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12.भव्यमार्गणा अधिकार

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भव्यमार्गणा अधिकार

अथ भव्यमार्गणाधिकार:

संप्रति भव्याभव्यजीवानां स्वामित्वप्रतिपादनाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-
भवियाणुवादेण भवसिद्धिओ अभवसिद्धिओ णाम कधं भवदि ?।।६४।।
पारिणामिएण भावेण।।६५।।
णेव भवसिद्धिओ णेव अभवसिद्धिओ णाम कधं भवदि ?।।६६।।
खइयाए लद्धीए।।६७।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-इमे भव्यजीवा अभव्यजीवाश्च पारिणामिकभावेन भवन्ति। भव्याभव्यत्वव्य-तिरिक्ताः ये जीवन्मुक्ताः सिद्धाश्च ते क्षायिकलब्धिभावेन इति ज्ञातव्यं।
एवं भव्यमार्गणायां स्वामित्वनिरूपणत्वेन सूत्रचतुष्टयं गतं।
इति श्री षट्खण्डागमग्रन्थे द्वितीयखण्डे प्रथमे महाधिकारे सिद्धांतचिंतामणिटीकायां भव्यमार्गणानाम एकादशोऽधिकार: समाप्त:।

अथ भव्यमार्गणा अधिकार

अब भव्य-अभव्य जीवों का स्वामित्व प्रतिपादन करने हेतु चार सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

भव्यमार्गणानुसार जीव भव्यसिद्धिक व अभव्यसिद्धिक किस कारण से होते हैं ?।।६४।।

पारिणामिक भाव से जीव भव्यसिद्धिक व अभव्यसिद्धिक होते हैं।।६५।।

जीव न भव्यसिद्धिक न अभव्यसिद्धिक किस कारण से होते हैं?।।६६।।

क्षायिक लब्धि से जीव न भव्यसिद्धिक न अभव्यसिद्धिक होते हैं।।६७।।

'सिद्धान्तचिंतामणिटीका-ये भव्य जीव और अभव्य जीव पारिणामिक भाव से होते हैं। भव्यत्व एवं अभव्यत्व से भिन्न जो जीवन्मुक्त-अरिहंत भगवान और सिद्ध भगवान हैं वे क्षायिकलब्धि से समन्वित होते हैं, ऐसा जानना चाहिए।

इस प्रकार भव्यमार्गणा में स्वामित्व का निरूपण करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ के द्वितीय खण्ड में प्रथम महाधिकार की सिद्धान्तचिंतामणिटीका में भव्यमार्गणा नाम का ग्यारहवाँ अधिकार समाप्त हुआ।