ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा देश के समस्त जैन विद्वानों के लिए विशेष सैद्धांतिक विषयों पर ऋषभगिरि-मांगीतुंगी से विद्वत प्रशिक्षण शिविर का पारस चैनल पर ४ दिसंबर, रविवार से ११ दिसंबर २०१६, रविवार तक प्रातः ६ बजे से ७ बजे तक सीधा प्रसारण होगा | घर बैठे देखकर अवश्य ज्ञान लाभ लें |

103.मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र की पर्वतीय यात्रा

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मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र की पर्वतीय यात्रा-

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लगभग दो वर्षों से स्व. आचार्य श्री श्रेयांससागर महाराज की संघस्थ आर्यिका श्री श्रेयांसमती माताजी एवं मांगीतुुंगी तीर्थ के ट्रस्ट मंडल का आग्रह चल रहा था कि ज्ञानमती माताजी! आप मांगीतुंगी की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा को सम्पन्न करवा दीजिए। आप जैसी दिव्यशक्ति के आये बिना यह कार्य संभव नहीं है। उनके आग्रह पर यद्यपि अयोध्या से कई बार विहार करने का मन बनाया किन्तु नक्शे में दूरी देखकर तथा अपना और आर्यिका चंदनामती का शरीर-स्वास्थ्य देखकर हिम्मत हार जाती थी।

अन्ततोगत्वा सन् १९९५ में अयोध्या से हस्तिनापुर पहुँचकर वहाँ वर्षायोग के बाद एक दिन २५ नवम्बर १९९५ को मैंने प्रातःकाल निर्णय कर लिया कि मांगीतुुंगी के लिए विहार करना है। संघस्थ सभी लोग आश्चर्यचकित थे किन्तु मैंने न तो किसी की स्वीकृति की परवाह की और न ही कोई व्यवस्था की ओर ध्यान दिया, बस २७ नवम्बर को जम्बूद्वीप के समस्त सिद्ध भगवन्तों को एवं कल्पवृक्ष भगवान महावीर के चरणों में नमन कर संघसहित हस्तिनापुर से मांगीतुंगी के लिए प्रस्थान कर दिया। फिर तो एक मात्र लक्ष्य भगवान राम आदि ९९ करोड़ मुनियों की निर्वाणभूमि के दर्शन का ही रह गया था अतः उसके अतिरिक्त कुछ दिखता ही नहीं था। ११ दिसंबर १९९५ को दरियागंज दिल्ली में दिगम्बर जैन बालाश्रम के प्रांगण में भगवान मुनिसुव्रत की छत्रछाया में आयोजित संघ की स्वागत सभा में जैन समाज के सर्वप्रमुख नेता साहू अशोक जी ने आकर मुझसे इस लम्बी यात्रा के विषय में विचार-विमर्श किया और संघ को मांगीतुंगी की यात्रा कराने का संकल्प लेने वाले साउथ एक्स. दिल्ली निवासी लाला महावीर प्रसाद जैन बंगाली स्वीट सेंटर का ‘संघपति’ के रूप में पगड़ी बाँधकर स्वागत किया। जिसका निर्वाह उन्होंने पूर्ण समर्पण एवं भक्ति के साथ किया, उनकी धर्मपत्नी सौ. कुसुमलता जी एवं पुत्र, पुत्रवधुएं सभी ने समय-समय पर संघ के साथ चलकर, आहारदान एवं वैयावृत्ति के द्वारा जो पुण्य अर्जित किया, वह उनकी गुरुभक्ति का परिचायक है।

मध्य में हरियाणा, राजस्थान होते हुए तिजारा, महावीर जी, चांदखेड़ी आदि तीर्थों के दर्शन करके मैं इंदौर पहुँची, वहाँ १३ मार्च १९९६ को भगवान ऋषभदेव जन्मजयंती के दिन मेरी प्रेरणा से ‘‘अखिल भारतीय दिगम्बर जैन महिला संगठन’’ नामक दिगम्बर जैन महिलाओं की एक स्वतंत्र संस्था का प्रारंभीकरण हुआ, जिसकी प्रथम केन्द्रीय अध्यक्षा चुनी गर्इं-श्रीमती चन्द्रप्रभा देवी जैन मोदी (इंदौर) एवं श्रीमती सुमन जैन (इंदौर) को महामंत्री बनाया गया। पूरे देश में इस महिला संगठन की लगभग २५० इकाई समितियों के माध्यम से महिलाएं अब सक्रिय होकर धार्मिक एवं शैक्षणिक कार्यों का संचालन कर रही हैं तथा केन्द्रीय महामंत्री सुमन जैन के प्रधान सम्पादन में ‘‘ऋषभदेशना’’ नाम की मासिक पत्रिका भी भारत की दिगम्बर जैन महिला समाज का सुन्दर प्रतिनिधित्व कर रही है। ५ माह में छह प्रदेशों की लम्बी यात्रा पूर्ण कर २७ अप्रैल १९९६ को मैं वहाँ पहुँची और मई में आशातीत सफलताओं के साथ पंचकल्याणक हुआ पुनः मांगीतुंगी में चातुर्मास स्थापित किया।

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संघपति जी की विनम्रता-

संघ विहार के मध्य अनेक जगह समाज के लोग औपचारिकतावश संघपति जी का और उनकी धर्मपत्नी का स्वागत करते, तब कुसुमलता जी तो यही कहकर टाल जातीं कि हम तो अपना कर्तव्य निर्वाह कर रहे हैं, इसमें स्वागत करने की क्या आवश्यकता है? किन्तु सामाजिक व्यवस्थानुसार महावीर प्रसाद जी ताौर उनके सहयोगी लाला प्रेमचंद जैन, खारीबावली-दिल्ली का स्वागत जब किया जाता तो महावीर प्रसाद अवश्य खड़े होकर विनम्रतापूर्वक कहते थे कि मैं कोई संघपति नहीं बल्कि पूज्य माताजी का संघसेवक हूँ। अभी मुझे माताजी अपने साथ मांगीतुंगी की यात्रा करा रही हैं, आगे भी मैं माताजी से यही चाहता हूँ कि अपने साथ मुझे सिद्धशिला की यात्रा भी अवश्य करा दीजिएगा। इसी प्रकार की भक्ति और लघुता वे आज भी प्रदर्शित किया करते हैं जो श्रावकों के लिए अनुकरणीय है।

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नवनिर्माणों की प्रेरणा-

मांगीतुंगी यात्रा का प्रारंभ होते ही पता नहीं कैसा सुयोग रहा कि मेरठ से लेकर मांंगीतुंगी तक तो जो भी प्रदेश बीच में पड़े, प्रायः उन सभी स्थानों पर किसी न किसी नवनिर्माण की मैंने प्रेरणा दी, उनमें से प्रमुख इस प्रकार हैं-

१. कमलानगर-मेरठ में विद्यमान बीस तीर्थंकर एवं वर्तमानकालीन चौबीस तीर्थंकरों की कमलरचना (कमलों पर भगवान विराजमान)

२. प्रीतविहार-दिल्ली में भगवान ऋषभदेव कमल मंदिर

३. ऋषभदेव केशरिया जी में पहाड़ी पर अयोध्या तीर्थ रचना

४. खेरवाड़ा (राज.) में कैलाशपर्वत रचना

५. सनावद (म.प्र.) में णमोकार धाम तीर्थ की स्थापना

६. सिद्धवरकूट सिद्धक्षेत्र पर तेरहद्वीप रचना मंदिर

७. झालरापाटन (राज.) में सिद्धाचलम् तीर्थ की घोषणा

८. मांगीतुंगी में सहस्रकूट कमलमंदिर

९. केकड़ी (राज.) में सम्मेदशिखर पर्वत रचना

१०. माधोराजपुरा (राज.) में नूतन तीर्थ स्थापना.....इत्यादि कई स्थानों के निर्माण पूर्ण होकर जिनधर्म का अमिट संदेश प्रदान कर रहे हैं।

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भगवान ऋषभदेव की १०८ फुट उत्तुंग प्रतिमा निर्माण की प्रेरणा-

मांगीतुंगी का चातुर्मास लगभग समापन की ओर था, एक दिन पर्वत पर स्थित सुधबुध की गुफा में मैं पिण्डस्थ ध्यान कर रही थी, उस मध्य पर्वत की पूर्वाभिमुख चट्टान में विशालकाय भगवान ऋषभदेव की १०८फुट ऊँची खड्गासन मूर्ति उत्कीर्ण कराने के भाव जागृत हुए। पास में बैठी आर्यिका चंदनामती को मैंने कहा कि यहाँ पहाड़ पर १०८ फुट के ऋषभदेव भगवान का रूप प्रगट करना है।

आर्यिका चंदनामती सुनकर बहुत खुश हुर्इं और कहने लगीं कि माताजी! आपको तो प्रारंभ से ही घर में भी दैवी अवतार के रूप में माना गया है। ऐसा लगता है कि आपका धरती पर जन्म मात्र परोपकार एवं संस्कृति संरक्षण के लिए ही हुआ है। काश! आपकी इच्छानुसार यह मूर्ति यहाँ बन जावे तो विश्वभर में एक बार फिर से दिगम्बर जैनधर्म का डंका गूंज जाएगा पुनः उन्होंने कुछ उन्मनस्कता से कहा-किन्तु माताजी! आप तो यहाँ से विहार करने वाली हैं तो इतना बड़ा श्रमसाध्य, दुरूह एवं अर्थसाध्य कार्य कैसे मूर्तरूप ले पाएगा? अतः इससे तो अच्छा है कि आप इस वृहत्काय योजना को प्रगट ही न कीजिए अन्यथा सब लोग आपको यहीं रोकने का प्रबल पुरुषार्थ करेंगे।

मेरा प्रारंभ से ही स्वभाव रहा है कि किसी भी अच्छी बात को मूर्तरूप करने की इच्छा होने पर मैं कभी किसी शिष्य या भक्त की बात नहीं मानती हूँ और भगवान एवं अपनी आत्मशक्ति पर विश्वास करके उसे करने की ठान लेती हूँ उसके पश्चात् शिष्यगण और भक्त अपने आप कर्तव्य निर्वाह की भावना से उसमें सहयोगी बन जाते हैं। इसी नीति के अनुसार २५ अक्टूबर १९९६ शरदपूर्णिमा के दिन कुछ भक्तों के समक्ष मैंने १०८ फुट मूर्ति निर्माण की घोषणा कर दी, जिसे तत्काल लोगों ने तालियाँ बजाकर एवं जय-जयकारों के साथ बनाना स्वीकार करके दानराशि की घोषणा भी प्रारंभ कर दी। कार्य की दुर्गमता एवं दुर्लभता देखकर सभी ने इस नूतन निर्माण की समिति अलग बनाने की घोषणा की तथा उसके अध्यक्ष पद के लिए कर्मयोगी ब्र. रवीन्द्र कुमार जी का नाम प्रस्तावित किया। इनकी कार्यक्षमता पर तो मुझे स्वयं गौरव है अतः मैंने भी क्षणमात्र आगे-पीछे की सोचकर अध्यक्ष पद में रवीन्द्र जी का नाम और महामंत्री पद हेतु डा. पन्नालाल जैन पापड़ीवाल-पैठण (महा.) का नाम घोषित कर दिया पुनः मूर्ति निर्माण हेतु रजिस्टर्ड ट्रस्ट बना, जिसके माध्यम से वर्षों के परिश्रमपूर्वक मूर्ति निर्माण के लिए प्रस्तावित पर्वत अधिकृत किया गया और ३ मार्च २००२ से निर्माण कार्य हेतु शिलापूजन (संघपति महावीर प्रसाद जैन-दिल्ली द्वारा) समारोह करके कार्य प्रारंभ हो गया है। पूरे देश की जैन समाज का मानस इस निर्माण के साथ जुड़ा है। कुशल इंजीनियर, आर्कीटेक्ट एवं शिल्पकारों के सहयोग से शीघ्र पर्वतखण्ड में जिनेन्द्र भगवान की मूर्ति निर्मित होवे इसी भावना के साथ सिद्धक्षेत्र मांगीतुंगी को मेरा परोक्षरूप में कोटि-कोटि वंदन है।

मैंने तो इस मूर्ति की घोषणा करके चातुर्मास के अनंतर मांगीतुंगी से १४ नवम्बर १९९६ को विहार कर दिया एवं ३० मार्च १९९७ को संघ सहित दिल्ली पहुँच गई और वहाँ से ऋषभदेव जन्मजयंती का शंखनाद शुरू किया। दिल्ली में २ अप्रैल १९९७ को भगवान ऋषभदेव जन्मजयंती महोत्सव का विशेष कार्यक्रम दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान, जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर एवं अग्रवाल दिगम्बर जैन पंचायत के संयुक्त तत्त्वावधान में रथयात्रा एवं दिगम्बर जैन लाल मंदिर में १०८ चांदी के कलशों से भगवान का जन्माभिषेकपूर्वक मनाया गया। इसी अवसर पर मेरी प्रेरणा से चांदनी चौक-दिल्ली की महिला संगठन इकाई का दीप जलाकर उद्घाटन किया गया। वर्तमान में दिल्ली की विभिन्न कॉलोनियों में ५० इकाइयाँ सक्रिय कार्य कर रही हैं।

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चौबीस कल्पद्रुम विधानों ने दिल्ली में एक साथ चौबीस समवसरण दिखाये-

मांगीतुंगी में एक दिन मैंने और आर्यिका चंदनामती ने आपस में विचार-विमर्श करके निर्णय किया कि इस बार दिल्ली में भक्ति का एक महान आयोजन चौबीस कल्पद्रुम विधान कराना है पुनः मार्ग में उसकी रूपरेखा बनाती रही और प्रभावनापूर्वक विहार करते-करते हम लोग महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, हरियाणा होते हुए ३० मार्च १९९७ को दिल्ली आ गये। वहाँ दिल्ली प्रदेश के मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा ने लालकिला मैदान में संघ का स्वागत-सम्मान किया, उसी सभा में भगवान ऋषभदेव जन्मजयंती महोत्सव का दीप प्रज्वलनपूर्वक उद्घाटन घोषित किया और पूरे देश की जनता को प्रथम तीर्थंकर की जन्मजयंती व्यापक स्तर पर मनाने की प्रेरणा प्रदान की। केन्द्रीय समिति ने पूरे वर्ष समय-समय पर मेरी प्रेरणानुसार जन्मजयंती, अक्षयतृतीया, ऋषभदेव निर्वाण दिवस आदि मनाने हेतु देश भर में पोस्टर भेजे, तो सभी जगह ऋषभदेव भगवान की धूम मची और धीरे-धीरे लोगों का यह भ्रम समाप्त होने लगा कि जैनधर्म की स्थापना भगवान महावीर ने की है।

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साहू अशोक जैन की उत्कट भावना-

दिनाँक ४ अक्टूबर से १३ अक्टूबर १९९७ तक रिंगरोड दरियागंज-दिल्ली में चौबीस कल्पद्रुम विधान हेतु विशाल पाण्डाल बना। लगभग ३००० स्त्री-पुरुष उस विधान की पूजा में बैठे। चौबीसों तीर्थंकर भगवन्तों के २४ समवसरण बनाकर उनके समक्ष अलग-अलग चक्रवर्तियों का परिवार भक्ति में रत चतुर्थकाल जैसा दृश्य उपस्थित कर रहा था। उन क्षणों का वर्णन तो वास्तव में लेखनी के द्वारा करना अशक्य है, जिसने साक्षात् उसे किया या देखा है वही उसकी महिमा जान सकता है। विधान कार्यक्रम का उद्घाटन जहाँ पूर्व राष्ट्रपति डा. शंकरदयाल शर्मा ने किया, मुख्यमंत्री एवं अनेक मंत्री, सांसद आदि ने आकर दर्शन करके अपने भाग्य की सराहना की, वहीं जैन समाज के प्रमुख नेता साहू अशोक जी तो उस मंच पर आते ही भाव विह्वल हो गये और जीवन में पहली बार इतनी बड़ी संख्या में एक जैसे परिधान में पंक्तिबद्ध पूजन करने वाले भक्तों को,२४ सुसज्जित समवसरणों को देखकर उनकी प्रसन्नता हर्षाश्रुओं के माध्यम से निकलने लगी। उन्होंने खड़े होकर मंच से अपने विचार व्यक्त करते हुए मुझसे अत्यन्त आग्रहपूर्वक निवेदन कया कि पूज्य माताजी! आज मैं राजधानी दिल्ली की धरती पर जो चतुर्थकालीन भक्तिदृश्य देख रहा हूँ वह मेरी जिंदगी का प्रथम अवसर है। मेरे मन में विचार आया है कि यदि आप एक बार सम्मेदशिखर चलकर अपने सानिध्य में ऐसा विशाल आयोजन करवा दें तो मेरा विश्वास है कि सम्मेदशिखर का सारा विवाद समाप्त हो जाएगा और फिर से सम्मेदशिखर का लुप्त होता अतिशय वापस आ जाएगा।

आज मैं सोचती हूँ कि साहू अशोक, जो सम्मेदशिखर तीर्थ के प्रति समर्पित भक्त थे, यदि जीवित होते तो उनकी भावना शायद सफल हो सकती थी किन्तु वे तो काल के गाल में समाहित हो गये और मैं जब मार्च २००३ में सम्मेदशिखर पहुँची तो उनकी भक्ति याद आ गई। तब मैंने भगवान पार्श्वनाथ के चरणों में ऐसे तीर्थभक्त की सद्गति हेतु मंगल कामना की।

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रमेशचंद जैन (पी.एस.मोटर्स) की आत्मीय भावना-

कल्पद्रुम विधान के विराट आयोजन में कार्याध्यक्ष के रूप में श्री रमेशचंद जैन (पी.एस.मोटर्स)-राजपुर रोड, दिल्ली ने सारे कार्यभार को संभाला तो मुझे हार्दिक प्रसन्नता हुई। यूं तो पिछले २५-३० वर्षों से रमेश जी एवं उनके परिवार के सभी लोग मेरे पास भक्ति और स्नेह के साथ आते ही थे किन्तु इस आयोजन में उन्होंने सक्रियतापूर्वक भाग लेकर आर्यिका चंदनामती, क्षु. मोतीसागर एवं अध्यक्ष रवीन्द्र कुमार के साथ अन्तरिम मीटिंग करके जब कार्य किया, तो वे भी हम लोगों की कार्यप्रणाली से अत्यन्त प्रसन्न हुए और हम लोग भी उनके व्यक्तित्व से परिचित हो सके। उनकी धर्मपत्नी सुशीला जी मेरी खास भक्तों में हैं और हमेशा मुझसे बात करके प्रसन्न एवं संतुष्ट होती हैं।

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प्रमुख चक्रवर्ती भरत सम्राट के पद पर दिल्ली निवासी राजकुमार जैन-वीरा बिल्डर्स-

इस विधान में प्रमुख चक्रवर्ती भरत सम्राट के पद पर दिल्ली निवासी राजकुमार जैन वीरा बिल्डर्स को मनोनीत किया गया था अतः उन्होंने अपनी धर्मपत्नी आशा जैन के साथ एवं पूरे परिवार तथा सभी चक्रवर्ती समूह को साथ लेकर अविस्मरणीय भक्ति का रसास्वादन लिया। कल्पद्रुम विधान की स्मारिका से पाठकगण इस महोत्सव का पूरा चित्रण देख सकते हैं। यहाँ मैं इस विषय को समाप्त करते हुए भक्तों को यही प्रेरणा दूँगी कि पंचमकाल में साधु और श्रावक दोनों के लिए जिनेन्द्र भक्ति के सिवाय दूसरा कोई प्रबल निमित्त कर्मनिर्जरा के लिए नहीं हो सकता है अतः अपनी पूरी शक्ति और भक्ति के साथ सदैव धर्मध्यान का अवलम्बन लेकर सांसारिक आर्त-रौद्र ध्यानों से छूटने का पुरुषार्थ करना चाहिए।

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समवसरण प्रवर्तन के साथ जन्मजयंती वर्ष का समापन हुआ-

भगवान ऋषभदेव का अस्तित्व जन-जन तक पहुँचाने हेतु मेरे मन में कई वर्षों से (सन् १९९२ से) लगन लगी थी अतः कुछ न कुछ प्रभावनात्मक कार्य करने की इच्छा हुआ करती थी। उसी के फलस्वरूप मैंने दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान के कार्यकर्ताओं को ‘‘भगवान ऋषभदेव समवसरण श्रीविहार’’ के नाम से पूरे भारत में एक रथ घुमाने की प्रेरणा दी। उस रथ के साथ-साथ जन्मकल्याणक के प्रतीक में एक विशाल ऐरावत हाथी का दूसरा रथ भी बनाया गया। इन दोनों रथों का उद्घाटन २२ मार्च १९९८ ऋषभदेवजन्मजयंती के दिन जन्मजयंती वर्ष के समापन अवसर पर लालकिला मैदान दिल्ली से केन्द्रीय वित्त राज्यमंत्री श्री धनंजय कुमार जैन की अध्यक्षता में हुआ पुनः ९ अप्रैल १९९८ को भगवान महावीर जन्मजयंती के दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भारत भ्रमण हेतु इन रथों का प्रवर्तन किया। निरंतर तीन वर्षों तक पूरे देश में इस समवसरण श्रीविहार के द्वारा ऋषभदेव के सिद्धांतों का एवं व्यसनमुक्ति, सदाचार, शाकाहार का जो व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ है वह अविस्मरणीय है। २१ अक्टूबर सन् २००२ में वह समवसरण प्रयाग-इलाहाबाद में नवनिर्मित तीर्थ ‘‘तीर्थंकर ऋषभदेव तपस्थली’’ परिसर के समवसरण मंदिर में स्थाईरूप से स्थापित किया गया है।

इस प्रवर्तन में संयोजक के रूप में चिरंजीव विजय कुमार जैन-कानपुर ने अथक परिश्रम करके जिस अदम्य उत्साह का परिचय दिया, वह नवीन युवा पीढ़ी के लिए निश्चित ही अनुकरणीय है। उसके लिए मैंने सदैव उसकी प्रशंसा करके यही आशीर्वाद प्रदान किया है कि तुम्हारी योग्यता और अधिक वृद्धिंगत हो, जिससे कि कलियुग में नई पीढ़ी द्वारा धर्ममार्ग की वृद्धि करने वाला सम्राट् चन्द्रगुप्त का स्वप्न सार्थक होगा। इसी प्रकार रथ प्रवर्तन के संचालक विद्वान् पं. सुधर्मचंद्र शास्त्री, तिवरी (म.प्र.) की धर्मरुचि भी सराहनीय रही है।

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कुलपति सम्मेलन के माध्यम से भगवान ऋषभदेव का अस्तित्व सामने आया-

दिल्ली से समवसरण श्रीविहार रथ प्रवर्तन के पश्चात् मैं मई में ससंघ हस्तिनापुर वापस आ गई और सन् १९९८ का वर्षायोग जम्बूद्वीप स्थल पर स्थापित किया। मेरे संघ में उस समय आर्यिका अभयमती जी, आर्यिका चंदनामती, क्षुल्लक मोतीसागर, क्षुल्लिक शांतिमती, क्षुल्लिका श्रद्धामती थीं। उस चातुर्मास के मध्य मेरी प्रेरणा से संस्थान ने ४ अक्टूबर से ६ अक्टूबर १९९८ तक ‘‘भगवान ऋषभदेव राष्ट्रीय कुलपति सम्मेलन’’ आयोजित किया, जो कि जैन समाज में प्रथम बार आयोजित हुआ है। पूरे देश के विश्वविद्यालयों में से लगभग ३० कुलपति, कुछ पूर्वकुलपति एवं शताधिक प्रोफेसर विद्वानों ने इस सम्मेलन में भाग लिया, तब सभी ने इस बात को स्वीकार किया कि अभी तक हम लोग भगवान महावीर को जैनधर्म का संस्थापक मानते थे जबकि वास्तविकता आज ज्ञात हुई है कि ‘‘जैनधर्म प्राकृतिक शाश्वत धर्म है और भगवान ऋषभदेव से महावीर तक इस युग के २४ तीर्थंकर हुए हैं।’’ जम्बूद्वीप के सुरम्य वातावरण ने सभी आगन्तुकों को बहुत ही मंत्रमुग्ध किया तथा ब्र. रवीन्द्र जी के द्वारा किये गये विशिष्ट आतिथ्यसत्कार एवं आवास व्यवस्था की सभी ने भूरि-भूरि प्रशंसा की। सम्मेलन के संयोजक के रूप में डा. अनुपम जैन (इंदौर) का सहयोग भी सराहनीय रहा। इस कुलपति सम्मेलन के मध्य ही ६ अक्टूबर को मेरी प्रेरणा से ‘‘तीर्थंकर ऋषभदेव जैन विद्वत् महासंघ’’ नामक विद्वानों की एक संस्था की स्थापना हुई। वर्तमान में उसके अध्यक्ष डा. शेखरचंद जैन-अहमदाबाद एवं महामंत्री-डा. अनुपम जैन-इंदौर के सक्रिय कार्यकलापों से वह संस्था विद्वानों की एक प्रतिष्ठित संस्था के रूप में मान्य है।

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षट्खण्डागम सिद्धान्तचिन्तामणि टीका के प्रथम भाग का विमोचन-

षट्खण्डागम सूत्र ग्रंथ का एवं उसकी धवला टीका का स्वाध्याय मैंने कई बार किया, उसमें बहुत से ऐसे सैद्धान्तिक और गणित के प्रकरण हैं जो कि अतीव क्लिष्ट हैं उन विषयों में मेरी भी प्रगति नहीं है। इसी हेतु से कई बार मन में आया कि इस महान् सूत्र ग्रंथ की धवला टीका के जो सरल अंश हैं उन्हें उद्धृत करके अल्पज्ञानी साधु-साध्वियों व प्रबुद्ध श्रावकों के लिए भी षट्खण्डागम का ज्ञान कराया जावे तथा च अपने ज्ञान के क्षयोपशम को भी वृद्धिंगत किया जाये। यह भावना वर्षों से चल रही थी कि इसी मध्य आर्यिका चंदनामती ने भी प्रार्थना की कि-‘‘माताजी! अब आप षट्खण्डागम ग्रंथ पर कुछ कार्य कीजिए।’’ उनके आग्रह से भावना और बलवती हुई। इसी के फलस्वरूप मैंने अपने ६२वें जन्मदिवस पर जबकि जम्बूद्वीप का द्वितीय बार पंचवर्षीय महामहोत्सव हस्तिनापुर में मनाया जा रहा था और भगवान श्री शांतिनाथ का सुमेरु पर्वत की पांडुकशिला पर १००८ कलशों से महामस्तकाभिषेक कार्यक्रम चल रहा था, उसी समय षट्खंडागम के प्रथमखंड की सिद्धान्तचिन्तामणि नाम की टीका लिखने का भाव बनाया और उसी दिन आश्विन शुक्ला १५-शरद् पूर्णिमा दिनाँक ८-१०-१९९५ को प्रातः ११.२५ पर मंगलाचरण लिखकर टीका लिखने का सूत्रपात किया।

ॐ नमः सिद्धेभ्यः

षट्खण्डागमः
अस्यान्तर्गतः
जीवस्थान-नाम-प्रथमखण्डागमः
अस्यापि प्रथम प्रकरण-सत्प्ररूपणायाः
सिद्धान्तचिन्तामणिनामधेया टीका
मंगलाचरणम्
सिद्धान् सिद्ध्यर्थमानम्य, सर्वांस्रैलोक्यमूर्धगान् ।
इष्टः सर्वक्रियान्तेऽसौ, शान्तीशो हृदि धार्यते।।१।।

तीन लोक के मस्तक पर विराजमान ऐसे सर्वसिद्धों को सिद्धि के लिए नमस्कार करके, जो सम्पूर्ण क्रियाओं के अंत में इष्ट हैं, ऐसे शान्तिनाथ भगवान को हम हृदय में धारण करते हैं अर्थात् मुनियों की अष्टमी पर्व, नंदीश्वर पर्व आदि क्रियाओं के अंत में शान्तिभक्ति का पाठ किया जाता है और श्रावकों की भी नित्य-नैमित्तिक पूजाओं के अंत में शांतिपाठ पढ़ा जाता है। इस प्रकार शान्तिनाथ भगवान् की भक्ति मुनि और श्रावक की भक्ति-पूजा क्रियाओं के अंत में पढ़ी जाती है ऐसे शान्तिनाथ भगवान को यहाँ टीका के प्रारंभ में हृदय में विराजमान किया गया है।

अनंतर तीन काल के अनन्त अर्हंतों को, चौबीस तीर्थंकरों को और सीमंधर स्वामी आदि बीस तीर्थंकरोें को नमस्कार करके भगवान शांतिनाथ, कुंथुनाथ और अरनाथ के गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान ऐसे चार-चार कल्याणकों से पवित्र हस्तिनापुर तीर्थ को नमस्कार किया है पुनः अट्ठारह महाभाषा और सात सौ लघु भाषा से समन्वित ऐसी द्वादशांगमयी श्रुतदेवी को हृदय में अवतरित किया है।

युग की आदि में हुए श्री ऋषभसेन गणधर गुरु से लेकर पंचम काल के अंत में हुए श्रीवीरांगज मुनि को नमस्कार किया है कि जिनके प्रसाद से आज तक भी सिद्धान्तज्ञान दिख रहा है। इसके बाद श्रीपुष्पदन्ताचार्य को और श्रीभूतबलि को नमस्कार किया है कि जिन्होंने ‘षट्खंडागम ग्रंथ’ को इस भूतल पर अवतीर्ण किया है-लिखा है पुनः श्रीवीरसेन स्वामी के उपकार का स्मरण किया है कि जिन्होंने इस षट्खंडागम ग्रंथ की ‘धवला’ नाम की टीका लिखकर भव्यजीवों के अन्तःकरण को उज्ज्वल कर दिया है।

इस बीसवीं शताब्दी के प्रथम आचार्य चारित्रचक्रवर्ती श्री शांतिसागरजी, उनके प्रथम पट्टाधीश आचार्य श्रीवीरसागर जी को नमस्कार करके मेरे आर्यिका दीक्षा के गुरु ‘ज्ञानमती’ नाम देने वाले श्रीवीरसागर जी आचार्य हैं ऐसा ध्वनित किया है पुनः युग की आदि में हुई ब्राह्मी-आर्यिका जो कि प्रथम गणिनी थीं, उनसे लेकर पंचमकाल के अंत में होने वाली ‘सर्वश्री’ आर्यिका तक सभी आर्यिकाओं को ‘वंदामि’ करके ग्यारह अंग की पाठी ऐसी ‘सुलोचना’ संयतिका-आर्यिका की वंदना की है।

पुनः ‘षट्खंडागम’ नाम के सिद्धान्तग्रंथ को भक्तिपूर्वक बार-बार नमस्कार करके इनमें से प्रथमखंड की टीका लिखने की प्रतिज्ञा की गई है। उस प्रथमखण्ड में भी जो प्रथम अंश सत्प्ररूपणा है, उसकी टीका लिखने में कहा है कि इसमें मैंने धवला टीका के अंशों को निकाल-निकाल कर अपने में ज्ञान ऋद्धि को प्रगट करने के लिए इस टीका को सरल बना दिया है अर्थात् धवला टीका के सरल-सरल अंशों को मैं इसमें उद्धृत करूँगी, ऐसा स्पष्ट किया है। अनन्तर मैंने ‘‘चंदनामती’’ आर्यिका को ‘ज्ञानवृद्धिं’ क्रियात् ‘ऐसा आशीर्वाद दिया है कि वर्तमान में जिनकी प्रार्थना से मैंने यह टीका लिखना प्रारंभ किया है पुनः मैंने प्रार्थना की है-

शारदे! तिष्ठ मच्चित्ते, यावन्न पूर्णमायुयात्।

प्रारब्धकार्य मेतद्धि, तावच्छत्तिं च देहि मे।।

हे शारद मातः! आप मेरे हृदय में तब तक विराजमान रहो कि जब तक प्रारंभ किया गया मेरा यह लेखन कार्य पूर्ण न हो जावे और तब तक मुझे शक्ति भी प्रदान करो। अनन्तर-सत्रहवें काव्य को लिखा है-

इन्द्रवज्रा छंद-

सिद्धान्तचिन्तामणिनामधेया, सिद्धान्तबोधामृतदानदक्षा।
टीका भवेत्स्वात्मपरात्मनो हि, कैवल्यलब्ध्यै खलु बीजभूता।।१७।।

यह जो ‘सिद्धान्तचिन्तामणि’ नाम की टीका है वह सिद्धान्तज्ञानरूपी अमृत को देने में कुशल है, यह टीका अपनी आत्मा में और अन्य पाठकों की आत्मा में केवलज्ञान को उत्पन्न करने के लिए बीजभूत होेवे, ऐसी प्रार्थना की गई है। यहाँ तक १७ काव्यों में इस टीका का मंगलाचरण किया गया है। इसके अनन्तर टीका लिखने में भूमिका लिखी है- ‘अथ सर्वेषां अंग-पूर्वाणामेकदेशज्ञानवतः श्रुतज्ञानस्याविच्छिन्नतां चिकीर्षोः महाकारुणिकस्य भगवतः श्रीधरसेनाचार्यस्य मुखकमलादधीत्य सिद्धान्तज्ञौ श्रीपुष्पदंत-भूतबलि-आचार्यो.........।’’ सम्पूर्ण अंग और पूर्वों के एकदेशज्ञाता, श्रुतज्ञान को अविच्छिन्न बनाने की इच्छा रखने वाले महाकारुणिक भगवान श्रीधरसेनाचार्य हुए हैं, उनके मुखकमल से पढ़कर सिद्धान्तज्ञानी श्रीपुष्पदंत और श्री भूतबलि आचार्य हुए हैं। उन्होंने ‘अग्रायणीय पूर्व’ नामक द्वितीय पूर्व के ‘चयनलब्धि’ नामक पाँचवी वस्तु के ‘कर्मप्रकृतिप्राभृत’ नामक चौथे अधिकार से निकले हुए जिनागम को छह खंडों में विभाजित करके ‘षट्खंडागम’ यह सार्थक नाम देकर सिद्धान्तसूत्रों को लिपिबद्ध किया है।

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छह खण्ड के नाम-

१. जीवस्थान

२. क्षुद्रकबंध

३. बंधस्वामित्वविचय

४. वेदना खण्ड

५. वर्गणाखण्ड और

६. महाबंध ये नाम हैं।

इनमें से पाँच खंडों में छह हजार सूत्र हैं और छठे खण्ड में तीन हजार सूत्र हैं। ऐसा श्रुतावतार ग्रंथ में लिखा है।

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वर्तमान में मुद्रित-

छपी हुई सोलह पुस्तकों में पाँच खण्ड माने गये हैं। उनके सूत्रों की गणना छह हजार, आठ सौ तीस (६८३०) है।

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पाँच खण्डों में विभाजित सूत्र संख्या-

प्रथम खण्ड में दो हजार तीन सौ पचहत्तर सूत्र (२३७५) हैं। दूसरे खण्ड में पन्द्रह सौ चौरानबे (१५९४) हैं। तृतीयखण्ड में तीन सौ चौबीस (३२४), चतुर्थ खण्ड में पन्द्रह सौ चौदह (१५१४), पाँचवें खण्ड में एक हजार तेईस (१०२३) सूत्र हैं।

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मुद्रित सोलह पुस्तकों में पाँच खण्डों का विभाजन-

छपी हुई प्रथम से लेकर छह पुस्तकों तक प्रथम खण्ड है। सातवीं पुस्तक में द्वितीय खण्ड है। आठवीं पुस्तक में तृतीय खण्ड है। नवमीं से लेकर बारहवीं पुस्तक तक चार पुस्तकों में चतुर्थ खण्ड है और तेरहवीं पुस्तक से लेकर सोलहवीं तक चार पुस्तकों में पाँचवां खण्ड है।

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प्रथम खण्ड के विषय-

प्रथम खण्ड में आठ अनियोगद्वार हैं एवं अंत में एक चूलिका अधिकार है। इस चूलिका के भी नव भेद हैं। आठ अनियोगद्वार के नाम- १. सत्प्ररूपणा

२. द्रव्यप्रमाणानुगम

३. क्षेत्रानुगम

४. स्पर्शनानुगम

५. कालानुगम

६. अन्तरानुगम

७. भावानुगम

८.अल्पबहुत्वानुगम।

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चूलिका के नाम और भेद-

१. प्रकृतिसमुत्कीर्तन चूलिका

२. स्थानसमुत्कीर्तन चूलिका

३. प्रथममहादण्डक

४. द्वितीयमहादण्डक

५. तृतीय महादण्डक

६. उत्कृष्ट स्थितिबंध

७. जघन्यस्थितिबंध

८. सम्यक्त्वोत्पत्ति चूलिका और

९. गत्यागती चूलिका।

मुद्रित छह पुस्तकों में यह प्रथम खण्ड विभाजित है- प्रथम पुस्तक में सत्प्ररूपणा है, द्वितीय पुस्तक में आलाप अधिकार नाम से इसी सत्प्ररूपणा का विस्तार है। तृतीय पुस्तक में द्रव्यप्रमाणानुगम है। चतुर्थ पुस्तक में क्षेत्रानुगम, स्पर्शनानुगम और कालानुगम का वर्णन है। पंचम पुस्तक में अन्तरानुगम, भावानुगम और अल्पबहुत्वानुगम है। छठी पुुस्तक में नौ चूलिकाएं हैं।

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सिद्धान्तचिन्तामणि टीका-

मैंने आश्विन शुक्ला पूर्णिमा, ८ अक्टूबर १९९५ को मंगलाचरण लिखकर इस षट्खण्डागम ग्रंथ के प्रथम खण्ड में भी प्रथम अवयवभूत सत्प्ररूपणा की टीका लिखने का संकल्प किया। इस टीका में ४ पेज तक ग्रंथ के प्रतिपाद्य विषय और सूत्र संख्या द्वारा भूमिका बनाई। पुनश्च आगे महामंत्र, जो कि अपराजित णमोकार मंत्र है और इस ‘षट्खण्डागम’ ग्रंथ का मंगलाचरण है, उसे लिखकर उसकी व्याख्या लिखना शुरू किया।

यह मेरे द्वारा लिखी जा रही टीका का आधार श्रीवीरसेनाचार्य द्वारा विरचित धवला टीका ही प्रमुख है। इस टीका के सरल अंशों को भी अपनी भाषा में सरल करने का प्रयास किया गया है तथा अन्य अनेक ग्रंथों के उदाहरण भी लिये गये हैं। इसमें णमोकार मंत्र के अक्षर, पद, मात्रा आदि का वर्णन करके यह द्वादशांग का सारभूत है, ऐसा भी अन्य ग्रंथों के आधार से सिद्ध किया है। इस मंगलाचरण में नाम, स्थापना आदि निक्षेप भी घटित किये हैं। यह मंत्र अनादिनिधन है ऐसा भी अन्य ग्रंथ के आधार से प्रगट किया है।

पुनः ग्रंथ के लिए निमित्त, हेतु, कर्ता आदि का सुन्दर विवेचन है। इसमें भगवान महावीर स्वामी को अर्थकर्ता सिद्ध करके भगवान की दिव्यध्वनि से प्रगट ग्यारह अंग, चौदह पूर्वों के नाम व संक्षिप्त लक्षण दिये गये हैं। ग्रंथकर्ता श्री गौतम स्वामी नाम से प्रसिद्ध जो कि इन्द्रभूति प्रथम गणधर हुए हैं, उनका भी वर्णन है।

अनन्तर श्रुतदेवी का भी लक्षण प्रतिष्ठा ग्रंथ आदि के आधार से दिया है। इसके बाद श्रुतावतार की अर्थात् षट्खण्डागम के उत्पत्ति की कथा संक्षेप में दी गई है। जो कि इस प्रकार है- सौराष्ट्रदेश में ऊर्जयंतपर्वत के पास गिरिनगर की चन्द्रगुफा में निवास करने वाले अष्टांगमहानिमित्त पारंगत श्रीधरसेनाचार्य ने एक बार मन में चिन्तन किया कि ‘‘आगे अंग श्रुतज्ञान का विच्छेद हो जायेगा।’’ अतः किसी भी उपाय से उस अंग श्रुतज्ञान की रक्षा का प्रयत्न करना चाहिए। उसी समय पंचवर्षीय साधु सम्मेलन में सम्मिलित दक्षिणदेशवासी आचार्यों के पास में एक पत्र भेजा। उस लेख को पढ़कर उन आचार्यों ने दो योग्य मुनि उस आन्ध्र देश से सौराष्ट्र देश मेंं भेजे। इन आचार्य धरसेन को अग्रायणीयपूर्व की पंचम वस्तु के चतुर्थ महाकर्म प्रकृतिप्राभृत का ज्ञान था जिससे इन्होंने अपनी आयु अल्प जानकर दो मुनि अपने पास भेजने के लिए पत्र लिखा था और एक ब्रह्मचारी के हाथ भेजा था।

जब ये दोनों मुनि वहाँ पहुँचने वाले थे, तभी आचार्यप्रवर श्रीधरसेन जी को पिछली रात्रि में स्वप्न हुआ कि दो शुभ्र वृषभ मेरी तीन प्रदक्षिणा देकर मेरे चरणों में नमन कर रहे हैं। यद्यपि स्वप्न का फल योग्य शिष्यों का मिलना समझ चुके थे फिर भी उन दोनों के आने के बाद उनकी परीक्षा के लिए गुरुदेव ने दोनों को एक-एक विद्यायें देकर भगवान नेमिनाथ की सिद्धभूमि पर बैठकर विद्या सिद्ध करने का आदेश दिया। गुरु की आज्ञा से वे दोनों विद्या सिद्ध करने हेतु मंत्र जपने लगे। जब विद्या सिद्ध हो गई, तब उनके सामने दो देवियाँ प्रगट हो गर्इं। उनमें से एक देवी कानी थी और दूसरी देवी के बड़े-बड़े दाँत थे। इन दोनों मुनियों ने चिन्तन किया कि देवियों के ये वास्तविक रूप नहीं हैं, कुछ न कुछ हमारे मंत्रों के दोष हैं। चिन्तन करके मंत्र के व्याकरण शास्त्र से दोनों ने मंत्र शुद्ध किए। एक मुनि के मंत्र में एक अक्षर कम था और दूसरे मुनि के मंत्र में एक अक्षर अधिक था। तब उन दोनों मुनियों ने मंत्र को शुद्ध करके जपना प्रारंभ किया। अनन्तर सुन्दर वेषभूषा में दो देवियाँ अपने सुन्दर रूप में प्रगट हुर्इं और कहा- ‘‘आज्ञा दीजिए! क्या करना है?’’

तभी दोनों मुनियों ने कहा-हमें आपसे कोई भी कार्य नहीं है। केवल गुरु की आज्ञा से हमने ये मंत्र जपे हैं। तब वे देवियाँ अंतर्हित हो गर्इं। इन दोनों ने जाकर गुरुवर्य श्रीधरसेनाचार्य को सारा वृत्तान्त सुना दिया। आचार्य श्री प्रसन्न हुए और इन दोनों मुनियों को शुभ मुहूर्त में श्रुत विद्या का अध्ययन कराना प्रारंभ कर दिया। इन्होंने विनयपूर्वक गुरु से श्रुतज्ञान प्राप्त कर लिया। तब श्री धरसेनसूरि ने अपनी आयु को अल्प जान इन दोनों का विहार करा दिया। ये दोनों महासाधु देवों द्वारा पूजा को प्राप्त होकर गुरु की आज्ञा से वहाँ से चलकर ‘अंकलेश्वर’ ग्राम में आये और वहीं चातुर्मास स्थापित किया।

तदनंतर बड़े मुनि श्री पुष्पदन्ताचार्य अपने भान्जे जिनपालित को साथ लेकर उन्हें मुनि बनाकर ‘वनवास’ नाम के देश को चले गये और भूतबलि नाम के दूसरे आचार्य तमिल देश को चले गये। श्री पुष्पदंताचार्य ने जिनपालित मुनि को सत्प्ररूपणा के एक सौ सतहत्तर सूत्रों को लिखकर पढ़ाये और उन्हें देकर भूतबलि आचार्य के पास भेज दिया। इन्होंने भी अपने सहपाठी गुरु भाई पुष्पदन्ताचार्य के अभिप्राय को जानकर और उनकी आयु भी अल्प जानकर विचार किया कि-‘‘महाकर्मप्रकृतिप्राभृत’ श्रुतज्ञान की परम्परा चलती रहे, इसका अंत न हो जाये ‘द्रव्यप्रमाणानुगम’ को आदि लेकर षट्खंडागम ग्रंथ की रचना पूरी की और ज्येष्ठ शुक्ला पंचमी के दिन इस ग्रंथ की चतुर्विध संघ ने पूजा की थी, तभी से श्रुतपंचमी पर्व चला आ रहा है। ये पुष्पदंत और भूतबलि दोनों आचार्य इस षट्खंडागम ग्रंथ के कत्र्ता माने गये हैं।

इस ग्रंथ के सत्प्ररूपणा के एक सौ सतहत्तर सूत्र जो कि षट्खंडागम पुस्तक प्रथम में छपे हैं वे श्री पुष्पदन्ताचार्य द्वारा विरचित हैं और शेष सभी सूत्र मुद्रित तीसरी पुस्तक से लेकर महाबंध तक श्री भूतबलि आचार्य द्वारा विरचित हैं। छपी हुई पुस्तक में सूत्र नहीं हैं केवल सत्प्ररूपणा से संदर्भित आलाप अधिकार है जो कि धवला टीकाकार श्रीवीरसेनाचार्य द्वारा विरचित है।

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षट्खण्डागम की टीकाएं-

पुनश्च षट्खण्डागम ग्रंथ पर छह टीकाएं लिखी गई हैं। उनके नाम - श्री कुन्दकुन्ददेव ने तीन खण्डों पर जिनका नाम ‘परिकर्म’ था यह १२००० श्लोकप्रमाण थी। श्रीशामकुंडाचार्य ने ‘पद्धति’ नाम से टीका लिखी जो संस्कृत, प्राकृत और कन्नड़ मिश्र थी, ये पाँच खण्डों पर थी और १२००० श्लोक प्रमाण थी। श्री तुम्बुलूर आचार्य ने ‘चूड़ामणि’ नाम से टीका लिखी। छठा खण्ड छोड़कर षट्खण्डागम और कषायप्राभृत दोनों सिद्धान्त ग्रंथों पर यह ८४००० श्लोकप्रमाण थी। श्री समंतभद्र स्वामी ने संस्कृत में पाँच खण्डों पर ४८००० श्लोक प्रमाण टीका लिखी। श्री वप्पदेव सूरि ने ‘व्याख्याप्रज्ञप्ति’ नाम से टीका पाँच खंडों पर और कषायप्राभृत पर लिखी यह ६०००० श्लोकप्रमाण थी। यह प्राकृत में थी पुनः श्रीवीरसेन आचार्य ने छहों खण्डों पर प्राकृत-संस्कृत मिश्र ‘धवला’ नाम से टीका लिखी, यह ७२००० श्लोकप्रमाण है।

वर्तमान में ऊपर कही हुई पाँच टीकाएँ उपलब्ध नहीं हैं, मात्र श्रीवीरसेनाचार्य कृत ‘धवला’ टीका ही उपलब्ध है। जिसका कि हिन्दी अनुवाद होकर छप चुका है। इस ग्रंथ को ताड़पत्र से लिखा कर और हिन्दी अनुवाद कराकर छपवाने का श्रेय चारित्रचक्रवर्ती आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज को है, उनकी कृपा प्रसाद से हम सभी इस ग्रंथ के मर्म को समझने में सफल हुए हैं।पुनः ‘जीवस्थान’ नाम के इस प्रथम खण्ड में जो आठ अनियोगद्वार और नव चूलिकाएं हैं, वे कहाँ-कहाँ से निकली हैं? इसका उपसंहार किया है।

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जीवस्थान के विषय का उपसंहार-

द्वादशांग में बारहवाँ अंग दृष्टिवाद नाम का है। इसके पाँच भेदों में पूर्वगत नाम से चौथा भेद है। उन चौदह पूर्वों में अग्रायणीय नाम से दूसरा पूर्व है। इस अग्रायणीय पूर्व के चौदह अर्थाधिकार हैं। उनमें से ‘चयनलब्धि’ नाम से पाँचवी वस्तु यहाँ ग्रहण की गई है। इस चयनलब्धि के भी बीस अधिकार हैं। इन्हें ‘प्राभृत’ भी कहते हैं। इनमें चौथा भेद ‘कर्मप्रकृतिप्राभृत’ है। इस प्राभृत के चौबीस अर्थाधिकारों में ‘बंधन’ नाम का छठा अधिकार है। इस ‘बंधन’ अधिकार के चार भेदों में से यहाँ पर बंधक और बंधविधान ये अधिकार ग्रहण किये गये हैं। इस बंध के ग्यारह अनियोगद्वारों में से ‘द्रव्यप्रमाणानुगम’ नाम से पाँचवाँ अनियोगद्वार यहाँ लिया गया है। आगे बंधविधान के भेद-प्रभेदोें से भावानुगम आदि अनियोगद्वार लिये गये हैं।

इस प्रकार इस ‘जीवस्थान’ नाम के प्रथम खण्ड में सत्प्ररूपणा, द्रव्यप्रमाणानुगम, क्षेत्रानुगम, स्पर्शनानुगम, कालानुगम, अन्तरानुगम, भावानुगम और अल्पबहुत्वानुगम ये आठ अनियोग द्वार हैं और नव चूलिकायें हैं। मैंने सरल संस्कृत भाषा में यह ‘सिद्धान्तचिन्तामणि’ नाम की टीका लिखी है। मात्र ४८ पेज तक हस्तिनापुर में टीका लिखी थी कि अकस्मात् मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र की ओर विहार करने का निर्णय कर दिया। मन में कुछ दुःख हुआ कि मेरा यह महान ज्ञानवर्धन का कार्य मार्ग में कैसे होगा? कब होगा? और क्या होगा? किन्तु आज मुझे स्वयं आश्चर्य हो रहा है कि- मगसिर शु. छठ, वीर नि. सं. २५२२, दिनाँक २७-११-१९९५ को मैंने हस्तिनापुर से मंगलविहार किया और अगले दिन २८-११-१९९५ को मवाना में ही प्रातः टीका लिखना प्रारंभ किया। मार्ग में भी कभी प्रातः कभी सायं मेरी लिखाई चलती रही है कभी-कभी विशेष प्रभावना के कार्यों में लिखाई बंद हुई है। प्रथम सत्प्ररूपणा अधिकार की टीका मैंने पिड़ावा राजस्थान में पूर्ण की है।

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इस प्रकार मैंने यह टीका अपनी कर्मभूमि तीर्थक्षेत्र हस्तिनापुर में प्रारंभ करके यात्रा के मध्य में अपनी दीक्षाभूूमि माधोराजपुरा (राज.) में लगभग अठारह मास में पूर्ण की है। मुझे प्रसन्नता तो हुई है साथ ही आश्चर्य भी हुआ है यह लगभग ९०० पेज की संस्कृत टीका कैसे लिखी गई है? इसे मैं सरस्वती देवी की विशेष कृपा ही समझती हूँ।

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द्वितीयखण्ड की टीका प्रारंभ-

फाल्गुन शु. १, वीर नि. सं. २५२३, दिनाँक १०-३-१९९७ को पद्मपुरा अतिशय क्षेत्र पर भगवान के सामने बैठकर बहुत ही श्रद्धा के साथ मैंने भगवान श्रीपद्मप्रभु तीर्थंकर को नमस्कार करके एक श्लोक लिखकर पुस्तक सातवीं, जो कि द्वितीय खण्ड है और ‘क्षुद्रकबंध’ जिसका नाम है, उसकी ‘सिद्धान्तचिन्तामणि’ टीका प्रारंभ की। मार्ग के विहार में टीका लिखने में मुझे बहुत ही निश्चिंतता रही है। जहाँ भी जैन समाज के ग्राम या शहर आये, प्रवेश करके सभा का कार्यक्रम रखा गया , अधिकांश स्थानों पर पहुँचते ही मंगलाचरण के पश्चात् मैं कोई नयी योजना देती, आर्यिका चंदनामती जी शीघ्र ही अपने प्रवचन से उस पर प्रकाश डालतीं और क्षुल्लक मोतीसागर जी तत्क्षण ही समाज के दो-तीन वरिष्ठ व्यक्तियों से परामर्श करके न्यौछावर राशि निर्धारित करके घोषणा करते थे और तभी दस, पन्द्रह मिनटों में योजना सफल हो जाती और मध्यान्ह में शिलान्यास कराकर संघ का विहार हो जाता। इसी बीच मैं सभा में भी अपना लेखन-कार्य करती रहती थी।

सभा संचालन एवं नूतन योजना को मूर्तरूप देने के कार्य में मुझे कुछ चिन्ता नहीं करनी पड़ती थी। यही कारण है कि मेरी टीका का कार्य अति अल्प समय में निर्विघ्न सम्पन्न हुआ है। इसलिए आर्यिका चंदनामती और क्षुल्लक मोतीसागर को मेरा बहुत-बहुत मंगल आशीर्वाद है। चूँकि उनका इस लेखन कार्य में बहुत ही बड़ा सहयोग रहा है। साथ ही संघस्थ ब्रह्मचारिणी बहनें आगे का सर्वे करके मेरे पहुँचने के पहले मेरे बस्ते को लेकर आगे पहुँच जातीं और मेरे पहुँचते ही मुझे लिखने का सामान दे देतीं इससे मेरा समय व्यर्थ नहीं जाता था। इसीलिए उन संघस्थ ब्रह्मचारी श्रीचंद को, ब्र. कु. बीना आदि को भी बहुत-बहुत मेरा आशीर्वाद है। आगे द्वितीय खण्ड के ग्रंथ का समापन मगसिर शु. १३, वी. नि. सं. २५२४ (दि. १२-१२-१९९७) को हस्तिनापुर में किया है पुनः तृतीय खण्ड (पु. ८) की टीका लिखने का प्रारंभ भी इसी दिन किया है।

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वर्तमान में मैं तेरहवीं पुस्तक की टीका लिखते हुए यही भावना भाती हूँ कि सरस्वती माता की कृपा से मैं सोलहों पुस्तक की टीका अपने हाथों से लिखकर पूर्ण कर सकूं। मेरी प्रेरणा से आर्यिका चंदनामती ने इस संस्कृत टीका के हिन्दी अनुवाद का कार्य अपने हाथ में लिया अतः प्रथम पुस्तक की टीका उन्होंने फरवरी सन् १९९८ में लिखकर मुझे दी, तब उस ग्रंथ का प्रकाशन हुआ और अक्टूबर में विमोचन के समय मुझे अतीव आल्हाद हुआ।

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मेरठ-कमलानगर में पंचकल्याणक-

दिसम्बर सन् १९९८ में श्री प्रेमचंद जैन तेल वाले-मेरठ, कमलानगर द्वारा मंदिर में मेरी प्रेरणा से (सन् १९९५ में दी गई प्रेरणा) विद्यमान बीस तीर्थंकर (सीमंधर, युगमंधर आदि) एवं वर्तमानकालीन चौबीस तीर्थंकर प्रतिमाओं को विराजमान करने हेतु दो वेदियों में कमल रचनाओं का निर्माण किया गया। उन भगवन्तों की पंचकल्याणक प्रतिष्ठा में सानिध्य प्रदान करने हेतु मैं दिसम्बर १९९८ में ससंघ मेरठ गई। वहाँ सिविल लाइन्स, सदर, शहर, शांतिनगर, प्रेमपुरी, शास्त्रीनगर, पल्लवपुरम् आदि कॉलोनियों में विशेष धर्मप्रभावना हुई, भगवान ऋषभदेव पर संगोष्ठियाँ सम्पन्न हुर्इं तथा कमलानगर जैनसमाज द्वारा आयोजित पंचकल्याणक प्रतिष्ठा आशातीत सफलताओं के साथ सम्पन्न हुई। जन्मकल्याणक में उपस्थित विशाल जनसमूह को देखकर सबके मुँह से यही निकला कि मेरठ में ऐसा कार्यक्रम प्रथम बार हुआ है।