ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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11.लेश्या मार्गणा अधिकार

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लेश्या मार्गणा अधिकार

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अथ लेश्यामार्गणाधिकार:

अथ द्वाभ्यामन्तरस्थलाभ्यां षट्सूत्रैः लेश्यामार्गणानाम दशमोऽधिकारः प्रारभ्यते। तत्र प्रथमस्थले त्रिकाशुभलेश्यानाम् कालकथनमुख्यत्वेन ‘‘लेस्साणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। ततः परं द्वितीयस्थले त्रिकशुभ-लेश्यास्थितिकथनप्रकारेण ‘‘तेउलेस्सिय-’’ इत्यादिना त्रीणि सूत्राणि इति समुदायपातनिका।
इदानीं कृष्णादिलेश्यानां कालप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
लेस्साणुवादेण किण्हलेस्सिय-णीललेस्सिय-काउलेस्सिया केवचिरं कालादो होंति ?।।१७७।।
जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।१७८।।
उक्कस्सेण तेत्तीस-सत्तारस-सत्तसागरोवमाणि सादिरेयाणि।।१७९।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-अनर्पितलेश्यायाः अविरुद्धायाः अर्पितलेश्यामागत्य सर्वजघन्यमन्तर्मुहूर्तं स्थित्वा अविरुद्धलेश्यान्तरं गतस्तस्य जघन्यकालः कथितः। उत्कर्षेण तिर्यक्षु मनुष्येषु वा कृष्ण-नील-कापोतलेश्याभिः सर्वोत्कृष्टमन्तर्मुहूर्तं स्थित्वा पुनः त्रयस्त्रिंशत्-सप्तदश-सप्तसागरोपमायुःस्थितिकेषु नारकेषु उत्पद्य कृष्णनील-कापोतलेश्याभिः सह स्वस्वात्मनः आयुःस्थितिं स्थित्वा तत्तो निर्गत्यान्तर्मुहूर्तकालं ताभिश्चैव लेश्याभिः गमयित्वा अविरुद्धलेश्यान्तरं गतस्य द्वाभ्यामन्तर्मुहूर्ताभ्यां समधिकत्रयस्त्रिंशत्-सप्तदश-सप्तसागरोपममात्र- त्रिकलेश्याकालोपलंभात्।
एवं प्रथमस्थले कृष्णाद्यशुभलेश्याकालप्रतिपादनत्वेन सूत्रत्रयं गतं।
अधुना तेजोलेश्यादिशुभलेश्यास्थितिप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
तेउलेस्सिय-पम्मलेस्सिय-सुक्कलेस्सिया केवचिरं कालादो होंति ?।।१८०।।
जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।१८१।।
उक्कस्सेण बे-अट्ठारस-तेत्तीस-सागरोवमाणि सादिरेयाणि।।१८२।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-तेजो-पद्म-शुक्ललेश्याभिः सर्वोत्कृष्टमन्तर्मुहूर्तमात्रं स्थित्वा पुनः यथाक्रमेण सार्धद्वय-सार्धाष्टादश-त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमायुः स्थितिकेषु देवेषूत्पद्यावस्थितलेश्याभिःस्वकस्वकायुः स्थिति-मनुपाल्य तत्तः च्युत्वान्तर्मुहूर्तकालं ताभिश्चैव लेश्याभिः स्थित्वा अविरुद्धलेश्यान्तरं गतस्य स्वकस्वकोत्कृष्टकाल उपलभ्यते ।
एवं द्वितीयस्थले शुभलेश्यास्थितिकथनमुख्यत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे एकजीवापेक्षया कालानुगमे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां लेश्यामार्गणानाम दशमोऽधिकारः समाप्तः।

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अथ लेश्यामार्गणा अधिकार प्रारंभ

अब दो अन्तरस्थलों में छह सूत्रों के द्वारा लेश्यामार्गणा नाम का दशवाँ अधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथम स्थल में तीन अशुभ लेश्याओं के काल कथन की मुख्यता से ‘‘लेस्साणुवादेण’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं, उसके पश्चात् द्वितीय स्थल में तीन शुभ लेश्याओं की स्थिति का कथन करने वाले ‘‘तेउलेस्सिय’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

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अब यहाँ कृष्णादि लेश्याओं का प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

लेश्यामार्गणानुसार जीव कृष्णलेश्या, नीललेश्या व कापोतलेश्या वाले कितने काल तक रहते हैं ?।।१७७।।

जघन्य से अन्तर्मुहूर्तकाल तक जीव कृष्णलेश्या, नीललेश्या व कापोतलेश्या वाले रहते हैं।।१७८।।

उत्कृष्ट से कुछ अधिक तेतीस सागर, कुछ अधिक सत्तरह सागर व कुछ अधिक सात सागरोपम काल तक जीव कृष्ण नील व कापोत लेश्या वाले रहते हैं।।१७९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अविवक्षित अविरुद्ध लेश्या से विवक्षित लेश्या में आकर सबसे कम अन्तर्मुहूर्त काल तक रहकर अन्य अविरुद्ध लेश्या में जाने वाले जीव के उक्त लेश्याओं का जघन्यकाल प्राप्त होता है। उत्कृष्ट से तिर्यंचों या मनुष्यों में कृष्ण, नील व कापोतलेश्या सहित सबसे अधिक अन्तर्मुहूर्त काल रहकर फिर तेतीस, सत्तरह व सात सागरोपम आयु स्थिति वाले नारकियों में उत्पन्न होकर कृष्ण, नील व कापोत लेश्याओं के साथ अपनी-अपनी आयु स्थिति प्रमाण काल तक रहकर वहाँ से निकलकर अन्तर्मुहूर्त काल उन्हीं लेश्याओं सहित व्यतीत किया, वहाँ अन्य अविरुद्ध लेश्या में गये हुए जीव के उक्त तीन लेश्याओं का दो अन्तर्मुहूर्त सहित क्रमश: तेतीस, सत्तरह व सात सागरोपमप्रमाण काल पाया जाता है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में कृष्ण आदि अशुभ लेश्याओं का कथन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब तेजोलेश्या आदि शुभ लेश्याओं की स्थिति का प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

जीव पीतलेश्या, पद्मलेश्या व शुक्ललेश्या वाले कितने काल तक रहते हैं ?।।१८०।।

जघन्य से अन्तर्मुहूर्त काल तक जीव पीत, पद्म व शुक्ल लेश्या वाले रहते हैं।।१८१।।

उत्कृष्ट से कुछ अधिक दो सागर, कुछ अधिक अठारह सागर व कुछ अधिक तेतीस सागरोपम काल तक जीव क्रमश: पीत, पद्म व शुक्ल लेश्या वाले रहते हैं।।१८२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-तेज (पीत), पद्म और शुक्ल लेश्याओं सहित सर्वोत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्तमात्र काल तक रहकर पुन: यथाक्रम से ढाई हजार, साढ़े अठारह सागर व तेतीस सागरोपम आयुस्थिति वाले देवों में उत्पन्न हुआ, वहाँ अवस्थित लेश्याओं सहित अपनी-अपनी आयुस्थिति को व्यतीत करके वहाँ से च्युत होकर अन्तर्मुहूर्त काल तक उन्हीं लेश्याओं सहित रहकर अन्य अविरुद्ध लेश्या में गये हुए जीव के उक्त लेश्याओं का अपना-अपना उत्कृष्ट काल प्राप्त हो जाता है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में शुभ लेश्याओें का कथन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए। इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नामक द्वितीय खण्ड में एक जीव की अपेक्षा कालानुगम प्रकरण में गणिनी आर्यिका ज्ञानमती माताजी विरचित सिद्धान्तचिंतामणि-टीका में लेश्यामार्गणा नाम का दशवाँ अधिकार समाप्त हुआ।