ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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10.दर्शन मार्गणा अधिकार

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दर्शन मार्गणा अधिकार

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अथ दर्शनमार्गणाधिकार:

अथ त्रिभिरन्तराधिकारैः अष्टसूत्रैः दर्शनमार्गणानाम नवमोऽधिकारः प्रारभ्यते। तत्र तावत् प्रथमस्थले चक्षुर्दर्शनिनां कालनिरूपणत्वेन ‘‘दंसणाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रत्रयं । ततः परं द्वितीयस्थले अचक्षुर्दर्शनिनां स्थितिप्रतिपादनत्वेन ‘‘अचक्खु-’’ इत्यादिना त्रीणिसूत्राणि। तत्पश्चात् तृतीयस्थले अवधिकेवलिदर्शनिनोः कालप्रतिपादनमुख्यत्वेन ‘‘ओधि-’’ इत्यादिसूत्रद्वयं इति समुदायपातनिका।
संप्रति चक्षुर्दर्शनिनां कालप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
दंसणाणुवादेण चक्खुदंसणी केवचिरं कालादो होंति ?।।१६९।।
जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।१७०।।
उक्कस्सेण बे सागरोवमसहस्साणि।।१७१।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-जघन्येन कश्चित् जीवः अचक्षुर्दर्शनेन स्थितः सन् चक्षुर्दर्शनं गत्वा जघन्यमन्त-र्मुहूर्तं स्थित्वा पुनोऽचक्षुर्दर्शनं गतः। उत्कर्षेण-कश्चिद् एकेन्द्रियो द्वीन्द्रियः त्रीन्द्रियो वा चतुरिन्द्रियादिजीवेषु उत्पद्य द्विसागरोपमसहस्राणि परिभ्रम्याचक्षुर्दर्शनिजीवेषूत्पन्नः तस्येदं उत्कृष्टं कालं लभ्यते।
चक्षुर्दर्शनक्षयोपशमस्य एषः कालः निर्दिष्टः। उपयोगं प्रतीत्य पुनः जघन्योत्कृष्टाभ्यां चान्तर्मुहूर्तमात्र एव।
एवं प्रथमस्थले चक्षुर्दर्शनवतां स्थितिनिरूपणत्वेन सूत्रत्रयं गतम् ।
इदानीं अचक्षुर्दर्शनवतां कालप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
अचक्खुदंसणी केवचिरं कालादो होंति ?।।१७२।।
अणादिओ अपज्जवसिदो।।१७३।।
अणादिओ सपज्जवसिदो।।१७४।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-अभव्यजीवान् अभव्यसमभव्यजीवान् वा प्रतीत्याचक्षुर्दर्शनिनः अनाद्यनन्ताः, अचक्षुर्दर्शनक्षयोपशमरहितछद्मस्थानामनुपलंभात्। अनादिसान्ताः निश्चयेन सिद्ध्यमानभव्यजीवान् प्रतीत्य एष निर्देशः कृतः। अचक्षुर्दर्शनस्य सादित्वं नास्ति, केवलदर्शनात् अचक्षुर्दर्शनमागच्छतामभावात्।
एवं द्वितीयस्थले अचक्षुर्दर्शनवतां कालकथनमुख्यत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।
अधुना अवधिदर्शन-केवलदर्शनवतां कालप्रतिपादनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-
ओधिदंसणी ओधिणाणीभंगो।।१७५।।
केवलदंसणी केवलणाणीभंगो।।१७६।।
सिद्धांतचितामणिटीका-अवधिदर्शनवतां एकजीवापेक्षया जघन्येन अंतर्मुहूर्तं, उत्कर्षेण साधिकषट्षष्टि-सागरोपमकालो लभ्यते। केवलदर्शनिनां भगवतां जघन्येनान्तर्मुहूर्तं, उत्कर्षेण देशोनपूर्वकोटिप्रमाणमिति ज्ञातव्यम्।
एवं तृतीयस्थले अवधिदर्शनकेवलदर्शनवतां कालकथनत्वेन सूत्रद्वयं गतम्।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे एकजीवापेक्षया कालानुगमे गणिनीज्ञानमतीकृतसिद्धांतचिंतामणिटीकायां दर्शनमार्गणानाम नवमोऽधिकारः समाप्तः।

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अथ दर्शनमार्गणा अधिकार प्रारंभ

अब तीन अन्तराधिकारों में आठ सूत्रों के द्वारा दर्शनमार्गणा नाम का नवमाँ अधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथम स्थल में चक्षुदर्शनी जीवों का काल निरूपण करने हेतु ‘‘दंसणाणुवादेण’’ इत्यादि तीन सूत्र कहेंगे। पुन: द्वितीय स्थल में अचक्षुदर्शनी जीवों की स्थिति का प्रतिपादन करने वाले ‘अचक्खू’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। तत्पश्चात् तृतीय स्थल में अवधिदर्शनी एवं केवलदर्शनी जीवों का काल प्रतिपादन करने वाले ‘‘ओधि’’ इत्यादि दो सूत्र हैं। यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

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अब प्रथमत: चक्षुदर्शनी जीवों का काल प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

दर्शनमार्गणानुसार जीव चक्षुदर्शनी कितने काल तक रहते हैं ?।।१६९।।

जघन्य से अन्तर्मुहूर्त काल तक जीव चक्षुदर्शनी रहते हैं।।१७०।।

उत्कृष्ट से दो हजार सागरोपम काल तक जीव चक्षुदर्शनी रहते हैं।।१७१।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-जघन्य से किसी अचक्षुदर्शन सहित स्थित हुए जीव के चक्षुदर्शन को ग्रहण कर जघन्य अन्तर्मुहूर्त रहकर वहाँ पुन: अचक्षुदर्शनी हो गया, वहाँ चक्षुदर्शन का जघन्यकाल अन्तर्मुहूर्त प्राप्त हो जाता है। उत्कृष्ट से-कोई एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय व त्रीन्द्रिय जीव चतुरिन्द्रियादि जीवों में उत्पन्न होकर दो हजार सागरोपम काल तक परिभ्रमण करके अचक्षुदर्शनी जीवों में उत्पन्न हुआ, उसके दो हजार सागरोपम का यह उत्कृष्ट काल प्राप्त होता है।

चक्षुदर्शन के क्षयोपशम का यह काल कहा गया है। उपयोग की अपेक्षा तो चक्षुदर्शन का जघन्य व उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त मात्र ही है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में चक्षुदशर््न वाले जीवों की स्थिति निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब अचक्षुदर्शनी जीवों का काल प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतीर्ण होते हैं-

सूत्रार्थ-

जीव अचक्षुदर्शनी कितने काल तक रहते हैं ?।।१७२।।

जीव अनादि अनन्त काल तक अचक्षुदर्शनी रहते हैं।।१७३।।

जीव अनादि सान्त काल तक अचक्षुदर्शनी रहते हैं।।१७४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अभव्य जीव अथवा अभव्य के समान भव्य जीव (दूरानुदूर भव्य) की अपेक्षा अचक्षुदर्शनी अनादि-अनन्त होते हैं, क्योंकि अचक्षुदर्शन के क्षयोपशम से रहित छद्मस्थ जीवों का अभाव पाया जाता है। अनादि-सान्त निश्चय से सिद्ध होने वाले भव्य जीव की अपेक्षा यह निर्देश किया गया है। अचक्षुदर्शन के सादिपना नहीं होता है, क्योंकि केवलदर्शन से अचक्षुदर्शन में आने वाले जीवों का अभाव है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में अचक्षुदर्शनी जीवों का काल कथन करने की मुख्यता वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब अवधि दर्शन और केवलदर्शन वाले जीवों का काल प्रतिपादन करने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

अवधिदर्शनी जीवों की कालप्ररूपणा अवधिज्ञानी जीवों के समान होती है।।१७५।।

केवलदर्शनी भगवन्तों की कालप्ररूपणा केवलज्ञानी भगवन्तों के समान है।।१७६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अवधिदर्शन वाले जीवों का काल एक जीव की अपेक्षा जघन्य से अन्तर्मुहूर्त है, उत्कृष्ट से कुछ अधिक छ्यासठ सागरोपम काल होता है। केवलदर्शनी भगवन्तों का जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है, उत्कृष्ट से उनका काल कुछ कम पूर्वकोटिवर्ष प्रमाण जानना चाहिए।

इस प्रकार तृतीय स्थल में अवधिदर्शन और केवलदर्शन वाले जीवों का काल कथन करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में एक जीव की अपेक्षा कालानुगम नामक प्रकरण में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणि-

टीका में दर्शनमार्गणा नाम का नवमाँ अधिकार समाप्त हुआ।