ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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11.भगवानश्रेयांसनाथ वन्दना

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श्री श्रेयांसनाथ वन्दना

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अडिल्लछंद


श्री श्रेयांस जिन मुक्ति रमा के नाथ हैं।

त्रिभुवन पति से वंद्य त्रिजग के नाथ हैं।।

गणधर गुरु भी नमें नमाकर शीश को।

मैं भी रुचि से नमूँ नमाऊँ शीश को।।१।।

-नरेंद्र छंद-

चिन्मय ज्योति चिदंबर चेतन, चिच्चैतन्य सुधाकर।

जय जय चिन्मूरति चिंतामणि, चिंतितप्रद रत्नाकर।।

आप अलौकिक कल्पवृक्ष प्रभु, मुंह मांगा फल देते।

आप भक्त चक्री सुरपति, तीर्थंकर पद पा लेते।।२।।

जो तुम चरण सरोरुह पूजें, जग में पूजा पावें।

जो जन तुमको चित में ध्याते, सब जन उनको ध्यावें।।

जो तुम वचन सुधारस पीते, सब उनके वच पालें।

जो तुम आज्ञा पालें भविजन, उन आज्ञा नहिं टालें।।३।।

जो तुम सन्मुख भक्ति भाव से, नृत्य करें हर्षित हों।
 
तांडव नृत्य करें उन आगे, सुरपति भी प्रमुदित हों।।

जो तुम गुण को नित्य उचरते, भवि उनके गुण गाते।

जो तुम सुयश सदा विस्तारें, वे जग में यश पाते।।४।।

मन से भक्ति करें जो भविजन, वे मन निर्मल करते।

वचनों से स्तुति को पढ़कर, वचन सिद्धि को वरते।।

काया से अंजलि प्रणमन कर, तन का रोग नशाते।

त्रिकरण शुचि से वंदन करके, कर्म कलंक नशाते।।५।।

कुंथु आदि गण ईश सतत्तर, सात ऋद्धि के धारी।
 
मुनि निग्र्रंथ सहस चौरासी, सातभेद गुणधारी।।

प्रमुख धारणा आदि आर्यिका, बीस सहस इक लक्षा।

दोय लाख श्रावक व श्राविका, चार लाख गुणदक्षा।।६।।

आयु चुरासी लाख वर्ष की, अस्सी धनुष तनू है।

तप्त स्वर्ण छवि तनु अतिसुंदर, गेंडा चिन्ह सहित हैं।।

प्रभु श्रेयांस विश्व श्रेयस्कर, त्रिभुवन मंगलकारी।

प्रभु तुम नाम मंत्र ही जग में, सकल अमंगलहारी।।७।।

बहु विध तुम यश आगम वर्णे, श्रवण किया मैं जब से।

तुम चरणों में प्रीति लगी है, शरण लिया मैं तब से।।

प्रभु श्रेयांस! कृपा ऐसी अब, मुझ पर तुरतहिं कीजे।
 
सम्यग्ज्ञानमती लक्ष्मी को, देकर निजसम कीजे।।८।।

दोहा- परमश्रेष्ठ श्रेयांस जिन, पंचकल्याणक ईश।

नमूँ नमूँ तुमको सदा, श्रद्धा से नत शीश।।९।।