ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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12.भव्य मार्गणा अधिकार

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भव्य मार्गणा अधिकार

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अथ भव्यत्वमार्गणाधिकार:

अथ स्थलद्वयेन पंचभिः सूत्रैः भव्यमार्गणानाम एकादशोऽधिकारः कथ्यते । तत्र तावत्प्रथमस्थले भव्यजीवानां कालकथनमुख्यत्वेन ‘‘भवियाणुवादेण’’ इत्यादि सूत्रत्रयं। ततः परं द्वितीयस्थले अभव्यानां स्थितिनिरूपणत्वेन ‘‘अभविय-’’ इत्यादि सूत्रद्वयमिति पातनिका भवति।
इदानीं भव्यमार्गणायां भव्यजीवकालप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
भवियाणुवादेण भवसिद्धिया केवचिरं कालादो होंति ?।।१८३।।
अणादिओ सपज्जवसिदो।।१८४।।
सादिओ सपज्जवसिदो।।१८५।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-भव्यजीवाः अनादयः सान्ता:, अनादिस्वरूपेणागतस्य भव्यभावस्यायोगिचरम-समये विनाशोपलंभात्।
कश्चिदाह-अभव्यसमानोऽपि भव्यजीवोऽस्ति इति अनादिः अनन्तो भव्यभावः किन्न प्ररूपितः ?
आचार्यः समाधत्ते-नैतद् वक्तव्यं, तत्र-भव्यत्वे अविनाशशत्तेरभावात्। यद्यप्यनादितोऽनन्तकालपर्यन्तं स्थितिसहिताः भव्यजीवाः संति, तह्र्यपि तेषु शक्तिरूपेण संसारविनाशस्य संभावनाऽस्ति, न चाविनाशस्य।
अत्र भव्यत्वशत्तेरेवाधिकारो न च व्यत्तेरिति कथं ज्ञायते ?
अनादिसान्तसूत्रस्यान्यथानुपपत्तेः। अनेनैव ज्ञायतेऽत्र भव्यत्वशत्तेरेवाधिकारो न च व्यत्तेâरिति।
सादयः सान्ताश्च भव्यजीवाः संति।
कश्चिदाशंकते-अभव्यो भव्यत्वं न गच्छति, भव्याभव्यभावयोरत्यन्ताभावप्रतिगृहीतयोरेकाधिकरणत्व-विरोधात्। न सिद्धो भव्यो भवति, नष्टाशेषास्रवाणां पुनरुत्पत्तिविरोधात्। तस्मात् भव्यभावो न सादिरिति ?
आचार्य: समादधाति-नैष दोष:, पर्यायार्थिकनयापेक्षया कथंचित् भव्यजीवा: सादय: सान्ता: सिद्ध्यन्ति।
उत्क्तं च श्रीवीरसेनाचार्येण धवलाटीकायां-
‘‘पज्जवट्ठियणयावलंबणादो अप्पडिवण्णे सम्मत्ते अणादि-अणंतो भवियभावो अंतादीदसंसारादो, पडिवण्णे सम्मत्ते अण्णो भवियभावो उप्पज्जइ पोग्गलपरियट्टस्स अद्धमेत्तसंसारावट्ठाणादो। एवं समऊण-दुसमऊणादिउवड्ढपोग्गलपरियट्टसंसाराणं जीवाणं पुध पुध भवियभावो वत्तव्वो। तदो सिद्धं भवियाणं सादि-सांतत्तमिदि।।’’
एवं प्रथमस्थले भव्यजीवानां कालप्रतिपादनत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।
इदानीं अभव्यानां कालनिरूपणाय सूत्रद्वयमवतार्यते-
अभवियसिद्धिया केवचिरं कालादो होंति ?।।१८६।।
अणादिओ अपज्जवसिदो।।१८७।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-अभव्यजीवाः अनाद्यनन्ताः संति। एकजीवापेक्षयापि तस्य कालोऽनादिः अनंत एव।
अभव्यभावो नाम व्यञ्जनपर्यायः, तेनास्य विनाशेन भवितव्यमन्यथा द्रव्यत्वप्रसंगात् इति चेत् ?
भवतु नाम व्यञ्जनपर्यायोऽयं, न च व्यञ्जनपर्यायस्य सर्वस्य विनाशेन भवितव्यमिति नियमोऽस्ति, एकान्तवादप्रसंगात्। न च न विनश्यति इति द्रव्यं भवति, उत्पादध्रौव्य-भंगसंगतस्य द्रव्यभावाभ्युपगमात्।
तात्पर्यमेतत्-भव्यत्वं व्यञ्जनपर्यायोऽस्ति तथापि तस्यानन्तकालेनापि नाशो नास्ति। एवं द्रव्यं सर्वकालं कूटस्थं ध्रुवमेव एतदपि नास्ति। किंच द्रव्यस्य लक्षणं-‘‘उत्पादव्ययध्रौव्ययुत्तं सत्’’, पुनश्च ‘‘सद्द्रव्यलक्षणं’’
अतएव अभव्यजीवानां संसारस्य विनाशो नास्ति, तेषां संततं चतुर्गतिषु परिभ्रमणमेव, इति ज्ञात्वा ‘वयं भव्याः’ अस्माकंक संसारोऽधुना स्वल्प एव, वयं सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रस्वरूपत्रिरत्नेनैव त्रैलोक्यसाम्राज्यं गृहीतुं सक्षमा भविष्यामः, एवं निश्चित्य रत्नत्रयसाधनायां अप्रमादीभूय स्वशुद्धात्मतत्त्वं प्रतिक्षणं भावनीयं भवद्भिः इति ।
एवं द्वितीयस्थले अभव्यानां कालप्रतिपादनत्वेन सूत्रद्वयं गतम् ।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे एकजीवापेक्षया कालानुगमे
गणिनीज्ञानमतीकृतसिद्धांतचिंतामणिटीकायां भव्यत्वमार्गणानाम
एकादशोऽधिकारः समाप्तः।

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अथ भव्यत्वमार्गणा अधिकार प्रारंभ

अब दो स्थलो में पाँच सूत्रों के द्वारा भव्यमार्गणा नाम का ग्यारहवाँ अधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथम स्थल में भव्य जीवों के काल कथन की मुख्यता वाले ‘‘भवियाणुवादेण’’ इत्यादि तीन सूत्र कहेंगे। पुन: द्वितीय स्थल में अभव्य जीवों की स्थिति का निरूपण करने हेतु ‘‘अभविय’’ इत्यादि दो सूत्रों को कहेंगे। यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

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अब भव्यमार्गणा में भव्य जीवों का काल प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

भव्यमार्गणानुसार जीव भव्यसिद्धिक कितने काल तक रहते हैं ?।।१८३।।

जीव अनादि सान्त काल तक भव्यसिद्धिक रहते हैं।।१८४।।

जीव सादि सान्त काल तक भव्यसिद्धिक रहते हैं।।१८५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-भव्य जीव अनादि-सान्त होते हैं, क्योंकि अनादिस्वरूप से आए हुए भव्यभाव का अयोगिकेवली के अन्तिम समय में विनाश पाया जाता है।

यहाँ कोई शंका करता है कि-अभव्य के समान भी तो भव्य जीव होता है, इसलिए भव्यभाव को अनादि अनन्त क्यों नहीं प्ररूपण किया ? तब आचार्य समाधान देते हैं कि-ऐसा, नहीं कहना चाहिए, क्योंकि भव्य में अविनाश शक्ति का अभाव है। अर्थात् यद्यपि अनादि से अनन्त काल तक रहने वाले भव्य जीव हैं तो सही, पर उनमें शक्तिरूप से तो संसार विनाश की संभावना है, अविनाश की संभावना नहीं होती।

'शंका-'यहाँ भव्यत्वशक्ति का ही अधिकार है, उसकी व्यक्ति का अधिकार नहीं, यह कैसे जाना जाता है ?

समाधान-भव्यत्व को अनादि-सान्त कहने वाले सूत्र की अन्यथा उपपत्ति नहीं बन सकती, इसी से जाना जाता है कि यहाँ भव्यत्व शक्ति से अभिप्राय है न कि वह व्यक्तरूप है।

भव्यजीव सादि और सान्त होते हैं।

यहाँ कोई शंका करता है कि-अभव्य जीव भव्यत्व को प्राप्त नहीं होता है, क्योंकि भव्य और अभव्य भाव एक-दूसरे के अत्यन्ताभाव को धारण करने वाले होते हैं, इसलिए उनका एक अधिकरण में रहना विरुद्ध है। सिद्ध भव्य नहीं होते हैं, क्योंकि जिन जीवों के समस्त कर्मास्रव नष्ट हो गये हैं उनके उन कर्मास्रवों की पुन: उत्पत्ति होने में विरोध आता है। अत: भव्यभाव सादि नहीं हो सकता ?

तब आचार्य समाधान करते हैं कि-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि पर्यायार्थिक नय की अपेक्षा भव्यजीव कथंचित् सादि-सान्त सिद्ध होते हैं।

श्री वीरसेनाचार्य ने धवला टीका में कहा है- ‘‘पर्यायार्थिक नय के अवलम्बन से जब तक सम्यक्त्व ग्रहण नहीं किया, तब तक जीव का भव्यभाव अनादि-अनन्तरूप है, क्योंकि उसका संसार अन्तरहित है। किन्तु सम्यक्त्व के ग्रहण कर लेने पर अन्य ही भव्यभाव उत्पन्न हो जाता है, क्योंकि सम्यक्त्व उत्पन्न हो जाने पर फिर उसके केवल अर्धपुद्गलपरिवर्तनमात्र काल तक संसार का अवस्थान रहता है। इसी प्रकार एक समय कम अर्धपुद्गलपरिवर्तन संसार वाले, दो समय कम उपार्धपुद्गलपरिवर्तन संसार वाले आदि जीवों के पृथक्-पृथक् भव्यभाव का कथन करना चाहिए। इस प्रकार यह सिद्ध हो जाता है कि भव्य जीव सादि-सान्त होते हैं।

इस प्रकार प्रथम स्थल में भव्यजीवों का काल निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब अभव्य जीवों का काल निरूपण करने हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

जीव अभव्यसिद्धिक कितने काल तक रहते हैं ?।।१८६।।

जीव अनादि-अनन्त काल तक अभव्यसिद्धिक रहते हैं।।१८७।।

'सिद्धान्तचिंतामणिटीका'-अभव्य जीव अनादि-अनन्त हैं। एक जीव की अपेक्षा भी उनका काल अनादि-अनन्त ही है।

शंका-अभव्य भाव जीव की एक व्यंजनपर्याय है, इसलिए उसका विनाश होना चाहिए, नहीं तो अभव्यत्व के द्रव्यपने का प्रसंग आ जायेगा ?

समाधान-अभव्यभाव जीव की व्यंजनपर्याय भले ही हो, पर सभी व्यंजनपर्याय का नाश होना चाहिए, ऐसा कोई नियम नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने से एकान्तवाद का प्रसंग आता है। ऐसा भी नहीं है कि जो वस्तु विनष्ट नहीं होती वह द्रव्य होती है, क्योंकि जिसमें उत्पाद, ध्रौव्य और व्यय पाये जाते हैं उसे द्रव्यरूप से स्वीकार किया गया है।

तात्पर्य यह है कि-भव्यत्व भाव यद्यपि व्यञ्जनपर्याय है फिर भी उसका अनन्तकाल से भी विनाश नहीं होता है। इस प्रकार द्रव्य सर्वकाल कूटस्थ ध्रुव ही है, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि द्रव्य का लक्षण-उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य से युक्त सत् होता है और पुन: द्रव्य का लक्षण सत् है।

अतएव अभव्य जीवों के संसार का विनाश नहीं होता है, उनका चारों गतियों में सदैव परिभ्रमण होता रहता है ऐसा जानकर ‘‘हम लोग भव्य हैं’’ हमारा संसार अब अल्प ही है, हम सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रस्वरूप तीन रत्नों से ही तीनों लोकों का साम्राज्य प्राप्त करने में सक्षम होंगे, ऐसा निश्चित करके रत्नत्रय की साधना में प्रमादरहित होकर अपने शुद्धात्मतत्व की प्रतिक्षण भावना हम सभी को भानी चाहिए।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में अभव्य जीवों का काल प्रतिपादन करने वाले दो सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम में क्षुद्रकबंध नामक द्वितीय खण्ड में एक जीव की अपेक्षा कालानुगम में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में भव्यत्वमार्गणा नामका ग्यारहवाँ अधिकार समाप्त हुआ।