ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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106.कुण्डलपुर में महावीर जयंती का क्रम पुनः प्रारंभ हुआ

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कुण्डलपुर में महावीर जयंती का क्रम पुनः प्रारंभ हुआ

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कुण्डलपुर विकास के प्रारंभिक चरण-

कुण्डलपुर में संघ का पदार्पण होते ही उत्तरमुखी नूतन क्रीत भूमि पर भगवान महावीर मंदिर का शिलान्यास मेरे संघ सानिध्य में दीपक जैन बनारस (सपत्नीक) ने किया। शिलान्यास करके ज्यों ही हम लोग आगे बढ़े तो सामने सुसज्जित हाथी दिखा, उसे सभी ने लड्डू आदि का मिष्ठान्न खिलाकर भगवान की जय-जयकारों से कुण्डलपुर को गुंजायमान कर दिया। मुझे इस दृश्य के शुभ शकुन ने कार्य की मंगलमयी पूर्णता हेतु आश्वस्त किया पुन: हम लोग प्राचीन दिगम्बर जैन मंदिर परिसर के कमरों में ठहरे और भक्तों की भीड़ ने अपने-अपने घर की ओर विदा ली पुन: संघ की दिनचर्या ३० दिसंबर से प्रारंभ हो गई तो प्रतिदिन नवविकसित तीर्थभूमि पर जाकर बाहर मैदान में ही ब्रह्मचारिणी बहनों से पूजा, विधान और जाप्य आदि का अनुष्ठान मैं कराने लगी। निर्माण कार्य अपनी गति से चल रहा था तथा भीषण सर्दी ने भी उसमें कोई व्यवधान नहीं पैदा होने दिया।

१ जनवरी २००३ ईसवी सन् के नूतन वर्ष के प्रारंभ में मैंने सभी को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया तथा सायंकाल में ब्र. रवीन्द्र कुमार जी एवं संघस्थ ब्रह्मचारिणी बहनों ने भगवान महावीर की १०८ दीपकों से मंगल आरती उतारकर संघ, समाज एवं देश में मंगल हेतु कामना की।

७ फरवरी से १२ फरवरी (माघ शु. ६ से १०) तक होने वाले महोत्सव को सम्पन्न करने हेतु बीच-बीच में बैठके सम्पन्न हुर्इं जिनमें निकटवर्ती पटना, आरा, कोडरमा, गया, हजारीबाग तथा दिल्ली-मेरठ आदि के श्रावकों ने अपनी-अपनी विभागीय जिम्मेदारियाँ संभालीं और रवीन्द्र जी के साथ सभी ने कंधे से कंधा मिलाकर कार्य में सहयोग प्रदान किया। कुण्डलपुर में नवविकसित हो रहे परिसर का नाम ‘‘नंद्यावर्त महल’’ रखा गया। भगवान महावीर के जन्म महल के नाम से इंगित किये गए इस तीर्थ परिसर के तमाम बोर्ड, बैनर, पोस्टर आदि देश के कोने-कोने में लगाये गये और पंचकल्याणक की व्यापक तैयारियाँ होने लगीं।

१४ जनवरी २००३ को उस नंद्यावर्त महल परिसर में सर्वप्रथम जम्बूद्वीप-हस्तिनापुर से भगवान ऋषभदेव तीर्थंकर की सवा ग्यारह फुट लालवर्णी पद्मासन प्रतिमा का मंगल पदार्पण हुआ। उन्हें यथास्थान वेदी पर विराजमान करने हेतु ५ जनवरी २००३ को वेदी का शिलान्यास हुआ। भगवान महावीर मंदिर के दार्इं ओर भगवान ऋषभदेव का मंदिर बनाना निश्चित हुआ इसलिए दार्इं ओर वेदी का निर्माण पहले शुरू कर दिया गया। इसी प्रकार मूल मंदिर के बार्इं ओर नवग्रहशांति जिनमंदिर का शिलान्यास ९ फरवरी २००३ को श्री ज्ञानचंद जैन-आरा ने किया। इस परिसर में इन तीन मंदिरों के अतिरिक्त त्रिकाल चौबीसी मंदिर (तीन मंजिला), नंद्यावर्त महल विशेष रूप से बनाने का निर्णय हुआ किन्तु सर्वप्रथम फरवरी में होने वाले पंचकल्याणक में जिन-जिन प्रतिमाओं की प्राण-प्रतिष्ठा होनी थी, उनको विराजमान करने हेतु वेदी आदि के निर्माण प्राथमिक स्तर पर द्रुतगति से हुए पुन: कुछ अस्थाई कच्चे कमरे बनाकर रवीन्द्र जी मुझे ससंघ नंद्यावर्त परिसर में ३० जनवरी २००३ को लाए। इससे पूर्व १ माह से हम लोग प्राचीन मंदिर के कमरों में थे। चूँकि पंचकल्याणक के दिनों में बार-बार वहाँ से यहाँ आने लायक मेरा स्वास्थ्य नहीं था इसीलिए टीन के अस्थाई कमरों में भी रहना मुझे उचित लगा। इस बीच कुण्डलपुर में दूर-दूर से भक्तों के समूह आये और सब तेजगति से कुण्डलपुर का विकास कार्य होता देखकर खूब प्रसन्न होते एवं प्रशंसा करते-करते सबके नेत्रों से हर्षाश्रु निकल पड़ते, यह सब कलियुग में जिनेन्द्रभक्ति का प्रभाव मानना चाहिए कि अच्छे कार्यों को देखकर असली भक्त गद्गद हुए बिना नहीं रहते।

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पंचकल्याणक प्रतिष्ठा एवं महाकुंभ मस्तकाभिषेक-

महोत्सव की तैयारी में कुण्डलपुर के अन्दर आयोजन समिति द्वारा आगंतुक श्रद्धालुओं के लिए बसाई गई नगरी को देखकर लोग इसे देवोपुनीत अतिशय ही मान रहे थे क्योेंकि लगभग सौ वर्षों में वहाँ ऐसा अद्वितीय कोई आयोजन हुआ ही नहीं था। मेहमानों के आने के साथ मुझे बार-बार मूलनायक भगवान महावीर के आने और उन्हें यथास्थान वेदी पर विराजमान करने की चिंता लगी थी, जिसका निवारण ७ फरवरी को गर्भकल्याणक के दिन ही हुआ। प्रतिमा तो ५ फरवरी (माघ शु. चतुर्थी) की रात्रि में जयपुर से कुण्डलपुर पहुँच गई, अगले दिन ६ फरवरी को व्रेन ने प्रतिमा की पेटी २५ फुट ऊँचे महावीर मंदिर के प्लेटफार्म पर पहुँचा दी किन्तु वेदी पर विराजमान करना व्रेन के लिए भी संभव नहीं था अतः चैनपुली के द्वारा ७ फरवरी की मध्यान्ह १ बजे से प्रतिमा विराजमान का उपक्रम प्रारंभ हुआ। मैं अपने पूरे संघ के साथ वहीं बैठकर मंत्र जाप्य करती रही पुनः चन्दनामती, क्षुल्लक मोतीसागर, रवीन्द्र जी आदि के साथ सेठ ऋषभदास जी-बनारस आदि श्रावकों ने शाम तक वहीं बैठकर सायं ७ बजकर ५० मिनट पर जब भगवान महावीर को यथास्थान स्थापित कर दिया, तब रत्नवृष्टि, मंगल आरती, जय-जयकारों के स्वर ने मुझे आश्वस्त कर दिया और मैंने उस दिन अपनी कुण्डलपुर यात्रा को सार्थक माना।

ऊँचाई पर प्रतिमा विराजमान करने के इस जोखिम भरे कार्य को सम्पन्न करने में जहाँ कुछ आगंतुक इंजीनियर भी भयभीत हो रहे थे, वहीं जंबूद्वीप-हस्तिनापुर के कुशल सुपरवाइजर शरीफ अहमद एवं जयपुर के मिस्त्री आत्माराम ने पूरी हिम्मत के साथ इस कार्य को सम्पन्न करके अपना कर्तव्य निभाया। मैंने उन दोनों पुण्यात्माओं के लिए खूब मंगल आशीर्वाद प्रदान किया और भक्तों ने उन्हें पुरस्कार प्रदान किया।

मुझे इस बात का गौरव है कि जम्बूद्वीप में २५-३० वर्षों से कार्यरत शरीफ अहमद जाति से मुसलमान होते हुए भी पूर्ण शाकाहारी है और उसका पूरा परिवार पूर्ण शाकाहारी है। इसी पुण्य के फलस्वरूप मेरी प्रेरणा से सम्पन्न होने वाले सभी जगह के निर्माणों में शरीफ का हाथ अवश्य लगता है। बल्कि यूँ कहें कि उसका हाथ लगे बिना कोई कार्य मुझे पसन्द नहीं आता है। आज भी उसकी मेरे प्रति अगाढ़ भक्ति है तभी वह परिवार का मोह छोड़कर महीनों तक कुण्डलपुर में रहकर भी निर्माण कराने का पुण्य अर्जित कर लेता है। उसके समान ही हस्तिनापुर-जम्बूद्वीप के सभी कर्मचारी सतवीर सिंह (गूजर) आदि जैन-अजैन सभी पूरे मनोयोग एवं अपनत्व भाव से कार्य करके पुण्य सम्पादन करते हैं।

पाठकगण इस प्रकरण को पढ़कर स्वयं ही मेरी संतुष्टि का अनुमान लगाते होंगे कि हमारी ज्ञानमती माताजी की चर्या में किसी प्रकार की बाधा आये बिना तीर्थोंद्धार एवं विकास के जो महान कार्य सम्पन्न हो रहे हैं, उसमें कर्णधार भक्तमंडली के साथ-साथ मेरे संघस्थ शिष्यों का एवं जम्बूद्वीप की सशक्त टीम का बहुत बड़ा योगदान रहता है तभी मैं बड़े कार्यों की प्रेरणा देकर भी एकदम निश्चिन्त रहती हूूँ और अपने लेखन में व्यस्त रहती हूँ। जिस दिन मुझे ये संयोग नहीं प्राप्त होंगे संभवतः मैं प्रभावना के कार्यों से विमुख होकर मात्र आत्मसाधना करूँगी क्योंकि आर्यिका चर्या में अपने संयम की साधना ही मेरा प्रमुख लक्ष्य है।

भगवान महावीर की ७ हाथ खड्गासन सफेद प्रतिमा (सवा दस फुट) कुण्डलपुर में विराजमान होते ही पंचकल्याणक महोत्सव प्रारंभ हो गया। यह प्रतिमा विराजमान करने का सौभाग्य मेरे संघभक्त लाला महावीर प्रसाद जैन-साउथ एक्स. दिल्ली एवं उनके परिवार को प्राप्त हुआ। प्रतिष्ठा मेें भी उन्होंने एवं उनकी धर्मपत्नी सौ. कुसुमलता जैन ने भगवान के पिता राजा सिद्धार्थ एवं माता त्रिशला बनने का पुण्य प्राप्त किया। सौधर्मइन्द्र-इन्द्राणी बनारस के दीपक जैन एवं उनकी धर्मपत्नी सौ. सुभाषिनी जैन बने। धनकुबेर का प्रमुख पद आरा निवासी कमल कुमार जैन एवं सौ. अनुपमा जैन को प्राप्त हुआ। अपने समस्त इन्द्र परिवार के साथ सौधर्म इन्द्र ने प्रतिष्ठाचार्य नरेश कुमार जैन संहितासूरि एवं अकलंक जैन प्रतिष्ठाचार्य (मेरे शिष्य) के द्वारा कराये गये विधि-विधानपूर्वक समस्त प्रतिमाओं को प्रतिष्ठित किया पुनः १२ फरवरी २००३ (माघ शु. १२) को निर्वाण कल्याणक के पश्चात् विशाल जनसमूह की उपस्थिति में भगवान महावीर स्वामी की खड्गासन ७ हाथ अवगाहना प्रमाण प्रतिमा का अतिशायी १००८ कलशों से महाकुंभ मस्तकाभिषेक सम्पन्न हुआ। मैंने एवं मेरे संघ ने उस पावन दिवस को अपने जीवन की धन्य घड़ियों के रूप में माना और भगवान महावीर के चरणों में जैनधर्म की विश्वव्यापी प्रभावना हेतु बारम्बार प्रार्थना की।

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पंचकल्याणक प्रतिष्ठा में सूरिमंत्र-

वर्तमान में कई एक वर्षों से पंचकल्याणक प्रतिष्ठाओं में मुनियों द्वारा ‘सूरिमंत्र’ दिया जाने का एक विषय चल पड़ा है। कानजी पंथियों द्वारा करायी जाने वाली प्रतिष्ठाओं के विरोध में यह एक विषय बनाया गया है। मैंने सन् १९५२ से देखा है कि आचार्यरत्न श्री देशभूषण जी महाराज या प्रथम आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज की परंपरा के आचार्यों में यह चर्चा कभी भी नहीं आई थी। आचार्यश्री वीरसागर जी महाराज के शिष्य प्रतिष्ठाचार्य संहितासूरि ब्र.सूरजमल जी ने बिना साधु-संघों के भी अनेक प्रतिष्ठाएँ करायी हैं। वे भी कहते थे कि श्री नेमिचंद्र प्रतिष्ठातिलक, पं. प्रवर आशाधर जी कृत प्रतिष्ठासारोद्धार आदि ग्रंथों में कहीं भी ऐसा उल्लेख नहीं है कि ‘सूरिमंत्र’ दिगंबर आचार्य ही देवें। यदि ‘सूरि’ अर्थात् आचार्य द्वारा दिया जाने वाला मंत्र ही ‘सूरिमंत्र’ है, तो उपाध्याय मुनि या सामान्य मुनियों के द्वारा भी ‘सूरिमंत्र’ नहीं दिलाया जा सकता है। वास्तव में पंचकल्याणक प्रतिष्ठा की सारी क्रियाएँ योग्य प्रतिष्ठाचार्यों द्वारा ही संपन्न करायी जाती है। हाँ! आचार्यसंघ, मुनिसंघ या आर्यिकासंघ आदि को आमंत्रित कर उनका सानिध्य प्राप्त करना यह तो श्रावकों द्वारा कराये गये सभी विशेष अनुष्ठानों में उत्तम है। फिर भी यदि संघ सानिध्य संभव न हो पाए, तो प्रतिष्ठाएं न हों, ऐसी बात नहीं है।

आज तो कई एक कानजीपंथविरोधी विद्वानों ने उन एकांती मुनि विरोधियों का विरोध करते-करते भूत-भविष्यत्कालीन तीर्थंकर प्रतिमा, भगवान पार्श्वनाथ की फणा सहित प्रतिमा एवं भगवान बाहुबली की प्रतिमा की प्रतिष्ठा का ही विरोध कर दिया है, जो कि अत्यन्त गलत है।

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सम्मेदशिखर यात्रा-

आर्यिका दीक्षा के बाद सन् १९६२-६३ में मैंने अपने आर्यिका संघ के साथ सम्मेदशिखर यात्रा की थी पुनः अब ४० वर्षों के बाद उस यात्रा का दुबारा संयोग भगवान महावीर की कृपा से ही प्राप्त हो गया। पंचकल्याणक के बाद १९ फरवरी २००३ को मैंने ससंघ सम्मेदशिखर के लिए कुण्डलपुर से विहार किया पुनः राजगृही के जवाहर नवोदय विद्यालय में महावीर स्वामी की पद्मासन प्रतिमा तथा जैनतीर्थ परिसर में भगवान मुनिसुव्रत की बड़ी प्रतिमा, पावापुरी सिद्धक्षेत्र पर भगवान महावीर की बड़ी प्रतिमा, गुणावां सिद्धक्षेत्र पर गौतम गणधर की प्रतिमा आदि विराजमान करने की प्रेरणा देते हुए संघ का झुमरीतलैया(कोडरमा), सरिया आदि जैनसमाज के नगरों में होते हुए १२ मार्च २००३ (फाल्गुन शु. नवमी) को शाश्वत तीर्थ सम्मेदशिखर में पदार्पण हुआ। ४० वर्षों बाद क्षेत्र पर अनेक संस्थाओं द्वारा वृहत्काय अनेक निर्माण देखकर मेरे में असीम आल्हाद हुआ और इस अनादि तीर्थ के दुबारा दर्शन होने पर मैंने बार-बार अपने भाग्य की सराहना की।

१३ मार्च को मैंने बीसपंथी कोठी में प्रातःकाल अपना केशलोंच किया और पर्वत वंदना की तीव्र उत्कण्ठा में उसी उपवास के दिन मध्यान्ह २ बजे अपने संघ के साथ पहाड़ पर चली गई। वहाँ चोपड़ाकुण्ड पर निर्मित जिनमंदिर एवं धर्मशाला में ठहरकर मैंने पर्वत की तीन वंदनाएँ सम्पन्न कीं। १५ मार्च को हस्तिनापुर से रवीन्द्र जी, बनारस से दीपक-सुभाषिनी, आरा से कमल-अनुपमा आ गये पुनः उन लोगों ने एवं तमाम भक्तों ने मेरे साथ १६ मार्च को सम्मेदशिखर पर्वत की वंदना करके जीवन को धन्य माना। वंदना के मध्य प्रत्येक टोंक पर जल, दूध, चंदन से भगवान के चरणों का सभी ने अभिषेक किया, अघ्र्य चढ़ाया, रत्नवृष्टि की, चांदी की लौंग एवं चांदी के कमल पुष्प चढ़ाये तथा निर्वाण लाडू चढ़ाकर आरती से अपनी भक्ति को प्रदर्शित किया। भगवान पार्श्वनाथ की अंतिम टोंक पर पहुँचकर मैंने पिण्डस्थ ध्यान में लीन होकर भगवान के मुक्तिगमन क्षणों की पावन अनुभूति की, पश्चात् पार्श्वनाथ प्रभु के चरणों का अभिषेक देखकर पूजन करवाई और निर्वाणलाडू चढ़वाकर पहाड़ से नीचे धर्मशाला में आ गई पुन: २१ मार्च को हम लोग दुबारा पहाड़ पर गये वहाँ चोपड़ाकुंड की धर्मशाला में रहकर चार वंदना कीं, इस प्रकार कुल ७ वंदना करके हमारी सम्मेदशिखर यात्रा इस जीवन की एक अमिट देन बन गई। चोपड़ाकुंड पर बने दिगम्बर जैन मंदिर को देखकर मेरा हृदय फूला नहीं समाया और मैंने सभी कार्यकर्ताओं को लाखों-लाखों आशीर्वाद प्रदान कर जिनधर्म की प्रभावना में सदैव डटे रहने की प्रेरणा दी।

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सम्मेदशिखर में श्रावक महासम्मेलन-

होली के अवसर पर सम्मेदशिखर का जैन मेला प्राचीनकाल से प्रसिद्ध रहा है । देश के विभिन्न प्रान्तों के लोग वहाँ फाल्गुन मास की अष्टान्हिका में सिद्धचक्र, इन्द्रध्वज आदि विधान करने अथवा होली के रंगों से बचने के लिए बड़ी संख्या में सम्मेदशिखर यात्रा को जाते हैं और वहाँ भगवान पार्श्वनाथ की भक्तिरूपी रंग से परस्पर में केशरिया होली खेलते हैं। ऐसी होली के दिन चैत्र कृ. एकम को ही आज से ५२ वर्ष पूर्व मैंने महावीर जी अतिशय क्षेत्र पर आचार्य श्री देशभूषण महाराज के करकमलों से क्षुल्लिका दीक्षा ग्रहण कर वीरमती नाम प्राप्त किया था। सम्मेदशिखर में उस दिन मैंने अपने दीक्षित जीवन के ५०वर्ष पूर्ण किये थे। उस अवसर पर वहाँ पधारे सभी भक्तों ने मेरे प्रति अपनी भक्ति भावनाएँ प्रस्तुत की, दीपक जैन आदि ने कुछ वस्तुएँ सबको वितरित किया, ५० मंदिरों के लिए स्वाध्याय हेतु ग्रंथ दिये गये......इत्यादि। इसी मेले के अवसर पर मेरी प्रेरणा से वहाँ १९ मार्च को श्रावक महासम्मेलन का कार्यक्रम आयोजित किया गया, उसमें मैंने श्रावकों के कर्तव्यों पर प्रकाश डालते हुए सम्मेदशिखर तीर्थरक्षा हेतु सभी को विशेष प्रेरणा प्रदान की तथा तीर्थरक्षा हेतु मुनि श्री आर्यनन्दी महाराज के उपकारों का स्मरण कराते हुए तीर्थक्षेत्र कमेटी को कहा कि सम्मेदशिखर में उनका एक स्मारक अवश्य बनाना चाहिए पुन: अनेक वक्ताओं ने वर्तमान में चल रहे तीर्थ विकास के प्रति अपने श्रद्धाभाव व्यक्त करते हुए सभी को अष्टमूलगुण, पंच अणुव्रत आदि धारण करके गुरुभक्ति, तीर्थभक्ति के लिए प्रेरित किया।

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ऋषभजयंती के दिन ऋषभदेव मंदिर का शिलान्यास-

हम लोगों ने शिखर जी में नीचे के सभी मंदिरों का दर्शन करके आपस में विचार-विमर्श किया कि पार्श्वनाथ की इस धरती पर प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव का अस्तित्व होना भी अतिआवश्यक है, जिससे प्रत्येक यात्री जैनधर्म की प्राचीनता से परिचित हो सके। मेरी प्रेरणानुसार वहाँ की बीसपंथी कोठी के पदाधिकारियों ने इस विषय में रुचि ली और चौबीसी तीर्थंकर, बाहुबली मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही जो प्रांगण खाली था, वहाँ २६ मार्च २००३ ऋषभदेव जन्मजयंती के दिन मंदिर का शिलान्यास डा. श्री पन्नालाल जैन पापड़ीवाल-पैठण, महाराष्ट्र (अध्यक्ष-महाराष्ट्र प्रान्तीय तीर्थक्षेत्र कमेटी एवं महामंत्री १०८ फुट मूर्ति निर्माण ट्रस्ट-मांगीतुंगी) सपरिवार ने किया। डा. पापड़ीवाल परिवार के सौजन्य से ही वहाँ मंदिर निर्माण एवं ९ फुट उत्तुंग पद्मासन मूर्ति स्थापित हुई है। शाश्वत तीर्थ पर उन्हें यह पुण्य अवसर प्राप्त हुआ, इस हेतु वे मेरे तथा संघ के प्रति अति कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं यह उनका जन्म-जन्मान्तर का संचित सातिशय पुण्य ही समझना चाहिए।

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कुण्डलपुर में महावीर जयंती का क्रम पुनः प्रारंभ हुआ-

संघस्थ सभी शिष्यों की भावनानुसार कुण्डलपुर में इस वर्ष भगवान महावीर की जन्मजयंती बड़े रूप में मनाना निर्णीत हुआ था, उसके पोस्टर भी समिति ने छापकर देशभर में भेज दिये थे अतः सम्मेदशिखर में और रुकना संभव नहीं था इसीलिए मैंने वहाँ से २९ मार्च को विहार कर दिया और संघ १० अप्रैल २००३ (चैत्र शु. अष्टमी) को सकुशल कुण्डलपुर पहुँच गया। वहाँ १५ अप्रैल को भारी प्रभावनापूर्वक महावीर जयंती का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। रथयात्रा नालंदा तक गई तोे पूरे रास्ते नागरिकों को रत्न एवं लड्डू वितरित किये गये।