ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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11. राम—रावण का युद्ध

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राम—रावण का युद्ध

(१०५)

इस तरह सभी चलते—चलते, थे हंसदीप में पहुँच गये।
थी उन्हें प्रतीक्षा भामंडल की, अत: वहीं पर ठहर गये।।
शत्रू की सेना निकट देख, रावण भी उठकर खड़े हुए।

बुलवाया सब राजाओं को, रण चलने के आदेश दिये।।
(१०६)

चलने को उद्यत रावण को, आ गये विभीषण समझाने।
पर जिद में अपनी अड़े रहे, वो कोई बात नहीं माने।।
बातों के ऐसे तीर चले, घायल हो गये विभीषण थे।

तब रोक न पाये वे खुद को, चल दिये राम के चरणन में।।
(१०७)

वे हंसद्वीप में जा करके, श्रीराम निकट चल दिए स्वयं।
जब खबर लगी ये रघुवर को, शंका में डूब गया था मन।।
लगता है इसमें रावण की कोई, चाल नई हो सकती है।

पर तभी एक मंत्री बोला, दोनों भाई में ना पटती है।।
(१०८)

हे नाथ! सुना है हमने भी, ये धर्ममार्ग के ज्ञाता हैं ।
ऐसे प्राणी न रखते हैं, पापी लोगों से नाता है।।
इस तरह चली इन बातों में, हनुमान राम से बोल पड़े।

अब संशय को तजिये स्वामिन्! ये शब्द ज्ञान के घोल उठे।।
(१०९)

भ्रम का आवरण हटा करके, रघुवर ने फिर अगवानी की।
गिर पड़े विभीषण चरणों में, अरु उनने मंगलवानी की।।
इस भव के आप मेरे स्वामी!, अगले भव के जिन राज प्रभु।

लंकाधिराज बनवा दूँगा, यह वचन दिया तब राम प्रभु।।
(११०)

दश—बीस नहीं वे तीस—तीस, अक्षौहिणी प्रमाण सेना लाये।
आ गये तभी भामंडल भी, वे भी विशाल सेना लाये।।
सब मिलकर पहुँच गये लंका, वहाँ युद्धभूमि निर्धारित की।

रावण ने जब प्रस्थान किया, तब दुखी हुर्इं महारानी जी।।
(१११)

वे चली पती को समझाने, पर असफल सभी प्रयास हुए।
उस समय दिखे थे शगुन बुरे, पर हठ के आगे हार गए।।
जिस समय चले थे लंका से, संग साढ़े चार करोड़ युवक ।

रावण के भ्राता कुम्भकर्ण, अरु बेटे दोनों वहाँ प्रमुख।।
(११२)

हो गया युद्ध प्रारंभ और, शस्त्रों के भीषण वार चले।
जब इंद्रजीत के वरुण अस्त्र से, थी भीषण जलधार चले।।
सुग्रीव चलाकर पवनबाण, मेघों को उड़ा हवाओं में ।

तब क्रोधित होकर चले, मेघ—वाहन के बाण फिजाओं में।।
(११३)

आग्नेय अस्त्र से जली अगन, नभ में धू—धूकर अग्नि जली।
तब हनूमान के वरुण अस्त्र से, नभ टकराये वृष्टि हुई।।
इस तरह कई दिन चला युद्ध, भीषण नर का संहार हुआ।

पर जीत—हार का नाम नहीं, रावण सुत ने तब वार किया।।
(११४)

सुग्रीव और भामंडल को था, नागपाश से जकड़ लिया।
निश्चेष्ट देख उन दोनों को, श्री राम ने तब स्मरण किया।।
मुनियों का कर उपसर्ग दूर, हमने जो भी वर पाया था।

स्मरण करो अब हे लक्ष्मण!, गरुड़ेन्द्र वहाँ जो आया था।।
(११५)

आसन कंपित हो गया तभी, गरुड़ेन्द्र जानकर सब बातें।
भेजा इक देव राम सम्मुख, वे दिव्य अस्त्र लेकर आते।।
सब तरह—तरह के अस्त्र—शस्त्र, विद्याएँ और गदाएँ दीं।

दोनों भाई ने फिर उनको,सम्मानित किया दुआएँ दी।।
(११६)

सब शस्त्रों की पूजा करके, वे दोनों भाई चले वहाँ।
सुग्रीव और भामंडल दोनों, वीर पड़े निश्चेष्ट जहाँ।।
जा करके वंधनमुक्त किया, वे विस्मययुत हो देख रहे।

ये दिव्य अस्त्र और ये वैभव, ये सब कैसे और कहाँ मिले।।
(११७)

बतलाया रामचंद्र ने तब, ये गुरुभक्ती फल हमें मिला।
जब चले अयोध्या से हम सब, तब रस्ते में मुनिसंघ मिला।।
इक देव अग्निप्रभु पूर्ववैरवश, उपसर्ग कर रहा था भारी ।

दोनों मुनिवर थे कुलभूषण—देशभूषण बन गये जगहारी ।।
(११८)

कुछ पल के लिये सभी राजा, भक्तिरस में थे डूब गये।
रघुवर की बड़ी प्रशंसा की, दुख—सुख अपने सब भूल गये।।
पुनरपि सब चले युद्ध करने, रावणसुत को था बाँध लिया।

तब क्रोधित होकर रावण ने, भरपूर शक्ति का वार किया।।
(११९)

वह शक्ति विभीषण के सम्मुख, आती देखा हो गये खड़े ।
लक्ष्मण को आकर शक्ति लगी, मूच्र्छित होकर वे वहीं गिरे।।
यह देख राम हो तीव्र दुखी, रावण पर छह—छह वार किए।

पर अंतसमय न आया था, अत: असफल सभी प्रयास हुए।।
(१२०)

बोले तब रघुवर रावण से, कुछ पुण्य उदय से हे राजन।
रक्षित हैं तेरे प्राण अभी, अब कहता हूँ जो आगे सुन ।।
मेरा भाई मरणोन्मुख है, आज्ञा दे तो कर लूँ दर्शन।

रावण प्रसन्न होकर बोला, जाकर कर लो अंतिम दर्शन।।
(१२१)

उस युद्धभूमि में सबने मिल, फिर चारों तरफ सफाई की ।
तंबू का शिविर लगा करके, सबने मिल पहरेदारी की ।।
लक्ष्मण की हालत देख—देख, रघुवर ने करुण विलाप किया।

अब जीवित मुझे नहां रहना, गर तुमने नहीं प्रलाप किया।।
(१२२)

रघुवर ने कहा सुनो मित्रों, इतना ही साथ हमारा था।
उपकार सभी का कर दूँगा, यह कोरा ख्याल हमारा था ।।
अब चिता जला दो जिससे मैं, भाई संग अंतिमधाम चलूँ।

जिसने सुखदुख मे साथ दिया, उसके बिन क्यों मैं यहाँ रहूँ ।।
(१२३)

तब कहा सभी ने रघुवर से, ऐसी बातें मन लाते हो।
नारायण है लक्ष्मण भाई, क्यों उसको मृतक बताते हो?।।
सूर्योदय से पहले—पहले, इसका उपाय करना चाहिए।

इसलिए सभी को दुख तज के, मन में धीरज धरना चाहिए।।
(१२४)

और तभी हुआ आश्चर्य सुनों, इक व्यक्ति अपरिचित आया था।
पूछा जब तेरा प्रयोजन क्या, तब अपना हाल बताया था।।
ऐसी ही शक्ती से घायल, होकर मैं गिरा अयोध्या में।

तब भरतराज ने जीवित कर, उपकार किया था पलभर में।।
(१२५)

वह चंदन मिश्रित दिव्य सुजल, राजा की कन्या का जल है।
वह द्रोणमेघ नामक राजा की, सुता विशल्या निर्मल है।।
उसके स्नान किये जल से, सब रोगशोक मिट जाते हैं।

इतना सुनते ही हनूमान,फौरन विमान से जाते हैं।।
(१२६)

जब हाल सुना भरतेश्वर ने, मूच्र्छित होकर गिर पड़े वहीं।
होकर सचेत भेजा माँ को, वह द्रोणमेघ घर गयी तभी।।
सब बातें सुनकर वे बोले, इसका जल क्या ले जायेगी।

ये तो लक्ष्मण के लिए बनी, ये साथ आपके जायेगी।।
(१२७)

ऐसा मुनिवर ने बतलाया, ये बात न होती झूठी है।
किसका वर कौन कहाँ होगा, घर में न रहे कोई बेटी है।।
लेकरके चले विशल्या को, सबने उसका सम्मान किया।

जैसे जैसे पग बढ़ते थे, उस शक्ती ने प्रस्थान किया।।
(१२८)

वह शक्ति नाम की विद्या जब, लक्ष्मण के सीने से निकली।
हनुमन ने उसे पकड़ पूछा, तू कौन तभी वह थी बोली।।
वैलाशगिरी पर रावण ने, एक बार गजब ये ढाया था।

अपने हाथों की नसें खांच, वीणा रच भक्ति रचाया था।।
(१२९)

धरणेन्द्रराज ने खुश होकर, मेरे जैसी अजेय विद्या ।
रावण को दी जिससे उसको, कोई भी हरा नहीं सकता ।।
बस केवल एक विशल्या है, जिसके आगे मै रुक न सकी।

यह सुनकर हनुमान बोले, वैâसे तुममें आई शक्ती ।।
(१३०)

सुनिए पिछले भव में इसने, निजतन से ऐसी ईष्र्या की ।
जंगल में तीन हजार वर्ष तक, रहकर घोर तपस्या की ।।
जिसके फल से हैं चकित सभी, मैंने भी घुटने टेके हैं।

ये तो संजीवन बूटी हैं, इनके आगे सब फीके हैं।।
(१३१)

श्री रामचन्द्र की आज्ञा ले अब किया विलेपन चंदन का ।
स्पर्श नहीं वह जादू था, और कमाल उन कंगन का ।।
वाद्यों की मधुर ध्वनी करके, निद्रा से उन्हें जगाया था।

भ्राता को उठते देख राम, हर्षित हो गले लगाया था।।
(१३२)

वो रावण कहाँ गया भाई, उठते ही पूछा लक्ष्मण ने।
सारी बातें तब बतलाई, वह बैठा होगा महलन में।।
जिसने नवजीवन तुम्हें दिया, वह भाग्यवान सुकुमारी है।

इसको स्वीकार करो भाई, क्या बोलो राय तुम्हारी है?।।
(१३३)

लक्ष्मण ने कहा यहाँ रण में, जहाँ प्राणों का कुछ पता नहीं।
ऐसे में कैसे ब्याह करूँ, शुभ कार्य है कोई सजा नहीं।।
लेकिन भ्राता की आज्ञावश, स्वीकृति में सिर था झुका लिया।

और युद्धभूमि में ही पूरे, वैभव से उनका ब्याह किया।।
(१३४)

उसक्षण रणभूमी की शोभा, लगती कितनी मनभावन थी।
नूपुर की ध्वनी लगी बजने, हर घटा वहां की सावन थी।।
देखा जब रूप विशल्या का, मुस्कान अधर पर खिल आयी।

रणभूमि लगी थी उपवन सी, हर कलियाँ—कलियाँ मुस्कायीं ।।