ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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12- विवाह संस्था-वैश्विक चिंतन एवं विकास

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विवाह संस्था-वैश्विक चिंतन एवं विकास

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विवाह संस्था ने वैश्विक स्तर पर आत्मिक ऐक्य के अवबोध से जन—जन को परिचित तो कराया ही है, वैश्विक समाज को एक नई व्यवस्था प्रणाली से परिचित भी कराया है, व्यक्ति के व्यवहार की दिशा को नया आधार दिया है, मानवीय अभिप्रेरणाओं के पवित्रीकरण के निमित्त नई दिशा दी है और सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण; स्त्री—पुरुष के पारस्परिक प्रेम को नैतिक दिशा देकर, सामाजिक मंगल एवं समरसता की नई इबारत लिखने का साहसिक यत्न भी किया है, जिससे मानवीय इयत्ता को एक नया आकार मिला है। मनुष्य की मनुजत्व संप्राप्ति की यात्रा को प्रवृत्त विवाह संस्था, काल के अपरिमित, अनवरत बहाव के गूंजते अनहद नाद से उर्जस्वित हो, सामाजिक अभ्युदय के जाग्रत स्पंदनों में स्पूर्त होती हुई, एक युगपत चिंतन की परिपक्व और समेकित प्रस्तुति करती है, जिसके कतिपय प्रेरक बिंब, अधोवर्णित हैं—

प्रख्यात चिंतन एवं दार्शनिक कन्फ्यूशियस ने विवाह को दो विभिन्न नामों और पहचान के धारकों के सहज—सरस युग्म के रूप में आख्यायित किया है, जो प्रेम तथा मैत्री से अभिप्रवृत्त होते हैं एवं जिनका उद्देश्य, प्राचीन परम्पराओं, धार्मिक रीति—रिवाजों के संबलन को संबोधित होता है। विख्यात् इतिहासकार, दर्शर्नावद् एवं साहित्यवेत्ता थामस द क्विंसी ने विवाह को दो व्यक्तियों के एक ऐसे यौगोलिक जीवन के रूप में चिह्नित किया है, जिसमें पूर्ण तारतम्यता रहती है और जो वाह्यजगत की अपेक्षा से स्वतंत्र रहते हैं।

चिंतन प्रक्रिया के विकास के क्रम में सामाजिक अधिकारों एवं दायित्वों की मीमांसा विभिन्न संस्कृतियों में की गई है, जिसके कुछ बिंब अधोलिखित परिभाषाओं में लक्षित होते हैं— सुविख्यात नृतत्व विज्ञानी एडवर्ड वेस्टरमार्व ने वर्ष १९२१ में प्रकाशित अपनी पुस्तक द हिस्ट्री ऑफ ह्यूमन मैरेज में विवाह के मूल में उच्छृंखलता के नियमन के निमित्त एक पत्नी व्रती होने तथा बच्चों की उचित परवरिश की सुनिश्चित व्यवस्था को रेखांकित किया है तो १९५१ में प्रकाशित पुस्तक, नोट्स एण्ड क्वेरीज में संतान की वैधानिकता को विवाह के प्रभावी कारक के रूप में भी इंगित किया गयाहै।

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पाश्चात्य समाज में जहाँ मेसेपोटोमिया साम्राज्य में सभ्यता और संस्कृति के उत्कर्षशील अध्याय का अथ हुआ, वहाँ हैम्मुरबी कोड में विवाह नियमों का सर्वप्रथम उल्लेख प्राप्त होता है, जिससे विवाह के नियमन द्वारा सामाजिक विन्यास के सशक्तीकरण के विषय में जानकारी मिलती है।

प्राचीन ग्रीक सभ्यता ने विवाह की निजता का सम्मान करते हुए इसे पुरुष और स्त्री की पारस्परिक सहमति के आधीन रखा और राजाज्ञा की परिधि से मुक्त कर, मानवीय स्वतंत्रता को रेखांकित किया। कुमारीत्व की अवधारणा को संबलित करने हेतु स्त्री की कम आयु और विशेषतया वैâशोर्यावस्था को वैवाहिक आयु के रूप में मान्यता दी गयी, जहाँ पुरुषों की आयु युद्धों में संलिप्तता के कारण बीस से तीस वर्ष के मध्य रहा करती थी। ग्रीक मान्यता के अनुसार शरद ऋतु और विशेषतया पूर्णचंद्र काल में आयोजित विवाह शुभ और अधिक मांगलिक होते थे।

रोमन सभ्यता में भी स्त्री और पुरुष की पारस्परिक सहमति विवाह का मुख्य आधार थी। पारंपरिक तौर पर कॉनवेंशियों इन मैनम विवाह में स्त्री के पैतृक परिवार से प्रदत्त होने वाले अधिकारों का स्वत: आहरण हो जाता था। पत्नी, पति की पारिवारिक सत्ता के आधीन होती थी। साइने मैनम; दूसरे प्रकार के विवाह की श्रेणी के अन्तर्गत थे, जिसमें पत्नी के पैतृक अधिकार कायम रहते थे, किन्तु पति प्रदत्त अधिकारों से वह वंचित रहती थी।

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क्रिश्चियन धर्म के प्रारंभिक काल (३०—३२५ ण्E) में विवाह की उत्सव—जन्य व्यवस्था नहीं थी, बल्कि विवाह व्यवस्था एक नितांत वैयक्तिक रूप में विद्यमान थी। छठीं शताब्दी में बहु—विवाह भी प्रचलित थे, किन्तु ये राज्य—सत्ता के विस्तार एवं कूट नीतिक कारणों के कारण ही प्रवृत्त होते थे। ऐसे कारणों से भारत में भी बहू—विवाह, सामंतों, श्रेष्ठियों तथा राज—परिवारों में हुआ करते थे। चौदहवीं सदी में राजाज्ञा के बिना विवाह करने की अनुमति नहीं थी। अपनी मर्जी से विवाह करने पर, कर की अदायगी करनी होती थी। पन्द्रह सौ पैंतालीस ई. में आपसी सहमति से विवाह प्रादुर्भूत हुए, जहां आपसी वायदा वबमिल कहलाता था, जो बिना किसी पुजारी या पादरी के पारस्परिक बंधन को अभिप्रवृत्त करता था।

वर्ष सत्रह सौ तिरेपन में ब्रिटेन में हार्डविक कानून ने विवाह में धार्मिक अनुष्ठानों एवं गवाहों की उपस्थिति को अनिवार्य तो किया ही; फ्लीट जेलों में हो रहे अनधिकृत विवाहों का समापन भी करा दिया। इस कानून की व्यवस्थाओं में, चर्च के पादरी के समक्ष, दो गवाहों की उपस्थिति में विवाह का निबंधन किया जाना अनिवार्य था। हालांकि यह कानून में, विवाह व्यवस्थाओं को और अधिक सशक्त किया गया एवंचर्च का महत्त्व उत्तरोत्तर बढ़ने लगा।

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वर्ष अठारह सौ पचहत्तर में जर्मनी में विवाह का एक परिवर्तित रूप उद्भूत हुआ, जिसमें असैनिक प्रशासन के एक लिपिक के समक्ष स्त्री तथा पुरुष दोनों ही, अपने वैवाहिक निर्णय की उद्घोषणा करते थे; तदनन्तर वैवाहिक वैधता सुनिश्चित होती थी। चीन में न्यूवा एवं पूजी ने सर्वप्रथम वैवाहिक नियमों का प्रतिपादन किया,जिसके अन्तर्गत एक पारिवारिक नाम के स्त्री—पुरुष के बीच विवाह निषिद्ध था, जो भारत के सगोत्र विवाह के नैषिध्य के समीप है।

सारांश रूप में देखें तो विश्व की प्रत्येक सभ्यता ने, विवाह की आवश्यकता को सामाजिक अपरिहार्यता के रूप में रेखांकित किया है।

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