ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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सोलहकारण व्रत की जाप्य - "ऊँ ह्रीं अर्हं शक्तितस्तपोभावनायै नमः"

12.समवसरण गीत

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समवसरण गीत

तर्ज-सौ साल पहले...

बीते युगों में यहाँ पर समवसरण आया था.....समवसरण आया था।
मैंने न जाने तब कहाँ जनम पाया था।।टेक.।।

करोड़ों साल पहले भी, हजारों साल पहले भी।
ऋषभ महावीर इस धरती पर खाए और खेले भी।।
भारत की वसुधा पर तब, स्वर्ग उतर आया था.....स्वर्ग उतर आया था।
मैंने न जाने तब कहाँ जनम पाया था।।1।।

हुआ था जिनवरों को दिव्य केवलज्ञान जब वन में।
तभी ऐसे समवसरणों की रचना की थी धनपति ने।।
इन्द्र मुनी चक्री सबने लाभ बहुत पाया था-लाभ बहुत पाया था।
मैंने न जाने तब कहाँ जनम पाया था।।2।।

आज के इस महाकलियुग में नहिं साक्षात् जिनवर हैं।
तभी हम मूतिर्यों को प्रभु बनाकर रखते मंदिर में।।
सतियों ने इनकी भक्ति करके नाम पाया था-करके नाम पाया था।
मैंने न जाने तब कहाँ जनम पाया था।।3।।

अधर आकाश की रचना धरा पर आज दिखती है।
बीच में ‘‘चन्दना’’ देखो प्रभू की गंधकुटि भी है।।
समवसरण का यह वर्णन शास्त्रों में आया था.....शास्त्रों में आया था।
मैंने न जाने तब कहाँ जनम पाया था।।4।।