ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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10.लेश्यामार्गणाधिकार

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विषय सूची

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लेश्यामार्गणाधिकार

अथ लेश्यामार्गणाधिकार:

अथ स्थलद्वयेन षट्सूत्रैः अंतरानुगमे लेश्यामार्गणाधिकारः कथ्यते। तत्र प्रथमस्थले अशुभत्रिकलेश्या-नामन्तरनिरूपणत्वेन ‘‘लेस्साणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। ततः परं द्वितीयस्थले शुभत्रिकलेश्यानामन्तरकथन-मुख्यत्वेन ‘‘तेउलेस्सिय-’’ इत्यादिना त्रीणि सूत्राणीति समुदायपातनिका।
इदानीं अशुभत्रिकलेश्यानामन्तरनिरूपणाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
लेस्साणुवादेण किण्हलेस्सिय-णीललेस्सिय-काउलेस्सियाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।१२५।।
जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।१२६।।
उक्कस्सेण तेत्तीससागरोवमाणि सादिरेयाणि।।१२७।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-कृष्णलेश्यावतः नीललेश्यां, नीललेश्यावतः कापोतलेश्यां, कापोतलेश्यस्य तेजोलेश्यां गत्वा स्व-स्वात्मनः लेश्यायां जघन्यकालेनागतस्यान्तर्मुहूर्तान्तरोपलंभात्।
उत्कर्षेण-कश्चित् पूर्वकोट्यायुष्को मनुष्यः गर्भाद्यष्टवर्षाणामभ्यन्तरे षडन्तर्मुहूर्ताः सन्तीति कृष्णलेश्यायां परिणाम्य आदिं कृत्वा पुनः नील-कापोत-तेजः-पद्म-शुक्ललेश्यासु परिपाटीक्रमेणान्तरं प्राप्य संयमं गृहीत्वा तिसृषु शुभलेश्यासु देशोनपूर्वकोटिकालं स्थित्वा पुनः त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमायुःस्थितिकेषु देवेषूत्पद्य तत्तः आगत्य मनुष्येषूत्पद्य शुक्ल-पद्म-तेजो-नीललेश्यायाः क्रमेण परिणाम्यान्ते कृष्णलेश्यायामागतः, तस्य दशान्तर्मुहूर्तोनाष्टवर्षैः न्यूनं पूर्वकोटिकालं सातिरेकं त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमं अंतरमुपलभ्यते। एवमेव नीलकापोतलेश्ययोरपि वक्तव्यं। केवलं तु-अष्ट-षडन्तर्मुहूर्तोनाष्टवर्षैः न्यूनं पूर्वकोटिं त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमां सातिरेकां भवतीति ज्ञातव्यंं।
एवं प्रथमस्थलेऽशुभत्रिकलेश्यानामन्तरनिरूपणत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।
अधुना शुभत्रिकलेश्यानामन्तरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
तेउलेस्सिय-पम्मलेस्सिय-सुक्कलेस्सियाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।१२८।।
जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।१२९।।
उक्कस्सेण अणंतकालमसंखेज्जपोग्गलपरियट्टं।।१३०।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-तेजः-पद्म-शुक्ललेश्याभ्योऽविरूद्धामन्यलेश्यां गत्वा जघन्यकालेन प्रतिनिवृत्य स्व-स्वात्मनो लेश्याणामागतस्य जघन्यान्तरमुपलभ्यते।
उत्कर्षेण-अर्पितलेश्यातः अविरूद्धानर्पितलेश्यां गत्वान्तरं प्राप्यावलिकायाः असंख्यातभागमात्रपुद्गलपरिवर्तनेषु कृष्णनीलकापोतलेश्याभिः अतिक्रान्तेषु अर्पितलेश्यामागतस्य सूत्रोक्तोत्कृष्टान्तरमुपलभ्यते ।
तात्पर्यमेतत्-अशुभलेश्याः परिहृत्य शुभलेश्याभिः परिणमनं कुर्वन् निजशुद्धपरमात्मतत्त्वं ध्यायन् ध्यायन् शुक्ललेश्यां संप्राप्य शुक्लध्यानबलेन घातिकर्माणि निहत्य आर्हंत्यावस्था प्रापणीया भवतीति निश्चित्य निरंतरं स्वशुद्धात्मभावनामेव भावयामीति लक्ष्यं मम वर्तते।
एवं द्वितीयस्थले शुभत्रिकलेश्यान्तरनिरूपणत्वेन सूत्राणि त्रीणि गतानि ।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे एकजीवापेक्षया अन्तरानुगमे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां लेश्यामार्गणानाम दशमोऽधिकारः समाप्तः।


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अथ लेश्यामार्गणा अधिकार

अब दो स्थलों में छह सूत्रों के द्वारा अन्तरानुगम में लेश्यामार्गणा अधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथम स्थल में तीनों अशुभ लेश्याओं का अन्तर निरूपण करने वाले ‘‘लेस्साणुवादेण’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। उसके आगे द्वितीय स्थल में तीनों शुभ लेश्याओं का अन्तर कथन करने वाले ‘‘तेउलेस्सिय’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। यह सूत्रों की समुदायपातनिका है।

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अब प्रारंभ की तीनों अशुभ लेश्याओं का अन्तर निरूपण करने हेत तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

लेश्यामार्गणानुसार कृष्णलेश्या, नीललेश्या, कापोतलेश्या वाले जीवों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।१२५।

कृष्ण, नील और कापोत लेश्या वाले जीवों का जघन्य अन्तरकाल अन्तर्मुहूर्त होता है।।१२६।।

कृष्ण नील और कापोत लेश्या वाले जीवों का उत्कृष्ट अन्तर कुछ अधिक तेंतीस सागरोपमप्रमाण होता है।।१२७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-कृष्ण लेश्या वाले जीव के नीललेश्या में, नीललेश्या वाले जीव के कापोत लेश्या में व कापोतलेश्या वाले जीव के तेजोलेश्या में जाकर अपनी-अपनी पूर्व लेश्या में जघन्य काल के द्वारा पुन: वापिस आने से अन्तर्मुहूर्तप्रमाण अन्तर पाया जाता है।

उत्कृष्ट से-कोई एक पूर्वकोटि वर्ष की आयु वाला मनुष्य गर्भ से लेकर आठ वर्ष के भीतर छह अन्तर्मुहूर्त शेष रहने पर कृष्ण लेश्यारूप से स्वयं को परिणमन प्रारंभ करके पुन: नील, कापोत, पीत, पद्म और शुक्ल लेश्याओं में परिपाटी क्रम से जाकर अन्तर करता हुआ, संयम ग्रहणकर तीन शुभ लेश्याओं में कुछ कम पूर्वकोटिकालप्रमाण रहा और फिर तेतीस सागरोपम आयु स्थिति वाले देवों में उत्पन्न हुआ। फिर वहाँ से आकर मनुष्यों में उत्पन्न होकर शुक्ल, पद्म, पीत, कापोत और नीललेश्यारूप से क्रम से स्वयं को परिणमाकर अन्त में कृष्ण लेश्या में आ गया। ऐसे जीव के दश अन्तर्मुहूर्त कम आठ वर्ष से हीन पूर्वकोटि अधिक कापोतलेश्या के उत्कृष्ट अन्तरकाल का प्ररूपण करना चाहिए। विशेषता केवल इतनी है कि नीललेश्या का अन्तर कहते समय आठ और कापोत लेश्या का अन्तर कहते समय छह अन्तर्मुहूर्त कम आठ वर्ष से हीन पूर्वकोटि अधिक तेतीस सागरोपमप्रमाण अन्तरकाल होता है, ऐसा जानना चाहिए।

इस प्रकार प्रथम स्थल में तीनों अशुभ लेश्याओं का अन्तर बतलाने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब तीन शुभ लेश्याओं का अन्तर प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतीर्ण होते हैं-

सूत्रार्थ-

पीतलेश्या, पद्मलेश्या और शुक्ललेश्या वाले जीवों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।१२८।।

पीत, पद्म और शुक्ल लेश्या वाले जीवों का जघन्य अन्तर काल अन्तर्मुहूर्त प्रमाण होता है।।१२९।।

पीत, पद्म और शुक्ललेश्या का उत्कृष्ट अन्तरकाल अनन्त काल होता है, जो असंख्यात पुद्गल परिवर्तनप्रमाण के बराबर होता है।।१३०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-पीत, पद्म व शुक्ल लेश्या से अपनी अविरोधी अन्य लेश्याओं में जाकर व जघन्य काल से लौटकर पुन: अपनी-अपनी पूर्व लेश्या में आने वाले जीव के अन्तर्मुहूर्तमात्र जघन्य अन्तरकाल पाया जाता है।

उत्कृष्ट से-विवक्षित लेश्या से अविरुद्ध अविवक्षित लेश्याओं को प्राप्त हो अन्तर को प्राप्त हुआ। पुन: आवली के असंख्यातवें भागप्रमाण पुद्गलनपरिवर्तनप्रमाण काल के कृष्ण, नील और कापोत लेश्याओं के साथ बीतने पर विवक्षित लेश्या को प्राप्त हुए जीव के उक्त लेश्याओं का सूत्रोक्त उत्कृष्ट अन्तर प्राप्त होता है।

तात्पर्य यह है कि-मनुष्य अशुभ लेश्याओं को दूर हटाकर शुभ लेश्यारूप से परिणमन करते हुए निज शुद्ध परमात्म तत्त्व को ध्या-ध्याकर शुक्ललेश्या को प्राप्त करके शुक्लध्यान के बल से घाति कर्मों को नष्ट करके अर्हन्त अवस्था की प्राप्ति के योग्य होता है ऐसा निर्णय करके मैं अपनी शुद्धात्म भावना को ही भाऊँ यही मेरा लक्ष्य है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में तीन शुभ लेश्याओं का अन्तर निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम गंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में एक जीव की अपेक्षा अन्तरानुगम में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में लेश्यामार्गणा नाम का दशवाँ अधिकार समाप्त हुआ।