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100.आर्यिका दीक्षादिवस माताजी का पुण्ययोग

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आर्यिका दीक्षादिवस माताजी का पुण्ययोग।

समयसार ग्रंथ पूर्वार्ध-

समयसार ग्रंथ का पूर्वार्ध छपकर आ चुका है। इसमें संवर अधिकार तक २०१ गाथायें हैं। इस ग्रंथ में गाथाओं का पद्यानुवाद आर्यिका चंदनामती से कराया है। अमृतचंदसूरि के कलश काव्यों का पद्यानुवाद आर्यिका अभयमती द्वारा किया हुआ था, सो इसी में दे दिया। प्रत्येक अधिकार के बाद सारे प्रकरणों पर संक्षिप्तीकरण करके और उसमें के महत्वपूर्ण विषय भी लेकर के सारांश बना दिये हैं। स्थल-स्थल पर भावार्थ और विशेषार्थ में गुणस्थान व्यवस्था व नयव्यवस्था को भी स्पष्ट किया है अतः यह ग्रंथ यहाँ वाचना में सर्व साधुओं व विद्वानों को बहुत ही सुन्दर लगा था। सो ठीक ही है क्योंकि समयसार ग्रंथ तो स्वयं में ही सुन्दर है, इसका विषय ‘समय शुद्ध आत्मा है’ जैसा कि ग्रंथ में कहा है ‘‘समओ सव्वत्थ सुंदरो लोगे’’ तथा इन ग्रंथ के प्रणेता श्रीकुन्दकुन्ददेव भी स्वयं सुन्दर-महान् आचार्य हुए हैं। यहाँ ‘महामहोत्सव’ में श्री कुन्दकुंद द्विसहस्राब्दी के उपलक्ष्य में श्रीकुन्दकुन्द संगोष्ठी के अवसर पर इस ग्रंथ का विमोचन कराया जायेगा। यहाँ क्षुल्लक मोतीसागर जी और रवीन्द्र कुमार इन ग्रंथों के प्रकाशन, प्रूफ संशोधन आदि में सर्व शक्ति लगा रहे हैं।

अष्टसहस्री का प्रकाशन-

इस अष्टसहस्री ग्रंथ का अनुवाद मैंने जयपुर के ईसवी सन् १९६९ के चातुर्मास में प्रारंभ किया था जबकि मैं आचार्य श्री धर्मसागर जी महाराज के संघस्थ कई एक मुनियों को, आर्यिकाओें को तथा ब्रह्मचारी आदि को अष्टसहस्री ग्रंथ पढ़ा रही थी। इसके हिन्दी अनुवाद के समय संघस्थ मोतीचंद जैन की विशेष प्रार्थना रही है और साथ ही विद्वान श्री भंवरलाल जी न्यायतीर्थ, पं. इन्द्रलाल जी शास्त्री आदि की भी विशेष प्रेरणा रही हेै। ईसवी सन् १९७० के टोंक (राजस्थान) के चातुर्मास के बाद पौष शुक्ला १२ के दिन टोडाराय सिंह (राजस्थान) में भगवान पार्श्वनाथ के मंदिर में बैठकर मैंने इस महान ग्रंथ का अनुवाद पूर्ण किया था। उस समय श्रावकों ने भक्ति से प्रेरित हो मूलग्रंथ और अनुवादित कापियों को चौकी पर विराजमान कर श्रुतस्कंध विधान की पूजा सम्पन्न की थी।

अनन्तर पौष शुक्ला १५ के दिन आचार्यश्री धर्मसागर जी की जन्मजयंती समारोह के उपलक्ष्य में रथयात्रा के साथ पालकी में इन ग्रंथ व कापियों को विराजमान कर उनकी शोभायात्रा सम्पन्न हुई थी।

इसके बाद ईसवी सन् १९७४ में इस अष्टसहस्री ग्रंथ के प्रथम भाग का प्रकाशन होकर दिल्ली में आचार्यरत्न श्री देशभूषण जी महाराज और आचार्य श्री धर्मसागर जी महाराज, इन दोनों के विशाल संघों के सानिध्य में तथा मुनिश्री विद्यानंद जी महाराज व मेरे संघ के सानिध्य में, इसका विमोचन समारोह सम्पन्न हुआ था।

शेष भागों का प्रकाशन-

ईसवी सन् १९८७ में अष्टसहस्री के द्वितीय आदि भागों के प्रकाशन का निर्णय लिया गया। द्वितीय भाग के छपते ही, प्रथम भाग जो छप चुका था, उसकी कुछ ही प्रतियाँ शेष रही थीं अतः प्रथम भाग का द्वितीय संस्करण भी छपवाया गया और साथ ही शेष बचे तृतीय भाग को भी प्रेस में दे दिया गया था। इस महान् ग्रंथराज का अनुवाद कार्य सन् १९७० में पूर्ण हुआ था और सन् १९९० में यह पूर्ण ग्रंथ तीन भागों में छप चुका है। बीस वर्ष के बाद इसके तीनों भागों के छपने का योग आया। इस बीच सन्मार्ग दिवाकर तीर्थोद्धारक शिरोमणि आचार्यश्री विमलसागर जी ने, अन्य अनेक साधुओं ने व पं. कैलाशचंद सिद्धान्तशास्त्री, डा. दरबारीलाल कोठिया, डा. लालबहादुर जी शास्त्री, डा. पन्नालाल जी साहित्याचार्य आदि अनेक विद्वानों ने बहुत बार कहा था कि ‘‘माताजी! इस अष्टसहस्री ग्रंथ को जल्दी ही पूरा प्रकाशित कराइये।’’

आज प्रसन्नता की बात है कि अष्टसहस्री का प्रथम भाग ‘वीर ज्ञानोदय ग्रंथमाला’ का प्रथम पुष्प था और यह तृतीय भाग इस ग्रंथमाला का सौवां (१००वां) पुष्प जो कि कली के रूप में रखा था, वह विकसित होकर (सन् १९९०) आने वाला है।

इस ग्रंथ के अनुवाद में शब्दशः अर्थ करके यथास्थान भावार्थ और विशेषार्थ देकर विषय को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है तथा प्रायः प्रकरणों के पूर्ण होने पर उन-उन विषयों के सारांश दिये गये हैं। इसलिए मैंने इस हिन्दी टीका का ‘स्याद्वादचिंतामणि’ यह नाम दिया है।

ग्रंथ की दुरूहता-

यह ग्रंथ कितना दुरुह है, कितना क्लिष्ट है और इसका विषय भी कितना कठिन है? इसके लिए इस ग्रंथ के अंत में लिखा हुआ है कि-

कष्टसहस्री सिद्धा साष्टसहस्रीयमत्र मे पुष्यात्। शश्वदभीष्टसहस्रीं कुमारसेनोक्तिवर्धमानार्था।।

अर्थात् यह अष्टसहस्री कष्टसहस्री है-हजारों कष्टों के द्वारा समझ में आने वाली है-हजारों मनोरथों को सफल करने वाली है।

पीठाधीश क्षुल्लक मोतीसागर जी ने तीनों भागों के मूल संस्कृत, टिप्पण आदि के प्रूफ संशोधन में बहुत ही श्रम किया है क्योंकि इतने महान् और दार्शनिक ग्रंथ का संशोधन हर किसी से कराना सहज नहीं था। क्षुल्लक जी की यह सरस्वती भक्ति ही रही है। टिप्पणियों का प्रूफ व्याकरण शुद्धि की दृष्टि से प्रायः मुझे ही देखना पड़ा है। ब्र. रवीन्द्र कुमार ने भी इन ग्रंथों के प्रकाशन में बहुत ही रुचि ली है। तीन भाग में इस अष्टसहस्री ग्रंथ का इस आने वाले ‘जम्बूद्वीप महामहोत्सव’ में विमोचन होने वाला है, अभी तृतीय भाग की प्रस्तावना छप रही है।

आत्मानुशासन-

आर्यिका श्री अभयमती जी ने समयसार कलश पद्यानुवाद पुरुषार्थसिद्ध्युपाय, आत्मानुशासन आदि कई ग्रंथों के पद्यानुवाद बनाये थे। इनमें से आत्मानुशासन नहीं छपा था, मैंने कई बार कहा कि बिना छपे हुए ग्रंथ मुझे देवो, मैं रवीन्द्र कुमार को देकर छपवा दूँगी। आज प्रसन्नता की बात है कि उनका यह ग्रंथ छप चुका है। इसी महोत्सव में इसका विमोचन होने वाला है। आर्यिका अभयमती जी कमजोर होते हुए भी ज्ञानाराधना में अपना उपयोगी समय लगाती हैं, यह अच्छी बात है। वास्तव में आत्मशुद्धि और आत्मसिद्धि का उपाय जिनागम का स्वाध्याय ही है। ये अभयमती जी हमेशा ज्ञानाराधना में लगी रहें, यही मेरी भावना है।

अष्टमूल गुणप्रदर्शनी-

शास्त्रों के अनुसार मूलगुण के तीन प्रकार अत्यधिक प्रचलित हैं। श्री अमृतचन्दसूरि के अनुसार पाँच उदुंबर और तीन मकार-(मद्य, मांस, मधु) इन आठों का त्याग करना आठ मूलगुण हैं-१. मद्य २. मांस ३. मधु ४. रात्रि भोजन ५. पंच उदुंबर फल इन पाँचों का त्याग तथा ६.जीव दया ७. जल छानकर पीना और ८. पंचपरमेष्ठी को नमस्कार-नित्य देवदर्शन करना, ये आठ मूलगुण ‘सागार धर्मामृत’ में कथित-पं. आशाधर के अनुसार हैं। पुनः पाँच अणुव्रत लेना तथा तीन मकार का त्याग करना, ये तीसरा प्रकार श्री समन्तभद्र स्वामी के अनुसार है। चन्दनामती की भावना बनी कि मूलगुण नियम के नियमपत्र (फार्म) छपाये जावें, जो कि जैन ही क्या, जैनेतर लोगों से भी भरायें जावें और इस महामहोत्सव में इन अष्टमूलगुणों की चित्र प्रतियोगिता रखी जावे। उन चित्रों की प्रदर्शनी लगाई जावे तथा चित्र बनाने वालों को उचित पुरस्कृत किया जावे। उन्होंने मुझसे निवेदन किया।

मैंने उनकी इस योजना को सराहा और उन्हें प्रोत्साहित किया। इसलिए यहाँ उनकी प्रेरणा से यह अष्टमूलगुण प्रदर्शनी भी रखी गयी है। इस योजना से छोटे-छोटे बालक बालिकाओं को तो अपनी चित्रकला प्रदर्शन का अवसर मिल ही रहा है, प्रौढ़ अनुभवी विद्वान् भी इसमें भाग ले रहे हैं, यह प्रसन्नता की बात है। हमेशा ही ये ऐसे-ऐसे धर्म प्रचार के कार्यों में अपना अमूल्य समय का सदुपयोग करती रहें, इनके लिए यही मेरा आदेश है।

आचार्यश्री वीरसागर स्मृति ग्रंथ-

सन् १९७४ में मैंने मोतीचन्द और रवीन्द्र कुमार से कहा था कि ‘हमारे दीक्षा गुरु आचार्यश्री वीरसागर जी का स्मृति ग्रंथ निकालना है।’’ कुछ रूप रेखाएँ बनाई थीं और सूचना भी वर्तमान पत्रोें में निकाल दी गई थी पुनः कुछ महीने बाद आर्यिका श्री सुपार्श्वमती जी ने आचार्यश्री के स्मृति को निकालने का निर्णय लिया, सूचनाएँ प्रसारित हुर्इं। कई एक लोगों ने मुझसे निवेदन किया-‘‘माताजी उधर से यदि आर्यिका सुपार्श्वमती जी ग्रंथ निकाल रही हैं, तो ठीक है, ग्रंथ निकलना चाहिए अतः आप न निकालें।’’ मैंने यह बात उचित ही समझी। कुछ कारणवश उधर से जब ग्रंथ नहीं निकल पाया, तब पुनः सन् १९८५ में मैंने यह स्मृति ग्रंथ निकालना चाहा किन्तु कार्य की अत्यधिक व्यस्तता से रवीन्द्र कुमार ने कहा-‘‘माताजी! यह कार्य आप विद्वानों को सौंप दें, मैं ग्रंथ संकलित हो जाने पर छपा दूँगा।’’

मैंने कई एक विद्वानों को कहा किन्तु कुछ सफलता नहीं मिली, कोई विद्वान् समय देने को तैयार नहीं हुए तब मैंने पुनः मोतीसागर, रवीन्द्रकुमार और आर्यिका चंदनामती को बिठाकर यह कहा कि-‘‘अब आचार्यदेव का स्मृति ग्रंथ निकालना है, तुम्हीं लोग परिश्रम करके सामग्री एकत्रित करो।’’ इन तीनों ने स्वीकर किया और ग्रंथ के लिए श्रद्धाञ्जलि, संस्मरण चित्र, लेख आदि मंगाने शुरू किये। रवीन्द्र कुमार तो संस्थान के निर्माण आदि कार्य में बहुत व्यस्त रहते हैं। मुझे प्रसन्नता है कि आर्यिका चंदनामती ने पूरी रुचि से सामग्री एकत्रित करना, जांचना, टाइप आदि कराना अत्यधिक कार्य भार संभाला है और आजकल अत्यधिक श्रम करके प्रूफ संशोधन के कार्य में भी लगी हुई हैंं। क्षुल्लक मोतीसागर जी भी संस्मरण, लेख आदि की पांडुलिपियाँ पढ़कर देखते रहते हैं और समय-समय पर प्रूफ आदि देखने में भी सहयोग देते रहते हैं। यह ग्रंथ ‘महामहोत्सव’ तक छप जायेगा और इस मंगल आयोजन में ही इसका विमोचन होगा, यह प्रसन्नता की बात है। बीच-बीच में कई पत्र भी ऐसे आये कि-‘‘आप अब इस स्मृति ग्रंथ को न निकालें.......क्योंकि आचार्यदेव की समाधि हुए भी ३३ वर्ष हो गये हैं। सन् १९५७ में उनकी समाधि हुई थी अतः उनसे संबंधित संस्मरण आदि विशेष नहीं मिल पायेंगे, कारण कि तीन दशक हो गये हैं । उनके समय की तो पीढ़ी ही प्रायः खत्म हो चुकी है। इत्यादि, फिर भी मैंने कहा-‘‘जो भी हो, मुझे तो अपने गुरु के गुणों को धर्मनिष्ठ समाज के सामने रखना ही है। गुरुदेव के आदर्श जीवन एवं शिक्षास्पद वचनों से भव्यजीव युगों-युगों तक प्रेरणा लेते रहेंगे और गुरुदेव की भक्ति से पुण्य संचय करते रहेंगे, इसी भावना के साथ मैंने इस ग्रंथ के प्रकाशन की प्रेरणा देकर गुरुदेव के श्रीचरणों में परोक्षरूप में यह फूल की एक पांखुड़ी समर्पित की है।

जंबूद्वीप स्थल पर भव्य कमल मंदिर-

सन् १९७५ में इस जंबूद्वीप के लिए क्रय की गई छोटी-सी भूमि में एक गर्भागार-छोटा सा कमरा बनवाकर इसमें भगवान महावीर स्वामी की सात हाथ-सवा नौ फुट की खड्गासन प्रतिमाजी विराजमान की गई थीं। उस समय बड़े मंदिर में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा हो रही थी। मेरी इच्छानुसार मोतीचंद व रवीन्द्रकुमार ने उसी समय इन प्रतिमाजी की भी प्रतिष्ठा करा ली थी। यद्यपि उस समय यहाँ संस्थान द्वारा विशेष आयोजन नहीं किये गये थे, फिर भी मूर्ति पर पंचकल्याणक प्रतिष्ठा विधिवत् कराई गई थी। तब से भगवान महावीर उसी गर्भागार में खड़े थे। जंबूद्वीप स्थल पर आज जो जंबूद्वीप रचना, त्रिमूर्ति मंदिर, रत्नत्रय निलय अनेक धर्मशालाएँ आदि कार्य दिख रहे हैं और जो सन् १९८२ से ८५ तक जंबूद्वीप ज्ञानज्योति का सारे भारत में प्रवर्तन हुआ है, मैं कहा करती हूँ कि ‘‘यह सब महान् कार्य व यहाँ का वैभव इन कल्पवृक्ष स्वरूप भगवान महावीर स्वामी का ही प्रसाद है।’’

कई वर्षों से मेरे मस्तिष्क में एक कमलाकार मंदिर की रचना का नक्शा घूम रहा था जिसे आसाम के कारीगर ‘वासु’ को बुलाकर मैंने कई एक कमल बनवाकर उनमें से जो जंच गया था, उसका मॉडल बनवाया था। आज वह भव्य कमल मंदिर बन कर तैयार हो गया है। इसमें अंदर व बाहर कमल के दलों पर संगमरमर पत्थर लग रहा है। वर्तमान में काम बहुत ही द्रुतगति से चलाया जा रहा है।

‘‘भगवान महावीर कमल के ऊपर खड़े हैं और कमल के भीतर खड़े हैं।’’ यही इस मंदिर की विशेषता है।

इस वासुदेव कारीगर ने यह कमल बनाया है। यहाँ पार्श्वनाथ, नेमिनाथ भगवान के भी कमल, त्रिमूर्ति के तोरणद्वार, ज्ञानमती कला मंदिर की झांकियाँ आदि इसने बनाये हैं। इसके हाथ की कला सुन्दर होने से यहाँ के कार्यकर्ता इसे ही बुलाते हैं।

अन्य निर्माण कार्य-

सुमेरु के अंदर भी पत्थर लगाया जा रहा है। उधर श्री अमरचंद पहा़डिया कलकत्ता वालों की कोठी का तथा जिनेन्द्रप्रसाद ठेकेदार, दिल्ली, अमरचंद अरविन्द कुमार होमब्रेड आदि छह श्रावकों के फ्लैट बन रहे हैं।

ब्र. रवीन्द्र कुमार प्रातः से रात्रि १०-११ बजे तक इसी निर्माण कार्य के कराने में व महामहोत्सव की तैयारी में ऐसे संलग्न हैं कि समय पर भोजन व नींद की भी उन्हें परवाह नहीं है।

श्री के.सी. जैन इंजीनियर यहाँ जंबूद्वीप स्थल पर लगभग ७-८ वर्षों से निःस्वार्थ, अवैतनिक सेवा दे रहे हैं। वर्तमान में ८२ वर्ष की उम्र में कमर आदि में दर्द होते हुए भी हर-एक निर्माण पूरी तरह संभालकर कराते हैं। इनकी धर्मपत्नी कैलाशवती जी भी मेरी वैयावृत्ति में खूब रुचि रखती हैं प्रायः मैनेजर, मुनीम आदि की महिलाओं को भी वैयावृत्ति का महत्व समझाती रहती हैं। उन्होंने ५-६ वर्ष पूर्व मेरे से आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत ले लिया था, धर्मकार्यों में भी रुचि रखते हैं। यह प्रकरण १९८७ का है।

चार प्रतिष्ठाएँ-

यहाँ जंबूद्वीप स्थल पर वीर सं. २५०१, फरवरी सन् १९७५ में भगवान महावीर स्वामी की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा हुई थी। वीर सं. २५०५, मई सन् १९७९ में सुदर्शन मेरु के सोलह जिनबिम्बों की प्रतिष्ठा हुई थी। तभी पांडुक शिला आदि चार शिलाओं पर अभिषेक के लिए चार जिनप्रतिमा, भगवान शांतिनाथ, कुंथुनाथ, अरनाथ की तीन प्रतिमा व भगवान बाहुबली की ५ फुट की प्रतिमा आदि की प्रतिष्ठाएँ हुई थीं। उस समय विधिनायक भगवान् शांतिनाथ थे।

वीर सं. २५११, २ मई १९८५ में जंबूद्वीप जिनबिंब प्रतिष्ठापना महोत्सव में १८५ सिद्धप्रतिमाओं की, जो कि जंबूद्वीप के जिनमंदिर व देवभवनों के गृहचैत्यालयों में हैं, उनकी तथा भगवान ऋषभदेव की व भगवान भरतेश आदि की अनेक प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा हुई थी। इसमें विधिनायक भगवान ऋषभदेव थे।

वीर सं. २५१३, ११ मार्च १९८७ में भगवान् पार्श्वनाथ व नेमिनाथ की प्रतिष्ठा हुई। इसमें विधिनायक भगवान पार्श्वनाथ थे।

इस प्रकार यहाँ जंबूद्वीप स्थल पर चार पंचकल्याणक प्रतिष्ठाएँ संपन्न हो चुकी हैं। जंबूद्वीप महामहोत्सव पांचवीं प्रतिष्ठा-

मैंने अनेक बार कहा ‘‘इस जंबूद्वीप स्थल पर हमेशा के लिए एक निश्चित समय पर महोत्सव करते ही रहना है। निर्णय यह हुआ कि ‘जंबूद्वीप जिनबिंब प्रतिष्ठापना महोत्सव’ पाँच-पाँच वर्ष में मनाया जावे।’’ तदनुसार सन् १९८५ के बाद अब सन् १९९० में पांच वर्ष के उपलक्ष्य में यह प्रथम ‘जंबूद्वीप महामहोत्सव’ मनाया जा रहा है। इसके साथ पंचकल्याणक प्रतिष्ठा भी होगी। इसमें इन्द्रध्वज-मध्यलोक के ४५८ अकृत्रिम जिनमंदिरों की ४५८ जिनप्रतिमाओं की एवं साथ ही ह्रीं मूर्ति की-इसमें विराजमान चौबीस तीर्थंकरों की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा होगी। इस प्रतिष्ठा में विधिनायक भगवान महावीर स्वामी होंगे।

इसी अवसर पर ‘कमल मंदिर’ की प्रतिष्ठा- मंदिर की शुद्धि होगी और इसी कमल मंदिर पर कलशारोहण किया जायेगा और वैशाख शु. १२ रविवार, ६ मई को ‘महामहोत्सव’ के उपलक्ष्य में ९१ फुट ऊँचे (शिखर समेत) सुमेरुपर्वत की पांडुकशिला पर १००८ कलशों द्वारा जिनेन्द्रदेव का महाअभिषेक कराया जायेगा। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में जैन रामायण और जैन महाभारत का मंचन दिखाया जावेगा।

इस महामहोत्सव का प्रारंभ वैशाख शु. ३, अक्षय तृतीया, २७ अप्रैल १९९० के मंगल दिवस झंडारोहण से होगा। इसी वर्ष वार्षिक रथयात्रापूर्वक भगवान नवनिर्मित पांडाल की वेदी में विराजमान किये जायेंगे।

वैशाख शु. ४ से ८ तक पाँच दिन तक समवसरण महामण्डल विधान व जाप्यानुष्ठान होगा। इसी मध्य वैशाख शु. ४, २८ अप्रैल से २ मई तक शिक्षण-प्रशिक्षण शिविर भी रखा गया है।

वैशाख शु. ९ से १३, वीर नि. सं. २५१६, ३ मई से ७ मई १९९० तक यह पाँचवीं पंचकल्याणक प्रतिष्ठा होगी।

पहले जंबूद्वीप आदि के निर्माण कार्यों में प्रतिष्ठा आदि महोत्सवों में ब्र. मोतीचंद, रवीन्द्र कुमार दोनों मिलकर सर्व कार्य करते थे। ब्र. माधुरी का भी सहयोग रहता था। अब मोतीचंद तो क्षुल्लक मोतीसागर बन गये हैं और ८ महीने हुए ब्र. माधुरी ने भी आर्यिका दीक्षा लेकर चंदनामती बन गई हैं अतः ये दोनों ग्रंथों के प्रकाशन में तो पूरा उपयोग रखते हैं किन्तु निर्माण आदि कार्यों में अपने पद के योग्य परामर्श ही देते हैं। यही कारण है उधर ब्र. रवीन्द्र कुमार अकेले पड़ जाते हैं, तो उन्हें बहुत ही श्रम पड़ जाता है।

ये जब मेरे पास आकर पूर्ववत् कुछ मार्गदर्शन आदि व परामर्श चाहते हैं, तब मैं यह कह देती हूँ कि-

‘‘अब तुम आर्यिका चंदनामती व क्षुल्लक मोतीसागर के साथ बैठकर, तीनों लोग मिलकर ही सब काम किया करो। वास्तव में तुम तीनों ही १८-२० वर्षों में जंबूद्वीप निर्माण आदि, जंबूद्वीप ज्ञानज्योति प्रवर्तन व प्रतिष्ठा तथा महोत्सव आदि बहुत से कार्य करके बहुत कुछ अनुभव प्राप्त कर चुके हो अतः तुम तीनों में सर्वांगीण योग्यता है, तुम लोगों ने जैसे पूर्व में मेरे मार्गदर्शन में आपस में मिलकर सौहार्द सहित इतने सब कार्य किये हैं मेरी तो यही प्रेरणा है कि आगे भी तुम तीनों पूर्ववत् ही अतिशय वात्सल्य व सौहार्द से अपनी संयम साधना के साथ-साथ संस्थान के सर्वतोमुखी कार्यकलापों को बढ़ाते हुए दिगदिगंत में जैनधर्म की कीर्तिपताका फहराते रहो, सतत मेरे मन में यही भावना बनी रहती है। जिनेन्द्र प्रसाद ठेकेदार, दिल्ली, गणेशीलाल रानीवाला कोटा, कैलाशचंद करोलबाग दिल्ली, अमरचंद जैन होमब्रेड आदि कर्मठ कार्यकर्ताओं ने भी इन लोगों के साथ महोत्सव आदि में कंधे से कंधा मिलाकर कार्य किया है और आज भी कर रहे हैं। ये सभी गुरुभक्त श्रावक इन लोगों के साथ ‘आगम प्रत्यय’ के सदृश जुड़े हुए हैं और आगे भी ऐसे ही जुड़े रहेंगे, इस प्रकार से ये लोग कृतसंकल्प हैं, सो प्रसन्नता का विषय है क्योंकि इन सबके ही क्या, पूरे भारत की जैनसमाज के तथा राजनैतिक राष्ट्रीय नेता आदि लोगों के सहयोग से ही यह जंबूद्वीप रचना बनी है और संस्थान सर्वांगीण विकसित हुआ है, इसमें कोई संदेह नहीं है । इन सभी के लिए मेरे द्वारा ‘धर्मवृद्धिरस्तु’ आशीर्वाद के साथ-साथ जीवन में आदर्श बनने की प्रेरणा मिलती ही रहती है।

वर्तमान में मेरी संघ व्यवस्था-

मेरे संघ में आर्यिका शिवमती यहाँ हमेशा गुरु की वैयावृत्ति के साथ-साथ स्वाध्याय आदि में सतत लगी रहती हैं, आर्यिका चंदनामती तो मेरे आदेश से सम्यग्ज्ञान के लेखों का भार संभालते हुए अन्य ग्रंथों के प्रकाशन आदि में लगी रहती हैं व यात्रियों के साथ वार्तालाप आदि करके मेरा भार हल्का करती रहती हैं। क्षुल्लक मोतीसागर जी ग्रंथों के प्रूफ आदि देखने में तथा यात्रियों की समस्या सुनकर उसे हल करने में मेरा भार हल्का करते रहते हैं, इनकी यही अनुकूल प्रवृत्ति सबसे बड़ी गुरुभक्ति व गुरु की-माता की वैयावृत्ति है। क्षुल्लिका श्रद्धामती भी गुरु की वैयावृत्ति व स्वाध्याय आदि में लगी रहती हैं।

कु. आस्था और कु. बीना संघ की व्यवस्था, चौका करना-आहार देना, गुरुओं की औषधि, उपचार आदि में तत्पर रहते हुए भी पठन-पाठन में लगी रहती हैं।

इस छोटे से भी संघ में सुचारू व्यवस्था बनी हुई है और सभी ज्ञानाराधना तथा चरित्र आराधना में तत्पर होकर भी धर्म प्रभावना के कार्य में रुचि लेते रहते हैं, इससे मुझे संतोष व शांति बनी रहती है और मैं भी अपनी आवश्यक क्रियाओं को संभालते हुए इन सभी को अपने जीवन के अनेक अनुभव सुना-सुनाकर उचित मार्गदर्शन देती रहती हूँ।

यात्रियों का आवागमन-

यहाँ जंबूद्वीप दर्शन के निमित्त से प्रतिदिन यात्रियों का मेला सा लगा रहता है। जैन यात्रियों की बसों के आ जाने से उपदेश तो करना पड़ता ही है, साथ ही यंत्र-मंत्र व व्रतादि ग्रहण करके देश-विदेश के जैन बंधु व महिलाएँ प्रतिदिन गुरु से लाभ लेकर संतुष्ट होते रहते हैं। प्रतिदिन नये-नये यात्रियों को देखकर मुझे चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी की वह पंक्तियाँ याद आती रहती है कि जो उन्होंने कुम्भोज में मुनिश्री समंतभद्र जी से कही थीं-

‘‘विहार करके तुम्हें जो कार्य करना चाहिए, वह यहाँ क्षेत्र पर हो ही जाता है अतः तुम यहाँ रहने में विकल्प न करके जैसे बने वैसे, भगवान बाहुबलि की बड़ी से बड़ी प्रतिमा स्थापित कराओ.....।’’इत्यादि।

इससे मेरे मन में भी यह भाव आ जाता है कि ‘‘विहार करने से मेरे द्वारा जितने लोग धर्मलाभ ले सकते हैं, उसकी अपेक्षा यहाँ रहने से नित्य नये-नये बहुत से लोग लाभ लेते रहते हैं......।’’

बात यह है कि अब मेरे शरीर में विहार करने की शक्ति तो है नहीं अतः गुरुओं की सूक्तियाँ स्मरण कर संतोष धारण करना ही पड़ता है। मैं कई बार कहा करती हूँ-

‘‘कोई खास रोगी है, उसे यदि डाक्टर कह देते हैं कि तुम्हें इसका छह महीने तक इलाज करना होगा, तो रोगी और उसके परिवार के लोग डाक्टर की बात मान लेते हैं यदि डॉ. परहेज में घी, दूध, नमक, चावल या फल आदि त्याग कराते हैं, तो उसे भी करके मात्र फुलका सब्जी खाते हैं और तो क्या, भूख से कम भी खाना स्वीकार कर लेते हैं। ऐसे ही यदि किसी को कोई भी असाध्य रोग हो जाय, तथा डाक्टर, वैद्य, हकीम आदि सभी चिकित्सक भी जवाब दे देवेंं, फिर भी आप रोगी को लेकर गुरु के पास पहुँचो। आठ दिन या एक माह या छह महीने का भी यदि वे कोई अनुष्ठान-जाप्य या विधान करते हैं, आप उसे श्रद्धा से, भक्ति से करो, निश्चित ही तीव्र असाता कर्म भी साता में संक्रमण कर जावेगा और रोगी स्वस्थ हो जावेगा। जिनेन्द्र भक्ति से दोनों हाथ लड्डू हैं, यदि रोग नष्ट हो गया या अकालमृत्यु टल गई, तो वह पूरी आयु भोगेगा, स्वस्थ, सुखी रहेगा और यदि कदाचित् मृत्यु भी हो गई तो वह जिन भक्ति के प्रभाव से परलोक में नियम से देवगति को प्राप्त करेगा, जहाँ अणिमा, महिमा आदि लोकोत्तर वैभव व सागरों तथा पल्यों की बड़ी लम्बी आयु मिलेगी।’’

ऐसे ही किसी व्यापार सिद्धि या मुकमदे आदि के प्रसंग में भी मैं कहा करती हूँ-‘‘आप लोग कार्यसिद्धि के लिए न जाने कितनों को हजारों, लाखों रुपया घूस में दे देते हो, फिर भी विश्वास नहीं कि आपका काम बनेगा ही बनेगा.....किन्तु यदि आप ऐसे ही खुले मन से जिनेन्द्रदेव की पूजा कर गुरु के कहे अनुसार कोई बड़ा सा अनुष्ठान कर लो, उसमें लाख रुपया या जो भी अधिक से अधिक खर्च कर सको कर लो तो तुम्हारी कार्यसिद्धि पूर्णतया निश्चित है, क्योंकि पूजा से विशेष पुण्य संचय हो जाने से अशुभग्रह, अनिष्ट आदि स्वयं टल जाते हैं, तब मनोकामना की पूर्ति नियम से हो ही जाती है, इसमें कोई संदेह नहीं है। फिर भी गुरु की बात भला कौन मानते हैं? हाँ! ऐसे-ऐसे सुशील कुमार जैसे विरले ही कोई पुण्यवान् भव्यजीव है, जो हम लोगों की बात मानकर आज भी अपना मनोरथ सिद्ध करते हुए देखे जाते हैं, इसके अनेक उदाहरण मौजूद हैं।’’ एक बार सीतापुर जिले के बेलहरा गाँव के वीरकुमार जैन का पुत्र दिलीप, जो १६-१७ वर्षीय था, अकस्मात् रेल से उतरने के बाद बिछुड़ गया, उसका दिमाग कुछ कमजोर था, वह नहीं मिल सका, उसके माता-पिता रोते-बिलखते मेरे पास आये, मैंने एक मंत्र दिया और सांत्वना देकर कहा-‘‘इस मंत्र के जाप्य से तुम्हारा पुत्र नियम से आ जायेगा.....।’’ वे बेचारे कई बार आये और मेरी प्रेरणा से उसी जाप्य को जपते रहे। छह महिने बाद एक दिन वे सवा लाख जाप्य पूर्ण करके मंदिरजी से निकले और मन में सोचने लगे-‘‘आज मेरा दिलीप आ जाना चाहिए....।’’ हुआ भी वैसा ही, मध्यान्ह में एक परिचित व्यक्ति उस दिलीप युवक को लेकर आ गया और वह कहाँ-कहाँ भटका है? सारी कथा सुना दी। जल्दी से वीरकुमार ने अपने पुत्र को छाती से लगाया और सुख-दुख मिश्रित अश्रुओं को बहाकर अपना शोक भगा दिया। कुछ दिन बाद वे पुत्र को लेकर मेरे पास हस्तिनापुर आये और एक विधान करके बोले-

‘‘माताजी! अब तो इसका दिमाग भी बिल्कुल ठीक हो गया है। यह सब आपका ही प्रसाद है। ‘‘मैंने कहा-‘‘भाई! यह मेरा नहीं, बल्कि यह तो मात्र इस मंत्र का ही प्रभाव है....। यह सन् १९८४ की घटना है। इस मंत्र को मुझसे लेकर पचीसों लोगोें के खोये हुए, पुत्र पिता आदि मिल चुके हैं, ऐसा मैंने स्वयं देखा है।

मंत्र गोपनीय है-

आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज कहा करते थे-‘‘मत्रि गुप्तभाषणे’’ मत्रि धातु गुप्त भाषण अर्थ में है। इसी धातु से मंत्र, मंत्रणा और मंत्री शब्द बने हैं। गुरुदेव का यही कहना था कि मंत्र गुरु से ही लेना चाहिए और उसे गुप्त ही रखना चाहिए। अनुष्ठान के मंत्र को हवन में भी मौन से ही बोलते हुए मात्र ‘स्वाहा’ का उच्चारण करना चाहिए। इस बात के अनुसार मंत्र ग्रंथों को छपाना मुझे इष्ट नहीं है.....। गुरुमुख से मैंने कुछ मंत्र सीखे थे, आज उन्हीं को किन्हीं-किन्हीं पापभीरू श्रावकों को दे दिया करती हूँ। खास करके स्वास्थ्य लाभ, घर की शांति और व्यापार लाभ के लिए ही प्रायः लोग आते हैं। गुरुमुख से मैंने सुना है-महामंत्र णमोकार मंत्र तो मातृका मंत्र है, इसे चाहे जैसे व चाहे जिस स्थिति में जपो, यह फलेगा ही फलेगा, माता के समान सुख ही देगा, कभी हानि नहीं करेगा। हाँ! दूसरे बीजाक्षर सहित जो मंत्र होते हैं, उनको यदि अशुद्ध जप ले तो लाभ की बजाए हानि की भी संभावना रहती है अतः णमोकार मंत्र के सिवास अन्य मंत्र गुरु से ही लेना चाहिए तथा उन्हें गुप्त ही रखना चाहिए।

इन्द्रध्वज विधान का झण्डारोहण-

वैशाख वदी २, दिनाँक १२ अप्रैल १९९० के दिन इधर एक विधान के हवन की प्रारंभिक क्रिया चल ही रही थी कि उधर त्रिमूर्ति मंदिर के सामने इन्द्रध्वज विधान के लिए झण्डारोहण क्रिया शुरू हो गई। सवा नौ बजे श्रीपाल जैन, उनके पुत्र ज्ञानचंद जैन ने झण्डारोहण किया। यह विधान १२ अप्रैल से २२ अप्रैल तक चला। वास्तव में ये विधान, अनुष्ठान आने वाले बड़े-बड़े अनिष्टों को दूर करने वाले हैं और नाना प्रकार की मनोकामना की सिद्धि करने वाले हैं, यह निश्चित है। ये भी भक्तिमान श्रावक हैं, आगम की विधि से विधान करा रहे थे।

आर्यिका दीक्षा दिवस-

वैशाख वदी दूज को सन् १९५६ में माधोराजपुरा गाँव में आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज के कर-कमलों से मेरी आर्यिका दीक्षा हुई थी, उसके अनुसार आज १९९० में मेरा चौतीसवाँ (३४वां)आर्यिका दीक्षा दिवस है। दीक्षा दिवस के दिन तो नियम से मुझे गुरुदेव के वचन याद आ जाते हैं। गुरुदेव कहा करते थे कि-

‘‘अपने दीक्षा के दिन को मत भूलो......दीक्षा के समय के भावों को हमेशा याद करते रहो.....।’’

वास्तव में दीक्षा के समय दीक्षार्थी के बहुत ही सुन्दर वैराग्य भाव होते हैं, अगर वैसे ही भाव हमेशा बने रहें, तो संसार समुद्र से पार होने में भला कितनी देर लगेगी? इस भव में न सही, तीसरे आदि भवों में मोक्ष को प्राप्त कर लेना कोई बड़ी बात नहीं है।

मेरा विशेष पुण्य योग-

प्रत्येक दीक्षा दिवस पर मैं अपने संयमी जीवन का सिंहावलोकन अवश्य करती हूँ। कई वर्षों से यहाँ जितने भी यात्री आते हैं, खास करके जो पहली बार आने वाले हैं, वे बरबस ही जंबूद्वीप की प्रशंसा करते हुए जैसे कि अघाते ही नहीं हैं पुनः मेरे पास आकर मेरी प्रशंसा में भाव विभोर हो कैसे-कैसे वाक्य बोलते हैं? उन्हें क्या लिखना? प्रत्यक्षदर्शी स्वयं ही बोलते हैं और दूसरे के शब्द सुनते भी हैं। उस समय मैं यही कह देती हूँ-‘‘भाई! इस सुन्दर भव्य जंबूद्वीप रचना का श्रेय तो इन मोतीचंद वर्तमान में क्षुल्लक मोतीसागर और रवीन्द्र कुमार को ही है, अथवा धन के सहयोग में पूरी दिगम्बर जैन समाज को ही है। मैंने तो मात्र तिलोयपण्णत्ति ग्रंथ के आधार से नक्शा बता दिया है तथा कार्यकर्ताओं को प्रेरणा के साथ आशीर्वाद दे दिया है, बस इसके सिवाय भला इस रचना में मेरा क्या है?.......कमल मंदिर के विषय में इस कमलाकार के लिए अवश्य ही मैंने मेरा मस्तिष्क लगाया है....।’’ वास्तव में मैं सोचा करती हूँ कि ‘‘मैं रचना के कार्य में जितना अलिप्त रही हूँ, शायद हर कोई उतना सोच भी नहीं सकते हैं। सन् १९५२ में घर छोड़ने के बाद रुपये-पैसे को तो मैंने हाथ से छुआ ही नहीं है। मुझे यह भी नहीं मालूम है कि चेक या ड्राफ्ट कैसे होते हैं? या रसीदें कैसे काटी जाती हैं? इत्यादि।’’

मैं समझती हूँ कि मैने पूर्वजन्म में ही नहीं, कई जन्मों में कुछ विशेष ही पुण्य संचित किया होगा कि जिसके फलस्वरूप ये दो शिष्यरत्न मुझे मिले हैं। इन्होंने मुझे ‘संयम में बाधा पहुँचे’ ऐसा कोई भी कार्य करने को नहीं कहा है, प्रत्युत् रुपयों की, कार्यालय की सारी जिम्मेवारी संभाले रहें और तृतीय रत्न कु. माधुरी थीं जिन्होंने आहार-विहार की व्यवस्था व वैयावृत्ति करते हुए तथा संस्थान के कार्य व ज्ञान ज्योति प्रवर्तन में और ग्रंथ लेख, प्रकाशन में भी रुचि से कार्य किया था, आज भी वे आर्यिका चंदनामती बनकर पद के योग्य कार्य संंभाल ही रही हैं। तभी तो मैंने इस रचना के निमित्त से यहाँ हस्तिनापुर क्षेत्र पर बैठकर एक दो नहीं, छोटे और बड़े मिलाकर सवा सौ ग्रंथ लिखे हैं। यह लेखन कार्य निश्चित है कि किसी गाँव या शहर में श्रावकों की बस्ती में बैठकर नहीं किया जा सकता था। प्राचीन काल में भी तो आचार्यों ने-श्रीकुन्दकुन्ददेव, श्री नेमिचन्द्राचार्य आदि महर्षियों ने ‘कुंदकुंदाद्रि’, ‘श्रवणबेलगोल’ आदि तीर्थों पर बैठकर ही तो महान्-महान् ग्रंथ रचे थे।

यह निश्चित ही है कि पूर्वपुण्य के योग से ही निराबाध संयम साधना, ज्ञानाराधना व सरस्वती माता की उपासना के अवसर मिल पाते हैं।

आज भी मैं श्री जिनेन्द्रदेव से यही प्रार्थना करती हॅूं कि-

‘‘हे भगवन् ! आपकी कृपाप्रसाद से अंत तक मेरा संयम निराबाध पलता रहे और मेरा उपयोग अपनी आत्मशुद्धि में ही लगा रहे। इन कार्यकलापों से ही क्या, शरीर से भी निर्ममता बढ़ती रहे, बस आपसे यही एक इस दीक्षादिवस पर याचना है, भावना है।’’