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11.लेश्यामार्गणा अधिकार

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लेश्यामार्गणा अधिकार

अथ लेश्यामार्गणाधिकार:

संप्रति लेश्यामार्गणायां षट्लेश्यावतां स्वामित्वकथनाय सूत्रद्वयमवतार्यते-

लेस्साणुवादेण किण्हलेस्सिओ णीललेस्सिओ काउलेस्सिओ तेउलेस्सिओ पम्मलेस्सिओ सुक्कलेस्सिओ णाम कधं भवदि ?।।६०।।
ओदइएण भावेण।।६१।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-अत्र पूर्ववत् निक्षेपान् आश्रित्य चालना प्ररूपयितव्या। अत्र नोआगमभाव-लेश्यायाः अधिकारः। औदयिकेन भावेन जीवाः कृष्णादिलेश्यावन्तो भवन्ति। उदयागतानां कषायानुभाग-स्पर्धकानां जघन्यस्पर्धकप्रभृति यावत् उत्कृष्टस्पर्धकपर्यंतस्थापितानां षड्भागविभक्तानां प्रथमभागः मंदतमः, तदुदयेन उत्पन्नकषायः शुक्ललेश्या भवति। द्वितीयभागः मंदतरः, तदुदयेन जातकषायः पद्मलेश्या नाम। तृतीयो भागः मंदः, तदुदयेन जातकषायः तेजोलेश्या नाम। चतुर्थभागः तीव्रः, तदुदयेन जातकषायः कापोतलेश्या नाम। पंचमभागस्तीव्रतर:, तदुदयेन जातकषाय: नीललेश्या नाम। षष्ठभागस्तीव्रतमः, तदुदयेन जातकषायः कृष्णलेश्या नाम। येनैताः षडपि लेश्याः कषायाणामुदयेन भवन्ति तेनौदयिकाः ज्ञातव्याः।
यदि कषायोदयेन लेश्याः उच्यन्ते तर्हि क्षीणकषायाणां लेश्याभावः प्रसज्यते ?
सत्यमेतत् , यदि कषायोदयादेव लेश्योत्पत्तिरिष्येत। किंतु शरीरनामकर्मोदयजनितयोगोऽपि लेश्या इति इष्यते, कर्मबंधनिमित्तत्वात्। तेन कषाये विनष्टेऽपि योगोऽस्ति इति क्षीणकषायाणां सलेश्यत्वं न विरुध्यते।
यदि बंधकारणानां लेश्यत्वं उच्यते तर्हि प्रमादस्यापि लेश्यत्वं किन्न इष्यते ?
न, तस्य कषायेष्वन्तर्भावात्।
असंयमस्य किन्नेष्यते ?
न, तस्यापि लेश्याकर्मणि अन्तर्भावात्।
मिथ्यात्वस्य किन्नेष्यते ?
भवतु तस्य लेश्याव्यपदेशः, विरोधाभावात्। किंतु कषायाणां चैवात्र प्रधानत्वं हिंसादिलेश्याकर्मकारणात्, शेषेषु बंधकारणेषु तदभावात्।
अलेश्यावन्तो जीवाः कथं भवन्तीति प्रश्नोत्तररूपेण सूत्रद्वयमवतार्यते-
अलेस्सिओ णाम कधं भवदि ?।।६२।।
खइयाए लद्धीए।।६३।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्रयोरर्थः सुगमः। लेश्यायाः कारणभूतकर्मणां क्षयेण उत्पन्नजीवपरिणामः क्षायिका लब्धिः, तया लब्ध्या जीवः अलेश्यिको भवति। इदमेव सूूत्रस्य तात्पर्यं। शरीरनामकर्मसत्त्वस्य अस्तित्वं प्रतीत्य क्षायिकत्वं न विरुध्यते, तस्य क्षायिकभावस्य शरीरनामकर्मणः तन्त्रत्वाभावात्।
एवं लेश्यामार्गणायां स्वामित्वप्रतिपादनत्वेन सूत्रचतुष्टयं गतं।
इति श्री षट्खण्डागमग्रन्थे द्वितीयखण्डे प्रथमे महाधिकारे सिद्धांतचिंतामणिटीकायां लेश्यामार्गणानाम दशमोऽधिकार: समाप्त:।

अथ लेश्यामार्गणा अधिकार

अब लेश्यामार्गणा में छहों लेश्या वालों का स्वामित्व बतलाने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

लेश्यामार्गणानुसार जीव कृष्णलेश्या, नीललेश्या, कापोतलेश्या, तेजोलेश्या, पद्मलेश्या और शुक्ललेश्या वाले किस कारण से होते हैं ?।।६०।।

औदायिक भाव से जीव कृष्ण आदि लेश्या वाले होते हैं।।६१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-यहाँ पूर्व के समान निक्षेपों का अवलम्बन लेकर कथन करना चाहिए। यहाँ नोआगम भावलेश्या का अधिकार है। औदयिक भाव के द्वारा जीव कृष्णादि लेश्या से समन्वित होते हैं। कषायसंबंधी अनुभाग जघन्य स्पर्धक से लेकर उत्कृष्ट स्पर्धकपर्यंत स्थापित छह भागों में विभक्त उदय में आए हुए स्पर्धकों का प्रथम भाग मंदतम होता है और उसके उदय से उत्पन्न कषाय शुक्ललेश्या है। दूसरा भाग मन्दतर कषायानुभाग का है, उसके उदय से उत्पन्न कषाय पद्मलेश्या है। तृतीय भाग मंद कषायानुभाग का है, उसके उदय से उत्पन्न हुई कषाय तेजोलेश्या है। चतुर्थ भाग तीव्र कषायानुभाग का है और उसके उदय से उत्पन्न हुई कषाय कापोतलेश्या है। पाँचवाँ भाग तीव्रतर कषायानुभाग का है, उसके उदय से उत्पन्न हुई कषाय का नीललेश्या है। छठवाँ भाग तीव्रतम कषायानुभाग है उससे उत्पन्न कषाय कृष्णलेश्या है। चूँकि ये छहों ही लेश्याएं कषायों के उदय से होती हैं, इसलिए वे औदयिक हैं, ऐसा जानना चाहिए।

शंका-यदि कषायों के उदय से लेश्याएँ कही जाती हैं, तो बारहवें गुणस्थानवर्ती क्षीणकषाय जीवों के लेश्या के अभाव का प्रसंग आता है ?

समाधान-सचमुच ही क्षीणकषाय जीवों में लेश्या के अभाव का प्रसंग आता, यदि केवल कषायोदय से ही लेश्या की उत्पत्ति मानी जाती। किन्तु शरीर नामकर्म के उदय से उत्पन्न योग भी लेश्या है यह स्वीकार किया जाता है, क्योंकि वह भी कर्म के बंध में निमित्त होता है। इस कारण कषाय के नष्ट हो जाने पर भी चूँकि योग रहता है इसलिए क्षीणकषाय जीवों को लेश्यासहित मानने में कोई विरोध नहीं आता है।

शंका-यदि बंध के कारणों को लेश्यारूप कहा जाता है, तो प्रमाद को भी लेश्यारूप क्यों नहीं स्वीकार किया जाता है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि प्रमाद का कषायोें में अन्तर्भाव हो जाता है।

शंका-असंयम को भी लेश्याभाव क्यों नहीं माना जाता है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि असंयम का भी लेश्याकर्म में अन्तर्भाव हो जाता है।

शंका-मिथ्यात्व को लेश्यारूप क्यों नहीं स्वीकार किया जाता है ?

समाधान-मिथ्यात्व की लेश्या संज्ञा होवे, क्योंकि ऐसा स्वीकार करने में कोई विरोध नहीं आता है। किन्तु यहाँ कषायों की ही प्रधानता है, क्योंकि कषाय ही हिंसा आदिरूप लेश्याकर्म के कारण हैं और अन्य बंधकारणों में उनका अभाव है।

अब लेश्यारहित जीव कैसे होते हैं ? इस प्रकार प्रश्नोत्तररूप से दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

जीव अलेश्यिक-लेश्यारहित कैसे होते हैं ?।।६२।।

क्षायिक लब्धि से जीव अलेश्यिक-लेश्यारहित होते हैं।।६३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त दोनों सूत्रों का अर्थ सुगम है। लेश्या के कारणभूत कर्मों के क्षय से उत्पन्न हुए जीव परिणाम को क्षायिक लब्धि कहते हैं, उसी क्षायिक लब्धि से जीव अलेश्यिक-लेश्यारहित होता है। यही सूत्र का तात्पर्य है।

शरीरनामकर्म की सत्ता का होना क्षायिकत्व के विरुद्ध नहीं है, क्योंकि क्षायिक भाव शरीर नामकर्म के आधीन नहीं है।

इस प्रकार लेश्यामार्गणा में स्वामित्व का प्रतिपादन करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ के द्वितीय खण्ड में प्रथम महाधिकार की सिद्धान्तचिंतामणिटीका लेश्यामार्गणा नाम का दशवाँ अधिकार समाप्त हुआ।