ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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1. सूत्रों की समुदायपातनिका से योगमार्गणा में काल के निरूपण तक

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सूत्रों की समुदायपातनिका से योगमार्गणा में काल के निरूपण तक

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अथ नानाजीवेन कालानुगमोऽष्टमो महाधिकार:

मंगलाचरणम्
भुजंगप्रयातं छंद:- सुकैवल्यबोधैर्जगद्व्याप्य विष्णु:। महामोहजिष्णुर्भविष्णु: सहिष्णु:।
विनालंकृतिं श्रीतनुब्र्रह्मचारी, नमस्तेऽतिवीराय धर्मस्य भत्र्रे।।१।।
अथ पंचपञ्चाशत्सूत्रै: नानाजीवापेक्षया कालानुगमो नाम अष्टमो महाधिकार: प्रारभ्यते। अस्मिन् चतुर्दशाधिकारा: कथ्यन्ते। तत्र तावत्प्रथमाधिकारे गतिमार्गणायां नानाजीवापेक्षया चतुर्गतिषु कालनिरूपणत्वेन ‘‘णाणाजीवेण-’’ इत्यादिना एकादशसूत्राणि। तत: परं द्वितीयेऽधिकारे इंन्द्रियमार्गणायां कालकथनत्वेन ‘‘इंदियाणु-’’ इत्यादिसूत्रद्वयं। तदनु तृतीयेऽधिकारे कायमार्गणायां कालनिरूपणत्वेन ‘‘कायाणु-’’ इत्यादिसूत्रद्वयं। तदनंतरं चतुर्थेऽधिकारे योगमार्गणायां कालकथनत्वेन ‘‘जोगाणुवादेण-’’ इत्यादिना एकादशसूत्राणि। तत्पश्चात् पंचमेऽधिकारे वेदमार्गणायां कालकथनमुख्यत्वेन ‘‘वेदाणु-’’ इत्यादिसूत्रद्वयं। तत: परं षष्ठेऽधिकारे कषायमार्गणायां कालनिरूपणत्वेन ‘‘कसायाणु-’’ इत्यादिना सूत्रे द्वे। तदनंतरं सप्तमेऽधिकारे ज्ञानमार्गणायां कालकथनत्वेन ‘‘णाणाणुवादेण-’’ इत्यादिसूत्रद्वयं। तत: परं अष्टमेऽधिकारे संयममार्गणायां कालनिरूपणत्वेन ‘‘संजमाणु-’’ इत्यादिसूत्रपंचकं। तत्पुन: नवमेऽधिकारे दर्शनमार्गणाधिकारे कालकथनप्रकारेण ‘‘दंसणाणुवादेण-’’ इत्यादिसूत्रद्वयं। पुनश्च दशमेऽधिकारे लेश्यामार्गणायां कालनिरूपणत्वेन ‘‘लेस्साणुवादेण-’’ इत्यादिसूत्रद्वयं। पुनरपि एकादशेऽधिकारे भव्यमार्गणायां कालनिरूपणत्वेन ‘‘भविया-’’ इत्यादिना सूत्रे द्वे। तत: परं द्वादशेऽधिकारे सम्यक्त्वमार्गणायां कालप्ररूपणायां ‘‘सम्मत्ताणु-’’ इत्यादिसूत्राष्टकं। ततश्च त्रयोदशेऽधिकारे संज्ञिमार्गणायां कालनिरूपणत्वेन ‘‘सण्णिया-’’ इत्यादिसूत्रद्वयं। पुनश्चाहारमार्गणायां चतुर्दशेऽधिकारे कालकथनमुख्यत्वेन ‘‘आहारा-’’ इत्यादिसूत्रद्वयमिति समुदायपातनिका सूचिता भवति।

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अथ नाना जीव की अपेक्षा कालानुगम नामक आठवाँ महाधिकार प्रारंभ

मंगलाचरण

श्लोकार्थ-अपने केवलज्ञान के द्वारा जगत् व्यापी होने से जो ‘विष्णु’ हैं। महामोह-मोहरूपी राजा पर विजय प्राप्त करने से जिष्णु हैं, भव का अन्त कर देने से ‘भविष्णु’ हैं, सहनशील होने के कारण ‘‘सहिष्णु’’ हैं तथा बिना अलंकारों-आभूषणों के जो ब्रह्मचारी-निविकारी तनु-शरीर वाले हैं, ऐसे धर्म के भत्र्ता-स्वामी अतिवीर भगवान के लिए मेरा नमस्कार है।।१।।

अब चार अधिकारों में नाना जीव की अपेक्षा कालानुगम नाम का आठवाँ महाधिकार प्रारंभ होता है। इस महाधिकार में चौदह अधिकार हैं। उनमें से गतिमार्गणा नाम के प्रथम अधिकार में नाना जीवों की अपेक्षा चारों गतियों में काल का निरूपण करने हेतु ‘‘णाणाजीवेण’’ इत्यादि ग्यारह सूत्र हैं। उसके आगे द्वितीय अधिकार में इन्द्रिय मार्गणा में काल का कथन करने वाले ‘‘इंदियाणु’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। पुन: तृतीय कायमार्गणा अधिकार में काल का निरूपण करने वाले ‘‘कायाणु’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। तदनंतर चतुर्थ योगमार्गणा अधिकार में काल का कथन करने हेतु ‘‘जोगाणुवादेण’’ इत्यादि ग्यारह सूत्र हैं। तत्पश्चात् पंचम वेदमार्गणा अधिकार में काल कथन की मुख्यता वाले ‘‘वेदाणु’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। आगे छठी कषायमार्गणा अधिकार में कालनिरूपण करने हेतु ‘‘कसायाणु’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। तदनंतर सातवीं ज्ञानमार्गणा में कालकथन करने वाले ‘‘णाणाणुवादेण’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। उसके बाद आठवीं संयममार्गणा में कालनिरूपण करने वाले ‘‘संजमाणु’’ इत्यादि पाँच सूत्र हैं। पुन: नवमी दर्शनमार्गणा में कालकथन प्रकार से दंसणाणुवादेण’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। आगे दशवीं लेश्यामार्गणा में कालनिरूपण करने हेतु ‘‘लेस्साणुवादेण’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। पुन: ग्यारहवीं भव्यमार्गणा में काल का निरूपण करने वाले ‘‘भविया’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। उसके बाद बारहवीं सम्यक्त्वमार्गणा में कालप्ररूपणा में ‘‘सम्मत्ताणु’’ इत्यादि आठ सूत्र हैं। आगे तेरहवीं संज्ञीमार्गणा में काल का निरूपण करने हेतु ‘‘सण्णिया’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। पुनश्च आहारमार्गणा नामक चौदह अधिकार में कालकथन की मुख्यता वाले ‘‘आहारा’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। इस प्रकार महाधिकार के प्रारंभ में सूत्रों की समुदायपातनिका सूचित की गई है।

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अथ गतिमार्गणाधिकार:

इदानीं गतिमार्गणायां नरकगतौ कालप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-

णाणाजीवेण कालाणुगमेण गदियाणुवादेण णिरयगदीए णेरइया केवचिरं कालादो होंति ?।।१।।
सव्वद्धा।।२।।
एवं सत्तसु पुढवीसु णेरइया।।३।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्रे नानाजीवग्रहणमेकजीवप्रतिषेधार्थं। ‘णेरइय’ निर्देश: तत्र नरकभूमिषु स्थितपृथिवीकायिकादिप्रतिषेधफल:। नरकगतौ नारका: किमनादि-अपर्यवसिता:, किमनादिसपर्यवसिता:, किं साद्यपर्यवसिता:, किं सादि-सपर्यवसिता: ? इति शिष्यस्याशंका प्रकटीकृता। अथवा नेदमाशंकितसूत्रं, किन्तु पृच्छासूत्रमिति वक्तव्यं। एषोऽर्थ: सर्वशंकासूत्रेषु योजयितव्य:।
आचार्य: प्राह-इमे नारका: अनाद्यपर्यवसिता: भवन्ति, शेषास्त्रयो विकल्पा एषु न सन्ति, स्वभावात्। सर्व: स्वभाव: सहेतुक एवेति नियमो नास्ति, एकान्तप्रसंगात्। तस्मात् ‘‘ण अण्णहावाइणो जिणा’’। इतीदं श्रद्धातव्यं।
यथा नारकाणां सामान्येन अनाद्यनन्त: संतानकाल: कथितस्तथा सप्तसु पृथिवीसु नारकाणामपि। प्रत्येकपृथिवीषु संतानस्य व्युच्छेदो न भवतीति उत्तंâ भवति।
एवं प्रथमादिपृथिवीषु नारकाणां काल: प्रतिपादित:।
अधुना तिर्यग्मनुष्याणां कालप्रतिपादनाय सूत्रपञ्चकमवतार्यते-
तिरिक्खगदीए तिरिक्खा पंचिंदियतिरिक्खा पंचिंदियतिरिक्खपज्जत्ता पंचिंदियतिरिक्खजोणिणी पंचिंदियतिरिक्खअपज्जत्ता, मणुसगदीए मणुसा मणुसपज्जत्ता मणुसिणी केवचिरं कालादो होंति ?।।४।।
सव्वद्धा।।५।।
मणुसअपज्जत्ता केवचिरं कालादो होंति ?।।६।।
जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।७।।
उक्कस्सेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागो।।८।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तिर्यग्गतौ सामान्यतिर्यञ्च: पंचेन्द्रियतिर्यञ्च: पंचेन्द्रियतिर्यक्पर्याप्ता: पंचेन्द्रियतिर्यग्योनिमत्य: पंचेन्द्रियतिर्यगपर्याप्ताश्चेमे पंचविधा:, मनुष्यगतौ सामान्यमनुष्या: मनुष्यपर्याप्ता: मनुषिन्य: इमे त्रिविधाश्च कियत्कालपर्यन्तं भवन्तीति पृच्छासूत्रं वर्तते।
अमी: अष्टविधा अपि संतानं प्रतीत्य किमनाद्यनन्ता: किमनादिसान्ता: किं सादि-अनन्ता:, किं सादि-सान्ता: ? यदि सादिसान्ता अपि सन्तस्तत्र किमेकसमयावस्थायिन: किं द्विसमया: किं त्रिसमया:, एवमावलिका-क्षण-लव-मुहूर्त-दिवस-पक्ष-मास-ऋतु-अयन-संवत्सर-पूर्व-पर्व-पल्य-सागर-उत्सर्पिणी-कल्पादिकालावस्थायिन इति आशंक्य तस्योत्तरसूत्रं भणति-
‘‘सव्वद्धा’’ सर्वा अद्धा कालो येषां ते सर्वाद्धा भवन्ति, संतानं प्रति इमे सर्वकालावस्थायिन इति कथितं भवति। केचिद् जीवा अनर्पितगते: आगत्य लब्ध्यपर्याप्तमनुष्येषूत्पद्यान्तरं विनाश्य क्षुद्रभवग्रहणकाल-पर्यन्तं स्थित्वा नि:शेषरूपेणानर्पितगतिं गतास्तेषां एतज्जघन्यकाल उपलभ्यते।
उत्कर्षेण-अपर्याप्तमनुष्येषु अन्तरं कृत्वा स्थितेषु अनर्पितगते: स्तोका: जीवा अपर्याप्तमनुष्येष्वागत्योत्पन्ना:। नष्टमन्तरं। तेषां जीवानां जीवितद्विचरमसमय इति पुनरपि उत्पत्तिं प्रतीत्यान्तरं कृत्वा पुन: अन्य जीवान् अपर्याप्तमनुष्येषूत्पादयितव्या:। तत्राप्युत्पत्तिं प्रतीत्यार्पितजीवानां जीवितद्विचरमसमय इति अन्तरं कृत्वा पुन: अन्ये जीवा: उत्पादयितव्या:। तत्राप्युत्पत्तिं प्रतीत्यार्पितजीवानां जीवितद्विचरमसमय: इत्यन्तरं कृत्वा अन्ये उत्पादयितव्या:। अनेन प्रकारेण पल्योपमस्यासंख्येयभागमात्रवारेषु गतेषु ततो नियमात् अन्तरं भवति।
एतस्मिन् काले आनीयमाने ‘एकस्यां वारशलाकायां यदि संख्यातावलिमात्र:कालो लभ्यते, तर्हि पल्योपमस्यासंख्येयभागमात्रशलाकासु किं लभामो’ इति फलेन इच्छां गुणयित्वा प्रमाणेनापवर्तिते अपर्याप्तमनुष्याणां संतानकाल: पल्योपमस्यासंख्यातभागमात्रो जात:। केचिदाचार्या: एकामायुस्थितिं स्थापयित्वावलिकाया: असंख्यातभागमात्रनिरन्तरोपक्रमकालेन गुणयित्वा प्रमाणेनापवर्तन्ते तेषामेष कालो नागच्छति।
संप्रति देवगतौ देवानां कालप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
देवगदीए देवा केवचिरं कालादो होंति ?।।९।।
सव्वद्धा।।१०।।
एवं भवणवासियप्पहुडि जाव सव्वट्ठसिद्धिविमाणवासियदेवा।।११।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमोऽस्ति।नानाजीवापेक्षया देवा: देवगतिषु चतुर्णिकायेषु सर्वकालमेव सन्ति।
एवं चतुर्गतिषु जीवानां कालनिरूपणत्वेन एकादशसूत्राणि गतानि।
इति श्री षट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे कालानुगमनाम- महाधिकारे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां गतिमार्गणानाम प्रथमोऽधिकार: समाप्त:।

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अथ गतिमार्गणा अधिकार

अब यहाँ सर्वप्रथम गतिमार्गणा में नरकगति में काल का प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

नाना जीवों की अपेक्षा कालानुगम से गतिमार्गणा के अनुसार नरकगति में नारकी जीव कितने काल तक रहते हैं ?।।१।।

नाना जीवों की अपेक्षा नरकगति में नारकी जीव सर्वकाल रहते हैं।।२।।

इसी प्रकार नाना जीवों की अपेक्षा सातों पृथिवियों में नारकी जीव सर्वकाल रहते हैं।।३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीकासूत्र में ‘नाना जीव’ शब्द का ग्रहण एक जीव का प्रतिषेध करने हेतु किया है। ‘‘णेरइय’’ अर्थात् ‘नारकी’ पद का निर्देश नरकभूमियों में रहने वाले पृथिवीकायिक आदि जीवों का प्रतिषेध करने हेतु है। नरकगति में नारकी जीव क्या अनादि-अपर्यवसित है, क्या अनादि-सपर्यवसित है, क्या सादि-अपर्यवसित हैं और क्या सादि-सपर्यवसित हैं इस प्रकार सूत्र द्वारा शिष्य की आशंका को प्रकट किया है। अथवा यह आशंका सूत्र नहीं है, किन्तु पृच्छासूत्र है, ऐसा कहना चाहिए। यह अर्थ सभी शंका सूत्रों में जोड़ना चाहिए। आचार्य कहते हैं कि-नारकी जीव अनादि-अपर्यवसित हैं, शेष तीन विकल्प इनमें नहीं हैं, क्योंकि ऐसा स्वभाव से ही है और सब स्वभाव सहेतुक ही हो, ऐसा कोई नियम नहीं है, क्योंकि ऐसा मान लेने में एकान्तवाद का प्रसंग आता है। इसलिए जिनदेव अन्यथावादी नहीं होते हैं, ऐसा श्रद्धान करना चाहिए।

जिस प्रकार नारकियों का सामान्य से अनादि-अनन्त सन्तान काल कहा गया है। उसी प्रकार सातों पृथिवियों में जानना चाहिए, क्योंकि प्रत्येक पृथिवी में नारकियों कीपरम्परा का व्युच्छेद नहीं होता है, ऐसा इस सूत्र का अभिप्राय है।

इस प्रकार से प्रथम आदि नरकपृथिवियों में नारकियों का काल प्रतिपादित किया गया।

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अब तिर्यंच और मनुष्यों का काल बतलाने हेतु पाँच सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

तिर्यंचगति में तिर्यंच, पंचेन्द्रिय तिर्यंच, पंचेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त, पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिनी व पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपर्याप्त तथा मनुष्यगति में मनुष्य, मनुष्य पर्याप्त और मनुष्यिनी कितने काल तक रहते हैं ?।।४।।

वे जीव सर्वकाल रहते हैं।।५।।

मनुष्य अपर्याप्त जीव कितने काल तक रहते हैं ?।।६।।

मनुष्य अपर्याप्त जघन्य से क्षुद्रभवग्रहण काल तक रहते हैं।।७।।

वे ही मनुष्य अपर्याप्त जीव उत्कृष्ट से पल्योपम के असंख्यातवें भाग प्रमाण काल तक रहते हैं।।८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तिर्यंचगति में सामान्य तिर्यंच, पंचेन्द्रिय तिर्यंच, पंचेन्द्रिय पर्याप्त तिर्यंच, पंचेन्द्रिययोनिमती तिर्यंच और पंचेन्द्रियअपर्याप्त तिर्यंच ये पाँच प्रकार के होते हैं। मनुष्यगति में सामान्यमनुष्य, पर्याप्त मनुष्य और मनुष्यिनी ये तीन भेद हैं और ये सभी कितने काल तक होते हैं ? ऐसा पृच्छा सूत्र है।

ये आठों प्रकार के तिर्यंच और मनुष्य सन्तान-परम्परा की अपेक्षा ‘क्या अनादि अनंत हैं, क्या अनादि-सान्त है, क्या सादि-अनन्त है, क्या सादि-सान्त है ? यदि सादि-सान्त हैं तो वे भी क्या एक समय अवस्थायी हैं ? क्या दो समय अवस्थायी हैं ? क्या तीन समय अवस्थायी हैं ? इसी प्रकार वे क्या आवली, क्षण, लव, मुहूर्त, दिवस, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, संवत्सर, पूर्व, पर्व, पल्योपम, सागरोपम, उत्सर्पिणी एव कल्पादि काल तक अवस्थायी हैं। इस प्रकार आशंका करके उसका उत्तरसूत्र कहते हैं।

‘‘सव्वद्धा’’ यह पाँचवाँ सूत्र हैं अर्थात् ‘सर्व हैं अद्धा अर्थात् काल जिनका वे सर्वाद्र्धा होते हैं’ इस बहुब्रीहि समास के अनुसार ‘सर्वाद्र्धा’ पद का अर्थ सर्वकाल होता हैं, अर्थात् संतान की अपेक्षा वहाँ उक्त जीव सर्वकाल अवस्थित रहते हैं। यह इस सूत्र का अभिप्राय बताया है। कोई जीव अविवक्षित गति से आकर मनुष्य अपर्याप्तों में उत्पन्न होकर व अन्तर को नष्ट करके वहाँ क्षुद्रभवग्रहणकाल तक रहकर नि:शेषरूप से अविवक्षित गति में गये हैं, तो उन जीवों का क्षुद्रभवग्रहणमात्र जघन्य काल पाया जाता है।

उत्कृष्ट से-अपर्याप्तक मनुष्य जीवों में अन्तर करके स्थित होने पर अविवक्षित गतियों से कम जीव मनुष्य अपर्याप्तों में आकर उत्पन्न हुए। उनका अन्तर नष्ट हो गया। उन जीवों को जीवित रहने के लिए द्विचरम समय तक फिर भी उत्पत्ति की अपेक्षा अन्तर करके पुन: अन्य जीवों को मनुष्य अपर्याप्तों में उत्पन्न कराना चाहिए। वहाँ भी उत्पत्ति की अपेक्षा विवक्षित जीवों के जीवित रहने के द्विचरम समय तक अन्तर करके पुन: अन्य जीवों में उत्पन्न कराना चाहिए। वहाँ भी उत्पत्ति की अपेक्षा विवक्षित जीवों के जीवित रहने के द्विचरम समय तक अन्तर करके अन्य जीवों को उत्पन्न कराना चाहिए। इस प्रकार से पल्योपम के असंख्यातवें भाग प्रमाण वारों के बीत जाने पर तत्पश्चात् नियम से अन्तर होता है।

इस काल के लाते समय ‘यदि एक बार शलाका में संख्यात आवली प्रमाण काल लब्ध होता है तो पल्योपम के असंख्यातवें भाग प्रमाण चार शलाकाओं में कितना काल लब्ध होगा ? इस प्रकार फल राशि से इच्छाराशि को गुणित कर प्रमाणराशि से अपवर्तित करने पर अपर्याप्त मनुष्यों की परम्परा का काल पल्योपम के असंख्यातवें भाग प्रमाण होता है। कितने ही आचार्य एक आयु स्थिति को स्थापित कर आवली के असंख्यातवें भाग प्रमाण निरन्तर उपक्रमकाल से गुणित करके प्रमाण से अपवर्तित करते हैं। उनके उक्त विधान से यह काल नहीं आता है।

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अब देवगति में देवों का काल प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

देवगति में देव कितने काल तक रहते हैं ?।।९।।

देवगति में देव सर्वकाल रहते हैं।।१०।।

इसी प्रकार भवनवासी देवों से लेकर सर्वार्थसिद्धि विमानवासी देवों तक सब देव सर्वकाल रहते हैं।।११।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इन सभी सूत्रों का अर्थ सुगम है। नाना जीव की अपेक्षा देव देवगति में चारों निकायों में सर्वकाल ही पाये जाते हैं।

इस प्रकार से प्रथम अधिकार में चारों गतियों के जीवों का काल निरूपण करने वाले ग्यारह सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में कालानुगम नामक महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में गतिमार्गणा नाम का प्रथम अधिकार समाप्त हुआ।

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अथ इन्द्रियमार्गणाधिकार:

संप्रति इन्द्रियमार्गणायां जीवानां कालकथनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-

इंदियाणुवादेण एइंदिया बादरा सुहुमा पज्जत्ता अपज्जत्ता बीइंदिया तीइंदिया चउिंरदिया पंचिंदिया तस्सेव पज्जत्ता अपज्जत्ता केवचिरं कालादो होंति ?।।१२।।
सव्वद्धा।।१३।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एकेन्द्रिया एकेन्द्रियपर्याप्ता एकेन्द्रियापर्याप्ता:, बादरैकेन्द्रिया बादरैकेन्द्रियपर्याप्ता: बादरैकेन्द्रियापर्याप्ता:, सूक्ष्मैकेन्द्रिया: सूक्ष्मैकेन्द्रियपर्याप्ता: सूक्ष्मैकेन्द्रियापर्याप्ताश्च इमे नवधा एकेन्द्रियजीवा:। द्वीन्द्रिया: त्रीन्द्रिया: चतुरिन्द्रिया: पंचेन्द्रिया: चतुर्विधा: एषां पर्याप्ताश्चतुर्विधा अपर्याप्ताश्चतुर्विधा: एवं द्वादशविधा: भवन्ति। एवं एकेन्द्रियादिपंचेन्द्रियपर्यंता एकविंशतिभेदा: सन्ति।
इमे सर्वेऽपि जीवा: सर्वकालं सन्ति नानाजीवापेक्षयेति।
एवं इन्द्रियमार्गणायां कालकथनत्वेन सूत्रद्वयं गतम्।
इति श्री षट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे कालानुगमनाम महाधिकारे गणिनी-ज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां इन्द्रियमार्गणानाम द्वितीयोऽधिकार: समाप्त:।

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अथ इन्द्रियमार्गणा अधिकार

अब इन्द्रियमार्गणा में जीवों का कालकथन करने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

इन्द्रियमार्गणा के अनुसार एकेन्द्रिय, एकेन्द्रिय पर्याप्त, एकेन्द्रिय अपर्याप्त, बादर एकेन्द्रिय, बादर एकेन्द्रिय पर्याप्त, बादर एकेन्द्रिय अपर्याप्त, सूक्ष्म एकेन्द्रिय, सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्याप्त, सूक्ष्म एकेन्द्रिय अपर्याप्त, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रिय तथा उनके पर्याप्त और अपर्याप्त जीव कितने काल तक रहते हैं ?।।१२।।

उक्त जीव सर्वकाल रहते हैं।।१३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एकेन्द्रिय जीव, एकेन्द्रिय पर्याप्त, एकेन्द्रिय अपर्याप्त, बादर एकेन्द्रिय, बादर एकेन्द्रिय पर्याप्त, बादर एकेन्द्रिय अपर्याप्त, सूक्ष्म एकेन्द्रिय, सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्याप्त, सूक्ष्म एकेन्द्रिय अपर्याप्त ये नौ भेद एकेन्द्रिय जीवों के हैं। दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय, चार इन्द्रिय और पंचेन्द्रिय ये चार और इन चारों के चार पर्याप्त और चार अपर्याप्त इस प्रकार बारह भेद हो जाते हैं। इस प्रकार एकेन्द्रिय से लेकर पञ्चेन्द्रिय पर्यन्त इक्कीस भेद होते हैं।

ये सभी जीव नाना जीवों की अपेक्षा सर्वकाल पाये जाते हैं।

इस प्रकार से द्वितीय स्थल में इन्द्रियमार्गणा में कालकथन करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में कालानुगम नामक महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में इन्द्रियमार्गणा नाम का द्वितीय अधिकार समाप्त हुआ।

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अथ कायमार्गणाधिकार:

इदानीं कायमार्गणायां कालनिरूपणार्थं सूत्रद्वयमवतार्यते-

कायाणुवादेण पुढविकाइया आउकाइया तेउकाइया वाउकाइया वणप्फ-दिकाइया णिगोदजीवा बादरा सुहुमा पज्जत्ता अपज्जत्ता बादरवणप्फ-दिकाइयपत्तेयसरीरपज्जत्तापज्जत्ता तसकाइयपज्जत्ता अपज्जत्ता केवचिरं कालादो होंति ?।।१४।।
सव्वद्धा।।१५।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-कायमार्गणानुसारेण पृथिवीकायिका: पृथिवीकायिकपर्याप्ता: पृथिवीकायिका-पर्याप्ता:, बादरपृथिवीकायिका: बादरपृथिवीकायिकपर्याप्ता बादरपृथिवीकायिकापर्याप्ता:, सूक्ष्मपृथिवी-कायिका: सूक्ष्मपृथिवीकायिकपर्याप्ता: सूक्ष्मपृथिवीकायिकापर्याप्ता: इमे पृथिवीकायिका नवविधा:। एतेनैव अप्कायिका: नवविधा:, तेजस्कायिका: नवविधा:, वायुकायिका: नवविधा:। वनस्पतिकायिका: वनस्पतिकायिकपर्याप्ता: वनस्पतिकायिकापर्याप्ता: बादरवनस्पतिकायिका: बादरवनस्पतिकायिकपर्याप्ता: बादरवनस्पतिकायिकापर्याप्ताश्चेमे षड्विधा:। निगोदजीवा: बादरसूक्ष्मभेदेन पर्याप्तापर्याप्तभेदेनापि नवविधा:। बादरवनस्पतिप्रत्येकशरीरा: बादरवनस्पतिकायिकप्रत्येकशरीरपर्याप्ता:, बादरवनस्पतिकायिक-प्रत्येकशरीरा-पर्याप्ता: त्रिविधा: एवमेकेन्द्रियस्थावरजीवा: चतु:पञ्चाशद्विधा: भवन्ति।
त्रसजीवा: त्रसजीवपर्याप्ता: त्रसजीवापर्याप्ताश्च त्रिविधा:, सर्वे मिलित्वा सप्तपञ्चाशद् भेदा: भवन्ति। इमे षट्कायजीवा: सर्वकालं सन्ति।
एवं षट्कायजीवानां कालकथनत्वेन द्वे सूत्रे गते।
इति श्री षट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे कालानुगमनाम- महाधिकारे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां कायमार्गणानाम तृतीयोऽधिकार: समाप्त:।

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अथ कायमार्गणा अधिकार

अब कायमार्गणा में काल का निरूपण करने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

कायमार्गणा के अनुसार पृथिवीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक, वनस्पतिकायिक, निगोदजीव, बादर, सूक्ष्म, पर्याप्त-अपर्याप्त, बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येक शरीर पर्याप्त-अपर्याप्त, त्रसकायिक पर्याप्तक-अपर्याप्त जीव कितने काल तक रहते हैं ?।।१४।।

ये सभी जीव सर्वकाल रहते हैं।।१५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-कायमार्गणा के अनुसार पृथिवीकायिक, पृथिवीकायिक पर्याप्तक, पृथिवीकायिक अपर्याप्तक, बादर पृथिवीकायिक, बादर पृथिवीकायिक पर्याप्त, बादर पृथिवीकायिक अपर्याप्त, सूक्ष्म पृथिवीकायिक, सूक्ष्म पृथिवीकायिक पर्याप्त, सूक्ष्म पृथिवीकायिक अपर्याप्त ये पृथिवीकायिक के नौ भेद हैं। इसी प्रकार अप्कायिक के नौ भेद हैं। तेजस्कायिक के नौ भेद हैं। वायुकायिक के नौ भेद हैं। वनस्पति, वनस्पतिकाियक पर्याप्त, वनस्पतिकायिक अपर्याप्त, बादर वनस्पतिकायिक, बादर वनस्पतिकायिक पर्याप्त, बादर वनस्पतिकायिक अपर्याप्त ये वनस्पतिकायिक के छह भेद हैं। निगोद जीव, निगोद जीव पर्याप्त, निगोद जीव अपर्याप्त, बादरनिगोद जीव, बादर निगोद जीव पर्याप्त, बादर निगोद जीव अपर्याप्त, सूक्ष्म निगोद जीव, सूक्ष्म निगोद जीव पर्याप्त, सूक्ष्म निगोद जीव अपर्याप्त के भेद से निगोद जीव नौ प्रकार के हैं। बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येक शरीर, बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येक शरीर पर्याप्त, बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येक शरीर अपर्याप्त के भेद से तीन प्रकार के हैं। इस प्रकार एकेन्द्रिय स्थावर जीवों के ५४ भेद होते हैं।

त्रसकायिक जीव, त्रसकायिक पर्याप्त जीव और त्रसकायिक अपर्याप्त जीव ये तीन प्रकार के हैं। अत: सब मिलकर ५७ भेद होते हैं। ये छहों काय के जीव सर्वकाल पाये जाते हैं।

इस प्रकार से तृतीय स्थल में षट्काय जीवों का काल कथन करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में कालानुगम नामक महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में कायमार्गणा नाम का तीसरा अधिकार समाप्त हुआ।

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अथ योगमार्गणाधिकार:

संप्रति योगमार्गणायां मनोवचनकाययोगिनां आहारयोगवर्जितानां कालनिरूपणाय सूत्रपञ्चकमवतार्यते-

जोगाणुवादेण पंचमणजोगी पंचवचिजोगी कायजोगी ओरालियकाय-जोगी ओरालियमिस्सकायजोगी वेउव्वियकायजोगी कम्मइयकायजोगी केवचिरं कालादो होेंति ?।।१६।।
सव्वद्धा।।१७।।
वेउव्वियमिस्सकायजोगी केवचिरं कालादो होंति ?।।१८।।
जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।१९।।
उक्कस्सेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागो।।२०।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थ: सुगमो वर्तते। वैक्रियिकमिश्रकाययोगिनां जघन्येनान्तर्मुहूर्तकालस्य व्यवस्था निरूप्यते-औदारिककाययोगस्थिततिर्यग्मनुष्याणां द्वौ विग्रहौ कृत्वा देवेषूत्पद्य सर्वजघन्येन कालेन पर्याप्ती: समाप्यान्तरिताणां अन्तर्मुहूर्तमात्रजघन्यकाल उपलभ्यते।
उत्कर्षेण-लब्ध्यपर्याप्तमनुष्याणां यथा पल्योपमस्यासंख्यातभागमात्र: संतानकाल: प्ररूपितस्तथात्रापि प्ररूपयितव्य:।
इदानीमाहारकाय-आहारमिश्रकाययोगिनां कालप्रतिपादनाय सूत्रषट्कमवतार्यते-
आहारकायजोगी केवचिरं कालादो होंति ?।।२१।।
जहण्णेण एगसमयं।।२२।।
उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं।।२३।।
आहारमिस्सकायजोगी केवचिरं कालादो होंति ?।।२४।।
जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।२५।।
उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं।।२६।।
सिद्धान्तचिंतामणिटीका-मनोयोग-वचनयोगेभ्य आहारकाययोगं गत्वा द्वितीयसमये कालं कृत्वा योगान्तरं गतस्तस्यैकसमयकाल उपलभ्यते।
उत्कर्षेणात्राहारकाययोगिनां द्विचरमसमयो यावत् आहारकाययोग-प्रवेशस्यान्तरं कृत्वा पुन: उपरिमसमये अन्यान् जीवान् प्रवेश्य एवं संख्यातवारशलाकासु उत्पन्नासु ततो नियमादन्तरं भवति। एवं संख्यातान्तर्मुहूर्त-समासोऽपि अन्तर्मुहूर्तमात्रश्चैव।
कथमेतज्ज्ञायते ?
‘उत्कृष्टकालोऽन्तर्मुहूर्तमात्र’ इति सूत्रवचनादेव ज्ञायते। आहारमिश्रकाययोगचरस्य महामुने: आहारमिश्रकाययोगं गत्वा सुष्ठु जघन्येन कालेन पर्याप्ती: समापितस्य जघन्यकालोपलंभात्।
उत्कर्षेण-अत्रापि पूर्वमिव संंख्यातान्तर्मुहूर्ताणां संकलना अपि अन्तर्मुहूर्तमेव कथ्यते।
एवं योगमार्गणासु कालनिरूपणत्वेन एकादशसूत्राणि गतानि।
इति श्री षट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे कालानुगमनाम महाधिकारे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां योगमार्गणानाम चतुर्थोऽधिकार: समाप्त:।

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अथ योगमार्गणा अधिकार

अब योगमार्गणा में आहारयोग से रहित मन-वचन-काय योगी जीवों का काल निरूपण करने हेतु पाँच सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

योगमार्गणा के अनुसार पाँच मनोयोगी, पाँच वचनयोगी, काययोगी, औदारिक-काययोगी, औदारिकमिश्रकाययोगी, वैक्रियिककाययोगी और कार्मणकाययोगी जीव कितने काल तक रहते हैं ?।।१६।।

उक्त जीव सर्वकाल रहते हैं।।१७।।

वैक्रियिकमिश्रकाययोगी जीव कितने काल तक रहते हैं ?।।१८।।

वैक्रियिक मिश्रकाययोगियों का काल जघन्य से अन्तर्मुहूर्त है।।१९।।

उत्कृष्ट से पल्योपम के असंख्यातवें भाग प्रमाण काल तक रहते हैं।।२०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इन सूत्रों का अर्थ सुगम है। वैक्रियिकमिश्रकाययोगियों के जघन्य से अन्तर्मुहूर्त काल का निरूपण करते हैं-औदारिककाययोग में स्थित तिर्यंच और मनुष्यों का दो विग्रह करके देवों में उत्पन्न होकर और सर्व जघन्य काल से पर्याप्तियों को पूर्णकर वैक्रियिक काययोग के द्वारा अन्तर को प्राप्त हुए उक्त देवों का जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त प्रमाण पाया जाता है।

उत्कृष्ट से-जिस प्रकार लब्ध्यपर्याप्त मनुष्यों का जैसा पल्योपम के असंख्यातवें भाग मात्र सन्तान काल निरूपण किया जा चुका है। उसी प्रकार यहाँ पर भी निरूपण करना चाहिए।

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अब आहारककाययोगी और आहारकमिश्रकाययोगियों का काल प्रतिपादन करने हेतु छह सूत्र अवतरित किये जाते हैं-

सूत्रार्थ-

आहारक काययोगी जीव कितने काल तक रहते हैं ?।।२१।।

आहारक काययोगी जीव जघन्य से एक समय तक रहते हैं।।२२।।

आहारक काययोगी जीव उत्कृष्ट से अन्तर्मुहूर्त तक रहते हैं।।२३।।

आहारकमिश्रकाययोगी जीव कितने काल तक रहते हैं ?।।२४।।

आहारकमिश्रकाययोगी जीव जघन्य से अन्तर्मुहूर्त तक रहते हैं।।२५।।

आहारकमिश्रकाययोगी जीव उत्कृष्ट से अन्तर्मुहूर्त तक रहते हैं।।२६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-मनोयोग और वचनयोग से आहारककाययोग को प्राप्त होकर व द्वितीय समय में मरण करके योगान्तर को प्राप्त होने पर उनके रहने का एक समय काल पाया जाता है।

उत्कृष्ट से-यहाँ आहारक काययोगियों के द्विचरम समय तक आहारककाययोग में प्रवेश का अन्तर करके पुन: उपरिम समय तक अन्य जीवों को प्रविष्ट कराके इस प्रकार संख्यात बादर शलाकाओं के उत्पन्न होने पर तत्पश्चात् नियम से अन्तर होता है। इस प्रकार संख्यात अन्तर्मुहूर्तों का जोड़ भी अन्तर्मुहूर्त मात्र ही होता है।

शंका-यह कैसे जाना जाता है ?

समाधान-‘‘उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त प्रमाण मात्र है’’ यह इस सूत्र वचन से ही जाना जाता है। क्योंकि आहारकमिश्रकाययोग को प्राप्त महामुनि जब आहारकमिश्रकाययोग को प्राप्त होकर अतिशय जघन्य काल से पर्याप्तियों को पूर्ण कर लेते हैं तब उनके जघन्य काल पाया जाता है।

उत्कृष्ट से-यहाँ पर भी पूर्व के समान संख्यात अन्तर्मुहूर्तों का संकलन करने पर भी अन्तर्मुहूर्त ही कहा जाता है।

इस प्रकार से योगमार्गणा में काल का निरूपण करने वाले ग्यारह सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में कालानुगम नामक महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणि-टीका में योगमार्गणा नाम का चतुर्थ अधिकार समाप्त हुआ।