ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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11- मुस्लिम विवाह

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मुस्लिम विवाह

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मुस्लिम विवाह को निकाह कहते हैं; निकाह के लिए कोई विशेष मुहूर्त नहीं होता। दूल्हा तथा दुल्हन, दोनों की रजामंदी के बाद ही, निकाह जायज होता है। मुस्लिम विवाह मुख्यत: पांच दिनों का होता है।

रुक्का — इस रस्म में दूल्हे के घर वाले, दुल्हन के घर, एक रुक्का, मिठाई आदि लेकर जाते हैं। इस रुक्के पर दूल्हे के खानदान की तफसाील, उसकी नौकरी, तनखा, दूल्हे की उम्र आदि लिखी होती है। दूल्हे के पिता, इसे दुल्हन के पिता को देते हैं, फिर इसे पढ़कर सभी के बीच सुनाया जाता है।

तारीखें — दोनों खानदानों की रजामंदी के बाद, शादी की तारीखें तय की जाती हैं। दुल्हन के घर, दूल्हे के रिश्तेदारों की दावत की जाती है। इस रस्म में दूल्हा, दुल्हन के घर नहीं जाता; सिर्पघर के बड़े जाते हैं एवं साथ में प्राय: दुल्हन की हल्दी का जोड़ा, तारीख का लाल दुपट्टा, फल एवं मिठाई लेकर जाते हैं।

मेंहदी — यह रस्म शादी के एक दिन पहले, दुल्हन के घर पर होती है, जिसमें दुल्हन के हाथों व पैरों में मेंहदी लगाई जाती है और सदका किया जाता है ; गरीबों में पैसे, कपड़े बाँटने को सदका कहते हैं। इस रात दुल्हन तथा दूल्हे के घर के लोग, अपने—अपने घरों पर उबटना खेलते हैं, यह सब माहौल को खुशनुमा बनाने के लिए होता है।

निकाह — निकाह या तो मस्जिद में या दूल्हा—दुल्हन किसी के भी घर, जहां सहूलियत हो, किया जा सकता है। निकाह, काजी करवाते हैं। निकाह में एक वकील और दो गवाह बनाए जाते हैं। निकाह में काजी कुरान शरीफ. की कुछ आयतें पढ़ते हैं, निकाहनामें पर दस्तखत के बाद खुदवा दिया जाता है कि दूल्हा—दुल्हन अपनी मर्जी से निकाह कबूल कर रहे हैं। इसके बाद शादी पूरी होती है। दोनों अपने से बड़ों को सलाम कर उनकी दुआएं लेते हैं। उन्हें मुबारकबाद दी जाती है।

निकाहनामा — काजियात का एक जरुरी दस्तावेज होता है जिस पर दूल्हा—दुल्हन के अलावा काजी, वकील, दो गवाहों के दस्तखत होते हैं और कजियात की सील होती है। यह दस्तावेज निकाह के बाद कजियात में जमा करा दिया जाता है। शरियत में दहेज की माँग करना जायज नहीं है, शरियत के अनुसार मेहर तय किया जाता है। मेहर उस रकम को कहते हैं जो दूल्हे की तरफ से दुल्हन को अदा की जानी होती है ; मेहर की अदायगी पूरी तरह दुल्हन की मर्जी पर होती है, चाहे तो उसे ले या माफ कर दे, इस पर पूरी तरह दुल्हन का हक होता है।

दिगाना रुकाई — दूल्हे के घर वाले, बारात लेकर, दुल्हन के घर पहुँचते हैं, तो उन्हें अंदर से आने से रोका जाता है, इसे दिगाना रुकाई कहते हैं। दुल्हन के छोटे भाई—बहन, नेग लेकर बारात को अंदर आने देते हैं। इस दिन, दुल्हन के पिता की तरफ से सबकी दावत रखी जाती है और बहुत अच्छे से मेहमान—नवाजी की जाती है।

रुक्सत — दुल्हन की अपने पिता के घर से विदाई को रुक्सत कहा जाता है। दूल्हे के घर पहुंचने पर दुल्हन का स्वागत किया जाता है। और दुआएं दी जाती हैं।

वलीमा — दूल्हे की तरफ से की जाने वाली दावत को वलीमा कहते हैं। इसमें दोनों तरफ के रिश्तेदार शामिल होते हैं। दूल्हा—दुल्हन वलीमे के दिन, अपने से बड़ों को सलाम कर, उनका आशीर्वाद लेते हैं। लड़के वालों को वलीमा करना जरूरी होता है।

चौथी — निकाह के चौथे दिन दुल्हन अपने माता—पिता के घर जाती है। जब दूल्हा—दुल्हन को लेने जाता है, जो जूता छुपाई की रस्म की जाती है।

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