ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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10. महाभारत

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महाभारत

इसी कुरुजांगल देश के हस्तिनापुर नगर में परम्परागत कुरुवंशियों का राज्य चला आ रहा था। उन्हीं में शांतनु नाम के राजा हुए उनकी ‘सबकी’ नाम की रानी से ‘पराशर’ नाम का पुत्र हुआ। रत्नपुर नगर के जन्हु नामक विद्याधर राजा की ‘गंगा’ नाम की कन्या थी। विद्याधर राजा ने पराशर के साथ गंगा का विवाह कर दिया। इन दोनों के गांगेय-भीष्माचार्य नाम का पुत्र हुआ। जब गांगेय तरुण हुआ तब पराशर राजा ने उसे युवराज पद दे दिया।

किसी समय राजा पराशर ने यमुना नदी के किनारे क्रीड़ा करते समय नाव में बैठी सुन्दर कन्या देखी और उस पर आसक्त होकर धीवर से उसकी याचना की, किन्तु उस धीवर ने कहा कि आप के पुत्र गांगेय को राज्य पद मिलेगा तब मेरी कन्या का पुत्र उसके आश्रित रहेगा अत: मैं कन्या को नहीं दूँगा। राजा वापस घर आकर चिंतित रहने लगे। किसी तरह गांगेय को पिता की चिंता का पता चला। तब वे धीवर के पास जाकर बोले कि तुम अपनी कन्या को मेरे पिता को ब्याह दो, मैं वचन देता हूँ कि आपकी पुत्री का पुत्र ही राज्य करेगा फिर भी धीवर ने कहा कि आपके पुत्र-पौत्र कब चैन लेने देंगे, तब गांगेय ने उसी समय आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया और धीवर को संतुष्ट कर दिया। धीवर ने कहा कि हे कुमार! मैं किसी समय यमुना के किनारे गया और एक सुन्दर कन्या देखी। मैंने नि:संतान उस कन्या को उठा लिया। उसी समय आकाश से दिव्यध्वनि हुई ‘‘कल्याणमय रत्नपुर नगर के रत्नांगद राजा की रत्नवती रानी से यह कन्या उत्पन्न हुई है उसके किसी विद्याधर शत्रु ने इस कन्या का हरण कर यहाँ छोड़ दिया है।’’ इस प्रकार की वाणी सुनकर मैं उसे ले आया, इसका गुणवती नाम रखा और पालन किया है। गांगेय उसकी कुलशुद्धि सुनकर प्रसन्न हो गया और पराशर से उसका ब्याह हो गया। उसका दूसरा नाम ‘योजनगंधा’ था क्योंकि उसके शरीर से सुगंध दूर तक फैलती थी। पराशर की गुणवती रानी से ‘व्यास’ नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ। व्यास की रानी सुभद्रा थी, इन दोनों के धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर ये तीन पुत्र उत्पन्न हुए। चंपापुरी के राजा सिंहकेतु की वंश परम्परा में हरिगिरि, हेमगिरि आदि अनेक राजा हुए। अनन्तर इस वंश में शूर और वीर ये दो राजा हुए। शूर राजा शौरीपुर में राज्य करता था और वीर राजा मथुरा में रहते थे। शूर राजा की रानी का नाम सुरसुन्दरी था। उसके अंधकवृष्टि नाम का पुत्र हुआ। अंधकवृष्टि की रानी का नाम भद्रा था। इन दोनों के समुद्रविजय, स्मितसागर, हिमवान्, विजय, अचल, धारण, पूरण, सुमुख, अभिनंदन और वसुदेव ऐसे दशधर्म के सदृश दश पुत्र हुए तथा कुन्ती और माद्री नाम की दो पुत्रियाँ हुर्इं। इनमें से एक समुद्रविजय, बाईसवें तीर्थंकर श्री नेमिनाथ के पिता थे और वसुदेव बलभद्र एवं श्री कृष्ण के पिता थे अर्थात् नेमिनाथ और श्रीकृष्ण की ये कुन्ती और माद्री बुआ थीं। मथुरा नगरी में सुवीर (वीर) राजा रहता था, उसकी पत्नी का नाम पद्मावती था। इन दोनों के भोजकवृष्टि नाम का पुत्र हुआ, तरुण होने पर इनका ब्याह हुआ, रानी का नाम सुमति था। इन दोनों के उग्रसेन, महासेन और देवसेन ये तीन पुत्र हुए और गांधारी नाम की कन्या हुई।

[सम्पादन] हरिवंश और कुरुवंश का संबंध-

कुरुवंशी व्यास के पुत्र धृतराष्ट्र का विवाह भोजकवृष्टि की पुत्री गांधारी के साथ सम्पन्न हुआ। धृतराष्ट्र ने किसी समय पाण्डु के साथ कुन्ती का विवाह करने के लिए अंधकवृष्टि से कहा किन्तु कुन्ती के पिता ने पाण्डु को पाण्डु रोग के कारण कन्या नहीं दी। किसी समय वङ्कामाली नाम का विद्याधर हस्तिनापुर के वन में क्रीड़ा करने आया, उसकी अंगूठी वहाँ गिर गई। इधर पाण्डु राजा भी उस वन में घूम रहे थे उन्होंने वह अंगूठी देखी और उठा ली। जब विद्याधर वापस आकर खोजने लगा, तब पाण्डु ने वह अंगूठी उसे दिखाई और पूछा-मित्र! इससे क्या काम होता है? उत्तर में विद्याधर ने कहा-मित्र! यह इच्छानुसार रूप बनाने वाली है। पाण्डु ने कहा-मित्र! कुछ दिन यह अंगूठी मेरे हाथ में रहने दो, उसने यह बात मान ली। इधर पाण्डु, कुन्ती के रूप में आसक्त हो अदृश्यरूप से कुन्ती के महल में चला गया और उसे अपने वश में करके प्रतिदिन अदृश्यरूप से जाने लगा। पाण्डु के समागम से कुन्ती के गर्भ रह गया और पुत्र का जन्म हुआ। तब गुप्त रखते हुए भी यह भेद प्रगट हो जाने से राजा अंधकवृष्टि ने उस बालक को कुण्डल आदि से अलंकृत कर संदूकची में बंदकर यमुना नदी में छोड़ दिया।

चम्पापुर के भानु राजा को वह पेटी प्राप्त हुई उन्होंने अपनी राधा पत्नी को वह पुत्र दे दिया। उस समय राधा ने कान खुजाया इसलिए भानु राजा ने पुत्र का नाम ‘कर्ण’ रख दिया। अनन्तर राजा अंधकवृष्टि ने पाण्डुराजा के साथ वुंâती और माद्री दोनों पुत्रियों का संबंध कर दिया, विवाह के कुछ दिन बाद कुन्ती ने क्रम से युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन ऐसे तीन पुत्रों को जन्म दिया। माद्री से नकुल और सहदेव ऐसे दो पुत्र हुए। ये पाँचों भाई पाण्डव कहलाने लगे। लोग कर्ण को कुन्ती के कान से उत्पन्न हुआ मानते हैं या सूर्य के सेवन से कुन्ती को कर्ण नाम का पुत्र हुआ, ऐसा कहते हैं, वह कथन युक्तिसंगत नहीं है। पाण्डु के छोटे भाई विदुर का विवाह देवक राजा की कन्या कुमुदवती के साथ हुआ था। धृतराष्ट्र और गांधारी के दुर्योधन को आदि लेकर क्रमश: सौ पुत्र उत्पन्न हुए जो कुरुवंशी होने से कौरव कहलाये। गांगेय ने इन कौरव-पाण्डवों का रक्षण किया और यथोचित शिक्षण दिया। द्रोणाचार्य नामक किन्हीं द्विज श्रेष्ठी ने इन सब पुत्रों को धनुर्वेद विद्या सिखाई। इन सभी में अर्जुन में विशेष विनय होने से गुरु की कृपा भी उस पर अधिक हो गई और विशेष योग्यता से अर्जुन ने गुरु से शब्दभेदी महाविद्या सीख ली। किसी समय राजा ने पाण्डु वन में हरिणी में आसक्त एक हरिण को अपने बाण से मार दिया, उस समय आकाश से ध्वनि हुई-‘‘राजन्’’! यदि वन में निरपराधी जन्तु को राजा ही मारेंगे तो उनका रक्षक कौन होगा? इस वाणी को सुनकर राजा के मन में पश्चात्ताप के साथ ही वैराग्य उत्पन्न हो गया। अनन्तर सुव्रत मुनि के पास जाकर उपदेश सुना और मुनि के मुख से अपनी आयु तेरह दिन की समझकर धृतराष्ट्र आदि को अपने घर में यथोचित धर्म शिक्षा देकर सब परिग्रह का त्याग कर गंगा के किनारे गया, वहाँ आजन्म शरीर और आहार का त्याग कर सल्लेखना से मरण किया और सौधर्म स्वर्ग में देव हो गया। रानी माद्री भी विरक्त होकर नकुल और सहदेव को कुन्ती को सौंपकर सल्लेखना से मरकर पहले स्वर्ग में उत्पन्न हुई।

[सम्पादन] धृतराष्ट्र का वैराग्य-

किसी समय धृतराष्ट्र राजा ने वन में मुनिराज से धर्मश्रवण कर प्रश्न किया-भगवन्! इस कौरव राज्य के भोक्ता मेरे पुत्र दुर्योधन होंगे या पाण्डु पुत्र? उत्तर में सुव्रत मुनि ने कहा-राजन्! राज्य के निमित्त से तेरे पुत्र दुर्योधन आदि और पाण्डवों के बीच महायुद्ध होगा। उसमें तेरे पुत्र मारे जावेंगे और पाण्डव राज्य में प्रतिष्ठित होंगे। यह सुनकर चिंतित हुए धृतराष्ट्र हस्तिनापुर वापस आये और गांगेय को बुलाकर अपना अभिप्राय प्रगट कर उनके तथा द्रोणाचार्य के समक्ष अपने पुत्रों व पाण्डवों को राज्य समर्पण कर दिया। अनन्तर अपनी माता सुभद्रा के साथ वन में जाकर दीक्षा ग्रहण कर ली। अनन्तर श्री गांगेय ने आपस में इनका कुछ विरोध देखकर वैर नष्ट करने के लिए युक्ति से आधा-आधा राज्य विभक्त कर कौरव और पाण्डवों को दे दिया। स्वभावत: कौरव हृदय में दुष्ट और वाणी में मिष्ठ थे। वे क्रोध से पाण्डवों के प्राण लेने की इच्छा करते थे। क्रीड़ाओं में अनेक बार कौरवों ने भीम को मारने का प्रयत्न किया किन्तु वे पुण्योदय से भीम का कुछ भी बिगाड़ नहीं सके प्रत्युत् स्वयं ही अपमानित होते रहे। यहाँ तक कि उन्होंने एक बार भीम को भोजन में विष भी दिला दिया किन्तु दैवयोग से उसके लिए वह महाविष भी अमृततुल्य हो गया।

[सम्पादन] द्रोणाचार्य द्वारा शिष्य परीक्षण-

किसी समय गुरु द्रोणाचार्य कौरव-पाण्डवों को साथ लेकर वन में गये, वहाँ उन्होंने उन्नत शाखा पर बैठे हुए काक को देखकर कहा-जो इस काक की दक्षिण आँख को लक्ष्य कर वेधित करेगा, वह धनुर्धरों में श्रेष्ठ समझा जावेगा। सब असमर्थ रहे, अन्त में अर्जुन ने अपनी जंघा को हस्त से ताड़ित किया, उसे सुनकर जैसे ही कौवे ने नीचे देखा, वैसे ही अर्जुन ने बाण से उसकी दाहिनी आँख को बेध दिया, तब अर्जुन की खूब प्रशंसा हुई।

[सम्पादन] भील की गुरुभक्ति-

किसी समय वन में अर्जुन ने एक कुत्ते को देखा, उसका मुख बाण प्रहार से संरुद्ध था। उसे देख अर्जुन ने सोचा-यह शब्दवेधी धनुर्विद्या गुरु ने मुझे ही दी है, इसका जानकार यहाँ और कौन है? खोजते-खोजते एक भिल्ल मिला, उससे वार्तालाप होने से उसने कहा-मेरे गुरु द्रोणाचार्य हैं मैंने उन्हीं से यह विद्या सीखी है। अर्जुन के आश्चर्य का पार नहीं रहा, तब भिल्ल ने वन में बनाये हुए स्तूप के पास ले जाकर अर्जुन को दिखाया और कहा-मेरे गुरु ये ही हैं, मैंने इन्हीं में द्रोणाचार्य की कल्पना कर रखी है। मैं इसी स्तूप को गुरु मानकर उपासना करके शब्दवेधी धनुर्विद्या में निपुण हुआ हूँ। अर्जुन ने हस्तिनापुर वापस आकर गुरु से सारी बात बता दी और कहा कि वह पापी भिल्ल निरपराध जन्तुओं को मारकर पापकर्म कर रहा है, आपको इसे रोकना चाहिए। द्रोणाचार्य अर्जुन के साथ वहाँ गये और उस भील ने उन्हें साक्षात् द्रोणाचार्य जानकर साष्टांग नमस्कार किया, बहुत ही भक्ति प्रदर्शित की, तब द्रोणाचार्य ने कहा-मैं एक वस्तु तुमसे माँगूँ, तुम दोगे? उत्तर में उसने सहर्ष स्वीकार किया, तब गुरु ने कहा ‘दाहिने हाथ का अंगूठा मुझे दे दो।’ उस भिल्ल ने उसी समय काटकर दे दिया, अब वह बाण चलाने में असमर्थ हो गया और जीवहिंसा से बच गया।

[सम्पादन] कौरव-पाण्डव विरोध-

कौरव और पाण्डव आधा-आधा राज्य भोगते हुए हर रोज सभा में आकर एकत्र बैठते थे। दुष्ट कौरव अब स्पष्ट बोलने लगे थे कि ‘हम सौ हैं और ये पाँच ही हैं परन्तु आधा-आधा राज्य हम दोनों को मिला है, यह अन्याय हुआ है। वास्तव में इस राज्य के एक सौ पाँच विभाग करके उत्तम साम्राज्य का उपभोग हम लोग लेंगे। कभी-कभी भीम, अर्जुन, आदि क्षुभित हो उठते थे तो अतिशय शांत धर्मप्रिय युधिष्ठिर इन लोगों को शांत कर लेते थे।

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लाक्षागृह में पाण्डवों को भेजकर दुर्योधन ने आग लगवा दी, किन्तु पुण्य से पाण्डव और माता कुन्ती सुरंग द्वार से निकल कर बच गए।

[सम्पादन] लाक्षागृह दाह-

किसी समय हस्तिनापुर में कपटी दुर्योधन ने लाख का एक दिव्य भवन बनवाया और पितामह से कहा कि एक पास रहने से अशांति होती है अत: पाण्डवों को उस गृह में भेज दो। सरल परिणामी गांगेय ने उन्हें भेज दिया। पाँचों पाण्डव निष्कपट वृत्ति से माता कुन्ती के साथ वहाँ लाक्षागृह में रहने लगे। दयालु विदुर ने (चाचा ने) यह कपट जान लिया और युधिष्ठिर आदि को उपदेश दिया कि पता नहीं यह लाख का मकान क्यों बनवाया है? तुम्हें इन दुर्योधन आदि पर विश्वास नहीं करना चाहिए। अनन्तर वे वन में चले गये। वहाँ स्थिरचित्त बहुत देर तक उपाय सोचा और लाख गृह से वन तक एक सुरंग खुदवा दी फिर वह गूढ़ सुरंग ढक दी। विदुर राजा ने स्वयं भी वह सुरंग नहीं देखी और पाण्डवों को भी सूचना नहीं दी थी। किसी समय रात्रि में दुर्योधन ने किसी दुष्ट ब्राह्मण से उस भवन में आग लगवा दी। वहाँ सोते हुए पाण्डव जग गये, चारों तरफ आग की लपटों को देख विंकर्तव्य विमूढ़ हो गये। महामंत्र का जाप करने लगे, इतने में इधर-उधर घूमते हुए उन्हें ढकी हुई सुरंग मिल गई और पुण्योदय से वे माता सहित सुरंग से बाहर आ गये। श्मशान से छह मुर्दे लाकर उसमें डालकर वे लोग अन्यत्र चले गये। प्रात:काल दुर्योधन ने कपट से रोना- धोना प्रारंभ किया किन्तु गांगेय आदि ने कह दिया कि यह सब तुम्हारी ही कूटनीति है, इस घटना से प्रजा भी दुर्योधन आदि से ग्लानि करने लगी। अपने भानजों का लाक्षागृह दाह से मरण सुनकर समुद्रविजय, वसुदेव आदि दुर्योधन पर बहुत कुपित हुए और युद्ध के लिए सन्नद्ध हुए किन्तु किसी विद्वान् ने उन्हें उस समय रोक दिया।

[सम्पादन] पाण्डवों का देशाटन-

उधर पाण्डव वन में से जाते हुए गंगा नदी के किनारे पहुँचे और उसे पार करने के लिए नाव में जा बैठे। नाव चलकर सहसा नदी के बीच में रुक गई। मल्लाह से पूछने पर उन्हें मालूम हुआ कि यहाँ तुण्डिका नामक जलदेवी रहती हैं जो नरबलि चाहती हैं, इससे सब चिंतित हो गये। अन्त में ‘भीम’ नदी में वूâद पड़ा और युद्ध में तुण्डिका को परास्त कर अथाह जल में तैरते हुए किनारे जा पहुँचा। तत्पश्चात् वे ब्राह्मण वेष में चलकर कौशिकपुरी पहुँचे, वहाँ पर वर्ण राजा के द्वारा आदर-सत्कार आदि को प्राप्त हुए। आगे अनेकों देशों में परिभ्रमण करते हुए इन लोगों के साथ अनेकों कन्याओं के पाणिग्रहण भी हो गये।

[सम्पादन] बक राजा का मर्दन-

चलते-चलते वे पाण्डव श्रुतपुर नगर में गये, वहाँ उन्होंने जिनमंदिर में अनेक जिन प्रतिमाओं का पूजन किया। रात्रि में एक वैश्य के घर में ठहर गये, इतने में ही वैश्य की पत्नी रोने लगी। कुन्ती के प्रश्न करने पर वैश्य पत्नी ने कहा कि ‘इस नगर का’ ‘बक’ नाम का राजा है वह मांसाहारी होने से अब तो मनुष्य का मांस खाने लगा। जब नगर के बालक बहुत कम हो गये, तब रसोइये से सारा भेद खुल जाने से प्रजाजनों ने मिलकर राजा को ग्राम से निकाल दिया और लोगों ने ऐसी व्यवस्था बनाई कि प्रतिदिन एक-एक घर से एक-एक मनुष्य दिया जाये। आज बारह वर्ष हो गये हैं वह राजा राक्षस के समान भयंकर हो गया है। आज मेरे पुत्र की बारी है और मेरे एक ही पुत्र है, ऐसा कहकर रोने लगी। इस घटना को सुनकर भीम ने बक राजा के पास जाकर अपनी बाहुओं से उसके साथ भयंकर युद्ध करके बक राजा को समाप्त कर दिया। तब सारी समाज ने भीम का जय-जयकार किया।

अनेकों धर्म उत्सव करते हुए वे पाण्डव वर्षाकाल व्यतीत कर वहाँ से निकले। घूमते-घूमते ये लोग चंपापुरी में पहुँच गये। अनेकों चेष्टाओं से मनोविनोद करते हुए घूम रहे थे कि अकस्मात् एक बलवान हाथी आलानस्तंभ तोड़कर नगर को व्याकुल कर रहा था। तब भीम ने उस हाथी को वश में करके नगर का वातावरण शांत किया। आगे बढ़कर कदाचित् ये लोग विंध्यपर्वत पर पहुँचे। वहाँ एक जिनमंदिर के किवाड़ बंद थे, भीम ने खोल दिये और सबने बड़ी भक्ति से जिनेन्द्र भगवान की पूजा की। अनन्तर एक यक्षदेव ने आकर भीम को एक गदा प्रदान की और बहुत प्रशंसा-स्तुति की।

[सम्पादन] द्रौपदी का स्वयंवर-

अनन्तर ये लोग अनेकों देशों का उल्लंघन करते हुए मावंâदी नगरी में आ गये। वहाँ के राजा दु्रपद की भोगवती पत्नी से उत्पन्न हुई द्रौपदी नामक सुन्दर कन्या थी, निमित्तज्ञानी ने बताया था कि जो पुरुष गांंडीव धनुष चढ़ायेगा, वही इस कन्या का पति होगा। वहाँ यह सूचना थी कि जो मनुष्य गांडीव धनुष चढ़ाकर राधा के नाक में स्थित मोती को विद्ध करेगा, वही इस कन्या का पति होगा। उस समय वहाँ पर दुर्योधन आदि बड़े-बड़े राजा लोग आये थे। सभी के हताश हो जाने पर युधिष्ठिर की आज्ञा से ब्राह्मण वेषधारी अर्जुन ने गांडीव धनुष को चढ़ाकर राधा की नाक का मोती बेधकर द्रौपदी की वरमाला प्राप्त कर ली।

[सम्पादन] द्रौपदी का लोकापवाद-

जिस समय द्रौपदी ने अर्जुन के गले में वरमाला डाली, उस समय हवा के वेग से माला के मणि टूटकर पाँचों पाण्डवों की गोद में जा गिरे। उस समय द्रौपदी ने पाँच पुरुषों को वर लिया है, मूर्ख लोगों ने ऐसी घोषणा कर दी। आचार्य कहते हैं कि जो ऐसी सतियों पर दोषारोपण करते हैं वे महान पाप का बंध कर लेते हैं। इसका कारण भी यह है कि किसी समय एक आर्यिका नवदीक्षिता थी उसने पाँच जार पुरुषों के साथ वन में आई हुई बसंतसेना नामक सुन्दर वेश्या को देखा, उसे देखकर मुझे भी ऐसा सुख प्राप्त होवे, ऐसा निदान कर लिया। पुन: शीघ्र ही वापस आर्यिकाओं के पास आकर गुर्वाणी के पास अपनी निंदा करते हुए प्रायश्चित्त लिया और घोर तपश्चरण किया पुन: आयु के अंत में समाधि से मरकर अच्युत स्वर्ग में देवी हुई, वहाँ से चयकर द्रौपदी हुई। जरा सी दुर्भावना से उस समय जो कर्म बंध हो गया था, उसके फलस्वरूप द्रौपदी को पाँच पति वाली होने का झूठा आरोप लगा है। वास्तव में युधिष्ठिर और भीम ज्येष्ठ तथा नकुल तथा सहदेव देवर थे।

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आर्यिका ने वेश्या के साथ पाँच जार पुरुषों को देखकर वैसा सुख चाहा, पुन: तत्काल ही प्रायश्चित्त लिया, फिर भी उस कर्म से द्रौपदी के भव में पंचभर्तारी होने का अपवाद आया।

द्रौपदी अर्जुन के गले में वरमाला डाल रही थी, माला टूटने से चारों तरफ बिखर गई। लोगों ने चर्चा कर दी कि द्रौपदी ने पाँच पति वरे हैं।

इधर दुर्योधन आदि भड़ककर युद्ध करने के लिए वहीं स्वयंवर मण्डप में सन्नद्ध हो गये। इस समय पाण्डव लोग ब्राह्मण के वेष में थे। भयंकर युद्ध शुरू हो गया। गुरु द्रोणाचार्य को अपने सामने युद्ध में तत्पर देख अर्जुन ने अपना परिचय लिखकर वाण में लगाकर गुरु के पास छोड़ा। द्रोणाचार्य ने पत्र पढ़ा, उनके नेत्र अश्रुजल से भर गये। लाक्षागृह में जल गये थे, ऐसी कल्पना के बाद पुन: उन पाण्डवों को जीवित प्राप्तकर कुटुम्बियों के हर्ष का पार नहीं रहा। द्रोणाचार्य, भीष्माचार्य, कर्ण, कौरव, सभी परस्पर में पाण्डवों से मिले। तब दुर्योधन ने कहा कि हे नृपगण! मैंने लाक्षागृह नहीं जलाया था, मैं शपथपूर्वक कहता हूँ। इत्यादि रूप से अपनी दुष्टता को छिपाते हुए दुर्योधन आदि अर्जुन का विवाह कराकर सब मिलकर हस्तिनापुर आ गये और सुख से रहने लगे। मार्ग में जिन-जिनने युधिष्ठिर आदि को कन्याएँ दी थीं व देने का संकल्प किया था, उन सभी को अपने यहाँ बुलाकर ये लोग कालयापन करने लगे।

उस समय युधिष्ठिर दिल्ली में, भीम कुरुजांगल देश के तिलपथ नामक बड़े नगर में, अर्जुन सुनपथ (सोनीपत) में, नकुल जलपथ (पानीपत) में और सहदेव वणिक्पथ (बागपत) नामक नगर में रहने लगे। ये पाण्डव हमेशा न्यायनीति युक्त धार्मिक भावना रखते थे किन्तु दुर्योधन आदि ईष्र्या में बढ़ते ही गये।

किसी समय पाण्डव के मामा वसुदेव के पुत्र श्रीकृष्ण ने अर्जुन को ऊर्जयन्त महापर्वत पर क्रीड़ा के लिए बुलाया। वहाँ पर बहुत काल तक ये नर और नारायण आनन्द से क्रीड़ा करते रहे। श्रीकृष्ण की बहिन सुभद्रा का अर्जुन के साथ विवाह संबंध हो गया। इसी प्रकार यादव वंश की कन्याओं का विवाह युधिष्ठिर आदि पाण्डवों के साथ सम्पन्न हुआ। कुछ दिन बाद अर्जुन सुभद्रा पत्नी के साथ हस्तिनापुर आ गये और उन दोनों के अभिमन्यु नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ।

[सम्पादन] कौरव-पाण्डवों की द्यूत क्रीड़ा-

किसी समय दुष्ट बुद्धि दुर्योधन ने पाण्डवों को बुलाया और द्यूत-जुआ खेलने का निर्णय किया। धीरे-धीरे धर्मराज्य युधिष्ठिर अपने को छोड़कर सब राज्य वैभव हार गये। तब भीम ने आकर युधिष्ठिर को जुआ खेलने से रोका और उस व्यसन के दोष बताये, किन्तु धर्मराज ने बारह वर्ष तक पृथ्वी को हारकर जुआ खेलना बंद किया। ये पाण्डव अपने घर पहुँचे। इतने में ही दुर्योधन ने एक दूत भेजा जिसने आकर कहा कि आप लोग बारह वर्ष तक वन में निवास करें जिससे कि कोई आपका नाम भी न जान सके। अनन्तर तेरहवाँ वर्ष गुप्तरूप से व्यतीत करें, ऐसा राजा दुर्योधन ने कहलाया है।

[सम्पादन] द्रौपदी का अपमान-

इसी बीच दुर्योधन का भाई दु:शासन दुष्टदृृष्टि से आकर द्रौपदी के महल में जाकर उसकी छोटी पकड़कर उसे बाहर घसीट लाया और अपमान किया। द्रौपदी के अपमान की बात सुनकर भीम और अर्जुन अत्यधिक कुपित हो उठ खड़े हुए किन्तु युधिष्ठिर ने उन्हें उस समय शांत कर दिया।

[सम्पादन] पाण्डवों का वन प्रयाण-

उस समय रोती हुई माता कुन्ती को ये पाण्डव अपने चाचा विदुर राजा के घर पर छोड़कर चल पड़े। अत्यधिक मना करने पर भी द्रौपदी इनके साथ चल पड़ी। जुआ के दोषों का विचार करते हुए ये पाण्डव वन और पर्वतों में यत्र-तत्र भ्रमण कर रहे थे।

किसी समय अर्जुन विजयार्ध पर्वत पर जाकर रथनूपुर के इन्द्र नामक राजा के शत्रुओं को परास्त कर वहाँ रहने लगे और शस्त्र विद्या में चित्रांग आदि सौ शिष्यों को प्राप्त किया पुन: पाँच वर्ष बाद उसी कालिंजर वन में आकर भाई से मिलकर रहने लगे।

किसी समय सहाय वन में पाण्डवों का समाचार जानकर दुर्योधन उन्हें मारने के लिए सेना के साथ वहाँ पहुँचा, तब नारद ऋषि से संकेत पाकर चित्रांग आदि विद्याधरों ने युद्ध में प्रवृत्त होकर दुर्योधन को बांध लिया किन्तु युधिष्ठिर की आज्ञा से सज्जन स्वभाव वाले अर्जुन ने दुर्योधन को छुड़ा लिया। उस समय दुर्योधन ने कहा कि मुझे युद्ध में मरने का या पराजय का वह दु:ख नहीं होता जो कि अर्जुन द्वारा बंधनमुक्त कराने का दु:ख है। तब उसने यह सूचना निकाल दी कि जो पाण्डवों को मार कर मेरे अपमानजनित दु:ख को दूर करेगा, उसे मैं आधा राज्य दूँगा। तब एक कनकध्वज राजा ने पाण्डवों को मारने के लिए ‘कृत्या’ नाम की विद्या सिद्ध की किन्तु उस विद्या ने उस कनकध्वज को ही मार डाला।

इधर घूमते-घूमते ये पाण्डव विराट नगर में पहुँचे। तब तक बारह वर्ष पूर्ण हो चुके थे और गुप्त रूप से तेरहवाँ वर्ष बिताना था इसलिए युधिष्ठिर ने पुरोहित, भीम ने रसोइया, अर्जुन ने गंधर्व, नकुल ने घोड़ों के रक्षक, सहदेव ने गोधन के रक्षक का वेष बनाया और द्रौपदी ने मालिन का वेष बना लिया। ये सब कषाय रंग के वस्त्र पहनकर राज्य सभा में गए और विराट नरेश ने इनको यथायोग्य स्थानों पर नियुक्त कर दिया।

किसी समय विराट नरेश का साला कीचक वहाँ आया और द्रौपदी के रूप पर मुग्ध होकर उसके शीलहरण की चेष्टा करने लगा, तब भीम ने स्त्री वेष में होकर उस कीचक को खूब दण्डित किया और द्रौपदी के शील की सुरक्षा की। किसी समय दुर्योधन के द्वारा भेजे गये अनेकों विंâकर वापस आकर हस्तिनापुर में दुर्योधन से बोले-महाराज! पाण्डवों का कहीं नामोनिशान नहीं मिलता है। तब दुर्योधन ने उन लोगों को खूब इनाम दिया। तब गुरु भीष्माचार्य पितामह ने कौरवों से कहा, ‘‘हे कौरवों! सुनो, वे पाण्डव अल्प मृत्यु वाले नहीं हैं मेरे सामने एक बार मुनि ने कहा है कि युधिष्ठिर कुरुजांगल देश का राजा होगा और शत्रुंजय पर्वत से मोक्ष प्राप्त करेगा।’’ अत: ये सत्पुरुष कहीं न कहीं जीवित अवश्य हैं।

किसी समय जालंधर नाम के राजा ने दुर्योधन से कहा कि विराट राजा के पास गोधन बहुत से हैं वह जगत में विख्यात हैं, मैं उसका हरण करूँगा तब गुप्त शरीर वाले पाण्डवों को शीघ्र ही मारूँगा। दुर्योधन ने यह सब स्वीकार कर लिया। वहाँ विराट नगर पहुँचकर गोकुल हरण करने से विराट राजा के साथ युद्ध छिड़ गया उसमें पाण्डवों ने जालंधर को बांध लिया। घटना से दुर्योेधन भी सेना लेकर वहाँ आ गया और द्रोणाचार्य, भीष्माचार्य, कर्ण आदि सभी उसमें सम्मिलित थे तब अर्जुन ने स्वनामाक्षर बाण भीष्म और द्रोण गुरु के पास भेजा। उस समय उन दोनों ने कौरवों को बहुत समझाया किन्तु वे न माने। अर्जुन ने पितामह और गुरु द्रोणाचार्य को बहुत मना किया किन्तु वे लोग भी अर्जुन आदि के साथ युद्ध करते रहे। उस युद्ध में अर्जुन ने विजय पताकाप्राप्त की और गोकुल को मुक्त कराया। कौरव राजागण लज्जित और पराजित होकर हस्तिनापुर चले आए।

उधर विराट राजा ने पाँचों पाण्डवों का परिचय प्राप्त कर उन्हें नमस्कार किया और कहा-हे भगवन्! मैंने आप को पहचाने बिना आप लोगों को विंâकर बनाया सो क्षमा करो, मैं आपका विंâकर हूँ। आप यहाँ राज्य कीजिए तथा अभिमन्यु के साथ अपनी कन्या के विवाह का निश्चय किया। यह खबर द्वारावती में पहुँच गई और वहाँ से बलभद्र, विष्णु, प्रद्युम्न, भानु, राजा द्रुपद आदि अभिमन्यु के विवाह में आये। कुछ दिन रहकर ये यादव लोग कुन्ती और पाण्डवों को लेकर द्वारावती चले गये, वहाँ अन्योन्य की प्रीति से वे दीर्घकाल तक रहे।

एक दिन द्वारावती में किसी ने श्रीकृष्ण को दु:शासन के द्वारा कृत द्रौपदी के अपमान की और भी दुर्योधन के अनेक दुष्टकृत्यों की बात कही। तब पाण्डवों के साथ विचार करके श्रीकृष्ण ने हस्तिनापुर एक दूत भेज दिया। दूत ने जाकर प्रणाम कर निवेदन किया-हे राजन्! श्रीकृष्ण का कहना है कि आप पाण्डवों से सन्धि करके उनका आधा राज्य उन्हें दे दीजिए अन्यथा आपके वंश का नाश होगा, श्रीकृष्ण आदि पाण्डवों की सहायता करेंगे। इस बात को दुर्योधन ने विदुर चाचा से बताया तब विदुर ने इन लोगों को बहुत समझाया किन्तु वे दुष्ट कुछ भी नहीं माने तब विदुर ने विरक्त होकर वन में जाकर विश्वकीर्ति मुनि को नमस्कार करके जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण कर ली।

[सम्पादन] महायुद्ध-

किसी समय एक विद्वान् राजगृह नगर के राजदरबार में उत्तम रत्नों की भेंट लेकर जरासंध अर्धचक्री के पास गया और नमस्कार किया, तब राजा जरासंध ने पूछा-तुम कहाँ से आये हो और यह रत्न कहाँ से लाये हो? उत्तर में उसने कहा-राजन्! ‘‘द्वारिका में नेमिप्रभु के साथ कृष्ण राजा राज्य करते हैं। श्री नेमि तीर्थंकर के गर्भ में आने के छह माह पहले से लेकर पन्द्रह माह तक देवों ने शौरीपुर में रत्न वर्षाए थे उनमें से ये रत्न हैं मैं उन्हें ही लेकर आपके दर्शनार्थ आया हूँ।’’ यह सुनते ही जरासंध चक्री भड़क उठे और युद्ध के लिए प्रयाण कर दिया, तब दुर्योधन आदि राजाओं के पास समाचार भेज दिया। दुर्योधन बहुत ही प्रसन्न हुआ। उसने सोचा यह पाण्डवों को समाप्त करने का अच्छा अवसर हाथ लगा है। जरासंध ने द्वारावती में दूत भेजा, वह दूत जाकर बोला-हे यादवों! आपको चक्री ने कहलाया है कि आप देश छोड़कर इस महा समुद्र में वैâसे रहते हैं? आप लोग गर्व छोड़कर चक्री जरासंध की सेवा करें। तब बलभद्र व्रुद्ध होकर बोला- श्रीकृष्ण को छोड़कर अन्य चक्री और कौन है? तथा दूत को फटकार कर निकाल दिया। यह सुनकर राजा जरासंध सेना के साथ युद्ध के लिए कुरुक्षेत्र में आ गया।

उस समय श्रीकृष्ण ने कर्ण के पास दूत से समाचार भेजा कि आप पांडु राजा के पुत्र युधिष्ठिर आदि के बड़े भाई हैं, आप सम्पूर्ण कुरुक्षेत्र का राज्य ग्रहण कीजिए, इधर आइए। माता१ कुन्ती ने भी उस समय कर्ण को वास्तविक स्थिति बताकर उस पक्ष से युद्ध करने के लिए बहुत रोका किन्तु कर्ण ने सारी बातें समझकर भी यह कहा कि राजा जरासंध के हमारे ऊपर बहुत उपकार हैं अत: इस समय स्वामी की सहायता करना हमारा कर्तव्य है न कि बंधुवर्गों की। यदि युद्ध में जीवित रहे तो पुन: बंधुओं का समागम प्राप्त करेंगे। कर्ण ने दूत के द्वारा जरासंध के पास समाचार भेजा कि आप यादवों से संधि कर लीजिए अन्यथा विष्णु श्रीकृष्ण के हाथ से आपका मरण होगा। इन सब बातों की जरासंध ने उपेक्षा कर दी।’’

श्रीकृष्ण भगवान नेमिनाथ के पास गए और पूछा कि शत्रु का क्षय होकर क्या मुझे विजय प्राप्त होगी? उस समय इन्द्रादि वंद्य भगवान ने ‘ॐ’ ऐसा उत्तर दिया। इस उत्तर से और नेमि प्रभु के मंद हास्य से श्रीकृष्ण ने अपनी विजय को निश्चित कर लिया। इस समय भगवान गृहस्थाश्रम में थे और सरागी थे। जरासंध के प्रयाण समय अनेक अपशकुन हुए तब राजा ने मंत्री से इसका फल पूछा, विद्वान् मंत्रियों ने कहा-राजन्! जिसने जरासंध की कन्या के पति वंâस को मारा है, मुष्टियों के प्रहार से चाणूर मल्ल को चूर्ण किया है और जिसने कोटिशिला उठाकर ‘‘मैं नारायण हूँ’’ इस बात को प्रगट कर दिया है उस कृष्ण के साथ आप लोगों का युद्ध अनिष्टसूचक ही है। जिसके साथ अर्जुन हैं, भीम हैं और भी अनेक भूमिगोचरी हैं, विद्याधर राजा हैं, नेमिनाथ के भाई ऐसे यादवों का तुम कुछ भी बिगाड़ नहीं कर सकोगे किन्तु ये गर्विष्ठ राजागण कुछ नहीं माने। इधर विष्णु भी सात अक्षौहिणी सेना सहित कुरुक्षेत्र में आ गये।

[सम्पादन] अक्षौहिणी का प्रमाण-

घोड़े, हाथी, पदाति और रथों से युक्त सेना अक्षौहिणी कहलाती है। जिसमें ९००० हाथी, ९००००० रथ, ९००००००० घोड़े और ९००००००००० (नौ सौ करोड़) पदाति हों उसे अक्षौहिणी कहते हैं। यादव पक्ष में अतिरथ, महारथ, समरथ, अर्धरथ और रथी ऐसे राजागण थे। श्री नेमि कुमार, बलदेव और कृष्ण अतिरथ थे। राजा समुद्र विजय, वसुदेव, युधिष्ठिर, अर्जुन आदि बहुत से राजा महारथ थे। स्तिमितसागर आदि वसुदेव के आठ भाई, शंब, द्रुपद आदि समरथ थे। महानेमि, विराट राजा आदि अर्धरथ थे और इनके सिवाय अनेकों राजा रथी थे।

इस समय एक-दूसरे के संबंधी ही विरोध पक्ष में थे। प्रद्युम्न इधर था, तो उसके धर्मपिता कालसंवर जरासंध के साथ थे, अर्जुन के पितामह, बड़े भाई कर्ण, गुरु द्रोणाचार्य आदि कौरवों के साथ थे। यादव पक्ष में उनके साढ़े तीन करोड़ कुमार रणविद्या में कुशल थे और हजारों राजागण श्रीकृष्ण के साथ थे।

[सम्पादन] चक्रव्यूह रचना-

जरासंध की सेना में कुशल राजाओं ने शत्रुओं को जीतने के लिए चक्रव्यूह की रचना की। उस चक्रव्यूह में जो चक्राकार रचना की गई थी उसके एक हजार आरे थे, एक-एक आरे में एक-एक राजा स्थित था, एक-एक राजा के सौ-सौ हाथी थे, दो-दो हजार रथ थे, पाँच-पाँच हजार घोड़े थे और सोलह-सोलह हजार पैदल सैनिक थे और उन राजाओं के हाथी, घोड़ा आदि का प्रमाण पूर्वोक्त प्रमाण से चौथाई था। कर्ण आदि पाँच हजार राजाओं से सुशोभित राजा जरासंध स्वयं उस चक्र के मध्य भाग में स्थित था। गांधार और सिंध देश की सेना, दुर्योधन से सहित सौ कौरव और मध्य देश के राजा भी उसी चक्र के मध्य भाग में स्थित थे। धीर-वीर पराक्रमी पचास राजा अपनी-अपनी सेना के साथ चक्रधारा की संधियों पर अवस्थित थे। आरों के बीच-बीच के स्थान अपनी-अपनी विशिष्ट सेनाओं से युक्त राजाओं से सहित थे। इनके सिवाय व्यूह के बाहर भी अनेक राजा नाना प्रकार के व्यूह बनाकर स्थित थे।

[सम्पादन] गरुड़व्यूह की रचना-

इधर जब वसुदेव को पता चला कि जरासंध की सेना में चक्रव्यूह की रचना की गई है तब उसने भी चक्रव्यूह को भेदने के लिए गरुड़व्यूह की रचना कर डाली। नाना प्रकार के शस्त्रों से सुसज्जित पचास लाख यादव कुमार उस गरुड़ व्यूह के मुख पर खड़े किए गए। अतिरथ, बलदेव और श्रीकृष्ण उसके मस्तक पर स्थित हुए। अव्रूâर, कुमुद आदि जो वसुदेव के पुत्र थे, वे बलदेव और श्रीकृष्ण की रक्षा करने के लिए उनके पृष्ठ रक्षक बनाए गए। एक करोड़ रथों से सहित भोज राजा गरुड़ के पृष्ठ भाग पर स्थित हुआ। राजा भोज की रक्षा के लिए धारण, सागर आदि अनेक राजा नियुक्त हुए। अपने महारथी पुत्रों तथा बहुत बड़ी सेना से युक्त राजा समुद्रविजय (नेमिनाथ के पिता) उस गरुड़ के दाहिने पंख पर स्थित हुए और उसकी आजू-बाजू की रक्षा के लिए सत्यनेमि, महानेमि आदि सैकड़ों प्रसिद्ध राजा पच्चीस लाख रथो से सहित स्थित हुए। बलदेव के पुत्र और पाण्डव गरुड़ के बांएँ पक्ष पर आश्रय लेकर खड़े हुए, इन्हीं के समीप उल्मुक, निषध आदि अनेक शस्त्रधारी राजा स्थित थे। ये सभी कुमार अनेक लाख रथों से युक्त थे। इनके पीछे राजा सिंहल, चन्द्रयश आदि राजा साठ-साठ हजार रथ लेकर स्थित थे। ये बलशाली राजा उस गरुड़ की रक्षा करते हुए स्थित थे। इनके सिवाय अशित, भानु आदि बहुत से राजा अपनी-अपनी सेनाओं से युक्त हो श्रीकृष्ण के कुल की रक्षा कर रहे थे। जिसके भीतर स्थित महारथी राजा उत्साह प्रगट कर रहे थे ऐसा ये वसुदेव के द्वारा निर्मित गरुड़व्यूह जरासंध के चक्रव्यूह को भेदन करने की इच्छा कर रहा था। यह अक्षौहिणी सेना का चक्रव्यूह और गरुड़व्यूह की रचना का विस्तार हरिवंश पुराण के आधार से है।

दोनों पक्ष में भयंकर युद्ध प्रारंभ हो गया। इधर दुर्योधन गांगेय पिता और द्रोण गुरु पर अधिक कोप करने लगा कि हे तात! आप यदि अर्जुन से युद्ध नहीं करेंगे तो महान अनर्थ होगा। वे बोले-हम क्या करें? वह अर्जुन स्वयं हमें पूज्य समझकर हम लोगों से युद्ध करना नहीं चाहता है। खैर! अन्त में परस्पर में गुरु-शिष्य, पितामह-पोते आदि के भेदभाव को छोड़कर वहाँ सब युद्ध में संलग्न हो गये। धृष्टद्युम्न (द्रौपदी के भ्राता) ने भीष्म पितामह को युद्ध में मृतकप्राय करके गिरा दिया। तब उन्होंने उसी रणभूमि में ही संन्यास धारण कर लिया, उस समय दोनों पक्ष के लोग रण छोड़कर पितामह के पास आये और उनके चरण वंदनकर रोने लगे, तब गांगेय ने कौरव-पाण्डवों को बहुत ही उपदेश दिया और मैत्रीभाव करने को कहा। इधर आकाशमार्ग से हंस और परमहंस नाम के दो चारण मुनि वहाँ आये और भीष्म को चतुराहार का त्याग कराकर विधिवत् सल्लेखना ग्रहण करा दी। उन्होंने पंच महामंत्र का स्मरण करते हुए शरीर का त्याग किया और आजन्म ब्रह्मचर्य के प्रभाव से पांचवें ब्रह्म स्वर्ग में देव हो गये।

इधर पुन: युद्ध प्रारंभ हुआ। अभिमन्यु की वीरता से युद्ध में कौरव पक्ष में हाहाकार मच गया, तब द्रोण की आज्ञा से जयाद्र्रकुमार ने अन्यायपूर्वक युद्ध करके अभिमन्यु को जमीन पर गिरा दिया। देवगणों ने भी कहा कि अन्यायी राजाओं ने यह अन्याय किया है। कर्ण ने अभिमन्यु से कहा-पानी पिओ, किन्तु अभिमन्यु ने उपवास ग्रहण करके पंचपरमेष्ठी का स्मरण करते हुए शरीर से निर्मम हो प्राण त्याग किया और देवगति प्राप्त की। चक्रव्यूह में मेरा पुत्र अभिमन्यु मारा गया है, यह सुन सुभद्रा के शोक का पार नहीं रहा। अर्जुन ने इसका बदला चुकाने के लिए जयाद्र्र की अनेकों रक्षा करने पर भी युद्ध में उसे मार डाला। शासन देवता के निमित्त से अर्जुन और कृष्ण को वहाँ अनेकों वाण प्राप्त हुए। एक समय युद्ध में कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि ये घोड़े प्यासे हैं तब अर्जुन ने उसी समय दिव्य वाण से पाताल से गंगा जल निकालकर घोड़ों को पिलाया।

एक समय द्रोणाचार्य आदि ने रात्रि में पांडव सैन्य पर हमला किया। द्रोणाचार्य भी बार-बार अर्जुन आदि के छोड़ दिये जाने पर भी युद्ध में आगे आते थे, उस समय ‘अश्वत्थामा’ नाम का एक हाथी युद्ध में गिरा दिया गया, तब पाण्डवों के सैन्य ने युधिष्ठिर धर्मराज को नमस्कार कर विज्ञप्ति की कि गुरुद्रोण के रहते हुए हम लोग जीत नहीं सकते हैं इसलिए आप द्रोणाचार्य को ऐसा कहें कि ‘अश्वत्थामा’ मारा गया है, तो वे युद्ध से पराङ्मुख हो सकते हैं परन्तु धर्मराज ने कहा कि मैं असत्य वैâसे कहूँ? फिर भी अत्यधिक आग्रह से अंत में उन्होंने वैसा कपट करना स्वीकार कर लिया। युधिष्ठिर ने कहा-‘अश्वत्थामा’ मारा गया है, बस इतना सुनते ही द्रोणाचार्य, पुत्रशोक से व्याकुल हो गये तब पुन: युधिष्ठिर ने कहा-अश्वत्थामा हाथी मारा गया है, आपका पुत्र नहीं। इतने में ही धृष्टार्जुन ने आकर आचार्य का मस्तक काट लिया। इस घटना से कौरव- पाण्डव रोने लगे और धृष्टार्जुन को बहुत कुछ फटकारा किन्तु धृष्टार्जुन ने कहा कि युद्ध में गुरु-शिष्य आदि का क्या पक्ष हो सकता है? इस तरह महायुद्ध में सत्रह दिन समाप्त हो गये।

अठारहवें दिन युद्ध में मकरव्यूह की रचना की गई। अन्त में कौरव-पाण्डव के भयंकर युद्ध में अर्जुन की वाण वर्षा से कर्ण पृथिवी पर गिर पड़ा। भीम ने भी दु:शासन आदि कौरवों को यमपुर में भेज दिया और अन्त में दुर्योधन को मार डाला। उसी दिन व्रुâद्ध अर्धचक्री जरासंध प्रतिनारायण युद्ध भूमि में आया और चक्ररत्न का स्मरण कर चक्र श्रीकृष्ण पर चला दिया, उस चक्र ने श्रीकृष्ण की तीन प्रदक्षिणाएँ दीं और उनके दाहिने हाथ पर ठहर गया। उस समय श्रीकृष्ण ने जरासंध को कहा-देख! अभी तू मान ले किन्तु जरासंध ने कृष्ण को ग्वालपुत्र आदि कहकर अपमानित किया। तब श्रीकृष्ण ने उसी चक्र से जरासंध का मस्तक छेद दिया। उस समय देवों, यादवों और पाण्डवों ने जय-जयकार किया, आकाश से पुष्पवृष्टि होने लगी, हे कृष्ण! आप तीन खण्ड के स्वामी नौवें नारायण हैं। आप इस त्रिखंड वसुधा का उपभोग करिये। अनन्तर रणभूमि का शोधन करने वाले श्रीकृष्ण ने जरासंध और दुर्योधन आदि को मृतक पड़े हुए देखकर बहुत ही खेद व्यक्त किया। दुर्योधन दुर्भावना के निमित्त से नरकगति को प्राप्त हुआ। यादवों ने इन सबकी अगुरु, चंदन आदि से दाह क्रिया की और सबकी रानियों को धैर्य बंधाया, श्रीकृष्ण ने जरासंध के पुत्र सहदेव को गोद में लेकर प्रेम किया और उसे मगधदेश का राजा बना दिया। बलदेव और श्रीकृष्ण अर्धचक्रवर्ती, वाद्य महोत्सवों के साथ द्वारावती नगरी में आ गये और जिनेन्द्र भगवान की पूजा आदि करके पापों की शांति की। श्रीकृष्ण की आज्ञा से पाँचों पाण्डव भी हस्तिनापुर आकर न्याय से राज्य करने लगे और धर्म क्रियाओं में तत्पर हो गये। इस प्रकार से यह महायुद्ध महाभारत के नाम से प्रसिद्ध है। विशेष जिज्ञासुओं को पाण्डव पुराण (महाभारत) ग्रंथ देखना चाहिए।

[सम्पादन] द्रौपदी का हरण-

किसी समय हस्तिनापुर में भीम से आदरणीय राजा युधिष्ठिर राज्य सिंहासन पर विराजे थे, उनके ऊपर चमर ढुर रहे थे और छत्र लगा हुआ था। उसी समय नारद जी आकाश मार्ग से पाण्डवों की सभा में आये। पुण्यशाली पाण्डवों ने उठकर नारद ऋषि का सम्मान किया, हाथ जोड़कर उच्च आसन आदि दिये, मंगल वार्तालाप हुआ। अनन्तर वे नारद अंत:पुर में चले गये। वहाँ द्रौपदी दर्पण के सामने अपना शृँगार कर रही थी, इसलिए उसने नारद जी को नहीं देखा और उठकर विनय आदि नहीं किया। बस! क्या था, नारद के क्रोध का पार नहीं रहा। वे वहाँ से चले गये और द्रौपदी के द्वारा हुए अपमान का बदला चुकाने के लिए अनेकों उपाय सोचते रहे। अन्त में वे धातकीखण्ड द्वीप के भरतक्षेत्र में गये, वहाँ अमरवंकापुरी का राजा पद्मनाथ था। उसके सामने द्रौपदी के लावण्य की बहुत ही प्रशंसा की। वह राजा वन में जाकर मंत्राराधना से संगम देव को बुलाकर उसे द्रौपदी को लाने को कहा। उस देव ने भी रात्रि में सोई हुई द्रौपदी को ले जाकर वहाँ के उत्तम उपवन में छोड़ दिया। प्रात:काल निद्रा भंग होने पर द्रौपदी को सब मालूम हुआ कि मैं हस्तिनापुर से बहुत ही दूर यहाँ हरण कर लाई गई हूँ। पद्मनाभ राजा ने आकर द्रौपदी से बहुत ही अनुनय की किन्तु वह शीलवती द्रौपदी अचल रही। अपने मस्तक पर वेणी बांधकर अर्जुन के समाचार मिलने तक आहार और अलंकारों का त्याग कर दिया।

इधर प्रात: द्रौपदी के न मिलने से ‘कोई शत्रु हरण कर ले गया है’ ऐसा समझकर पाण्डवों ने सर्वत्र विंकर भेजे, श्रीकृष्ण को भी समाचार भेज दिये, सर्वत्र खोज चल रही थी। इसी बीच श्रीकृष्ण की सभा में नारद ने आकर कहा- हे केशव! द्रौपदी को अमरवंâका नामक नगरी में मैंने देखा है आप उसे दु:ख से छुड़ाइये। इस समाचार से श्रीकृष्ण और पाण्डव आदि बहुत ही प्रसन्न हुए। श्रीकृष्ण रथ पर बैठकर दक्षिण समुद्र के तट पर जा पहुँचे और लवण समुद्र के अधिष्ठाता देव की आराधना की। अनन्तर लवण समुद्र का रक्षक देव पाँचों पाण्डवों सहित श्रीकृष्ण को छह रथों में बिठाकर क्षणमात्र में दो लाख विस्तृत लवणसमुद्र का उल्लंघन कर उन्हें धातकी खण्डद्वीप के भरतक्षेत्र में ले गया। वहाँ श्रीकृष्ण ने पैरों के आघात से किले के दरवाजे को तोड़ दिया, नगर में सर्वत्र हाहाकार मचा दिया, तब द्रोही राजा पद्मनाथ घबड़ाकर द्रौपदी की शरण में पहुँचा और क्षमायाचना की। द्रौपदी ने उसे क्षमा करके अभयदान दिलाया और भाई श्रीकृष्ण तथा ज्येष्ठ, देवर तथा पति अर्जुन से मिलकर प्रसन्न हुई। उस समय अर्जुन ने स्वयं अपने हाथों से द्रौपदी की वेणी की गांठ खोली पुन: स्नान आदि करके सभी ने भोजन-पान ग्रहण किया।

अनन्तर पाण्डव और द्रौपदी को साथ लेकर श्रीकृष्ण समुद्र के किनारे आये और शंखनाद किया, जिससे सब दिशाओं में शब्द व्याप्त हो गया। उस समय वहाँ चंपानगरी के बाहर स्थित जिनेन्द्र भगवान को नमस्कार करके धातकी खण्ड के नारायण ने पूछा-भगवन्! मुझ समान शक्तिधारक किसने यह शंख बजाया है? भगवान ने कहा कि यह जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र का नारायण श्रीकृष्ण है अपनी बहन द्रौपदी के हरण से यहाँ आया था। नारायण कपिल को श्रीकृष्ण से मिलने की इच्छा हुई किन्तु भगवान ने कहा कि तीर्थंकर-तीर्थंकर से चक्रवर्ती-चक्रवर्ती से, नारायण-नारायण से मिल नहीं सकते हैं, केवल चिन्ह मात्र से ही उनका तुम्हारा मिलाप हो सकता है। तदनन्तर कपिल नारायण वहाँ आये और दूर से ही समुद्र में कृष्ण के ध्वज का साक्षात्कार हुआ। कपिल नारायण ने अमरवंâकापुरी के राजा पद्मनाथ को इस नीच कृत्य के कारण बहुत ही फटकारा।

कृष्ण तथा पाण्डव पहले की तरह महासागर को शीघ्र ही पार कर इस तट पर आ गये। वहाँ कृष्ण विश्राम करने लगे और पाण्डव चले गये। पाण्डव नौका के द्वारा गंगा को पार कर दक्षिण तट पर आ ठहरे। भीम ने क्रीड़ा के स्वभाव से वहाँ नौका तट पर छिपा दी। जब श्रीकृष्ण आये, तब पूछा-आप लोग गंगा को वैâसे पार किए? तब भीम ने कृष्ण की सामथ्र्य को देखने के लिए कुतूहल से कह दिया-हम लोग भुजाओं से तैर कर आये हैं। श्रीकृष्ण भी घोड़ों सहित रथ को एक हाथ पर लेकर एक हाथ और जंघाओं से शीघ्रता से गंगा नदी के इस पार आ गये। तब पाण्डवों ने श्रीकृष्ण का आलिंगन कर अपूर्व शक्ति की प्रशंसा की और भीम ने अपने द्वारा नौका छिपाने की हंसी की बात बता दी। उस समय श्रीकृष्ण को पाण्डवों पर क्रोध आ गया क्योंकि असमय की हंसी अच्छी नहीं लगती है। श्रीकृष्ण ने कहा-अरे पाण्डवों! तुमने अनेकों बार हमारे अमानुषिक विशेष कार्य देखे हैं फिर भला यहाँ मेरी शक्ति की क्या परीक्षा करनी थी?

इस प्रकार वे उन्हीं के साथ हस्तिनापुर गये और वहाँ अपनी बहन सुभद्रा के पौत्र (पोते) को राज्य देकर पाण्डवों को दक्षिण दिशा में भेज दिया। उस समय की घटना से अत्यधिक दुखी हुए पांचों पाण्डव, अपनी स्त्री और अपने पुत्रों को साथ लेकर दक्षिण मथुरा को चले गये और वहाँ राज्य करने लगे।

[सम्पादन] नेमिनाथ का दीक्षा ग्रहण-

भगवान नेमिनाथ के विवाह के समय बाड़े में बहुत सारे पशु बंधे हुए थे। तब भगवान पशुओं का बंधन देखकर तथा इसका कारण जानकर करुणा से उन्हें छुड़ाकर विरक्त हो गये और देवों द्वारा स्तुत्य होकर दीक्षा ग्रहण कर ली। छप्पन दिन के अनन्तर प्रभु को केवलज्ञान हो गया। तब बलभद्र और श्रीकृष्ण ने भगवान के समवसरण में दर्शन कर धर्म उपदेश श्रवण किया।

बहुत काल तक भगवान के समवसरण में असंख्य जीवों ने धर्मामृत का पान किया है। अनंतर भगवान ने आषाढ़ शुक्ला सप्तमी को गिरनार पर्वत से मोक्ष प्राप्त किया है।

[सम्पादन] पाण्डवों की दीक्षा-

किसी समय संसार के दु:ख से भयभीत हुए पांडव, पल्लव देश में विहार करते हुए श्री नेमि जिनेश्वर के समवसरण में पहुँचे। भगवान की तीन प्रदक्षिणा देकर नमस्कार करके धर्म श्रवण किया। सभी ने क्रम से अपने-अपने पूर्वभव पूछे और अन्त में जैनेश्वरी दीक्षा ग्रहण कर ली। कुन्ती, द्रौपदी, सुभद्रा आदि ने भी राजमती आर्यिका के समीप आर्यिका दीक्षा ले ली। पाँचों पाण्डव रत्नत्रय से विशुद्ध, पंच महाव्रत, पाँच समिति, तीन गुप्ति आदि से अपनी आत्मा का चिंतवन करते हुए आत्मसिद्धि के लिए घोर तप करने लगे।

श्री भीम मुनिराज ने एक दिन भाले के अग्रभाग से दिये हुए आहार को ग्रहण करने का नियम किया। ‘‘क्षुधा से उनका शरीर कृश हो गया था। छह महीने में उनका यह वृत्त परिसंख्यान पूरा हुआ और आहारलाभ हुआ।’’

किसी समय ये पाँचों पांडव मुनि सौराष्ट्र देश के शत्रुंजय पर्वत पर प्रतिमा योग से विराजमान हो गये। उस समय दुर्योधन की बहन का पुत्र कुर्युधर वहाँ आया और उन्हें अपने मामा के शत्रु समझकर उन पर दारुण उपसर्ग करने लगा। उसने सोलह प्रकार के उत्तम आभूषण लोहे के बनवाये जिनमें कुण्डल, बाजूबंद, हार आदि थे और तीव्र अग्नि में उन्हें तपा-तपा कर लाल वर्ण के अंगारे जैसे कर-करके उन पांडवों को संडासी से पहनाना शुरू किया। मस्तक पर मुकुट, गले में हार, कर में वंâकण, बाजूबंद, कमर में करधनी, चरणों में पादभूषण, पाँचों अंगुलियों में मुद्रिकाएं आदि अग्निमय गरम-गरम पहना दीं। जैसे अग्नि लकड़ियों को जलाती है वैसे ही वे सब अग्निमय आभूषण मुनियों के शरीर को जलाने लगे। उस समय उन मुनियों ने ध्यान का आश्रय लिया, वे बारह भावनाओं का और शरीर से निर्ममता का चिंतवन करने लगे। वास्तव में दिगम्बर जैन साधु ऐसे-ऐसे घोर उपसर्ग के समय अपने धैर्य और क्षमा से विचलित नहीं होते हैं। वे पांडव मुनि शरीर को अपनी आत्मा से भिन्न समझकर शुद्धोपयोग में स्थिर होकर श्रेणी में चढ़ गये। धर्मराज युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन मुनियों ने क्षपकश्रेणी में चढ़कर शुक्लध्यान के द्वारा घातिया कर्मों का नाशकर केवलज्ञान को प्राप्त कर लिया और तत्क्षण ही अघातिया कर्मों का भी नाशकर ये अन्तकृत्केवली मोक्ष को प्राप्त हो गये, परम सिद्ध परमात्मा बन गये। एक क्षण में आठवीं पृथ्वी के ऊपर तनुवातवलय के अग्रभाग में विराजमान हो गये। नकुल और सहदेव मुनि उपशम श्रेणी पर चढ़े थे। ये दोनों बड़े भाईयों की दाह को सोचकर आकुल चित्त हो गये थे, ऐसा हरिवंशपुराण में कहा है, इसलिए यहाँ से उपसर्ग सहन करके वीर मरण करते हुए ‘सर्वार्थसिद्धि’ में अहमिन्द्र हो गये हैं। वहाँ पर तैंतीस सागर तक रहेंगे पुन: मनुष्य होकर तपश्चर्या करके उसी भव से मोक्ष प्राप्त करेंगे। ये पाँचों पांडव मुनि महान उपसर्ग विजेता हुए हैं। इन पांडवों को इस हस्तिनापुर में हुए आज लगभग छियासी हजार पाँच सौ वर्ष हुए हैं। इन्हें मेरा मन, वचन, काय से बारम्बार नमस्कार होवे।