ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

Whatsappicon.png
Whatsappicon.png
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें |


पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा देश के समस्त जैन विद्वानों के लिए विशेष सैद्धांतिक विषयों पर ऋषभगिरि-मांगीतुंगी से विद्वत प्रशिक्षण शिविर का पारस चैनल पर ४ दिसंबर, रविवार से ११ दिसंबर २०१६, रविवार तक प्रातः ६ बजे से ७ बजे तक सीधा प्रसारण होगा | घर बैठे देखकर अवश्य ज्ञान लाभ लें |

10. कषाय और उनके भेद

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


विषय सूची

[सम्पादन]
कषाय और उनके भेद

प्रश्न-३६६ कषाय कितनी होती हैं उनके नाम बताओ?

उत्तर-३६६ कषाय चार होती हैं—क्रोध, मान, माया व लोभ।

प्रश्न-३६७ कषाय किसे कहते हैं?

उत्तर-३६७ जो आत्मा को कषे अर्थात् दु:ख दे या पराधीन करे उसे कषाय कहते हैं।

प्रश्न-३६८ क्रोध किसे कहते हैं?

उत्तर-३६८ क्रोध गुस्से को कहते हैं।

प्रश्न-३६९ इससे क्या होता है?

उत्तर-३६९ इससे दूसरों का बुरा होने के पहले अपना बुरा हो जाता है।


प्रश्न-३७० क्रोध कषाय में प्रसिद्ध व्यक्ति का नाम बताते हुए कथा को संक्षेप में कहो?

उत्तर-३७० क्रोध कषाय में कमठ प्रसिद्ध हुआ है। कमठ ने अपने छोटे भाई मरुभूति की स्त्री से व्यभिचार किया। तब राजा ने उसे दण्ड देकर देश से निकाल दिया। वह तापसी आश्रम में पत्थर की शिला को हथेली पर रखकर ऊंची करके तपश्चरण कर रहा था। मरुभूति भाई के मोह से उसे बुलाने गया किन्तु उस कमठ ने क्रोध से वह शिला भाई पर पटक दी जिससे वह मर गया। कालान्तर में मरुभूति का जीव तो पाश्र्वनाथ तीर्थंकर हो गया किन्तु कमठ के जीव ने दस भव तक दु:ख भोगते हुए मरुभूति के जीव को सताया। अन्त में भगवान पाश्र्वनाथ की पर्याय में भी उनके ऊपर भयंकर उपसर्ग किया। क्रोध करने के पाप से कमठ नरकादि अनेक गतियों में दु:ख भोगता रहा और मरुभूति क्षमा के प्रभाव से भगवान पार्श्वनाथ बन गये।

[सम्पादन] मान कषाय

प्रश्न-३७१ मान कषाय में कौन प्रसिद्ध हुआ है?

उत्तर-३७१ मान कषाय में भगवान आदिनाथ का पोता मरीचि कुमार प्रसिद्ध हुआ।

प्रश्न-३७२ मान कषाय के वशीभूत हो उसने कितने पाखण्ड मत चलाये?

उत्तर-३७२ मान कषाय के वशीभूत हो उसने ३६३ पाखण्ड मत चलाये।

प्रश्न-३७३ मान वश उसने कितने भवों तक दु:ख उठाया?

उत्तर-३७३ मानवश उसने असंख्यातों भवों तक दु:ख उठाया।

प्रश्न-३७४ कालान्तर में कैसे उन्नति की?

उत्तर-३७४ कालान्तर में सिंह की पर्याय में ऋद्धिधारी मुनि के उपदेश से पंचाणुव्रत और सम्यक्त्व को ग्रहण कर अंत में मरकर स्वर्ग चला गया। वही जीव सिंह से आगे दशवें भव में तीर्थंकर महावीर बन गया।

प्रश्न-३७५ भगवान ऋषभदेव के साथ कितने राजाओं ने दीक्षा ली थी?

उत्तर-३७५ भगवान ऋषभदेव के साथ चार हजार राजाओं ने दीक्षा ली थी

प्रश्न-३७६ मरीचि कुमार ने पुन: दीक्षा क्यों नहीं ली?

उत्तर-३७६ जब भगवान आदिनाथ को केवलज्ञान हुआ तब जो ४ हजार राजा भगवान ऋषभदेव के साथ दीक्षित हुए थे उनमें से मरीचि को छोड़ अपना पूर्वभव, आगे का भव आदि समवसरण में जान कर वे सभी भ्रष्ट साधु पुन: दीक्षित हो स्वर्ग मोक्ष चले गये किन्तु मरीचि ने भी आगे के भव जान लिये थे सो इस अभिमान से कि मैं भी आगामी समय में तीर्थंकर बनूंगा पुन: दीक्षा न लेकर कहा कि मैं भी अपने मत का प्रचार करके इन्द्र द्वारा पूजा को प्राप्त करूँगा।


[सम्पादन] माया कषाय

प्रश्न-३७७ माया कषाय में प्रसिद्ध मुनि का नाम बताओ?

उत्तर-३७७ माया कषाय में मृदुमति नामक मुनि प्रसिद्ध हुए हैं।

प्रश्न-३७८ मृदुमति मुनि ने क्या मायाचारी की और क्यों की?

उत्तर-३७८ मृदुमति मुनि ने ‘कहीं मेरी भक्ति कम न हो जाए’ इसलिए मायाचारी की, घटना इस प्रकार है किसी पर्वत पर गुणनिधि नाम के मुनि चार महीने का उपवास कर विराजमान थे जिनकी (ऋद्धिधारी मुनि की) देवगण स्तुति करते थे। चातुर्मास समाप्त होने पर वे मुनि आकाशमार्ग से विहार कर गये। इधर मृदुमति नाम के दूसरे मुनि उसी क्षण आहार के लिए गाँव में आ गये। श्रावकों ने इन्हें गुणनिधि मुनि समझकर बहुत ही स्तुति भक्ति की। मुनि ने मायाचारी रखी और अपना नाम इसलिए नहीं बताया कि मेरी भक्ति कम हो जाएगी। अंत में वे मुनि मरकर देव हो गये किन्तु इस मायाचार के पाप से वे वहाँ से च्युत होकर ‘त्रिलोकमण्डन’ हाथी हो गये जिसे कि रावण ने अपने वश में किया था।

प्रश्न-३७९ ‘त्रिलोक मण्डन’ हाथी कब हुआ है?

उत्तर-३७९ त्रिलोक मण्डन हाथी रामचंद्र के समय में हुआ जिसे रावण ने अपने वश में किया था।

प्रश्न-३८० चार महीने के उपवास वाले मुनि का क्या नाम था?

उत्तर-३८० चार महीने के उपवास वाले मुनि का नाम ‘गुणनिधि’था।

प्रश्न-३८१ मायाचारी करने से कौन सी गति प्राप्त होती है?

उत्तर-३८१ मायाचारी करने से तिर्यंच गति प्राप्त होती है।


[सम्पादन] लोभ कषाय

प्रश्न-३८२ पाप का बाप किसे कहा है?

उत्तर-३८२ लोभ को पाप का बाप कहा है।

प्रश्न-३८३ लोभ के फल से सेठ मरकर कहाँ गया?

उत्तर-३८३ लोभ के फल से सेठ मरकर चौथे नरक चला गया।

प्रश्न-३८४ सेठ ने किस वस्तु का लोभ किया था ? उसका उसे क्या फल मिला?

उत्तर-३८४ जब उस सेठ की स्त्री ने राजा को रत्नथाल भेंट में देने के लिए सेठ को दिया तो अतिलोभ से रत्न थाल हाथ में लेते ही सेठ की अंगुलियाँ सर्प के फण सदृश हो गर्इं। यह सब देखकर राजा ने उसकी निन्दा करके ‘फणहस्त’ नाम रख दिया वह लोभी मरक अपने भण्डार में सर्प हो गया जहाँ अपने ही पुत्रों द्वारा मारा जाकर नर्क चला गया।

प्रश्न-३८५ उसके यहाँ पशु-पक्षियों की कितनी जोड़ियाँ थीं?

उत्तर-३८५ उसके यहाँ पशु-पक्षियों की सैकड़ों जोड़ियाँ थीं।

प्रश्न-३८६ लोभ से क्या हानि होती है?

उत्तर-३८६ लोभ से जग में निंदा तो होती ही है नरक, तिर्यंच आदि गतियाँ भी प्राप्त हो जाती हैं।