्रमाण हैं ?।।८१।।

संज्ञी जीव सब जीवों के अनन्तवें भाग प्रमाण हैं।।८२।।

असंज्ञी जीव सब जीवों के कितने भागप्रमाण हैं ?।।८३।।

असंज्ञी जीव सब जीवों के अनन्त बहुभागप्रमाण हैं।।८४।।

आहारमार्गणा के अनुसार आहारक जीव सब जीवों के कितने भागप्रमाण हैं ?।।८५।।

आहारक जीव सब जीवों के असंख्यात बहुभागप्रमाण हैं।।८६।।

अनाहारक जीव सब जीवों के कितने भागप्रमाण हैं?।।८७।।

अनाहारक जीव सब जीवों के असंख्यातवें भागप्रमाण है।।८८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त सभी सूत्रों का अर्थ सुगम है। अचक्षुदर्शनी, भव्य, मिथ्यादृष्टि और असंज्ञी जीव एकेन्द्रिय आदि की अपेक्षा सर्वजीवराशि के अनन्तबहुभागप्रमाण हैं। कृष्णलेश्या वाले जीव सर्वजीवराशि में भाग देने पर कुछ अधिक एक बटे तीन भागप्रमाण हैं। नील और कापोत लेश्या वाले जीव कुछ कम एक बटे तीन भाग प्रमाण हैं। तीनों शुभलेश्या वाले जीव सर्वजीवराशि के अनन्तवें भागप्रमाण हैं। अभव्य जीव भी अनन्तभागप्रमाण हैं। आहारक जीव असंख्यातबहुभागप्रमाण हैं और अनाहारक जीव असंख्यात भाग प्रमाण हैं, ऐसा जानना चाहिए।

इस प्रकार नवमीं मार्गणा को लेकर चौदहवीं मार्गणा तक में स्थित जीवों का भागाभाग प्रतिपादन करने वाले छब्बीस सूत्र पूर्ण हुए।

तात्पर्य यह है कि-भव्य जीवों के अन्तर्गत अनन्तबहुभागप्रमाण जीवों में मेरी गणना है, सम्यक्त्व के प्रभाव से भव्यत्व और अभव्यत्व से रहित सिद्धिगति मुझे प्राप्त करने योग्य है, ऐसा जानकर अनन्तज्ञान-अनन्तदर्शन-अनन्तसुख और अनन्तवीर्यस्वरूप अनुन्तचतुष्टय को प्रगट करने हेतु रत्नत्रय निरन्तर ही आराधनीय है। यही स्वाध्याय का सार सभी भव्यपुंगवों के द्वारा ग्रहण करने योग्य है।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम के क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में भागाभागानुगम नामक महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धांतचिंतामणि-टीका में दर्शनमार्गणा से लेकर आहारमार्गणापर्यन्त मार्गणा नामका छठा अधिकार समाप्त हुआ।