ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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104.भगवान ऋषभदेव अंतर्राष्ट्रीय निर्वाण महोत्सव, जिनेन्द्र भक्ति पर निर्भर है

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भगवान ऋषभदेव अंतर्राष्ट्रीय निर्वाण महोत्सव, जिनेन्द्र भक्ति पर निर्भर है

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भगवान ऋषभदेव अन्तर्राष्ट्रीय निर्वाण महोत्सव-

दिगम्बर जैन त्रिलोक शोध संस्थान, जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर के कार्यकलाप प्रारंभ से ही सर्वतोमुखी, सर्वोदयी एवं राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर के रहे हैं इसीलिए विविध संस्थाओं के कार्यकर्ता भी इसे जैनधर्म का पावर हाउस, कार्यकर्ताओं का ट्रेनिंग सेंटर एवं आर्षमार्गरक्षक के रूप में देखते हैं। जम्बूद्वीप रचना एवं विभिन्न मंदिरों के निर्माणलक्ष्य के साथ-साथ समय-समय पर स्थानीय, जिला, प्रदेश, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षण प्रशिक्षण शिविर-संगोष्ठियाँ आयोजित करके देश भर में इस संस्था ने जो ख्याति अर्जित की, उसी का प्रतिफल ईसवी सन् की द्वितीय सहस्राब्दि के अंतिम दशक में भगवान ऋषभदेव संबंधी महोत्सवों में प्राप्त हुआ।

जन्मजयंती, समवसरण श्रीविहार के पश्चात् भी मेरी इच्छा बनी रही कि भगवान ऋषभदेव का निर्वाण महोत्सव अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसी संस्था द्वारा मनाया जावे अतः मैंने संंस्थान के कार्यकर्ताओं को प्रेरणा दी और इस बार ब्र. रवीन्द्र जी की कार्यव्यस्तता देखते हुए ‘‘भगवान ऋषभदेव अंतर्राष्ट्रीय निर्वाण महोत्सव’’ की समिति का अध्यक्ष घोषित कर दिया श्री प्रदीप जैन कासलीवाल-इंदौर (अध्यक्ष दिगम्बर जैन महासमिति) को एवं सुरेश जैन ‘रितुराज’-मेरठ (महामंत्री जैन मिलन) को महामंत्री बनाकर रवीन्द्र जी की उन्मनस्कता होते हुए भी उन्हें कार्याध्यक्ष घोषित कर दिया। इसके साथ ही ४ फरवरी २००४ (माघ कृ. चतुर्दशी ऋषभदेव निर्वाणकल्याणक तिथि) को निर्वाण महोत्सव के दिल्ली से उद्घाटन की तारीख निश्चित कर दी और कुछ दिनों में ही महोत्सव को सम्पन्न करने हेतु विशाल समिति का भी गठन हो गया।

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जिनेन्द्र भक्ति पर निर्भर है कार्य की सफलता-

कार्यकारिणी समिति और महोत्सव उद्घाटन की तारीख निर्णीत होते ही मुझे शीघ्रता से कार्य को गति देने की आकुलता होने लगी किन्तु आवश्यक नहीं है कि सभी कार्यकर्ता मेरी कार्यपद्धति का ही अनुसरण करें। निर्वाण महोत्सव के मुख्य पदाधिकारियों की धीमी गति से जब मुझे संतोष नहीं हुआ, तब कार्याध्यक्ष ब्र.रवीन्द्र कुमार जी को मैंने जोर देकर द्रुतगति से कार्य प्रारंभ कराया अतः मनोनुकूल स्तर से लाल किला मैदान दिल्ली में ४ फरवरी २००० को विशाल कैलाशपर्वत (७२ रत्नप्रतिमाओं से समन्वित) के समक्ष तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटलबिहारी वाजपेयी ने महोत्सव का उद्घाटन कर प्रथम निर्वाणलाडू चढ़ाया एवं द्वितीय लाडू सभाध्यक्ष केन्द्रीय वित्तराज्यमंत्री श्री वी. धनंजय कुमार जैन ने चढ़ाया पुनः १००८ निर्वाणलाडू चढ़ाने के लिए भक्तों की लम्बी कतार कैलाशपर्वत के समक्ष आई। भक्ति के उस महाकुंभ का दृश्य देखते ही बनता था, जब सभी के हाथों में क्रम-क्रम से अलग-अलग प्रकार के लाडू (सिद्धि लाडू, रत्न लाडू आदि) एवं इलेक्ट्रिक दीप जगमगा रहे थे। तभी मैंने स्पष्ट कहा कि देखो! जिनेन्द्रभक्ति के साथ-साथ कर्मठ कार्यकर्ताओं पर निर्भर होती है कार्य की सफलता। भक्ति का यह द्वितीय महाकुंभ भी अपने आप में अद्वितीय था।

इसी अवसर पर ४ से १० फरवरी २००० तक ‘भगवान ऋषभदेव जैन मेला एवं पंचकल्याणक प्रतिष्ठा’ का कार्यक्रम भी आयोजित किया गया। यहाँ यह ज्ञातव्य है कि ९ अप्रैल १९९८ को समवसरण श्रीविहार प्रवर्तन में एवं इस निर्वाण महोत्सव में प्रधानमंत्री को लाने में कमेटी के साथ श्री धनंजय जैन का सराहनीय योगदान रहा है। इनकी धर्मनिष्ठा को देखकर ही संस्थान ने मेरी प्रेरणा से इन्हें ‘‘भगवान ऋषभदेव नेशनल अवार्ड’’ से सम्मानित करने का निर्णय लिया।

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जम्बूद्वीप महोत्सव २०००-

जम्बूद्वीप रचना पूर्ण होने के बाद सन् १९८५ में मैंने संस्थान के कार्यकर्ताओं को प्रेरणा दी थी कि प्रति ५ वर्षों में जम्बूद्वीप महोत्सव का आयोजन करना है। उसी प्रेरणानुसार सन् १९९० और १९९५ में महोत्सव सम्पन्न हो चुके थे पुनः सन् २००० में भगवान ऋषभदेव निर्वाण महोत्सव होने के बाद रवीन्द्र जी ने मुझे कहा कि माताजी! अब आप हस्तिनापुर चलकर जम्बूद्वीप महोत्सव करवा दीजिए क्योंकि उसको भी ५ वर्ष पूरे होने वाले हैं। जम्बूद्वीप रचना दर्शन की मेरी भी इच्छा चल रही थी अतः उनकी बात स्वीकार करके मैंने हस्तिनापुर के लिए विहार कर दिया और वहाँ (चैत्र शु. त्रयोदशी से वैशाख कृ. पंचमी तक) १६ अप्रैल से २३ अप्रैल २००० तक पंचकल्याणक प्रतिष्ठापूर्वक जम्बूद्वीप महोत्सव सम्पन्न हुआ।

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१५ वर्ष बाद त्रिमूर्ति मंदिर का शिखर बना-

सन् १९८५ में जम्बूद्वीप जिनबिम्ब प्रतिष्ठापना के समय ही संस्थान द्वारा त्रिमूर्ति मंदिर का निर्माण किया गया था जिसमें भगवान ऋषभदेव, भरत, बाहुबली की तीन प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा उस समय हुई पुनः मार्च १९८७ में सहस्रफणा भगवान पार्श्वनाथ एवं भगवान नेमिनाथ की सवा पाँच-पाँच फुट पद्मासन श्यामवर्णी प्रतिमाएँ भी उसी मंदिर के अंदर आजू-बाजू में कमलाकृति वेदियों पर विराजमान की गर्इं किन्तु मंदिर के शिखर बनने का सुयोग नहीं आया था। सन् २००० में कर्मयोगी ब्र. रवीन्द्र जी ने एक माह में द्रुतगति से कार्य चलाकर त्रिमूर्ति मंदिर का शिखर बनवा दिया। उस शिखर के अंदर भी मेरी प्रेरणा से एक छोटा सा मंदिर बनाया गया। उसमें त्रिमूर्ति मंदिर के ऋषभदेव भगवान की खड्गासन प्रतिमा को विराजमान करके नीचे ऋषभदेव की बिल्कुल सफेद नई प्रतिमा स्थापित की गर्इं, फिर तो पंचकल्याणक एवं जम्बूद्वीप के साथ-साथ नवनिर्मित शिखर पर कलशारोहण हो गया और आगन्तुक सभी भक्तों ने मानवजीवन के मंदिर पर सदाचारों का कलश चढ़ाने की शिक्षा प्राप्त की। मंदिर निर्माण के १५ वर्षों बाद शिखर बनने की इस पावन घड़ी में मुझे हार्दिक आल्हाद हुआ, तभी आचार्य श्री पूज्यपाद स्वामी की ये पंक्तियाँ सार्थक मालूम पड़ने लगीं-

दृष्टं जिनेन्द्रभवनं भवतापहारि, भव्यात्मनां विभवसंभवभूरिहेतुः।

दुग्धाब्धिपेनधवलोज्वलकूटकोटि, नद्धध्वजप्रकरराजि विराजमान।।

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इतिहासकार सम्मेलन-

हस्तिनापुर में मेरा ग्रीष्मकालीन प्रवास चल रहा था, उस मध्य संस्थान द्वारा ११ जून २००० को ‘‘जैनधर्म की प्राचीनता’’ पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न हुई जिसमें अनेक उच्चकोटि के इतिहासकार एवं विद्वान् पधारे। इस अवसर पर दिल्ली से एन.सी.ई.आर.टी. (राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद) की ओर से पधारे इतिहास के रीडर श्री प्रीतीश आचार्य ने सभी विद्वानों के आलेख सुनकर संगोष्ठी की रिपोर्ट शिक्षा विभाग तक पहुँचाने का आश्वासन प्रदान किया। पाठ संशोधन पुरुषार्थ के इस क्रम में मैंने समय-समय पर संस्थान के कार्यकर्ताओं एवं संघस्थ ब्र. कु. स्वाति जैन आदि को एन.सी.ई.आर.टी. के डायरेक्टर प्रो. जे.एस. राजपूत के पास भेजा पुनः प्रो. राजपूत मेरे पास कमलमंदिर-दिल्ली में आये और अनेक चर्चाओं के दौरान उन्होंने इतिहास की नई पाठ्यपुस्तकों में संशोधन करने का विश्वास दिलाते हुए मुझसे जैनधर्म का एक अधिकृत पाठ लिखकर देने को कहा, जिसे मैंने कुछ दिन पश्चात् ही उनके पास भिजवा दिया था। इस बीच मानव संसाधन विकासमंत्री डा. मुरली मनोहर जोशी भी दो बार मेरे पास आये और पाठ्यपुस्तकों में यथायोग्य संशोधन करने की बात पर उन्होंने कहा कि हर धर्म के अधिकृत साधु-संतों एवं विशिष्ट विद्वानों से लेख को प्रमाणित करवा कर ही पाठ्यपुस्तकों में प्रकाशित हो ऐसा मेरा प्रयास चल रहा है। कुल मिलाकर इस विषय में मैंने यह अनुभव किया कि बीसवीं सदी के नवीन इतिहासलेखकों ने जैनधर्म के बारे में जो कुछ असत्य बातें लिखीं, उन पर किसी भी अधिकृत जैन विद्वान ने कभी संशोधन हेतु कोई सक्रिय कदम नहीं उठाया। यही कारण रहा कि वे ही असत्य बातें जैनधर्म के तथ्य के रूप में पढ़ाई जाती रहीं और अब संशोधन के नाम पर भारी कठिनाई नजर आने लगी अतः अब पुरुषार्थ करके धीरे-धीरे ही कार्य की सिद्धि संभव है। आखिर एक दिन सफलता मिली जब संसदभवन के सत्रों में भी पाठ्यपुस्तकों के संशोधन की विस्तृत चर्चा चली और जैनधर्म के साथ-साथ अन्य धर्मावलम्बियों के प्रति लिखी गई असत्य बातों का कुछ अंशों में संशोधन (सन् २००३ के संस्करणों में) हो सका है। आगे भी पुरुषार्थ करते रहने से अन्य विवादास्पद विषयों का परिवर्तन संभव है।

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दिल्ली के कमल मंदिर में नई सहस्राब्दि का ऐतिहासिक चातुर्मास-

सन् १९९२ में एक लघु पंचकल्याणक के माध्यम से दिल्ली के एक युवा श्रावक अनिल कुमार जैन मेरे दर्शनार्थ हस्तिनापुर आये, तब से उन्होंने अपनी गुरुभक्ति की अद्वितीय मिसाल प्रस्तुत की। फरवरी सन् १९९४ में अयोध्या तीर्थ पर हुए महामस्तकाभिषेक वाले पंचकल्याणक महोत्सव में वे अपनी धर्मपत्नी अनीता जैन के साथ सौधर्म इन्द्र-इन्द्राणी बने पुनः जब मैं मांगीतुंंगी जा रही थी, तब दिसम्बर १९९५ में प्रीतविहार-दिल्ली पदार्पण के समय उनकी इच्छानुसार उनके मकान के बाहर प्रांगण में एक जिनचैत्यालय बनाने हेतु मैंने भूमि में यंत्र स्थापित कर दिया था।

मांगीतुंगी से वापस आने तक अनिल जी ने चैत्यालय के नाम पर एक सुन्दर कमलमंदिर का निर्माण करवा लिया था, उनके आग्रह पर मैंने ८ जून से १५ जून १९९७ तक पंचकल्याणक प्रतिष्ठा में सानिध्य प्रदान किया पुनः मई १९९८ में उस मंदिर पर कलशारोहण हुआ। ‘‘भगवान ऋषभदेव कमलमंदिर’’ के नाम से प्रसिद्ध उस मंदिर में ऋषभदेव की अतिशयकारी सवा दो फुट धातु की पद्मासन प्रतिमा विराजमान है। छोटे से उस गृहमंदिर में अत्यन्त सुन्दर पच्चीकारी एवं चित्रकारी का कार्य हुआ है जिससे दर्शन करने वाले लोग मंत्रमुग्ध हुए बिना नहीं रहते हैं।

मंदिर निर्माण के बाद से अनिल जी हमेशा मुझसे आग्रह करते थे कि माताजी! आप जब भी दिल्ली रहें तो इस मंदिर में ही प्रवास करें तथा एक चातुर्मास भी आपके संघ का यहाँ पर अवश्य होना चाहिए। उनकी हार्दिक गुरुभक्ति एवं मनोभावना के फलस्वरूप प्रतिवर्ष किसी न किसी कार्यक्रम के निमित्त से कमल मंदिर में मेरा कुछ दिन प्रवास हो ही जाता था। जैसे-सन् १९९७ में प्रतिष्ठा हुई, मई १९९८ में कलशारोहण हुआ, १९९९ में लघु पंचकल्याणक एवं श्रुतपंचमी आदि कार्यक्रम के निमित्त से २-३ माह का समय व्यतीत हुआ पुनः सन् २००० में तो उनके अत्यंत आग्रह पर मेरे संघ सहित वर्षायोग का ही वहाँ संयोग बन गया। फिर तो उन्होंने अपनी पूरी कोठी संघ के लिए खाली कर दी और स्वयं निकट में ही एक फ्लैट खरीदकर उसमें परिवार को रखा तथा पूरे चातुर्मास भर संघ की सेवा में उपस्थित रहकर समस्त आगन्तुकों का जी भरकर आतिथ्यसत्कार किया। उनकी धर्मपत्नी अनीता वास्तव में सती सीता का उदाहरण प्रस्तुत करने वाली धर्मनिष्ठ महिला हैं एवं पुत्रियाँ कु. अनु, कु. अन्तिमा तथा पुत्र चि. अतिशय जैन ये सभी माता-पिता के धार्मिक संस्कारों से ओतप्रोत हैं और मेरे संघ को ये सभी अपने कुलगुरु का संघ मानकर भक्ति एवं समर्पण का भाव रखते हैं।

इस चातुर्मास में जहाँ प्रयाग तीर्थ से एवं भगवान ऋषभदेव निर्वाण महोत्सव वर्ष से संबंधित अनेक ऐतिहासिक निर्णय हुए, वहीं मेरे दीक्षित जीवन में किसी श्रावक के द्वारा व्यक्तिगत रूप से कराया गया यह प्रथम चातुर्मास था किन्तु अनिल जी की मिलनसारता ने पूरे समाज को गुरुभक्ति का लाभ प्राप्त कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

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दिल्ली में कैलाश मानसरोवर यात्रा की प्रेरणा-

कमल मंदिर चातुर्मास के मध्य प्रीतविहार जैन समाज के कार्यकर्ताओं ने मेरी प्रेरणा से अक्टूबर २००० में ‘विकास मार्ग’ के विशाल मैदान में भगवान ऋषभदेव निर्वाण महोत्सव वर्ष की सार्थकता में ऋषभदेव की निर्वाणभूमि कैलाशपर्वत का विहंगम दृश्य उपस्थित कर जनमानस को कैलाश मानसरोवर की यात्रा भारत की धरती पर ही सुलभ कराई। उसमें उमड़ी भारी भीड़ को बेरिकेटिंग व्यवस्था से जाते देखकर मेरा रोम-रोम पुलकित हो जाता था। अस्थाई रूप से बनाये गये इस कृत्रिम कैलाशपर्वत पर जगह-जगह गुफा, झरना, जंगल आदि के प्राकृतिक दृश्य दिखाये गये थे तथा मैंने पूरे पर्वत पर बहत्तर मंदिर बनवाकर त्रिकाल चौबीसी की ७२ प्रतिमाएँ विराजमान करार्इं एवं सबसे ऊपर अष्टापद के स्थान पर विराजमान भगवान ऋषभदेव के समक्ष अखण्ड मंत्रध्वनि चलती रही, जिससे सचमुच पर्वत वंदना का अतिशय चमत्कार सभी ने देखा। इस यात्रा को कराने में प्रीतविहार जैन समाज के अध्यक्ष श्री सागरचंद जैन, महामंत्री श्री अतुल कुमार जैन एवं सुरेशचंद जी, सुभाषचंद जी, सुनील जी, पदमचंद जी, चेतनलाल जी आदि अनेक सक्रिय कार्यकर्ताओं की प्रमुख भूमिका सराहनीय रही है।

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एक ही पाण्डाल में एक साथ ४८ भक्तामर विधान हुए-

मानसरोवर यात्रा के मध्य एक दिन ४८ मांडले बनाकर अलग-अलग भक्तटोलियों ने मेरी प्रेरणा से ४८ भक्तामर विधान सम्पन्न कर भगवान ऋषभदेव के प्रति अपनी भक्ति समर्पित की। संयोग से मेरे दीक्षित जीवन का यह ४८वाँ चातुर्मास भी था अतः ४८ पद्यों वाले भक्तामर स्तोत्र के ४८ मंडल बनाकर पूजा विधान करने की यह भावना सभी में विशेष बलवती थी। गुरुभक्ति की प्रेरणा देने वाली प्रीतविहार की जैन समाज की आज भी मेरे प्रति पूर्ण श्रद्धा है और आवश्यकता पड़ने पर प्रत्येक आयोजन में उन लोगों की पूरी सहभागिता रहती है।

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प्रयाग तीर्थ का निर्माण एक सम-सामयिक देन साबित हुआ-

आज से करोड़ों वर्ष पूर्व प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव ने जहाँ युग की प्रथम जैनेश्वरी दीक्षा धारण की थी, उस स्थल का नाम ‘‘प्रयाग’’ पड़ा था। जैसा कि पद्मपुराण में वर्णन आता है-

प्रकृष्टो वा कृतस्त्यागः, प्रयागस्तेन कीर्तितः’’

लेकिन युगों-युगों के परिवर्तन के साथ अब इलाहाबाद के नाम से जाने जा रहे उस प्रयाग शहर को मात्र गंगा, यमुना, सरस्वती नदियों के त्रिवेणी संगम के रूप में ही संसार भर में प्रसिद्धि प्राप्त है। वहाँ समय-समय पर हिन्दुओं का महाकुंभ मेला आयोजित होता है, जिसमें दुनिया भर से लाखों-करोड़ों लोग आकर नदी में स्नान कर अपने को पवित्र मानते हैं। ऐसा ही एक बारहवर्षीय महाकुंभ मेला जनवरी २००१ में आयोजित था, जो नई सहस्राब्दि का प्रथम मेला होने के कारण कुछ विशेषताओं को लिए हुए था। उन्हीं दिनों दिल्ली से विहार करके १ जनवरी २००१ को मैं संघ सहित प्रयाग पहुँची। चूँकि मेरी इच्छानुसार प्रयाग में करोड़ों वर्ष पूर्व उस धरती पर घटित भगवान ऋषभदेव के दीक्षा इतिहास को साकार करके नूतन तीर्थ बनाने हेतु जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर की कमेटी द्वारा इलाहाबाद-बनारस हाइवे पर एक भूमि क्रय कर ली गई थी। वहाँ निर्माण भी शुरू हो चुका था और मेरे संघ सानिध्य में ४ फरवरी से ८ फरवरी २००१ तक ‘‘भगवान ऋषभदेव पंचकल्याणक प्रतिष्ठा एवं महाकुंभ मस्तकाभिषेक महोत्सव’’ आयोजित होने वाला था।

४ फरवरी २००० में प्रारंभ किये गये भगवान ऋषभदेव अंतर्राष्ट्रीय निर्वाण महोत्सव वर्ष का समापन भी ४ फरवरी २००१ को ही प्रयाग के इस नवनिर्मित तीर्थ ‘‘तीर्थंकर ऋषभदेव तपस्थली प्रयाग दिगम्बर जैन तीर्थ’’ के लोकार्पण के साथ हुआ। इससे पूर्व १८ जनवरी से २१ जनवरी २००१ तक विश्वहिन्दू परिषद के प्रमुख कार्यकर्ता (अंतर्राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष) श्री अशोक सिंघल, श्री के.एल. जैन गोधा (उपाध्यक्ष गोवंश रक्षा एवं मांस निर्यात निरोध परिषद)-उदयपुर एवं श्री हुकुमचंद जैन साबला-इंदौर आदि के विशेष निवेदन पर मैं ससंघ महाकुंभ मेला परिसर में गई और वहाँ आयोजित ‘‘नवम धर्म संसद’’ में सभी हिन्दू सन्त-महन्तों ने पूरे सम्मान के साथ मंच पर हम लोगों को उच्चासन प्रदान किया। महाकुंभ में प्रथम बार जैनधर्म का प्रतिनिधित्व हुआ, संघस्थ आर्यिका चंदनामती का और मेरा सामयिक उद्बोधन सभी ने प्राप्त किया। उसके प्रतिफल में उस मंच पर अगले दिनों में भी भगवान राम के पूर्वज के रूप में तीर्थंकर ऋषभदेव की विस्तृत चर्चा चलती रही। वहाँ पर आयोजित जैन समारोह ‘‘भगवान ऋषभदेव सनातन संस्कृति संगम’’ में प्रतिदिन अनेक धार्मिक आयोजन चले, जिसका झण्डारोहण लाला महावीर प्रसाद जैन (संघपति) दिल्ली ने करके समारोह की कलशयात्रा में १०८ महिलाओं को कलश, नारियल और साड़ियाँ भेंट की तथा २१ जनवरी को भगवान ऋषभदेव के निर्वाण दिवस की पूर्व संध्या पर १००८ लाडू चढ़ाने हेतु सभी को १००८ थाल (लाडू सहित) प्रदान किये।

इस निर्वाण महोत्सव की सभा में जैन समाज के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की उपस्थिति के साथ ही न्यायमूर्ति श्री गुमानमल जी लोढ़ा (भारतीय जीवजंतु कल्याण बोर्ड के राष्ट्रीय अध्यक्ष), आचार्य श्री धर्मेन्द्र जी आदि ने भी सभा में भगवान ऋषभदेव एवं राम के सिद्धान्तों की उपयोगिता बताते हुए महाकुंभ में जैनधर्म के प्रतिनिधित्व की भूरि-भूरि प्रशंसा की। मेरे संघ को संघ भक्त बनकर प्रयाग की यह यात्रा कराने का सौभाग्य मेरठ (उ.प्र.) निवासी श्री पवन कुमार आनंद कुमार जैन (जैन मार्बल होम) एवं उनकी मातेश्वरी ने प्राप्त किया।