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1. सूत्रों की समुदायपातनिका से वेदमार्गणा में अस्तित्व के कथन तक

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विषय सूची

सूत्रों की समुदायपातनिका से वेदमार्गणा में अस्तित्व के कथन तक

अथ भंगविचयानुगमो चतुर्थो महाधिकार:

मंगलाचरणम्
स्वचतुष्टयभावेन, सिद्धास्तिष्ठन्ति सिद्धिदाः।
चतुष्टयपरैर्हीनास्तान् नुमोऽस्तित्वसिद्धये।।१।।
अथ चतुर्दशभिरधिकारेः त्रयोविंशतिसूत्रैः नानाजीवापेक्षया भंगविचयानुगमो नाम चतुर्थो महाधिकारः प्रारभ्यते। तत्र प्रथमेऽधिकारे नानाजीवैः गतिमार्गणायां भंगविचयानुगमकथनत्वेन ‘‘णाणाजीवेहि’’ इत्यादिसूत्रषट्वंं। ततः परं द्वितीयेऽधिकारे इंद्रियमार्गणायां अस्तित्वनास्तित्वप्रतिपादनत्वेन ‘‘इंदियाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रद्वयं। तदनु तृतीयेऽधिकारे कायमार्गणायां अस्तित्वकथनत्वेन ‘‘ कायाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रमेकं । तत्पश्चात् चतुर्थेऽधिकारे योगानुवादेन अस्तित्व-नास्तित्व भंगकथनत्वेन ‘‘जोगाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रद्वयं। तदनंतरं पंचमेऽधिकारे वेदमार्गणायां अस्तित्वभंगनिरूपणत्वेन ‘‘वेदाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रमेकं ।तदनु षष्ठेऽधिकारे कषायानुवादेण अस्तित्वनिरूपणत्वेन ‘‘कसायाणु-’’ इत्यादिसूत्रमेकं। ततः परं सप्तमेऽधिकारे ज्ञानमार्गणायां अस्तित्वकथनपरत्वेन ‘‘णाणाणुवादेण’’ इत्यादिना सूत्रमेकं। तत्पश्चात् अष्टमेऽधिकारे संयममार्गणायां अस्तित्वप्ररूपणत्वेन ‘‘संजमाणुवादेण ’’ इत्यादिसूत्रद्वयं। पुनः नवमेऽधिकारे दर्शनमार्गणायां अस्तित्वकथनत्वेन ‘‘दंसणाणु-’’ इत्यादिसूत्रमेकं। पुनरपि दशमेऽधिकारे लेश्यामार्गणायां भंगकथनप्रकारेण ‘‘लेस्साणु-’’ इत्यादिना सूत्रमेकं । ततः परं एकादशेऽधिकारे भव्यमार्गणायां भंगकथनत्वेन ‘‘भविया-’’ इत्यादिसूत्रमेकं। तत्पश्चात् द्वादशेऽधिकारे सम्यक्त्वमार्गणायां अस्तित्व-नास्तित्वकथनपरत्वेन ‘‘सम्मत्ताणु-’’ इत्यादिसूत्रद्वयं। ततः परं त्रयोदशेऽधिकारे संज्ञिमार्गणायां अस्तित्वकथनत्वेन ‘‘सण्णिया-’’ इत्यादिसूत्रमेकं। तदनु चतुर्दशेऽधिकारे आहारमार्गणायां आहारानाहारजीवा नामस्तित्वनिरूपणत्वेन ‘‘आहाराणु-’’ इत्यादिना सूत्रमेकमिति समुदायपातनिका।

अथ भंगविचयानुगम नामक चतुर्थ महाधिकार प्रारंभ

मंगलाचरण

श्लोकार्थ-सिद्धि के प्रदाता जो सिद्ध भगवान स्वचतुष्ट्य-स्वद्रव्य, क्षेत्र, काल और भावरूप से समन्वित एवं परचतुष्टय-परद्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव से रहित होकर सिद्धशिला पर विराजमान हैं, उन समस्त सिद्ध परमेष्ठियों की हम अपने अस्तित्व की सिद्धि के लिए नमस्कार करते हैं।।१।।

अब चौदह अधिकारों में तेईस सूत्रों के द्वारा नाना जीवों की अपेक्षा भंगविचयानुगम नाम का चतुर्थ महाधिकार प्रारंभ हो रहा है। उनमें से प्रथम अधिकार में गतिमार्गणा के अन्दर नाना जीवों की अपेक्षा भंगविचयानुगम का कथन करने वाले ‘‘णाणजीवेहि’’ इत्यादि छह सूत्र कहेंगे। आगे द्वितीय अधिकार में इन्द्रियमार्गणा के अन्तर्गत अस्तित्व-नास्तित्व का प्रतिपादन करने वाले ‘‘इंदियाणुवादेण’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। उसके पश्चात् कायमार्गणा नाम के तृतीय अधिकार में अस्तित्व कथन की मुख्यता वाला ‘‘कायाणुवादेण’’ इत्यादि एक सूत्र है। तत्पश्चात् चतुर्थ अधिकार में योगमार्गणा के अनुवाद से अस्तित्व-नास्तित्व भंग के कथन की मुख्यता वाले ‘‘जोगाणुवोदण’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। तदनंतर वेदमार्गणा नाम के पंचम अधिकार में अस्तित्व भंग का निरूपण करने हेतु ‘‘वेदाणुवादेण’’ इत्यादि एक सूत्र है। उसके बाद छठे अधिकार में कषायमार्गणा के अनुवाद से अस्तित्व निरूपण करने वाला ‘‘कसायाणुवादेण’’ इत्यादि एक सूत्र है। पुन: ज्ञानमार्गणा नामक सातवें अधिकार में अस्तित्व कथन की मुख्यता वाला ‘‘णाणाणुवादेण’’ इत्यादि एक सूत्र है। तत्पश्चात् संयममार्गणा नाम वाले अष्टम अधिकार में अस्तित्व प्ररूपण करने हेतु ‘‘संजमाणुवादेण’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। पुन: नवमें अधिकार में दर्शनमार्गणा के अन्तर्गत अस्तित्व कथन करने वाला ‘‘दंसणाणुवादेण’’ इत्यादि एक सूत्र है। पुनरपि लेश्यामार्गणा नाम के दशवें अधिकार में भंंगों का कथन करने वाला ‘‘लेस्साणु’’ इत्यादि एक सूत्र है। उसके पश्चात् भव्यमार्गणा नाम के ग्यारहवें अधिकार में भंग कथन करने वाला ‘‘भविया’’ इत्यादि एक सूत्र है। तत्पश्चात् सम्यक्त्वमार्गणा नाम के बारहवें अधिकार में अस्तित्व-नास्तित्व का कथन करने वाले ‘‘सम्मत्ताणु’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। उससे आगे संज्ञीमार्गणा नाम के तेरहवें अधिकार में अस्तित्व का कथन करने वाला ‘‘सण्णिया’’ इत्यादि एक सूत्र है। पुन: आहारमार्गणा नाम के चौदहवें अधिकार में आहारक-अनाहारक जीवों का अस्तित्व निरूपण करने वाला ‘‘आहाराणु’’ इत्यादि एक सूत्र है। इस प्रकार से यह महाधिकार के प्रारंभ में सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

अथ गतिमार्गणाधिकार:

इदानीं नरकगतौ नारकाणामस्तित्वप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-

णाणाजीवेहि भंगविचयाणुगमेण गदियाणुवादेण णिरयगदीए णेरइया णियमा अत्थि।।१।।
एवं सत्तसु पुढवीसु णेरइया।।२।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-विचयो विचारणा।
केषां ?
अस्ति-नास्तिभंगाणां ।
कुतोऽवगम्यते ? ‘‘णेरइया णियमा अत्थि ’’ इति सूत्रनिर्देशात्।
न बंधकाधिकारे एतस्यान्तर्भावोऽस्ति। सर्वकालं नियमेन पुनः अनियमेन च मार्गणानां मार्गणाविशेषाणां चास्तित्वप्ररूपणात्र यास्ति, तस्याः सामान्यास्तित्वप्ररूपणायां अंतर्भावविरोधात्। सप्तसु पृथिवीषु नारकाणां नियमितास्तित्वापेक्षया सामान्यप्ररूपणायाः भेदाभावात्।
सामान्यप्ररूपणायाश्चैव विशेषप्ररूपणायां सिद्धायां किमर्थं पुनः प्ररूपणा क्रियते ?
न, सप्तानां पृथिवीनां नियमेनास्तित्वाभावेऽपि सामान्येन नियमात् अस्तित्वस्य विरोधाभावात्।
अधुना तिर्यग्गतौ मनुष्यगतौ तिरश्चां मनुष्याणां च अस्तित्वप्रतिपादनाय सूत्र द्वयमवतार्यते-
तिरिक्खगदीए तिरिक्खा पंचिंदियतिरिक्खा पंचिंदियतिरिक्खपज्जत्ता पंचिंदियाqतरिक्खजोणिणी पंचिंदियतिरिक्खअपज्जत्ता मणुसगदीए मणुसा मणुसपज्जत्ता मणुसिणीओ णियमा अत्थि।।३।।
मणुसअपज्जत्ता सिया अत्थि सिया णत्थि।।४।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-तिर्यग्गतौ पंचविधानां तिरश्चां अस्तित्वं नियमेनास्ति । अतीतानागतवर्तमानकालेषु एतासां मार्गणानां मार्गणाविशेषाणां च गंगाप्रवाहस्येव व्युच्छेदाभावात्। मनुष्यापर्याप्तानां-लब्ध्यपर्याप्तानां कदाचिदस्तित्वं भवति कदाचिन्न भवति।
कुतः ?
स्वभावात्।
कः स्वभावो नाम ?
अभ्यन्तरभावः स्वभावो निगद्यते । अस्यायमर्थः-वस्तुनो वस्तुस्थितेर्वा तस्या अवस्थाया नाम स्वभावः, यस्तस्याभ्यन्तरगुणः बाह्यपरिस्थितेः नावलम्बते।
देवगतौ देवानामस्तित्वख्यापनार्थं सूत्रद्वयमवतार्यते-
देवगदीए देवा णियमा अत्थि।।५।।
एवं भवणवासियप्पहुडि जाव सव्वट्टसिद्धिविमाणवासियदेवेसु।।६।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-देवगतौ त्रिष्वपि कालेषु देवानां विरहाभावात् ते नियमात् संति। भवनवासिदेवानां प्रभृति सर्वार्थसिद्धिविमानपर्यन्तानां देवानां अस्तित्वं सर्वकालेषु सिद्धमेव ।
एवं चातुर्गतिकानां जीवानामस्तित्वं नास्तित्वं च प्ररूपकं सूत्रषट्कं गतम्।
इति श्री षट्खण्डागमग्रन्थे क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे भंगविचयानुगमे चतुर्थे महाधिकारे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां गतिमार्गणानाम प्रथमोऽधिकार: समाप्त:।

अथ गतिमार्गणा अधिकार

अब नरकगति में नारकियों का अस्तित्व प्रतिपादन करने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

नाना जीवों की अपेक्षा भंगविचयानुगम से गतिमार्गणानुसार नरकगति में नारकी जीव नियम से हैं।।१।।

इसी प्रकार सातों पृथिवियों में नारकी जीव नियम से होते हैं।।२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-विचय शब्द का अर्थ है विचार करना।

शंका-किनकी विचारणा करना ?

समाधान-‘‘अस्ति-नास्ति भंगों का विचार करना’’ यह अर्थ लेना है।

शंका-यह कहाँ से जाना जाता है ?

समाधान-यह ‘नारकी जीव नियम से हैं’ इस सूत्र के निर्देश से जाना जाता है।

इसका बंधकाधिकार में अन्तर्भाव नहीं हो सकता, क्योंकि यहाँ जो सर्वकाल नियम से व अनियम से मार्गणा एवं मार्गणा विशेषों की अस्तित्वप्ररूपणा है, उसका सामान्य अस्तित्वप्ररूपणा में अन्तर्भाव होने का विरोध है। क्योंकि सातों पृथिवियों में नारकियों के नियमित अस्तित्व की अपेक्षा सामान्य प्ररूपणा से कोई भेद नहीं है।

शंका-सामान्य प्ररूपणा से ही विशेष प्ररूपणा के सिद्ध होने पर पुन: प्ररूपणा किसलिए की गई है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि सात पृथिवियों के नियम से अस्तित्व के अभाव में भी सामान्यरूप से नियमत: अस्तित्व के होने में कोई विरोध नहीं है।

अब तिर्यंचगति में और मनुष्यगति में तिर्यंच और मनुष्यों का अस्तित्व प्रतिपादन करने हेतु दो सूत्र अवतरित किये जाते हैं-

सूत्रार्थ-

तिर्यंचगति में तिर्यंच, पंचेन्द्रिय तिर्यंच, पंचेन्द्रिय तिर्यंच पर्याप्त, पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिनी और पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपर्याप्त तथा मनुष्यगति में मनुष्य, मनुष्य पर्याप्त और मनुष्यिनी नियम से होते हैं।।३।।

मनुष्य अपर्याप्त कथंचित् हैं और कथंचित् नहीं है।।४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तिर्यंचगति में पाँचों प्रकार के तिर्यंचों का अस्तित्व नियम से पाया जाता है। क्योंकि, अतीत-अनागत व वर्तमान कालों में इन मार्गणा विशेषों का गंगा प्रवाह के समान व्युच्छेद नहीं होता है। मनुष्य अपर्याप्तों का कदाचित् अस्तित्व होता है और कदाचित् नहीं होता है, क्योंकि ऐसा स्वभाव है।

शंका-ऐसा क्यों है ?

समाधान-क्योंकि ऐसा ही स्वभाव है।

शंका-स्वभाव किसे कहते हैं ?

समाधान-आभ्यन्तर भाव को स्वभाव कहते हैं। इसका यह अर्थ है कि-वस्तु या वस्तुस्थिति की उस व्यवस्था को उसका स्वभाव कहते हैं जो कि उसका भीतरी गुण है और वह बाह्य परिस्थिति पर अवलम्बित नहीं है।

अब देवगति में देवों का अस्तित्व ज्ञापित करने हेतु दो सूत्र अवतरित किये जा रहे हैं-'

सूत्रार्थ-

देवगति में देव नियम से पाये जाते हैं।।५।।

इसी प्रकार भवनवासियों से लेकर सर्वार्थसिद्धिविमानों तक देव नियम से होते हैं।।६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-देवगति में तीनों ही कालों में देवताओं के विरह का अभाव पाया जाता है, क्योंकि वहाँ वे नियम से सदाकाल रहते हैं। भवनवासी देवों से लेकर सर्वार्थसिद्धिविमान पर्यन्त सभी विमानों में देवों का अस्तित्व सभी कालों में सिद्ध ही है।

इस प्रकार चतुर्गति में रहने वाले जीवों का अस्तित्व और नास्तित्व प्ररूपित करने वाले छह सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नामके द्वितीय खण्ड में भंगविचयानुगम नाम के चतुर्थ महाधिकार में सिद्धान्तचिंतामणिटीका में गतिमार्गणा नाम का प्रथम अधिकार समाप्त हुआ।

अथ इन्द्रियमार्गणाधिकार:

इदानीं इन्द्रियमार्गणायां अस्तिभंगप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-

इंदियाणुवादेण एइंदिया बादरा सुहुमा पज्जत्ता अपज्जत्ता णियमा अत्थि।।७।।
बेइंदिय-तेइंदिय-चउिंरदिय-पंचिंदिय पज्जत्ता अपज्जत्ता णियमा अत्थि।।८।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-एकेन्द्रियबादरसूक्ष्माः पर्याप्तापर्र्याप्ताः, द्वीन्द्रियादयश्च पर्याप्तापर्याप्ताः सर्वे इमे जीवाः त्रिष्वपि कालेषु संति व्युच्छेदाभावात्।
एवं इंद्रियमार्गणास्तित्वकथनत्वेन द्वे सूत्रेगते।
इति श्री षट्खण्डागमग्रन्थे क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे भंगविचयानुगमनाम चतुर्थे महाधिकारे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां इन्द्रियमार्गणानाम द्वितीयोऽधिकार: समाप्त:।

अथ इन्द्रियमार्गणा अधिकार

यहाँ इन्द्रियमार्गणा में अस्ति भंग का प्रतिपादन करने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-'

सूत्रार्थ-

इन्द्रियमार्गणा के अनुसार एकेन्द्रिय बादर-सूक्ष्म पर्याप्त-अपर्याप्त जीव नियम से रहते हैं।।७।।

द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रिय पर्याप्त-अपर्याप्त जीव नियम से रहते हैं।।८।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-एकेन्द्रिय बादर-सूक्ष्म, पर्याप्त-अपर्याप्त जीव एवं दो इन्द्रिय पर्याप्त-अपर्याप्त ये सभी जीव तीनों ही कालों में होते हैं, क्योंकि इनके व्युच्छेद का अभाव पाया जाता है।

इस प्रकार इन्द्रियमार्गणा का अस्तित्व कथन करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नामके द्वितीय खण्ड में भंगविचयानुगम नाम के चतुर्थ महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में इंद्रियमार्गणा नाम का द्वितीय अधिकार समाप्त हुआ।

अथ कायमार्गणाधिकार:

अधुना कायमार्गणायामस्तिभंगकथनार्थं सूत्रमवतरति-

कायाणुवादेण पुढविकाइया आउकाइया तेउकाइया वाउकाइया वणप्फदिकाइया णिगोदजीवा बादरा सुहुमा पज्जत्ता अपज्जत्ता बादरवण-प्फदिकाइयपत्तेयसरीरा पज्जत्ता अपज्जत्ता तसकाइया तसकाइयपज्जत्ता अपज्जत्ता णियमा अत्थि।।९।।
एवं कायमार्गणास्तित्वभंगनिरूपणत्वेन सूत्रमेकं गतम्।
इति श्री षट्खण्डागमग्रन्थे क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे भंगविचयानुगमनाम चतुर्थे महाधिकारे गणिनी-ज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां कायमार्गणानाम तृतीयोऽधिकार: समाप्त:।

अथ कायमार्गणा अधिकार

अब कायमार्गणा में अस्तित्व भंग कहने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

कायमार्गणा के अनुसार पृथिवीकायिक, जलकायिक, तेजकायिक, वायुकायिक, वनस्पतिकायिक, निगोदजीव बादर सूक्ष्म पर्याप्त अपर्याप्त तथा बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येक शरीर पर्याप्त, अपर्याप्त एवं त्रसकायिक, त्रसकायिक पर्याप्त, अपर्याप्त जीव नियम से हैं।।९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इन मार्गणाओं एवं मार्गणा विशेषों के प्रवाह का कभी व्युच्छेद नहीं होता है।

इस तरह से कायमार्गणा में अस्तित्व भंग का निरूपण करने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में भंगविचयानुगम नामक चतुर्थ महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणि-टीका में कायमार्गणा नाम का तृतीय अधिकार समाप्त हुआ।

अथ योगमार्गणाधिकार:

योगमार्गणायामस्तिनास्तिभंगकथनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-

जोगाणुवादेण पंचमणजोगी पंचवचिजोगी कायजोगी ओरालियकायजोगी ओरालियमिस्सकायजोगी वेउव्वियकायजोगी कम्मइयकायजोगी णियमा अत्थि।।१०।।
वेउव्वियमिस्सकायजोगी आहारकायजोगी आहारमिस्सकायजोगी सिया अत्थि सिया णत्थि।।११।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्रयोरर्थः सुगमोऽस्ति। वैक्रियिकमिश्रकाययोगिनः आहार-आहारमिश्रयोगिनो मुनयश्च कथंचित् संति कथंचित् न संति, सान्तरस्वभावत्वात्। न च स्वभावः परपर्यनुयोगार्हः अतिप्रसंगात्।
एवं योगमार्गणाभंगकथनत्वेन सूत्रे द्वे गते।
इति श्री षट्खण्डागमग्रन्थे क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे भंगविचयानुगमनाम चतुर्थे महाधिकारे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां योगमार्गणानाम चतुर्थोऽधिकार: समाप्त:।

अथ योगमार्गणा अधिकार

अब योगमार्गणा में अस्ति-नास्ति भंग का कथन करने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

योगमार्गणा के अनुसार पाँच मनोयोगी, पाँच वचनयोगी, काययोगी, औदारिक काययोगी, औदारिकमिश्रकाययोगी, वैक्रियिककाययोगी और कार्मणकाययोगी नियम से हैं।।१०।।

वैक्रियिकमिश्रकाययोगी, आहारककाययोगी और आहारकमिश्रकाययोगी कदाचित हैं, कदाचित् नहीं हैं।।११।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-दोनों सूत्रों का अर्थ सरल है। वैक्रियिकमिश्रकाययोगी और आहारक-आहारकमिश्रकाययोगी मुनि कथंचित् होते हैं और कथंचित् नहीं होते हैं, क्योंकि ये मार्गणाएं सान्तर स्वभाव वाली हैं एवं स्वभाव दूसरों के प्रश्न के योग्य नहीं होता है, चूँकि ऐसा होने से अतिप्रसंग दोष आता है।

इस तरह से योगमार्गणा में भंगों का कथन करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में भंगविचयानुगम नामक चतुर्थ महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणि-टीका में योगमार्गणा नाम का चतुर्थ अधिकार समाप्त हुआ।

अथ वेदमार्गणाधिकार:

वेदमार्गणायामस्तित्वकथनाय सूत्रमवतरति-

वेदाणुवादेण इत्थिवेदा पुरिसवेदा णवुंसयवेदा अवगदवेदा णियमा अत्थि।।१२।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-एतेषां त्रिवेदानामपगतवेदानां च जीवानां गंगाप्रवाहस्येव व्युच्छेदाभावात् नियमात् ते सन्त्येव।
एवं वेदमार्गणास्तित्वकथनत्वेन सूत्रमेकं गतम्।
इति श्री षट्खण्डागमग्रन्थे क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे भंगविचयानुगमनाम चतुर्थे महाधिकारे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां वेदमार्गणानाम पंचमोऽधिकार: समाप्त:।

अथ वेदमार्गणा अधिकार

अब वेदमार्गणा में अस्तित्व का कथन करने हेतु सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

वेदमार्गणानुसार स्त्रीवेदी, पुरुषवेदी, नपुंसकवेदी और अपगतवेदी जीव नियम से हैं।।१२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इन तीनों वेद सहित एवं वेदरहित अपगतवेदी सिद्धों का अस्तित्व गंगानदी के प्रवाह के समान सतत रहता है, अर्थात् वे नियम से सदैव विद्यमान रहते हैं, क्योंकि उनके व्युच्छेद का अभाव पाया जाता है।

इस प्रकार वेदमार्गणा में अस्तित्व को बतलाने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में भंगविचयानुगम नामक चतुर्थ महाधिकार में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणि-टीका में वेदमार्गणा नाम का चतुर्थ अधिकार समाप्त हुआ।