ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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1. नवम चूलिका अधिकार ( गत्यागति चूलिका )

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नवम चूलिका अधिकार(गत्यागति चूलिका)

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द्वितीयो महाधिकार:

गत्यागतिचूलिका
नवम चूलिकाधिकार:
मंगलाचरणं
सिद्धानानम्य संप्राप्य, सम्यक्त्वोत्पत्तिकारणम्।
गत्यागतिविनाशाय, जिनसूत्राणि संस्तुम:।।१।।

येनादिब्रह्मणा भगवता श्रीऋषभदेवेन राजसभायां नीलाञ्जनाप्सरानृत्यं अवलोकयता तस्या: आयुक्र्षीणे सति द्वितीयाप्सरसं विलोक्यावधिलोचनेन वस्तुस्थितिमवबुद्ध्य राज्येभ्य: विरज्य अयोध्यानगर्या: निष्क्रम्य यत्र गत्वा प्रकृष्टस्त्याग: कृत: स ‘प्रयाग:’ इति कीर्तित:। असौ भगवान् तत्र वटवृक्षतले षण्मासं योगे तस्थौ, तं भगवन्तं मुहुर्मुहुर्नमस्कृत्य तदक्षयं वटवृक्षं तत्प्रयागतीर्थं चापि नमामो वयम्।
अथ षट्खंडागमस्य प्रथमखण्डे षष्ठग्रन्थे द्वितीयमहाधिकारे जीवस्थानचूलिकायां गत्यागति-नामनवमी चूलिका प्रारभ्यते। तत्र तावत् त्रिचत्वािंरशदधिकद्विशतसूत्राणि सन्ति, तेषु चत्वारोऽन्तराधिकारा: कथ्यन्ते। अत्र प्रथमान्तराधिकारे चतुर्गतिषु सम्यक्त्वोत्पत्तिकारणप्रतिपादनपरत्वेन त्रिचत्वािंरशत्सूत्राणि। द्वितीयान्तराधिकारे चतुर्गतिषु प्रवेश:, ताभ्य: निर्गमनं, एतत्प्रवेशनिर्गमनकथनमुख्यत्वेन गुणस्थानापेक्षया द्वात्रिंशत्सूत्राणि। तृतीयान्तराधिकारे चातुर्गतिकानां गत्यागतिनिरूपणत्वेन सप्तविंशत्यधिकशतसूत्राणि। चतुर्थान्तराधिकारे चतुर्गतिभ्यो निर्गत्य जीवा: का: का: गती: कान् कांश्च गुणान् उत्पादयन्तीति प्रतिपादनत्वेन एकचत्वािंरशत्सूत्राणि वक्ष्यन्ते। इति समुदायपातनिका सूचिता भवति।
अस्मिन्नपि चतुर्भि: स्थलै: त्रिचत्वािंरशत्सूत्रै: सम्यक्त्वोत्पत्तिकारणप्रतिपादननामा प्रथमोऽन्तराधिकार: कथ्यते। तत्र प्रथमस्थले नरकगतौ प्रथमसम्यक्त्वोत्पत्ते: बाह्यनिमित्तकारणप्रतिपादनत्वेन ‘‘णेरइया मिच्छाइट्ठी’’ इत्यादिना द्वादशसूत्राणि। तदनु द्वितीयस्थले तिर्यग्गतौ प्रथमोपशमसम्यक्त्वोत्पत्तिकारणनिरूपणत्वेन ‘‘तिरिक्खा मिच्छाइट्ठी’’ इत्यादिसूत्रदशकं। तत: परं तृतीयस्थले मनुष्यगतौ सम्यक्त्वोत्पत्तिनिमित्तबाह्यकारणकथनमुख्यत्वेन ‘‘मणुस्सा’’ इत्यादिसूत्राष्टकं। तत्पश्चात् चतुर्थस्थले देवगतौ प्रथमसम्यक्त्वोत्पत्ते: बाह्यकारणनिरूपणत्वेन ‘‘देवा मिच्छाइट्ठी’’ इत्यादिना त्रयोदशसूत्राणि उच्यन्ते।

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नारकी मिथ्यादृष्टिजीवा: कस्यामवस्थायां सम्यक्त्वमुत्पादयन्तीति प्रतिपादनायसूत्रपंचकमवतार्यते

णेरइया मिच्छाइट्ठी पढमसम्मत्तमुप्पादेंति।।१।।

उप्पादेंता कम्हि उप्पादेंति।।२।।
पज्जत्तएसु उप्पादेंति, णो अपज्जत्तएसु।।३।।
पज्जत्तएसु उप्पादेंता अंतोमुहुत्तप्पहुडि जाव उवरिममुप्पादेंति, णो हेट्ठा।।४।।
एवं जाव सत्तसु पुढवीसु णेरइया।।५।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-संप्रति ‘वा’ शब्देन सूचितां नवमीं चूलिकां कथयिष्यति श्रीभूतबलिसूरिवर्य:। तत्र तावत्पूर्वप्ररूपितस्यार्थस्य स्मारणार्थं सूत्राणि कथितानि।
चतुर्गतिषु अपि प्रथमसम्यक्त्वमुत्पादयन्ति इति पूर्वं प्ररूपितं, अतोऽधुना प्रथमत: नरकेषु नारकमिथ्यादृष्टिजीवानां कस्यामवस्थायां सम्यक्त्वं उत्पद्यते ? प्रश्ने सत्येव पर्याप्तकावस्थायामेव न अपर्याप्तकेषु। अत्रापि निर्वृत्त्यपर्याप्तापेक्षया एव अपर्याप्ता: गृहीतव्या: न च लब्ध्यपर्याप्तका:, किंच इमे नरकेषु नोत्पद्यन्ते। तथा पर्याप्तप्रथमसमयादारभ्य यावत्तत् प्रायोग्यान्तर्मुहूर्तं तावत् निश्चयेन प्रथमोपशमसम्यक्त्वं नोत्पादयन्ति, अन्तर्मुहूत्र्तेण विना प्रथमसम्यक्त्वयोग्यविशुद्धीनामुत्पत्तेरभावात्।
आयुषि अन्तर्मुहूर्तावशेषेऽपि नारका: प्रथमसम्यक्त्वं न प्रतिपद्यन्ते, तेन तत्र प्रतिषेध: कथयितव्य: ?
नैतद् वक्तव्यं, पर्यायार्थिकनयावलंबनेन प्रतिसमयं पृथक्-पृथक् सम्यक्त्वभावे जीवितद्विचरमसमय: इति प्रतिपद्यमानस्य तदुपलंभात्। चरमसमयेऽपि न प्रतिषेध: वक्तव्य:, दर्शनमोहोदयेन विना उत्पन्नचरमसमयसासादनगुणस्थानभावस्यापि उपचारेण प्रथमसम्यक्त्वव्यपदेशात्। अथवा देषामर्षकमिदं सूत्रं, तेनान्तिमसमयेऽपि प्रथमसम्यक्त्वग्रहणस्य प्रतिषेध: सिद्ध: भवति।
किंतु सप्तमपृथिव्यां अस्ति कश्चिद् विशेष:-द्विचरमसमयपर्यंतं सम्यक्त्वस्य प्रादुर्भावोऽस्ति एतद्वचनं न सप्तमपृथिव्यां घटते, तत्र केवलं मिथ्यात्वगुणस्थानादेव मरणं भवतीति ज्ञातव्यं।
अधुना नरकगतौ सम्यक्त्वोत्पत्ते: कारणप्रतिपादनाय प्रश्नोत्तररूपेण सूत्रचतुष्टयमवतारयति-णेरइया मिच्छाइट्ठी कदिहि कारणेहि पढमसम्मत्तमुप्पादेंति।।६।।
तीहिं कारणेहिं पढमसम्मत्तमुप्पादेंति।।७।।
केइं जाइस्सरा, केइं सोऊण, केइं वेदणाहिभूदा।।८।।
एवं तिसु उवरिमासु पुढवीसु णेरइया।।९।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उत्पद्यमानं सर्वं हि कार्यं कारणाच्चैवोत्पद्यते, कारणेन विना कार्योत्पत्तिविरोधात्। एवं निश्चितकारणस्य तत्संख्याविषयं पृच्छासूत्रमवतारितं आचार्यश्रीभूतबलिना।
कश्चिदाह-कथमेकं कार्यं त्रिभि: कारणै: समुत्पद्यते ?
तस्य समाधानं क्रियते-नैष दोष:,, अविरुद्धै: मुद्गर-लकुट-दण्ड-स्तंभ-शिला-भूमिघटादिभि: उत्पद्यमानखर्पराणामुपलंभात्। जातिस्मरणादीनि त्रीणि कारणानि सूत्रे प्रोक्तानि सन्ति।
सर्वे नारका: विभंगज्ञानेन एक-द्वि-त्रि-आदिभवग्रहणानि येन जानन्ति तेन सर्वेषांजातिस्मरणत्वमस्ति अत: सर्वै: नारवै: सम्यग्दृष्टिभि: भवितव्यं ?
नैषदोष:, भवसामान्यस्मरणेन सम्यक्त्वोत्पत्तेरनभ्युपगमात्। किंतु धर्मबुद्ध्या पूर्वभवे कृतानुष्ठानानां विफलत्वदर्शनस्य प्रथमसम्यक्त्वोत्पत्ते: कारणत्वमिष्यते, तेन न पूर्वोक्तदोष: प्राप्नोति। न चैवंविधा बुद्धि: सर्वनारकाणां भवति, तीव्रमिथ्यात्वोदयेन अवष्टब्धनारकाणां पूर्वभवस्मरणसंजातानामपि एवंविधोपयोगाभावात्। तस्मात् जातिस्मरणं प्रथमसम्यक्त्वोत्पत्ते: कारणं।
कथं तेषां नारकाणां धर्मश्रवणकारणं संभवति, तत्र ऋषीणां गमनाभावात् ?
न, सम्यग्दृष्टीनां पूर्वभवसंबंधिनां धर्मोपदेशदाने व्यापृतानां सकलबाधारहितानां देवानां तत्र गमनदर्शनात्।
पुनरपि कश्चिदाशंकते-वेदनानुभवनं सम्यक्त्वोत्पत्ते: कारणं न भवति, सर्व नारकाणां साधारणत्वात्। यदि भवति, तर्हि सर्वे नारका: सम्यग्दृष्टयो भवन्ति। न चैवं, तथानुपलंभात् ?
अस्य परिहार: उच्यते-न वेदनासामान्यं सम्यक्त्वोत्पत्ते: कारणं। किंतु येषां एषा वेदना एतस्मात् मिथ्यात्वात् अस्मात् असंयमात् वा उत्पन्ना इति उपयोगो जात:, तेषां चैव वेदना सम्यक्त्वोत्पत्ते: कारणं नापरजीवानां वेदना, तत्रैवंविधोपयोगाभावात्।
एष: नियम: प्रथमद्वितीयतृतीयनरकभूमिषु नारकाणां ज्ञातव्य:।


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दूसरा महाधिकार गत्यागति चूलिका नाम की नवमी चूलिका

मंगलाचरण

सिद्ध भगवन्तों को नमस्कार करके एवं सम्यक्त्व की उत्पत्ति के कारणों को प्राप्त कर अब हम अपनी गति और आगति को नष्ट करने के लिए इन षट्खण्डागम के जिनसूत्रों की स्तुति करते हैं।।१।।

जिन आदिब्रह्मा भगवान श्री ऋषभदेव ने राजसभा में नीलांजना नाम की देवअप्सरा के नृत्य को देखते हुए एवं उसकी आयु के क्षीण हो जाने पर तत्क्षण ही द्वितीय अप्सरा को देखकर अपने दिव्य अवधिज्ञान नेत्र से वस्तुस्थिति को समझकर राज्य से विरक्त होकर अयोध्या नगरी से निकलकर जहाँ पहुँचकर प्रकृष्ट-पूर्णरूप से त्याग किया था, वह स्थल ‘प्रयाग’ इस नाम से प्रसिद्ध हुआ है। ऐसे ये भगवान वहाँ पर वटवृक्ष के नीचे छहमास तक योग में-ध्यान में स्थित हुए थे, उन भगवान को पुन:-पुन: नमस्कार करके, उस अक्षयवटवृक्ष को एवं उस प्रयाग तीर्थ को भी हम नमस्कार करते हैं।

अब इस षट्खण्डागम ग्रंथ के प्रथम खण्ड में इस छठे ग्रंथ में द्वितीय महाधिकार में ‘जीवस्थान चूलिका’ के अन्तर्गत ‘गत्यागति’ नाम की यह नवमी चूलिका प्रारंभ की जा रही है। इसमें दो सौ तेतालीस सूत्र हैं। उनमें चार अन्तराधिकार कहेंगे। प्रथम अन्तराधिकार में चारों गतियों में सम्यक्त्व की उत्पत्ति के कारणों का प्रतिपादन करते हुए तेतालीस सूत्र हैं। द्वितीय अन्तराधिकार में चारों गतियों में प्रवेश करना-जाना और उनसे निकलना, इस प्रवेश-निर्गमन के कथन की मुख्यता से गुणस्थानों की अपेक्षा रखते हुए बत्तीस सूत्र हैं। तीसरे अन्तराधिकार में चारों गतियों के जीवोें के गत्यागती का निरूपण करते हुए एक सौ सत्ताईस सूत्र हैं। चतुर्थ अंतराधिकार में चारों गतियों से निकलकर जीव किन-किन गतियों को और कौन-कौन से गुणों को उत्पन्न करते हैं, इस विषय का प्रतिपादन करते हुए इकतालीस सूत्र कहेंगे। इस प्रकार यह समुदायपातनिका कही गई है।

इनमें भी अब चार स्थलों द्वारा तेतालीस सूत्रों से ‘सम्यक्त्वोत्पत्तिकारण’ प्रतिपादन नाम का यह प्रथम अन्तराधिकार कहा जा रहा है। उसमें प्रथम स्थल में नरकगति में प्रथम सम्यक्त्व की उत्पत्ति के बाह्य निमित्त कारणों का प्रतिपादन करने वाले ‘णेरइया मिच्छाइट्ठी’ इत्यादि बारह सूत्र हैं। इसके बाद दूसरे स्थल में तिर्यंचगति में प्रथमोपशम सम्यक्त्व की उत्पत्ति के कारणों का निरूपण करने वाले ‘‘तिरिक्खा मिच्छाइट्ठी’’ इत्यादि दश सूत्र हैं। इसके अनन्तर तीसरे स्थल में मनुष्यगति में सम्यक्त्व की उत्पत्ति के लिए निमित्तभूत बाह्य कारणों के कथन की मुख्यता से ‘मणुस्सा’ इत्यादि आठ सूत्र कहेंगे। इसके पश्चात् चौथे स्थल में देवगति में प्रथम सम्यक्त्व की उत्पत्ति के बाह्य कारणों का निरूपण करते हुए ‘‘देवा मिच्छाइट्ठी’’ इत्यादि तेरह सूत्र कहेेंगे।

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अब नारकी मिथ्यादृष्टि जीव किस अवस्था में सम्यक्त्व को उत्पन्न करते हैं, इसका प्रतिपादन करने के लिए पाँच सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

नारकी मिथ्यादृष्टि जीव प्रथम सम्यक्त्व को उत्पन्न करते हैं।।१।।

प्रथम सम्यक्त्व को उत्पन्न करने वाले नारकी जीव किस अवस्था में उसे उत्पन्न करते हैं।।२।।

नारकी जीव पर्याप्तकों में ही प्रथम सम्यक्त्व उत्पन्न करते हैं, अपर्याप्तकों में नहीं।।३।।

पर्याप्तकों में उत्पन्न करते हुए अन्तर्मुहूर्त से लेकर आगे अन्त तक उत्पन्न करते हैं, पहले नहीं।।४।।

इस प्रकार एक से लगाकर सातों पृथिवियों में नारकी जीव प्रथम सम्यक्त्व उत्पन्न करते हैं।।५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अब श्री भूतबली आचार्यवर्य ‘वा’ शब्द से सूचित अर्थात् प्रथम चूलिकान्तर्गत प्रथम सूत्र में ही कथित ‘गत्यागति’ नाम की नवमी चूलिका कहेंगे। इस प्रकरण में पूर्व में कथित अर्थ का स्मरण कराने के लिए सूत्र कहे हैं। चारों गतियों में भी जीव प्रथम सम्यक्त्व को उत्पन्न करते हैं, ऐसा पूर्व में प्ररूपित किया है, इसलिए अब प्रथम ही नरकों में मिथ्यादृष्टि नारकी जीवों के किस-किस अवस्था में सम्यक्त्व होता है ? ऐसा प्रश्न होने पर ही पर्याप्तक अवस्था में ही होता है न कि अपर्याप्त अवस्था में। यहाँ पर भी निर्वृत्त्यपर्याप्तक की अपेक्षा से ही अपर्याप्तक लिये गये हैं न कि लब्ध्यपर्याप्तक, क्योंकि ये लब्ध्यपर्याप्तक नरकों में उत्पन्न ही नहीं होते हैं। वह इस प्रकार है-पर्याप्त होने के प्रथम समय से लगाकर तत्प्रायोग्य अन्तर्मुहूर्त तक निश्चय से जीव प्रथम सम्यक्त्व उत्पन्न नहीं करते, क्योंकि अन्तर्मुहूर्तकाल के बिना प्रथम सम्यक्त्व उत्पन्न करने के योग्य विशुद्धि की उत्पत्ति का अभाव है।

शंका-आयु के अन्तर्मुहूर्त शेष रहने पर भी नारकी जीव प्रथम सम्यक्त्व को प्राप्त नहीं करते हैं, इसलिए उस काल में भी सम्यक्त्वोत्पत्ति का अभाव करना चाहिए ?

समाधान-नहीं, पर्यायार्थिक नय के अवलम्बन से प्रत्येक समय पृथक्-पृथक् सम्यक्त्व की उत्पत्ति होने पर जीवन के द्विचरम समय तक भी सम्यक्त्व की उत्पत्ति पायी जाती है। चरम समय में भी सम्यक्त्वोत्पत्ति का प्रतिषेध नहीं कहा जा सकता, क्योंकि दर्शनमोहनीय कर्म के उदय के बिना उत्पन्न होने वाले चरमसमयवर्ती सासादनभाव की भी उपचार से प्रथमसम्यक्त्व संज्ञा मानी जा सकती है। अथवा, यह सूत्र देशामर्षक है, जिससे जीवन के अवसान काल में भी प्रथम सम्यक्त्व के ग्रहण का प्रतिषेध सिद्ध हो जाता है।

किन्तु सातवीं पृृथ्वी में कुछ विशेषता है-द्विचरम समय तक सम्यक्त्व का प्रादुर्भाव बतलाया है, वह सप्तम पृथिवी में लागू नहीं होता, क्योंकि वहाँ केवल एक मिथ्यात्व गुणस्थान के साथ ही मरण होता है, ऐसा जानना चाहिए।

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अब नरकगति में सम्यक्त्व की उत्पत्ति के कारण का प्रतिपादन करने के लिए प्रश्नोत्तररूप से चार सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

नारकी मिथ्यादृष्टि जीव कितने कारणों से प्रथम सम्यक्त्व उत्पन्न करते हैं।।६।।

तीन कारणों से नारकी मिथ्यादृष्टि जीव प्रथम सम्यक्त्व को उत्पन्न करते हैं।।७।।

कितने ही नारकी जीव जातिस्मरण से, कितने ही धर्मोपदेश सुनकर और कितने ही वेदना से अभिभूत होकर सम्यक्त्व को उत्पन्न करते हैं।।८।।

इस प्रकार ऊपर की तीन पृथिवियों में नारकी जीव सम्यक्त्व की उत्पत्ति करते हैं।।९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उत्पन्न होने वाला सभी कार्य कारण से ही उत्पन्न होता है, क्योंकि कारण के बिना कार्य की उत्पत्ति का विरोध है। इस प्रकार निश्चित कारण का संख्याविषयक यह पृच्छासूत्र है। इसे श्री भूतबली आचार्य ने अवतरित किया है।

शंका-यह प्रथम सम्यक्त्वोत्पत्तिरूप कार्य तीन कारणों से किस प्रकार उत्पन्न होता है ?

समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि मुद्गर, लकड़ी, दंड, स्तंभ, शिला, भूमि व घट रूप अविरुद्ध कारणों के द्वारा खप्पड़ों का उत्पन्न होना पाया जाता है। अत: नरकों में सम्यक्त्वोत्पत्ति के जातिस्मरण आदि वे तीन कारण कहे गये हैं।

शंका-चूँकि सभी नारकी जीव विभंग ज्ञान के द्वारा एक, दो या तीन आदि भवों को जानते हैं, इसलिए सभी के जातिस्मरण होता है, अतएव सभी नारकी जीव सम्यग्दृष्टि होना चाहिए ?

समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि, सामान्यरूप से भवस्मरण के द्वारा सम्यक्त्व की उत्पत्ति नहीं होती। किन्तु धर्मबुद्धि से पूर्वभव में किये गये अनुष्ठानों की विफलता के दर्शन से ही प्रथम सम्यक्त्व की उत्पत्ति का कारणत्व इष्ट है, जिससे पूर्वोक्त दोष प्राप्त नहीं होता और इस प्रकार की बुद्धि सब नारकी जीवों के होती नहीं है, क्योंकि तीव्र मिथ्यात्व के उदय से वशीभूत नारकी जीवों के पूर्वभवों का स्मरण होते हुए भी उक्त प्रकार के उपयोग का अभाव है। इस प्रकार जातिस्मरण प्रथम सम्यक्त्व की उत्पत्ति का कारण है।

शंका-नारकी जीवों के धर्मश्रवण किस प्रकार संभव है, क्योंकि वहाँ तो ऋषियों के गमन का अभाव है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि अपने पूर्वभव के संंबंधी जीवों के धर्म उत्पन्न कराने में प्रवृत्त और समस्त बाधाओं से रहित सम्यग्दृष्टि देवों का नरकों में गमन देखा जाता है।

शंका-पुन: कोई आशंका करता है कि वेदना का अनुभवन सम्यक्त्वोत्पत्ति का कारण नहीं हो सकता, क्योंकि वह अनुभवन तो सब नारकियों के साधारण होता है। यदि वह अनुभवन सम्यक्त्वोत्पत्ति का कारण हो, तो सब नारकी जीव सम्यग्दृष्टि होेंगे। किन्तु ऐसा है नहीं क्योंकि वैसा पाया नहीं जाता ?

समाधान-आचार्यदेव पूर्वोक्त शंका का परिहार कहते हैं-वेदना सामान्य सम्यक्त्वोत्पत्ति का कारण नहीं है। किन्तु जिन जीवों के ऐसा उपयोग होता है कि अमुक वेदना अमुक मिथ्यात्व के कारण या अमुक असंयम से उत्पन्न हुई, उन्हीं जीवों की वेदना सम्यक्त्वोत्पत्ति का कारण होती है। अन्य जीवों की वेदना नरकों में सम्यक्त्वोत्पत्ति का कारण नहीं होती, क्योंकि उसमें उक्त प्रकार के उपयोग का अभाव होता है।

यह नियम प्रथम, द्वितीय, तृतीय नरकभूमियों में नारकियों के जानना चाहिए।

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संप्रति चतुर्थादिपृथ्वीनां नारकाणां कारणनिरूपणाय सूत्रत्रयमवतार्यते-

चदुसु हेट्ठिमासु णेरइया मिच्छाइट्ठी कदिहि कारणेहि पढमसम्मत्तमुप्पा-देंति।।१०।।

दोहि कारणेहि पढमसम्मत्तमुप्पादेंति।।११।।
केइं जाइस्सरा, केइं वेयणाहिभूदा।।१२।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-चतुथ्र्यादिपृथ्वीनां नारकाणां धर्मश्रवणात् प्रथमसम्यक्त्वस्य उत्पत्तिर्नास्ति, देवानां तत्र गमनाभावात्।
तत्रतनसम्यग्दृष्टिनारवै: धर्मश्रवणं कृत्वा प्रथमसम्यक्त्वं तत्र किन्नोत्पद्यते ?
नोत्पद्यते, किंच तेषां भवसंबंधेन पूर्ववैरसंबंधेन वा परस्परविरुद्धाणां अनुग्राह्यानुग्राहकभावानामसंभवात्।
सम्यक्त्वोत्पत्तिकारणेषु नरकेषु तृतीयपृथिव्यामध: देशनालब्धि: कथं संभवति ?
पूर्वभवे गुरुमुखात् श्रुतोपदेश: संस्कारवशात् तत्र देशनालब्धिर्भवति। जातिस्मरणनिमित्तं अपि नरकेषु एतादृशं भवितुमर्हति। यत् येन केन मनुष्येन कंचिदपि नियमं गृहीत्वा केनापि निमित्तेन भंगं कृतं, अनाचारं कृत्वा पुनर्न गृहीतं न च प्रायश्चित्तं कृतं तस्य पापदोषेण यदि नरकं गच्छति, तर्हि तत्र जातिस्मरणेन विभंगज्ञानेन वा स्मृत्वा मुहुर्मुहु: पापाद् विभ्यति नरकवेदनामनुभूयानुभूय अत: तस्य नारकस्य जातिस्मरणं वेदनानुभवो वा तत्र सम्यक्त्वस्य निमित्तं भवति इति ज्ञात्वा नियमग्रहणे अत्यधिक ऊहापोहो न विधातव्य: यदि परिपूर्णतया पाल्यते तर्हि देवगतिर्निश्चयेन यदि कदाचित् त्यज्यते तह्र्यपि नरके सम्यक्त्वकारणं भवेदिति चारित्रचक्रवर्ति-श्रीशांतिसागराचार्येण कथितमनेकवारं।
एवं प्रथमस्थले नारकाणां सम्यक्त्वोत्पत्तेर्बाह्यकारणनिरूपणत्वेन द्वादश सूत्राणि गतानि।
अधुना तिर्यञ्च: कस्यामवस्थायां प्रथमसम्यक्त्वमुत्पादयन्ति इति प्रतिपादनाय सूत्राष्टकमवतार्यते-तिरिक्खा मिच्छाइट्ठी पढमसम्मत्तमुप्पादेंति।।१३।।
उप्पादेंता कम्हि उप्पादेंति ?।।१४।।
पंचिंदिएसु उप्पादेंति, णो एइंदिय-विगलिंदिएसु।।१५।।
पंचिंदिएसु उप्पादेंता सण्णीसु उप्पादेंति, णो असण्णीसु।।१६।।
सण्णीसु उप्पादेंता गब्भोवक्कंतिएसु उप्पादेंति, णो सम्मुच्छिमेसु।।१७।।
गब्भोवक्कंतिएसु उप्पादेंता पज्जत्तएसु उप्पादेंति, णो अपज्जत्तएसु।।१८।।
पज्जत्तएसु उप्पादेंता दिवसपुधत्तप्पहुडि जावमुवरिमुप्पादेंति, णो हेट्ठादो।।१९।।
वं जाव सव्वदीवसमुद्देसु।।२०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तिर्यञ्च: प्रथमसम्यक्त्वमुत्पादयन्त: बादरसूक्ष्मैकेन्द्रियेषु द्वि-त्रि-चतुरिन्द्रियजीवेषु असंज्ञिपंचेन्द्रियेषु नोत्पादयितुं क्षमा: भवन्ति। अपर्याप्तकेषु-निर्वृत्त्यपर्याप्तकेषु न प्राप्नुवन्ति तत्र करणपरिणामाभावात्। दिवसपृथक्त्वमिति कथनेन अत्र सप्ताष्टौ वा दिवसा: न गृहीतव्या:। अत्र पृथक्त्वशब्द: विपुलवाचकोऽस्ति अत: बहुषु दिवसपृथक्त्वगतेषु गर्भोपपन्ना: पर्याप्ता: पंचेन्द्रियतिर्यञ्च: प्रथमसम्यक्त्व-मुत्पादयितुं योग्या भवन्ति। इमे च असंख्यातेषु अपि द्वीपेषु असंख्यातेषु समुद्रेष्वपि प्रथमसम्यक्त्वग्रहणयोग्या भवंति।
सार्धद्वयद्वीपेषु कर्मभूमिजा भोगभूमिजा तिर्यञ्च: संति। लवणोदधि-कालोदसमुद्रयो: तिर्यञ्च: सन्ति। शेषद्वीपेषु भोगभूमिजा: तिर्यञ्च: सन्ति। अंतिमार्धापरद्वीपे अन्तिमसमुद्रे च कर्मभूमिजा: तिर्यञ्च: सन्ति।
भोगभूमिप्रतिभागिकेषु समुद्रेषु मत्स्या मकरा वा न सन्ति, आर्षेषु तत्र त्रसजीवप्रतिषेध: कृत: पुनस्तत्र प्रथमसम्यक्त्वोत्पत्तिर्न युज्यते ?
नैष दोष:, पूर्ववैरिदेवै: कर्मभूमिजतिरश्च: उत्थाप्य तत्र इमे मत्स्यमकरादय: प्रक्षिप्यन्ते कदाचित् अतस्तेषां क्षिप्तपंचेन्द्रियतिरश्चां तत्र संभवोऽस्ति इति ज्ञातव्यं।
इमे तिर्यञ्च: कतिभि: कारणै: सम्यक्त्वमुत्पादयन्तीति प्रश्नोत्तररूपेण सूत्रद्वयमवतार्यते-तिरिक्खा मिच्छाइट्ठी कदिहि कारणेहि पढमसम्मत्तं उप्पादेंति ?।।२१।।
तीहि कारणेहि पढमसम्मत्तमुप्पादेंति-केइं जाइस्सरा, केइं सोऊण, केइं जिणिंबबं दट्ठूण।।२२।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्रयोरर्थ: सुगमोऽस्ति। जिनबिंबदर्शनेन निधत्तनिकाचितस्यापि मिथ्यात्वादि-कर्मकलापस्य क्षयो भवति।
प्रोक्तं च श्रीवीरसेनाचार्येण धवलायां-
‘‘जिणबिंबदंसणेण णिधत्तणिकाचिदस्स वि मिच्छत्तादिकम्मकलावस्स खयदंसणादो। तथा चोक्तं-
दर्शनेन जिनेन्द्राणां पापसंघातकुंजरम्।
शतधा भेदमायाति गिरिर्वङ्काहतो यथा।।
तात्पर्यमेतत्-ये कर्मभूमिजा: तिर्यञ्च: सार्धद्वयद्वीपवर्तिनस्ते जिनमंदिराणां मानस्तम्भेषु जिनबिंबानि दृष्ट्वा केचित्सम्यक्त्वं उत्पादयन्ति केचित्समवसरणे गत्वा तत्रस्थमानस्तम्भविराजमानजिनबिंबानां दर्शनेन, केचित् रथयात्रादिमहामहोत्सवावसरे जिनमूर्ती: अवलोक्य च। केचित् साक्षात् समवसरणस्थितगंधकुट्यां विराजमानजिनराजतीर्थकरदेवानां दर्शनेन सम्यक्त्वगुणं लभन्ते।
उक्तं च श्रीमद्गौतमस्वामिगणधरदेवेन-
जयति भगवान् हेमाम्भोजप्रचारविजृंभिता-वमरमुकुटच्छायोद्गीर्णप्रभापरिचुंबितौ।
कलुषहृदया मानोद्भ्रान्ता: परस्परवैरिणो, विगतकलुषा: पादौ यस्य प्रपद्य विशश्वसु:।।
शेषा: स्वयंभूरमणपर्वतापरभागवर्तिनो कर्मभूमिजा: भोगकुभोगभूमिजा: जिनबिंबदर्शनमन्तरेण अन्यकारणाभ्यामेव सम्यक्त्वमुत्पादयन्ति।
कथितं चान्यत्रापि- केइ पडिवोहणेण य केइ सहावेण तासु भूमीसुं।
दट्ठूणं सुहदुक्खं केइ तिरिक्खा बहुपयारं।।
जाइभरणेण केइ केइ जिणिंदस्स महिमदंसणदो।
जिणबिंबदंसणेण य पढममुवसमवेदगं च गेण्हंति।।
तिरश्चां केषाञ्चिज्जातिस्मरणं केषाञ्चिद्धर्मश्रवणं केषाञ्चिज्जिनबिंबदर्शनम्।
एवं द्वितीयस्थले तिर्यग्गतौ सम्यक्त्वोत्पत्तेर्बाह्यकारणप्रतिपादनत्वेन दश सूत्राणि गतानि।
मिथ्यादृष्टिमनुष्या: कस्यामवस्थायां सम्यक्त्वमुत्पादयन्तीति प्रतिपादनाय सूत्रषट्कमवतार्यते-मणुस्सा मिच्छादिट्ठी पढमसम्मत्तमुप्पादेंति।।२३।।
उप्पादेंता कम्हि उप्पादेंति।।२४।।
गब्भोवक्कंतिएसु पढमसम्मत्तमुप्पादेंति, णो सम्मुच्छिमेसु।।२५।।
गब्भोवक्कंतिएसु उप्पादेंता पज्जत्तएसु उप्पादेंता, णो अपज्जत्तएसु।।२६।।
पज्जत्तएसु उप्पादेंता अट्ठवासप्पहुडि जाव उवरिमुप्पादेंति, णो हेट्ठादो।।२७।।
एवं जाव अड्ढाइज्जदीव-समुद्देसु।।२८।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमो वर्तते। मिथ्यादृष्टिमनुष्या: प्रथमं सम्यक्त्वमुत्पादयन्ति अस्य निमित्तत्रिविधकरणपरिणामानां संभवात्। गर्भजानामेव एतत्सम्यक्त्वं न सम्मूच्र्छिमानां, तत्र प्रथमसम्यक्त्वस्य अत्यन्ताभावात्। अपर्याप्तेष्वपि प्रथमसम्यक्त्वोत्पत्ते: अत्यन्ताभावात्। अत्र अष्टवर्षादुपरि सम्यक्त्वस्य नियमोऽपि गर्भादेव गृहीतव्य:। अस्यायमर्थ:-गर्भागतजीवस्य गर्भे एव अन्तर्मुहूर्ते जीव: पर्याप्तो भवति, तत: प्रभृति अष्टवर्षो गृहीतव्य:।
उक्तं च-‘‘पज्जत्तपढमसमयप्पहुडि जाव अट्ठ वस्साणि त्ति ताव एदिस्से अवत्थाए पढमसम्मत्तुप्पत्तीए अच्चंताभावस्स अवट्ठाणादो।’’
गर्भागतस्य जीवस्य शरीरयोग्यपुद्गलानां ग्रहणयोग्यशत्ते: पूर्णतैव पर्याप्तावस्था उच्यते न च शरीरावयवरचना इति ज्ञातव्यं।
अत्र ‘समुद्देसु’ पदेन सार्धद्वयद्वीपान्तर्गतद्वयोरेव समुद्रयोग्र्रहणं कर्तव्यम्।


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अब चतुर्थ आदि पृथ्वी के नारकियों के कारण का निरूपण करने के लिए तीन सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

नीचे की चार पृथिवियों में नारकी मिथ्यादृष्टि जीव कितने कारणों से प्रथम सम्यक्त्व को उत्पन्न करते हैं ?।।१०।।

नीचे की चार पृथिवियों में नारकी मिथ्यादृष्टि जीव दो कारणों से प्रथम सम्यक्त्व को उत्पन्न करते हैं।।११।।

कितने ही जीव जातिस्मरण से और कितने ही वेदना से अभिभूत होकर सम्यक्त्व की उत्पत्ति करते हैं।।१२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-नीचे की चार पृथिवियों में धर्मश्रवण के द्वारा प्रथम सम्यक्त्व की उत्पत्ति नहीं होती क्योंकि वहाँ देवों के गमन का अभाव है।

शंका-नीचे की चार पृथिवियों में विद्यमान सम्यग्दृष्टियों से धर्मश्रवण के द्वारा प्रथम सम्यक्त्व की उत्पत्ति क्यों नहीं होती ?

समाधान-ऐसा पूछने पर उत्तर देते हैं कि नहीं होती, क्योंकि भव संबंध से या पूर्व बैर के संबंध से परस्पर विरोधी हुए नारकी जीवों के अनुग्रह्य-अनुग्राहक भाव उत्पन्न होना असंभव है।

शंका-सम्यक्त्व की उत्पत्ति के कारणों में नरकों में तीसरे नरक के नीचे देशनालब्धि कैसे संभव है ? समाधान-इसे ही बताते हैं-पूर्व भव में गुरु के मुख से जो शास्त्र का उपेदश सुना है, उसके संस्कार के वश से वहाँ चौथी आदि पृथिवियों में ‘देशनालब्धि’ होती है। जातिस्मरण निमित्त भी नरकों में ऐसा ही होता है। जैसे कि जिस किसी मनुष्य ने कोई भी नियम लेकर किसी भी निमित्त से भंग कर दिया, ऐसा व्रतभंगरूप अनाचार करके पुन: व्रत को ग्रहण नहीं किया और न उस व्रतभंग का प्रायश्चित्त ही किया, उस पाप के दोष से यदि वह जीव नरक जाता है, तो वहाँ जातिस्मरण के निमित्त से या विभंगज्ञान से उस व्रतभंगादि पाप का स्मरण कर-करके और वहाँ बार-बार वेदना का अनुभव कर-करके पापों से डरता है, अतएव उस नारकी जीव के जातिस्मरण अथवा वेदना का अनुभव वहाँ सम्यक्त्व का निमित्त-कारण बन जाता है।

ऐसा जानकर नियम को ग्रहण करने में अत्यधिक ऊहापोह-विचार नहीं करना चाहिए। यदि ग्रहण किया नियम पूर्णरूप से पाला जाता है, तो नियम से देवगति होती है। यदि कदाचित् छूट जाता है, तो भी नरक में सम्यक्त्व का कारण हो जावेगा, ऐसा चारित्रचक्रवर्ती श्री शांतिसागर जी आचार्यदेव बहुत बार कहा करते थे।

इस प्रकार प्रथम स्थल में नारकियों के सम्यक्त्वोत्पत्ति के बाह्य कारणों का निरूपण करते हुए बारह सूत्र पूर्ण हुए।

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अब तिर्यंच जीव किस अवस्था में प्रथम सम्यक्त्व को उत्पन्न करते हैं, इसका प्रतिपादन करने के लिए आठ सूत्र अवतार लेते हैंं-

सूत्रार्थ-

तिर्यंच मिथ्यादृष्टि जीव प्रथम सम्यक्त्व उत्पन्न करते हैं।।१३।।

प्रथम सम्यक्त्व उत्पन्न करने वाले तिर्यंच किस अवस्था में उत्पन्न करते हैं ?।।१४।।

तिर्यंच जीव पंचेन्द्रियों में ही प्रथम सम्यक्त्व को उत्पन्न करते हैं, एकेन्द्रियों और विकलेन्द्रियों में नहीं।।१५।।

पंचेन्द्रियों में भी प्रथम सम्यक्त्व उत्पन्न करने वाले तिर्यंच जीव संज्ञी जीवों में ही उत्पन्न करते हैं, असंज्ञियों में नहीं।।१६।।

संज्ञी तिर्यंचों में भी प्रथम सम्यक्त्व उत्पन्न करने वाले जीव गर्भोपक्रान्तिक जीवों में ही उत्पन्न करते हैं, सम्मूच्र्छिमों में नहीं।।१७।।

गर्भोपक्रान्तिक तिर्यंचों में भी प्रथम सम्यक्त्व उत्पन्न करने वाले जीव पर्याप्तकों में ही उत्पन्न करते हैं, अपर्याप्तकों में नहीं।।१८।।

पर्याप्तक तिर्यंचों में भी प्रथम सम्यक्त्व उत्पन्न करने वाले जीव दिवसपृथक्त्व से लगाकर उपरिम काल में उत्पन्न करते हैं, नीचे के काल में नहीं।।१९।।

इस प्रकार सब द्वीप-समुद्रों में तिर्यंच प्रथम सम्यक्त्व उत्पन्न करते हैं।।२०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तिर्यंच जीव प्रथम सम्यक्त्व को उत्पन्न करते हुए बादर एकेन्द्रिय, सूक्ष्म एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और असंज्ञी पंचेन्द्रियों में सम्यक्त्व उत्पन्न करने में सक्षम-समर्थ नहीं होते हैं। अपर्याप्तकों में-निर्वृत्ति अपर्याप्तकों में भी सम्यक्त्व प्राप्त नहीं कर पाते हैं क्योंकि इनमें सम्यक्त्व के योग्य करण परिणामों का अभाव है।

यहाँ पर ‘दिवस पृथक्त्व’ कहने से सात या आठ दिवस नहीं लेना। यहाँ यह पृथक्त्व शब्द विपुलता का वाचक है, इसलिए बहुत से दिवस पृथक्त्व के जाने पर गर्भ से उत्पन्न, पर्याप्तक, पंचेन्द्रिय तिर्यंच प्रथम सम्यक्त्व को उत्पन्न करने के योग्य होते हैं। ये असंख्यातों भी द्वीपों में और असंख्यातों समुद्रों में भी प्रथम सम्यक्त्व के ग्रहण के योग्य होते हैं।

ढाई द्वीपों में कर्मभूमिज और भोगभूमिज दोनों प्रकार के तिर्यंच हैं। लवणोदधि और कालोदधि समुद्रों में तिर्यंच हैं। शेष द्वीपों में भोगभूमिज तिर्यंच होेते हैं। अंतिम आधे उधर के द्वीप में और अंतिम समुद्र में कर्मभूमिज तिर्यंच होते हैं।

शंका-चूँकि ‘भोगभूमि के प्रतिभागी समुद्रों में मत्स्य या मगर नहीं हैं’, ऐसा वहाँ त्रस जीवों का प्रतिषेध किया गया है, इसलिए उन समुद्रों में प्रथम सम्यक्त्व की उत्पत्ति मानना उपयुक्त नहीं है ?

समाधान-यह कोई दोष नहीं, क्योंकि, पूर्वभव के बैरी देवों के द्वारा उन समुद्रों में डाले गये मछली, मगर आदि पंचेन्द्रिय तिर्यंचों की संभावना है। कदाचित् उन डाले गये पंचेन्द्रिय तिर्यंचों में सम्यक्त्व संभव है, ऐसा जानना चाहिए।

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ये तिर्यंच कितने कारणों से सम्यक्त्व को उत्पन्न करते हैं ? ऐसे प्रश्नोत्तररूप से दो सूत्रों का अवतार होता है-

सूत्रार्थ-

तिर्यंच मिथ्यादृष्टि जीव कितने कारणों से प्रथम सम्यक्त्व को उत्पन्न करते हैं ?।।२१।।

पूर्वोक्त पंचेन्द्रिय तिर्यंच तीन कारणों से प्रथम सम्यक्त्व को उत्पन्न करते हैं-कितने ही तिर्यंच जातिस्मरण से, कितने ही धर्मोपदेश सुनकर, कितने ही जिनबिम्बों के दर्शन करके।।२२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-दोनों सूत्रों का अर्थ सुगम है। जिनबिम्ब के दर्शन से निधत्त और निकाचित रूप भी मिथ्यात्वादि कर्मकलाप का क्षय देखा जाता है, जिससे जिनबिम्ब का दर्शन प्रथम सम्यक्त्व की उत्पत्ति का कारण होता है। श्री वीरसेन स्वामी ने धवला टीका मेें कहा भी है- जिनबिम्बदर्शन से निधत्त निकाचित भी मिथ्यात्वादि कर्मों का क्षय देखा जाता है।

श्लोकार्थ-जिनेन्द्रों के दर्शन से पापसंघातरूपी कुंजर के सौ टुकड़े हो जाते हैं, जिस प्रकार कि वङ्का के आघात से पर्वत के सौ टुकड़े हो जाते हैं।।

तात्पर्य यह है कि जो ढाईद्वीपवर्ती कर्मभूमिज तिर्यंच हैं, वे जिनमंदिरों के मानस्तंभों में जिनप्रतिमाओें को देखकर कोई-कोई सम्यक्त्व को उत्पन्न कर लेते हैं, कोई समवसरण में जाकर वहाँ पर स्थित मानस्तंभ में विराजमान जिनबिम्बों के दर्शन से, कोई तिर्यंच रथयात्रा आदि महोत्सव के अवसर पर जिनप्रतिमाओं का दर्शन करके सम्यक्त्व को प्राप्त कर लेते हैं।

कोई समवसरण में स्थित गंधकुटी में साक्षात् विराजमान जिनराज तीर्थंकर भगवन्तों के दर्शन से सम्यक्त्वगुण को प्राप्त कर लेते हैं।

श्री गणधर देव गौतम स्वामी ने भी कहा है- ये भगवान्-महावीर स्वामी जयशील हो रहे हैं कि जिनके चरणयुगल देवों द्वारा रचित स्वर्णमयी कमलों पर विहार करते हुए अति शोभायमान हैं एवं देवों के मुकुटों की किरणों से निकलती हुई प्रभा से स्पर्शित हैं। आपके ऐसे चरणयुगलों का आश्रय लेकर कलुषमना मान कषाय से ग्रसित और परस्पर में जन्मजात वैरी ऐसे पशुगण भी विश्वास को-परस्पर में प्रेमभाव को प्राप्त कर लेते हैं।।

शेष स्वयंभूरमण पर्वत के आगे के भाग में रहने वाले कर्मभूमियाँ तिर्यंच, भोगभूमिया और कुभोगभूमिया तिर्यंच जिनबिम्ब दर्शन के बिना अन्य दो कारणों से-जातिस्मरण एवं धर्मश्रवण से ही सम्यक्त्व को उत्पन्न करते हैं।

तिलोयपण्णत्तिग्रंथ में भी कहा है- उन भूमियों में कितने ही तिर्यंच जीव प्रतिबोध और कितने ही स्वभाव से भी प्रथमोपशम एवं वेदक सम्यक्त्व को ग्रहण करते हैं। इसके अतिरिक्त बहुत प्रकार के तिर्यंचों में से कितने ही सुख-दुख को देखकर, कितने ही जातिस्मरण से, कितने ही जिनेन्द्रमहिमा के दर्शन से और कितने ही जिनबिम्ब के दर्शन से प्रथमोपशम व वेदक सम्यक्त्व को ग्रहण करते हैं।

सर्वार्थसिद्धि ग्रंथ में भी कहा है- किन्हीं तिर्यंचों के जातिस्मरण से, किन्हीं के धर्मश्रवण से और किन्हीं के जिनबिम्ब दर्शन से सम्यग्दर्शन होता है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में तिर्यंचगति में सम्यक्त्वोत्पत्ति के बाह्य कारणों का प्रतिपादन करने वाले दश सूत्र पूर्ण हुए।

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अब मिथ्यादृष्टि मनुष्य किस अवस्था में सम्यक्त्व को उत्पन्न करते हैं इस विषय का प्रतिपादन करने के लिए छह सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

मिथ्यादृष्टि मनुष्य प्रथम सम्यक्त्व को उत्पन्न करते हैं।।२३।।

प्रथम सम्यक्त्व को उत्पन्न करने वाले मिथ्यादृष्टि मनुष्य किस अवस्था में उत्पन्न करते हैं ?।।२४।।

मिथ्यादृष्टि मनुष्य गर्भोपक्रान्तिकों में प्रथम सम्यक्त्व को उत्पन्न करते हैं, सम्मूच्र्छनों में नहीं।।२५।।

गर्भोपक्रान्तिकों में प्रथम सम्यक्त्व को उत्पन्न करने वाले मिथ्यादृष्टि मनुष्य पर्याप्तकों में ही उत्पन्न करते हैं, अपर्याप्तकों में नहीं।।२६।।

पर्याप्तकों में प्रथम सम्यक्त्व को उत्पन्न करने वाले गर्भोपक्रान्तिक मिथ्यादृष्टि मनुष्य आठ वर्ष से लेकर ऊपर किसी समय भी उत्पन्न करते हैं, उससे नीचे काल में नहीं।।२७।।

इस प्रकार अढाई द्वीप-समुद्रों में मिथ्यादृष्टि मनुष्य प्रथम सम्यक्त्व को उत्पन्न करते हैं।।२८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्रों का अर्थ सुगम है। मिथ्यादृष्टि मनुष्य प्रथम सम्यक्त्व को उत्पन्न करते हैं, क्योंकि इनमें प्रथम सम्यक्त्व के लिए निमित्तभूत तीन प्रकार के करण परिणामों का होना संभव है। गर्भ जन्म वाले मनुष्यों में ही सम्यक्त्व उत्पन्न होता है, न कि सम्मूच्र्छन मनुष्यों में, क्योंकि वहाँ सम्मूच्र्छन मनुष्यों में प्रथम सम्यक्त्व का अत्यंताभाव है। अपर्याप्त मनुष्यों में भी प्रथम सम्यक्त्व की उत्पत्ति का अत्यंताभाव है।

यहाँ जो सूत्र में आठ वर्ष के ऊपर सम्यक्त्वोत्पत्ति का नियम है, वह भी गर्भ से ही आठ वर्ष लेना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि गर्भ में आया हुआ जीव गर्भ में ही अन्तर्मुहूर्त में पर्याप्त हो जाता है। क्योंकि गर्भ से ही आठ वर्ष ग्रहण करने को कहा है।

धवलाटीका में कहा है-पर्याप्तकाल के प्रथम समय से लेकर आठ वर्ष पर्यंत की अवस्था में प्रथम सम्यक्त्व की उत्पत्ति के अत्यंताभाव का नियम है। गर्भ में आये हुए जीव के शरीर के योग्य पुद्गलों के ग्रहण योग्य शक्ति की पूर्णता ही पर्याप्तावस्था कही जाती है न कि शरीर के अवयवोें की रचना, ऐसा जानना चाहिए।

यहाँ सूत्र में ‘समुद्देसु’ इस पद से ढाई द्वीप के अन्तर्गत दो ही समुद्रों को ग्रहण करना चाहिए।


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संप्रति सम्यक्त्वोत्पत्तिकारणानि प्रश्नोत्तररूपेण निरूपणाय सूत्रद्वयमवतार्यते-

मणुसा मिच्छाइट्ठी कदिहि कारणेहि पढमसम्मत्तमुप्पादेंति।।२९।।

तीहि कारणेहि पढमसम्मत्तमुप्पादेंति-केइं जाइस्सरा, केइं सोऊण, केइं जिणबिंबं दट्ठूण।।३०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्रयो: अर्थ: सुगम:। कृत्रिमाकृत्रिमजिनबिंबानांदर्शनेन प्रथमोपशमसम्यक्त्वमपि प्रतिपद्यन्ते भव्यजीवा: एतत्सूत्रपदेन जिनदर्शनस्य महिमा ज्ञातव्या भवति।
कश्चिदाह-जिनमहिमां दृष्ट्वापि केचित् प्रथमसम्यक्त्वं प्रतिपद्यमाना: सन्ति तेन चतुर्भि: कारणै: प्रथमसम्यक्त्वं प्रतिपद्यंते इति वक्तव्यं ?
तस्योत्तरमाह-नैष दोष:, एतस्य कारणस्य जिनबिंबदर्शने अन्तर्भावात्। अथवा मनुष्यमिथ्यादृष्टीनां गगनगमनविरहितानां चतुर्विधदेवनिकायै: नंदीश्वरजिनगृहप्रतिमानां क्रियमाणमहामहिमावलोकने संभवाभावात्।
मेरुजिनवरमहिमा: विद्याधरमिथ्यादृष्टय: पश्यन्ति, इत्येषोऽर्थ: न वक्तव्य: इति केचिदाचार्या वदन्ति तेन
पूर्वोक्तश्चैवार्थो गृहीतव्य:।
लब्धिसंपन्नर्षिदर्शनमपि प्रथमसम्यक्त्वोत्पत्ते: कारणं भवति तत् कारणमपि अत्र पृथक् किन्न भण्यते ?
न वक्तव्यं, एतस्यापि कारणस्य जिनबिंबदर्शने अन्तर्भावात्। ऊर्जयन्त-चंपा-पावानगरादिदर्शनमपि एतेन जिनबिंबदर्शनेनैव गृहीतव्यं भवति, विंâच-तत्रतनजिनबिंबदर्शन-जिननिर्वृत्तिगमनकथनै: विना प्रथमसम्यक्त्वग्रहणाभावात्।
तत्त्वार्थमहाशास्त्रसूत्रग्रन्थे नैसर्गिकमपि प्रथमसम्यक्त्वं कथितं, तदपि अत्रैव दृष्टव्यं।
प्रोक्तं च श्रीवीरसेनाचार्येण धवलायां-
‘‘जाइस्सरण-जिणबिंबदंसणेहि विणा उप्पज्जमाणणइसग्गिय-पढमसम्मत्तस्स असंभवादो।’’
उत्पत्त्यपेक्षया सम्यग्दर्शनस्य द्वौ भेदौ अपि कथ्येते-
‘तन्निसर्गादधिगमाद्वा।। निसर्गात् स्वभावात् गुरुपदेशमन्तरेण यदुत्पद्यते तन्निसर्गजसम्यग्दर्शनं, यद् गुरुपदेशेनोत्पद्यते तदधिगमजसम्यग्दर्शनमिति। अत्रापि तत्त्वार्थवृत्तिग्रन्थे श्रीश्रुतसागरसूरिणा कथितं यत् किंचिद् गुरुपदेशादपि उत्पद्यते तदपि निसर्गजं ‘‘गुरोरक्लेशकारित्वात्।’’ अतो ज्ञायते यत् निसर्गजमपि सम्यग्दर्शनं तदपि बाह्यकारणमपक्षेत एव न च बाह्यकारणमन्तरेण कदाचिदपि उत्पद्यते। ‘असंभवादो’ इति पदेन श्रीवीरसेनाचार्येण एतदेव दृढीकृतमत्र।
एवं तृतीयस्थले मनुष्यगतौ सम्यक्त्वोपत्तेर्बाह्यकारणप्रतिपादनत्वेन सूत्राष्टकं गतम्।
संप्रति मिथ्यादृष्टिदेवा: कस्यामवस्थायां सम्यग्दर्शनमुत्पादयन्तीति प्रतिपादनाय सूत्रपंचकमवतार्यते-देवा मिच्छाइट्ठी पढमसम्मत्तमुप्पादेंति।।३१।।
उप्पादेंता कम्हि उप्पादेंति।।३२।।
पज्जत्तएसु उप्पादेंति, णो अपज्जत्तएसु।।३३।।
पज्जत्तएसु उप्पाएंता अंतोमुहुत्तप्पहुडि जाव उपरि उप्पाएंति, णो हेट्ठदो।।३४।।
एवं जाव उवरिमउवरिमगेवज्जविमाणवासियदेवा त्ति।।३५।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तत्र प्रथमसम्यक्त्वयोग्यत्रिविधकरणपरिणामा: उपलभ्यन्ते देवानां मिथ्यादृष्टीनां, तेषां अपर्याप्तानां प्रथमसम्यक्त्वोत्पत्ते: अत्यंताभावात् तदुत्पत्तिविरोधोऽस्ति। पर्याप्तप्रथमसमयादारभ्य अन्तर्मुहूर्तकालपर्यंतं त्रिविधकरणपरिणामाभावात् अन्तर्मुहूर्तानन्तरं प्रथमसम्यक्त्वग्रहणयोग्यता भवति। एष नियम: उपरिमोपरिमग्रैवेयकविमानवासिपर्यन्तं।
कतिकारणै: इमे देवा: सम्यक्त्वोत्पादनयोग्या: इति प्रश्नोत्तररुपेण सूत्रत्रयमवतार्यते-देवा मिच्छाइट्ठी कदिहि कारणेहि पढमसम्मत्तमुप्पादेंति ?।।३६।।
चदुहि कारणेहि पढमसम्मत्तमुप्पादेंति-केइं जाइस्सरा, केइं सोऊण, केइं जिणमहिमं दट्ठूण, केइं देविद्धिं दट्ठूण।।३७।।
एवं भवणवासियप्पहुडि जाव सदरसहस्सार-कप्पवासियदेवा त्ति।।३८।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-प्रथमोपशमसम्यक्त्वं कार्यं, अन्यथा तस्योत्पत्तिविरोधात्। कार्यं च कारणात् उत्पद्यते, निष्कारणस्य उत्पत्तिविरोधात्। तच्च प्रथमसम्यक्त्वं कारणात् उत्पद्यमानं कतिभि: कारणै: उत्पद्यते ? इति पृच्छासूत्रानन्तरं उत्तरसूत्रं कथितं आचार्यश्रीभूतबलिदेवेन चतुर्भि: कारणैरिति। तेषु कारणेषु जिनबिंबदर्शनं प्रथमसम्यक्त्वस्य कारणत्वेन अत्र न कथितं। अस्मिन् विषये श्रीवीरसेनाचार्यो वदति-
जिनमहिमदर्शने तस्यान्तर्भावात्, किंच जिनबिंबेन विना जिनमहिमा अनुपपत्ते:।
स्वर्गावतरण-जन्माभिषेक-परिनिष्क्रमणजिनमहिमा: जिनबिंबेन विना क्रियमाणा: दृश्यन्ते, अत: जिनमहिमादर्शने जिनबिंबदर्शनस्य अविनाभावो नास्ति ?
एतन्नाशंकनीयं, तत्रापि भावि जिनबिंबस्य दर्शनोपलंभात् । अथवा एतासु महिमासु उत्पद्यमान-प्रथमोपशमसम्यक्त्वं न जिनबिंबदर्शननिमित्तं, विंâतु जिनगुणश्रवणनिमित्तमिति।
देवद्र्धिदर्शनं जातिस्मरणे किन्न प्रविशति ?
न प्रविशति, आत्मन: अणिमादिऋद्धी: दृष्ट्वा एता: ऋद्धय: जिनप्रज्ञप्तधर्मानुष्ठानात् जाता: इति प्रथमसम्यक्त्वप्राप्ति: जातिस्मरणनिमित्ता भवति। किंतु यदा सौधर्मैद्रादिदेवानां महद्र्धी: दृष्ट्वा एता: सम्यग्दर्शनसंयुक्तसंयमफलेन जाता:, अहं पुन: सम्यग्दर्शनविरहितद्रव्यसंयमफलेन वाहनादिनीचदेवेषु उत्पन्न:, इति ज्ञात्वा यत् प्रथमसम्यक्त्वग्रहणं जायते तत् देवद्र्धिदर्शननिमित्तकं। तन्न द्वयोरेकत्वमिति।
किं च जातिस्मरणं तु उत्पन्नप्रथमसमयप्रभृति अन्तर्मुहूर्तकालाभ्यन्तरे एव भवति। देवद्र्धिदर्शनं पुन: कालान्तरे चैव भवति-अन्तर्मुहूर्तानन्तरमेव, तेन न द्वयोरेकत्वं। एष एवार्थ: नारकाणां जातिस्मरण-वेदनाभिभवयोरपि वक्तव्य:।
एवं भवनवासि-व्यन्तर-ज्योतिर्वासिदेवानां सौधर्मादिसहस्रारपर्यंतकल्पवासिनां पूर्वोक्तानि चत्वारि कारणानि भवन्तीति।
आनतादिकल्पवासिनां सम्यक्त्वोत्पत्तिकारणप्रतिपादनाय प्रश्नोत्तररूपेण सूत्रद्वयमवतार्यते-आणद-पाणद-आरण-अच्चुदकप्पवासियदेवेसु मिच्छादिट्ठी कदिहि कारणेहिं पढमसम्मत्तमुप्पादेंति।।३९।।
तीहि कारणेहि पढमसम्मत्तमुप्पादेंति-केइं जाइस्सरा, केइं सोऊण, केइं जिणमहिमं दट्ठूण।।४०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्रयोरर्थ: सुगमोऽस्ति।
देवद्र्धिदर्शनेन सह चत्वारि कारणानि किन्नोक्तानि ?
नोक्तानि, किंच-तत्र महद्र्धिसंयुक्तोपरिमदेवानामागमाभावोस्ति। न, तत्र स्थितदेवानां महद्र्धिदर्शनं प्रथमसम्यक्त्वोत्पत्ते: निमित्तं, भूय: दर्शनेन तत्र विस्मयाभावात्। अथवा शुक्ललेश्याया: सद्भावेन महद्र्धिदर्शनेन संक्लेशाभावात् न तन्निमित्तं भवति।
धर्मोपदेशं श्रुत्वा यज्जातिस्मरणं, देवद्र्धिं दृष्ट्वा च यज्जातिस्मरणं, इमे द्वे अपि यद्यपि प्रथमसम्यक्त्वोत्पत्ते: निमित्ते भवत:, तह्र्यपि तत् सम्यक्त्वं जातिस्मरणनिमित्तं इति अत्र न गृह्यते, देवद्र्धिदर्शन-धर्मोपदेशश्रवणानन्तरोत्पन्नजातिस्मरणनिमित्तत्वात्। अतएव धर्मोपदेशश्रवण-देवद्र्धिदर्शननिमित्तमिति गृहीतव्यम्। एवं विधानि त्रीण्येव कारणानि एषु चतुर्षु स्वर्गेषु ज्ञातव्यानि भवन्ति।
अधुना नवग्रैवेयकादिअहमिन्द्राणां सम्यक्त्वकारणप्रतिपादनाय प्रश्नोत्तररूपेण सूत्रत्रयमवतार्यते-णवगेवज्जविमाणवासियदेवेसु मिच्छादिट्ठी कदिहि कारणेहि पढम-सम्मत्तमुप्पादेंति ?।।४१।।
दोहि कारणेहि पढमसम्मत्तमुप्पादेंति-केइं जाइस्सरा, केइं सोऊण।।४२।।
अणुदिसजाव सव्वट्ठसिद्धिविमाणवासियदेवा सव्वे ते णियमा सम्माइट्ठी त्ति पण्णत्ता।।४३।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-नवग्रैवेयकवासिनामहमिन्द्राणां केषांचित् जातिस्मरणं, केषांचित् धर्मश्रवणं निमित्तं, अत्र महर्षिदर्शनं नास्ति उपरिमदेवानामागमाभावात्। जिनमहिमादर्शनमपि नास्ति, नंदीश्वरादिमहिमानां तेषामागमनाभावात्।
अवधिज्ञानेन तत्रास्थिताश्चैव जिनमहिमा: पश्यन्ति इति जिनमहिमादर्शनं तेषां सम्यक्त्वोत्पत्तेर्निमित्तं किन्नोच्यते ?
न, तेषां अहमिंद्रदेवानां वीतरागाणां जिनमहिमादर्शनेन विस्मयाभावान् तत्तृतीयनिमित्तं तत्र न कथ्यते।
तेषामहमिन्द्राणां कथं धर्मश्रवणसंभव: ?
न, तेषां अन्योन्यसंलापे सति अहमिन्द्रत्वस्य विरोधाभावात्। न तत्र कश्चित् अहमिन्द्रा: कमपि संबोधयति धर्मं उपदिशति वा किन्तु तत्र तेषां परस्परधर्मचर्चा भवति, सैव चर्चा कस्यचित् मिथ्यादृष्टे: प्रथमसम्यक्त्वस्य निमित्तं भवति इति ज्ञातव्यं।
तदुपरि नवानुदिशवासिनोऽहमिन्द्रा: पंचानुत्तरवासिनश्च सर्वेऽपि नियमात् सम्यग्दृष्टय एव इति अत: तत्र सम्यक्त्वोत्पत्तेर्निमित्तानि न सन्ति।
तात्पर्यमेतत्-प्रत्येककार्यस्योत्पत्तौ उपादानकारणं निमित्तकारणं च द्वे स्त:। यथा घटस्योत्पत्तौ मृत्तिका उपादानकारणं कुंभकारचक्रदण्डादिनिमित्तकारणं। तथैव सम्यक्त्वस्योत्पत्तौ आत्मा उपादानं आत्मानं मुक्त्वा अन्यत्र सम्यक्त्वं नोत्पद्यते। निमित्तकारणस्य द्वौ भेदौ-अन्तरंगबहिरंगौ च। तत्रापि करणलब्धि: अंतरंगकारणं, बहिरंगकारणानि इमानि जातिस्मरणादीनि। अत्रापि बाह्यकारणेषु सत्सु एव सम्यक्त्वमुत्पद्यते नासत्सु। अत्राप्येतज्ज्ञातव्यं-बाह्यकारणेषु सत्सु सम्यक्त्वमुत्पद्यते न वा उत्पद्यते किन्तु असत्सु नोत्पद्यते असंभवात्, किन्तु करणलब्धौ सत्यां नियमेन जायते अतएव अस्य करणसंज्ञा वर्तते। साधकतम: करणम्।। इति सूत्रात्।
करणलब्धे: अध:करणापूर्वकरणानिवृत्तिकरणरूपेण त्रयो भेदा: सन्ति, येषु जातेषु नियमेन सम्यक्त्वमुत्पद्यते तानि करणानि। अत: इमानि साधकतमरूपेण करणानि सन्ति।
अतोऽस्माभि: बाह्यकारणस्योपेक्षा न कर्तव्या, प्रत्युत जिनबिंबदर्शनगुरुपदेशश्रवणादिकारणानि मेलयितव्यानि कोटिप्रयत्नेन निरन्तरमिति।
एवं चतुर्थस्थले देवगतौ सम्यक्त्वोत्पत्तिबाह्यकारणनिरूपणत्वेन त्रयोदशसूत्राणि गतानि।
इति सम्यक्त्वोत्पत्तिबाह्यकारणप्ररुपक: नवमीचूलिकायां प्रथमोऽन्तराधिकार: समाप्त:।

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अब सम्यक्त्वोत्पत्ति के कारणों को प्रश्नोत्तररूप से निरूपित करने के लिए दो सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

मिथ्यादृष्टि मनुष्य कितने कारणों से प्रथम सम्यक्त्व को उत्पन्न करते हैं ?।।२९।।

मिथ्यादृष्टि मनुष्य तीन कारणों से प्रथम सम्यक्त्व को उत्पन्न करते हैं-कितने ही मनुष्य जातिस्मरण से, कितने ही धर्मोपदेश सुनकर और कितने ही जिनबिम्ब के दर्शन करके।।३०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-दोनों सूत्रों का अर्थ सुगम है। कृत्रिम-अकृत्रिम जिनबिम्बों के दर्शन से भव्य जीव प्रथमोपशम सम्यक्त्व को प्राप्त कर लेते हैं। इस सूत्रपद से जिनदर्शन की महिमा को जानना चाहिए।

शंका-जिनमहिमा को देखकर भी कितने ही मनुष्य प्रथम सम्यक्त्व को प्राप्त करते हैं, इसलिए चार कारणों से मनुष्य प्रथम सम्यक्त्व को प्राप्त करते हैं, ऐसा कहना चाहिए ?

समाधान-यह कोई दोष नहीं, क्योंकि जिनमहिमादर्शन का जिनबिम्बदर्शन में अन्तर्भाव हो जाता है। अथवा, मिथ्यादृष्टि मनुष्यों के आकाश में गमन करने की शक्ति न होने से उनके चतुर्विध देवनिकायों के द्वारा किये जाने वाले नंदीश्वरद्वीपवर्ती जिनालयों में जिनेन्द्रप्रतिमाओं के महामहोत्सव देखना संभव नहीं है, इसलिए उनके जिनमहिमादर्शनरूप कारण का अभाव है।

मेरु पर्वत पर किये जाने वाले महोत्सवों को विद्याधर मिथ्यादृष्टि मनुष्य देखते हैं। इसलिए पूर्वोक्त अर्थ नहीं कहना चाहिए, ऐसा कितने ही आचार्य देव कहते हैं, अत: पूर्वोक्त अर्थ ही ग्रहण करना योग्य है।

शंका-लब्धिसम्पन्न ऋषियों का दर्शन भी तो प्रथम सम्यक्त्व की उत्पत्ति का कारण होता है, अतएव इस कारण को यहाँ पृथक् रूप से क्यों नहीं कहा ?

समाधान-नहीं कहा, क्योंकि लब्धिसम्पन्न ऋषियों के दर्शन का भी जिनबिम्बदर्शन में ही अन्तर्भाव हो जाता है।

ऊर्जयन्त पर्वत तथा चम्पापुर व पावापुर आदि के दर्शन का भी जिनबिम्ब दर्शन के भीतर ही ग्रहण कर लेना चाहिए, क्योेंकि उक्त प्रदेशवर्ती जिनबिम्बों के दर्शन तथा जिनभगवान के मोक्षगमन कथन के बिना प्रथम सम्यक्त्व का ग्रहण नहीं हो सकता। तत्त्वार्थसूत्र महाशास्त्र गंथ में नैसर्गिक प्रथम सम्यक्त्व का भी कथन किया गया है, उसका भी पूर्वोक्त कारणों से उत्पन्न हुए सम्यक्त्व में ही अन्तर्भाव कर लेना चाहिए।

श्री वीरसेनाचार्य ने धवलाटीका में कहा भी है- जातिस्मरण और जिनबिम्बदर्शन के बिना उत्पन्न होने वाला नैसर्गिक प्रथम सम्यक्त्व असंभव है।

उत्पत्ति की अपेक्षा सम्यग्दर्शन के दो भेद भी कहे गये हैं-वह सम्यग्दर्शन निसर्गज और अधिगम के भेद से दो प्रकार का है। निसर्गज-स्वभाव से गुरु के उपदेश के बिना जो सम्यक्त्व उत्पन्न होता है, वह निसर्गज सम्यग्दर्शन है और जो गुरु के उपदेश से उत्पन्न होता है, वह अधिगमज सम्यग्दर्शन है।

इस विषय में भी तत्त्वार्थवृत्ति ग्रंथ में श्री श्रुतसागरसूरि ने कहा है कि-जो किंचित् मात्र गुरु के उपदेश को प्राप्त कर भी उत्पन्न होता है, वह भी निसर्गज है क्योंकि उसमें गुरु को क्लेश-श्रमविशेष नहीं हुआ है। इससे यह जाना जाता है कि जो निसर्गज भी सम्यग्दर्शन है वह भी बाह्य कारणों की अपेक्षा रखता ही है, क्योंकि बाह्य कारणों के बिना कदाचित् भी सम्यग्दर्शन उत्पन्न नहीं होता है। यहाँ पर श्री वीरसेनाचार्य ने ‘असंभवादो’ इस पद से इसी बात को ही दृढ़ किया है, ऐसा जानना।

इस प्रकार तृतीय स्थल में मनुष्यगति में सम्यक्त्वोत्पत्ति के बाह्य कारणों के प्रतिपादन करने वाले आठ सूत्र पूर्ण हुए।

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अब मिथ्यादृष्टि देव किस अवस्था मेें सम्यग्दर्शन उत्पन्न करते हैं ? इस विषय का प्रतिपादन करने के लिए पाँच सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

देव मिथ्यादृष्टि प्रथम सम्यक्त्व उत्पन्न करते हैं।।३१।।

प्रथम सम्यक्त्व उत्पन्न करने वाले मिथ्यादृष्टि देव किस अवस्था में उत्पन्न करते हैं ?।।३२।।

प्रथम सम्यक्त्व उत्पन्न करने वाले मिथ्यादृष्टि देव पर्याप्तकों में उत्पन्न करते हैं, अपर्याप्तकों में नहीं।।३३।।

पर्याप्तकों में प्रथम सम्यक्त्व उत्पन्न करने वाले मिथ्यादृष्टि देव अन्तर्मुहूर्तकाल से लेकर ऊपर उत्पन्न करते हैं, उससे नीचे के काल में नहीं।।३४।।

इस प्रकार उपर-ऊपर ग्रैवेयकविमानवासी देव तक प्रथम सम्यक्त्व ग्रहण करते हैं।।३५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-मिथ्यादृष्टि देवों में प्रथम सम्यक्त्व के योग्य तीन प्रकार के कारण-परिणाम पाए जाते हैं। क्योंकि, अपर्याप्तकों में प्रथम सम्यक्त्व की उत्पत्ति का अत्यन्ताभाव है और इसलिए उनमें उसकी उत्पत्ति मानने में विरोध आता है। क्योंकि पर्याप्तकाल के प्रथम समय से लेकर अन्तर्मुहूर्तकाल तक तीन प्रकार के करण-परिणामों का अभाव पाया जाता है। अन्तर्मुहूर्त के अनन्तर प्रथम सम्यक्त्व की योग्यता होती है। यह नियम उपरिमोपरिम-अन्तिम ग्रैवेयक विमानवासी अहमिन्द्रों तक है।

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कितने कारणों से ये देव सम्यक्त्व को उत्पन्न करने के योग्य होते हैं ? इस प्रकार प्रश्नोत्तररूप से तीन सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

मिथ्यादृष्टि देव कितने कारणों से प्रथम सम्यक्त्व को उत्पन्न करते हैं ?।।३६।।

मिथ्यादृष्टि देव चार कारणों से प्रथम सम्यक्त्व उत्पन्न करते हैं-कितने ही जातिस्मरण से, कितने ही धर्मोपदेश सुनकर, कितने ही जिनमहिमा देखकर और कितने ही देवों की ऋद्धि देखकर।।३७।।

इस प्रकार भवनवासी देवों से लेकर शतार-सहस्रार कल्पवासी देव प्रथम सम्यक्त्व को उत्पन्न करते हैं।।३८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-प्रथम सम्यक्त्व कार्य है, अन्यथा उसकी उत्पत्ति मानने में विरोध आता है और कार्य कारण से ही उत्पन्न होता है, क्योंकि कारण के बिना कार्य की उत्पत्ति मानने में विरोध आता है। अतएव कारण से उत्पन्न होने वाला यह प्रथम सम्यक्त्व कितने कारणों से उत्पन्न होता है, ऐसा प्रश्न इस सूत्र में किया गया है।

पुन: श्री भूतबलि आचार्य ने उत्तर सूत्र कहा है कि चार कारणों से सम्यक्त्व उत्पन्न होता है। इन कारणों में जिनबिम्बदर्शन को प्रथम सम्यक्त्व के कारणरूप से नहीं कहा है।

इस विषय में श्रीवीरसेनाचार्य कहते हैं- जिनबिम्बदर्शन का जिनमहिमादर्शन में ही अन्तर्भाव हो जाता है, कारण कि जिनबिम्ब के बिना जिनमहिमा की उत्पत्ति बनती नहीं हैं।

शंका-स्वर्गावतरण, जन्माभिषेक और परिनिष्क्रमणरूप जिनमहिमाएं जिनबिम्ब के बिना की जाने वाली देखी जाती हैं, इसलिए जिनमहिमादर्शन में जिनबिम्बदर्शन का अविनाभाव नहीं है ?

समाधान-ऐसी आशंका नहीं करना चाहिए, क्योंकि स्वर्गावतरण, जन्माभिषेक और परिनिष्क्रमणरूप जिनमहिमाओं में भी भावी जिनबिम्ब का दर्शन पाया जाता है। अथवा, इन महिमाओं में उत्पन्न होने वाला प्रथम सम्यक्त्व जिनबिम्बदर्शननिमित्तक नहीं है, किन्तु जिनगुणश्रवणनिमित्तक है।

शंका-देवद्र्धिदर्शन का जातिस्मरण में समावेश क्यों नहीं होता ?

समाधान-नहीं होता, क्योंकि अपनी अणिमादिक ऋद्धियों को देखकर जब यह विचार उत्पन्न होता है कि ये ऋद्धियाँ जिन भगवान द्वारा उपदिष्ट धर्म के अनुष्ठान से उत्पन्न हुई हैं, तब प्रथम सम्यक्त्व की प्राप्ति जातिस्मरण निमित्तक होती है। किन्तु जब सौधर्मेन्द्रादिक देवों की महाऋद्धियों को देखकर यह ज्ञान उत्पन्न होता है कि ये ऋद्धियाँ सम्यग्दर्शन से संयुक्त संयम के फल से प्राप्त हुई हैं, किन्तु मैं सम्यक्त्व से रहित द्रव्यसंयम के फल से वाहनादिक नीच देवों में उत्पन्न हुआ हूँ तब प्रथम सम्यक्त्व का ग्रहण देवद्र्धिदर्शननिमित्तक होता है। इससे जातिस्मरण और देवद्र्धिदर्शन, ये प्रथम सम्यक्त्वोत्पत्ति के दोनों कारण एक नहीं हो सकते तथा जातिस्मरण उत्पन्न होने के प्रथम समय से लगाकर अन्तर्मुहूर्त काल के भीतर ही होता है। किन्तु देवद्र्धिदर्शन उत्पन्न होने के समय से अन्तर्मुहूर्तकाल के पश्चात् ही होता है। इसलिए भी उन दोनों कारणों में एकत्व नहीं है। यही अर्थ नारकियों के जातिस्मरण और वेदनाभिभवन रूप कारणों में विवेक के लिए भी कहना चाहिए।

इस प्रकार भवनवासी, व्यंतर, ज्योतिर्वासी देवों में और सौधर्म-ईशान आदि से सहस्रार स्वर्ग पर्यंत कल्पवासी देवों में ये ही चार कारण होते हैं।

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अब आनत-प्राणतादि चार कल्पवासी देवों के सम्यक्त्वोत्पत्ति के कारण का प्रतिपादन करने के लिए प्रश्नोत्तररूप से दो सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

आनत, प्राणत, आरण और अच्युत कल्पों के निवासी देवों में मिथ्यादृष्टि कितने कारणों से प्रथम सम्यक्त्व को उत्पन्न करते हैं ?।।३९।।

पूर्वोक्त आनतादि चार कल्पों के देव तीन कारणों से प्रथम सम्यक्त्व को उत्पन्न करते हैं-कितने ही जातिस्मरण से, कितने ही धर्मोपदेश सुनकर और कितने ही जिनमहिमा को देखकर।।४०।।

सिद्धांतचिंतामणिटीका-दोनों सूत्रों का अर्थ सुगम है।

शंका-यहाँ पर देवद्र्धिदर्शन सहित चार कारण क्यों नहीं कहे ?

समाधान-नहीं कहे, क्योंकि वहाँ आनतादि चार कल्पों में महद्र्धि से संयुक्त ऊपर के देवों का आगमन नहीं होता इसलिए वहाँ महद्र्धिदर्शनरूप प्रथम सम्यक्त्व की उत्पत्ति का कारण नहीं पाया जाता और उन्हीं कल्पों में स्थित देवों की महद्र्धि का दर्शन प्रथम सम्यक्त्व की उत्पत्ति का निमित्त हो नहीं सकता, क्योंकि उसी ऋद्धि को बार-बार देखने से विस्मय नहीं होता। अथवा, उक्त कल्पों में शुक्ललेश्या के सद्भाव के कारण महद्र्धि के दर्शन से कोई संक्लेशभाव उत्पन्न नहीं होते। अत: वह निमित्त नहीं है।

धर्मोपदेश सुनकर जो जातिस्मरण होता है और देवद्र्धि को देखकर जो जातिस्मरण होता है ये दोनों ही जातिस्मरण यद्यपि प्रथम सम्यक्त्व की उत्पत्ति के निमित्त होते हैं, तथापि उनसे उत्पन्न सम्यक्त्व यहाँ जातिस्मरणनिमित्तक नहीं माना गया है क्योंकि यहाँ देवद्र्धि के दर्शन व धर्मोपदेश के श्रवण के पश्चात् ही उत्पन्न हुए जातिस्मरण का निमित्त प्राप्त हुआ है। अतएव यहाँ धर्मोपदेशश्रवण और देवद्र्धिदर्शन को ही निमित्त मानना चाहिए।

इस प्रकार ये तीन ही कारण इन चार स्वर्गों में जानना चाहिए।

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अब नवग्रैवेयक आदि के अहमिन्द्रों में सम्यक्त्वोत्पत्ति के कारणों का प्रतिपादन करने के लिए प्रश्नोत्तररूप से तीन सूत्र अवतार लेते हैं-

सूत्रार्थ-

नौ ग्रैवेयक विमानवासी देवों में मिथ्यादृष्टि देव कितने कारणों से प्रथम सम्यक्त्व उत्पन्न करते हैं ?।।४१।।

नौ ग्रैवेयक विमानवासी मिथ्यादृष्टि देव दो कारणों से प्रथम सम्यक्त्व उत्पन्न करते हैं-कितने ही जातिस्मरण और कितने ही धर्मोपदेश सुनकर।।४२।।

अनुदिशों से लगाकर सर्वार्थसिद्धि तक के विमानवासी देव सभी नियम से सम्यग्दृष्टि ही होते हैं, ऐसा उपदेश पाया जाता है।।४३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-नव ग्रैवेयकवासी अहमिन्द्रों में किन्हीं के जातिस्मरण एवं किन्हीं के धर्मश्रवण निमित्त होते हैं क्योंकि नौ ग्रैवेयकों में महद्र्धिदर्शन नहीं है, क्योंकि यहाँ ऊपर के देवों के आगमन का अभाव है। यहाँ जिनमहिमादर्शन भी नहीं है, क्योंकि ग्रैवेयकविमानवासी देव नन्दीश्वरादि के महोत्सव देखने नहीं आते।

शंका-ग्रैवेयक देव अपने विमानों में रहते हुए अवधिज्ञान से जिनमहिमाओं को देखते हैं, अतएव जिनमहिमा का दर्शन उनके सम्यक्त्व की उत्पत्ति में निमित्त होता है, ऐसा क्यों नहीं कहते ?

समाधान-नहीं, क्योंकि ग्रैवेयकविमानवासी देव वीतराग होते हैं, अतएव जिनमहिमा के दर्शन से उन्हें विस्मय नहीं उत्पन्न होता। इसलिए तीसरा कारण उनके नहीं कहा गया है।

शंका-ग्रैवेयकविमानवासी देवों के धर्मश्रवण किस प्रकार संभव होता है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि उनमें परस्पर संलाप होने पर अहमिन्द्रत्व से विरोध नहीं आता। (अतएव वह संलाप ही धर्मोपदेश रूप से सम्यक्त्वोत्पत्ति का कारण हो जाता है।)

वहाँ कोई भी अहमिन्द्र न तो किसी को संबोधन देते हैं और न धर्म का उपदेश ही देते हैं, किन्तु वहाँ उनके परस्पर में धर्मचर्चा होती है वही चर्चा किन्हीं मिथ्याादृष्ट के प्रथम सम्यक्त्व का निमित्त हो जाती है, ऐसा जानना चाहिए।

इनके ऊपर नव अनुदिशवासी सभी अहमिन्द्र और पाँच अनुत्तर के सभी अहमिन्द्र नियम से सम्यग्दृष्टी ही हैं अत: वहाँ सम्यक्त्वोत्पत्ति के कारणों की बात ही नहीं है।

यहाँ तात्पर्य यह है कि-प्रत्येक कार्य की उत्पत्ति में उपादानकारण और निमित्तकारण ये दो होते हैं। जैसे-घड़े की उत्पत्ति में मिट्टी उपादान कारण है और कुंभार, चाक, दण्ड आदि निमित्तकारण हैं। उसी प्रकार सम्यक्त्व की उत्पत्ति में आत्मा उपादान है क्योंकि आत्मा को छोड़कर अन्यत्र सम्यक्त्व की उत्पत्ति नहीं है। निमित्त कारण के दो भेद हैं-अंतरंग और बहिरंग। उनमें से करण लब्धि अंतरंग कारण है और ये जातिस्मरण आदि बहिरंग कारण हैं। इन बाह्य कारणों के होने पर ही सम्यक्त्व की उत्पत्ति होती है नहीं होने पर नहीं। यहाँ पर यह भी जानना चाहिए कि बाह्य कारणों के होने पर सम्यक्त्व उत्पन्न होता है अथवा नहीं भी होता है किन्तु नहीं होने पर नहीं होता है, असंभव है, किन्तु करणलब्धि के होने पर नियम से सम्यक्त्व उत्पन्न होता है इसीलिए इसे ‘करणसंज्ञा’ है क्योंकि जैनेन्द्र व्याकरण का सूत्र है-जो साधकतम है वह करण है अर्थात् जिसके होने पर नियम से कार्य हो जावे वह ‘साधकतम’ कहलाता है।

करणलब्धि के अध:करण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण के भेद से तीन भेद हैं। जिनके होने पर नियम से सम्यक्त्व उत्पन्न हो जाता है वे ‘करण’ हैं इसलिए ये ‘साधकतमरूप’ से करण कहलाते हैं।

इसलिए हमें बाह्य कारणों की उपेक्षा नहीं करना चाहिए प्रत्युत् करोड़ों प्रयास करके निरन्तर जिनबिम्बदर्शन, गुरुओं के उपदेश का श्रवण आदि कारणों को जुटाना चाहिए।

इस प्रकार चतुर्थस्थल में देवगति में सम्यक्त्वोत्पत्ति के बाह्य कारणों का निरूपण करने वाले तेरह सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार षट्खण्डागम ग्रंथ में सम्यक्त्वोत्पत्ति के बाह्य कारणों का प्ररूपण करने वाला नवमी चूलिका में यह प्रथम अन्तराधिकार पूर्ण हुआ।