ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

Whatsappicon.png
Whatsappicon.png
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें |


पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा देश के समस्त जैन विद्वानों के लिए विशेष सैद्धांतिक विषयों पर ऋषभगिरि-मांगीतुंगी से विद्वत प्रशिक्षण शिविर का पारस चैनल पर ४ दिसंबर २०१६- रविवार से सीधा प्रसारण चल रहा है | घर बैठे देखकर अवश्य ज्ञान लाभ लें |

12.सम्यक्त्वमार्गणाधिकार

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


विषय सूची

[सम्पादन]
सम्यक्त्वमार्गणाधिकार

अथ सम्यक्त्वमार्गणाधिकार:

अथ स्थलद्वयेन नवभिः सूत्रैः अन्तरानुगमे सम्यक्त्वमार्गणाधिकारः प्रारभ्यते। तत्र तावत्प्रथमस्थले त्रिविधसम्यग्दृष्टीनां सम्यग्मिथ्यादृष्टीनां चान्तरनिरूपणत्वेन ‘‘सम्मत्ताणुवादेण’’ इत्यादिना पंचसूत्राणि। ततः परं द्वितीयस्थले सासादन-मिथ्यात्वसहितानां अंतरप्रतिपादनत्वेन ‘‘सासण-’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयमिति पातनिका भवति।
इदानीं सामान्यसम्यग्दृष्टि-वेदक-उपशमसम्यग्दृष्टि-क्षायिकसम्यग्दृष्टि-सम्यग्मिथ्यादृष्टीनामन्तरप्रतिपादनाय सूत्रपंचकमवतार्यते-
सम्मत्ताणुवादेण सम्माइट्ठि-वेदगसम्माइट्ठि-उवसमसम्माइट्ठि-सम्मामिच्छा-इट्ठीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।१३३।।
जहण्णेण अंतोमुहत्तं।।१३४।।
उक्कस्सेण अद्धपोग्गलपरियट्टं देसूणं।।१३५।।
खइयसम्माइट्ठीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।१३६।।
णत्थि अंतरं णिरंतरं।।१३७।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-कश्चित् सम्यग्दृष्टिः मिथ्यात्वं गत्वा जघन्येन कालेन पुनः सम्यक्त्वमागतस्तस्य जघन्यान्तरमुपलभ्यते । एवं वेदकसम्यग्दृष्टि-उपशमसम्यग्दृष्टि-सम्यग्मिथ्यादृष्टीनामपि जघन्यान्तरं, भेदाभावात्। उपशमसम्यग्दृष्टेः किंचिदन्तरं-कश्चित् उपशमसम्यक्त्वसहितो महामुनिः उपशमश्रेणीतोऽवतीर्णः, वेदक-सम्यक्त्वेन जघन्यकालस्यान्तरं प्राप्य पुनः उपशमश्रेणिं समारोहणार्थं दर्शनमोहनीयमुपशम्य उपशमसम्यक्त्वं गतस्तस्य जघन्यान्तरं वक्तव्यं।
उत्कर्षेण-कश्चिदनादिमिथ्यादृष्टिः अद्र्धपुद्गलपरिवर्तनस्यादिसमये सम्यक्त्वं गृहीत्वान्तर्मुहूर्तं स्थित्वा मिथ्यात्वं गत्वोपाद्र्धपुद्गलपरिवर्तनस्यान्तरालं कृत्वावसाने सम्यक्त्वं संयमं च युगपत् गृहीत्वान्तरं समानीयान्त-र्मुहूर्तेणाबंधकत्वं गतः। तस्योपाद्र्धपुद्गलपरिवर्तनान्तरमुपलभ्यते। एवं सर्वत्रागमाविरोधेन ज्ञातव्यं।
क्षायिकसम्यग्दृष्टीनां नास्त्यन्तरं, तेषां सम्यक्त्वान्तरगमनाभावात्।
एवं प्रथमस्थले सम्यग्दृष्ट्यादीनामन्तरकथनत्वेन सूत्रपंचकं गतम्।
अधुना सासादन-मिथ्यादृष्टिजीवानामन्तरप्रतिपादनार्थं सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-
सासणसम्माइट्ठीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।१३८।।
जहण्णेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागो।।१३९।।
उक्कस्सेण अद्धपोग्गलपरियट्टं देसूणं।।१४०।।
मिच्छाइट्ठी मदिअण्णाणिभंगो।।१४१।।
सद्धांतचिंतामणिटीका-कश्चिद् जीवः प्रथमसम्यक्त्वं गृहीत्वान्तर्मुहूर्तं स्थित्वा सासादनगुणस्थानं गत्वादिं कृत्वा मिथ्यात्वं गत्वान्तरं प्राप्य सर्वजघन्येन पल्योपमस्यासंख्यातभागमात्रोद्वेलनकालेन सम्यक्त्व-सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृत्योः प्रथमसम्यक्त्वप्रायोग्यसागरोपमपृथक्त्वमात्रस्थितिसत्कर्म स्थापयित्वा त्रीण्यपि करणानि कृत्वा पुनः प्रथमसम्यक्त्वं गृहीत्वा षडावलिकावशेषे उपशमसम्यक्त्वकाले सासादनं गतः तस्य पल्योपमस्या-संख्यातभागमात्रान्तरमुपलभ्यते।
कश्चिदाह-उपशमश्रेणीतोऽवतीर्य सासादनं गत्वान्तर्मुहूर्तेण पुनरपि उपशमश्रेणिं चटित्वावतीर्य सासादनं गतस्यान्तर्मुहूर्तमात्रान्तरमुपलभ्यते, इदमत्र किन्न प्ररूपितं ? न चोपशमश्रेणीतोऽवतीर्णोपशमसम्यग्दृष्टयः सासादनं न गच्छन्तीति नियमोऽस्ति ‘‘आसाणं पि गच्छेज्ज’’ इति कषायप्राभृते चूर्णिसूत्रदर्शनात् ?
अत्र परिहारः उच्यते-उपशमश्रेणीतोऽवतीर्णोपशमसम्यग्दृष्टिः एक एव जीवः द्विवारं सासादनगुणस्थानं न प्रतिपद्यते इति। तस्मिन् भवे सासादनं प्रतिपद्य उपशमश्रेणिमारुह्य तस्मादवतीर्णोऽपि न सासादनं प्रतिपद्यते एष अभिप्रायः एतस्य सूत्रस्य। तेनान्तर्मुहूर्तमात्रं जघन्यान्तरं नोपलभ्यते।
उत्कर्षेण-कश्चिदनादिमिथ्यादृष्टिः अद्र्धपुद्गलपरिवर्तनस्यादिसमये गृहीतसम्यक्त्वस्य सासादनं गत्वोपाद्र्ध-पुद्गलपरिवर्तनं भ्रमित्वान्तर्मुहूर्तावशेषे संसारे प्रथमसम्यक्त्वं गृहीत्वा एकसमयं सासादनं भूत्वान्तरं समानीय पुनः मिथ्यात्वं सम्यक्त्वं च क्रमेण गत्वाऽबंधकत्वं गतस्तस्योपाद्र्धपुद्गलपरिवर्तनान्तरमुपलभ्यते।
मिथ्यादृष्टेर्जघन्येनान्तर्मुहूर्तं उत्कर्षेण द्वे षट्षष्टिसागरोपमे देशोने।
तात्पर्यमेतत्-एतत्सम्यक्त्वमार्गणां पठित्वा अंतरं विज्ञाय क्षायिकसम्यक्त्वलब्धये भावना भावयितव्या। यावत्केवलिश्रुतकेवलिपादमूलं न लभेत तावत्प्रयत्नेन क्षयोपशमसम्यग्दर्शनमेव संरक्षणीयं, तस्याष्टांगानि अपि संरक्षणीयानि।
उक्तं च श्रीमत्समन्तभद्रस्वामिना-
नांगहीनमलं छेत्तुं , दर्शनं जन्मसन्ततिम् ।
न हि मंत्रोऽक्षरन्यूनो, निहन्ति विषवेदनाम्।।२१।।
एवं द्वितीयस्थले सासादनादिगुणस्थानयोरन्तरप्रतिपादनत्वेन सूत्रचतुष्टयं गतम्।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे एकजीवापेक्षया अन्तरानुगमे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां सम्यक्त्वमार्गणानाम द्वादशोऽधिकारः समाप्तः।


[सम्पादन]
अथ सम्यक्त्वमार्गणा अधिकार

अब दो स्थलों में नौ सूत्रों के द्वारा अन्तरानुगम में सम्यक्त्वमार्गणा अधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथम स्थल में तीन प्रकार के सम्यग्दृष्टियों का और सम्यग्मिथ्यादृष्टियों का अन्तर निरूपण करने वाले ‘‘सम्मत्ताणुवादेण’’ इत्यादि पाँच सूत्र हैं। पुन: द्वितीय स्थल में सासादनसम्यक्त्व और मिथ्यात्वसहित जीवों का अन्तर प्रतिपादन करने वाले ‘‘सासण’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

[सम्पादन]
अब सामान्यसम्यग्दृष्टि-वेदकसम्यग्दृष्टि-उपशमसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि और क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीवों का अन्तर बतलाने हेतु पाँच सूत्र अवतीर्ण होते हैं-

सूत्रार्थ-

सम्यक्त्वमार्गणा के अनुसार सामान्य सम्यग्दृष्टि, वेदकसम्यग्दृष्टि, उपशमसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।१३३।।

उक्त जीवों का अन्तर जघन्य से अन्तर्मुहूर्तप्रमाण है।।१३४।।

उक्त जीवों का उत्कृष्ट अन्तरकाल कुछ कम अर्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण है।।१३५।।

क्षायिकसम्यग्दृष्टियों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।१३६।।

क्षायिकसम्यग्दृष्टियों का अन्तर नहीं होता, वे निरन्तर हैं।।१३७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-कोई सम्यग्दृष्टि जीव मिथ्यात्व को प्राप्त होकर जघन्य काल से पुन: सम्यक्त्व को प्राप्त होने तक उसके उक्त जघन्य अन्तर प्राप्त होता है। इसी प्रकार वेदकसम्यग्दृष्टि, उपशमसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टियों का भी जघन्य अन्तर कहना चाहिए, क्योंकि उसमें विशेषता का अभाव है। उपशमसम्यग्दृष्टि में किचित् अन्तर है कि उपशमसम्यक्त्व सहित कोई महामुनि उपशमश्रेणी से उतरे और वेदकसम्यक्त्व से जघन्य काल प्रमाण अन्तर प्राप्त करके पुन: उपशमश्रेणी पर चढ़ने के लिए दर्शनमोहनीय को उपशमाकर उपशमसम्यक्त्व को प्राप्त हुए, उनके वह जघन्य अन्तर कहना चाहिए।

उत्कृष्ट से-किसी अनादिमिथ्यादृष्टि के अर्धपुद्गलपरिवर्तन के प्रथम समय में सम्यक्त्व को ग्रहणकर और उसके साथ अन्तर्मुहूर्त रहकर मिथ्यात्व को प्राप्त होने पर उपार्ध अर्थात् कुछ कम अर्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण अन्तर को प्राप्त हो अन्त में सम्यक्त्व एवं संयम को एक साथ ग्रहणकर अन्तर को समाप्त करते हुए अन्तर्मुहूर्त से अबंधकत्व को प्राप्त होने पर कुछ कम अर्धपुद्गलपरिवर्तन प्रमाण उत्कृष्ट अन्तर प्राप्त होता है। इस प्रकार सर्वत्र आगम के अविरोधरूप से अन्तर जानना चाहिए।

क्षायिकसम्यग्दृष्टियों का कोई अन्तर नहीं है, क्योंकि क्षायिकसम्यग्दृष्टियों में अन्य सम्यक्त्व में जाने का अभाव पाया जाता है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में सम्यग्दृष्टि आदि जीवों का अन्तर कथन करने वाले पाँच सूत्र पूर्ण हुए।

[सम्पादन]
अब सासादनसम्यग्दृष्टि और मिथ्यादृष्टि जीवों का अन्तर प्रतिपादन करने हेतु चार सूत्र अवतीर्ण किये जाते हैं-

सूत्रार्थ-

सासादनसम्यग्दृष्टियों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।१३८।।

सासादनसम्यग्दृष्टियों का जघन्य अन्तर पल्योपम के असंख्यातवें भाग प्रमाण होता है।।१३९।।

सासादनसम्यग्दृष्टियों का उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण है।।१४०।।

मिथ्यादृष्टि का अन्तर मति-अज्ञानी के समान है।।१४१।।

'सिद्धान्तचिंतामणिटीका-'कोई जीव प्रथम सम्यक्त्व को ग्रहणकर और अन्तर्मुहूर्त रहकर सासादनगुणस्थान को प्राप्त हो करके पुन: मिथ्यात्व में जाकर अन्तर को प्राप्त हुआ, वहाँ सबसे जघन्य पल्योपम के असंख्यातवें भाग प्रमाण उद्वेलनकाल के द्वारा सम्यक्त्व व सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृतियों के प्रथमसम्यक्त्व के योग्य सागरोपमपृथक्त्वमात्र स्थितिसत्व को स्थापित कर तीनों ही करणों को करके पुन: प्रथम सम्यक्त्व को ग्रहणकर उपशमसम्यक्त्वकाल में छह आवलियों के शेष रहने पर सासादन को प्राप्त हुआ, उस जीव के पल्योपम के असंख्यातवेें भाग प्रमाण जघन्य अन्तर प्राप्त होता है।

यहाँ कोई शंका करता है कि-उपशमश्रेणी से उतरकर सासादन को प्राप्त हो अन्तर्मुहूर्त से फिर भी उपशमश्रेणी पर चढ़कर व उतरकर सासादन को प्राप्त हुए जीव के अन्तर्मुहूर्तमात्र अन्तर प्राप्त होता है, उसका यहाँ निरूपण क्यों नहीं किया ? और उपशमश्रेणी से उतरे हुए उपशमसम्यग्दृष्टि जीव सासादन को नहीं प्राप्त होते, ऐसा कोई नियम नहीं है, क्योंकि ‘‘सासादन को भी प्राप्त होता है’ इस प्रकार कषायप्राभृत में चूर्णिसूत्र देखा जाता है ? यहाँ उक्त शंका का परिहार कहते हैं-उपशमश्रेणी से उतरा हुआ उपशम सम्यग्दृष्टि एक ही जीव दो बार सासादनगुणस्थान को प्राप्त नहीं होता है। उसी भव में सासादन को प्राप्त कर पुन: उपशमश्रेणी पर आरूढ़ हो उससे उतरा हुआ भी जीव सासादन को प्राप्त नहीं होता है, यह इस सूत्र का अभिप्राय है। इस कारण अन्तर्मुहूर्तमात्र जघन्य अन्तर प्राप्त नहीं होता है।

उत्कृष्ट से-किसी अनादिमिथ्यादृष्टि के अर्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण के प्रथम समय में सम्यक्त्व को ग्रहणकर सासादन को प्राप्त हो कुछ कम अर्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण काल तक भ्रमणकर संसार के अन्तर्मुहूर्त शेष रहने पर प्रथम सम्यक्त्व को ग्रहणकर एक समय सासादन में रहकर अन्तर को समाप्त कर पुन: क्रम से मिथ्यात्व और सम्यक्त्व को प्राप्त करके अबंधक भाव को प्राप्त होने पर कुछ कम उपार्धपुद्गलपरिवर्तन प्रमाण अन्तर प्राप्त होता है।

मिथ्यादृष्टि के जघन्य से अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट से कुछ कम दो छ्यासठ सागरोपमकाल का अन्तर पाया जाता है।

तात्पर्य यह है कि-इस सम्यक्त्वमार्गणा को पढ़कर अन्तर जानकर क्षायिकसम्यक्त्व की प्राप्ति हेतु सदैव भावना भानी चाहिए। जब तक केवली-श्रुतकेवली भगवन्तों का पादमूल न प्राप्त होवे, तब तक क्षयोपशम सम्यग्दर्शन का ही संरक्षण करना चाहिए और उसके आठों अंगों का संरक्षण करते हुए पालन करना चाहिए।

श्री समन्तभद्रस्वामी ने भी कहा है-


श्लोकार्थ-जैसे एक अक्षर से भी न्यून मंत्र विष की वेदना को दूर नहीं कर पाता है, उसी प्रकार एक अंग से भी न्यून-हीन सम्यग्दर्शन संसार की जन्म-मरण परम्परा को समाप्त नहीं कर सकता है।।२१।।

विशेषार्थ-भव्यात्माओं! जिस प्रकार से मकान का मूल आधार नींव है और वृक्ष का मूल आधार उसकी जड़े हैं उसी प्रकार से धर्म का मूल आधार सम्यग्दर्शन है। क्योंकि सम्यग्दर्शन के बिना धर्मरूपी मकान अथवा धर्मरूपी वृक्ष ठहर नहीं सकता है। जीवरक्षारूप आत्मा का परिणाम दया है, वह दया ही धर्म का लक्षण है। तीर्थंकर देव ने तथा अन्य केवलज्ञानियों ने अपने गणधर चक्रवर्ती, इन्द्र आदि शिष्यों को यही उपदेशा है। इसे अपने कानों से सुनकर सम्यग्दर्शन से हीन मनुष्य को नमस्कार नहीं करना चाहिए क्योंकि धर्म की जड़स्वरूप सम्यग्दर्शन जिसके पास नहीं है वह धर्मात्मा वैâसे हो सकता है और जो धर्मात्मा नहीं है वह वंदना या नमस्कार का पात्र वैâसे हो सकता है। सम्यग्दर्शन शून्य मनुष्य को तो आहार दान आदि भी नहीं देना चाहिए। क्योंकि कहा भी है...........‘‘मिथ्यादृग्भ्यो ददानं दाता मिथ्यात्ववर्धक:।’’ मिथ्यादृष्टियों को दान देने वाला दाता मिथ्यात्व को बढ़ाने वाला है।

अब प्रश्न यह होता है कि सम्यग्दर्शन से रहित मनुष्य कौन है ? उसका उत्तर यह है कि जो तीर्थंकर परमदेव की प्रतिमा को नहीं मानते हैं, उनकी पूजा नहीं करते हैं वे मिथ्यादृष्टि हैं। जो कहते हैं कि पंचमकाल में मुनि नहीं होते हैं, व्रतों से क्या प्रयोजन है ? आत्मा का ही पोषण करना चािहए उसे दु:ख नहीं देना चाहिए। मयूर पंख की बनी पिच्छी सुन्दर नहीं होती है सूत की पिच्छिका ही ग्राह्य है मयूर पंख की पिच्छिका से तो हिंसा होती है। आत्मा ही देव है अन्य कोई देव नहीं है। भगवान महावीर के बाद आठ केवली हुए हैं न कि तीन। महापुराण आदि विकथाएं हैं। इत्यादि प्रकार से जो उत्सूत्र कथन करने वाले हैं वे मिथ्यादृष्टि हैं क्योंकि जिनागम में जिनप्रतिमाओं के दर्शन, वंदन, नमस्कार आदि की बहुत ही महिमा बताई गई है। आचार्यों ने कहा है कि जिस प्रकार चिंतामणि आदि रत्न अचेतन होकर भी फलदायी हैं वैसे ही जिनेन्द्रदेव की कृत्रिम व अकृत्रिम प्रतिमाओं के दर्शन, पूजन से अनंत संसार में संचित पाप समूह नष्ट हो जाता है। जिनबिंब के दर्शन से निकाचित मिथ्यात्व आदि कर्मों के सौ-सौ टुकड़े हो जाते हैं तथा उनकी पूजा में अष्टद्रव्य सामग्री में पुष्प, चंदन, नैवेद्य, दीप, धूप, फल आदि का स्पष्ट कथन है। रामचंद्र आदि महापुरुषों ने पुष्पादि से जिनप्रतिमाओं की पूजा की है जिनपूजा का फल अचिन्त्य है। इसके लिए मेंढक का उदाहरण सर्वजन सुप्रसिद्ध ही है।

उसी प्रकार से इस पंचमकाल में मुनि हैं, होते हैं और होंगे ही। श्री गुणभद्र सूरि ने भी कहा है कि जो स्वयं मोह को छोड़कर कुलपर्वतों के समान पृथ्वी का उद्धार करने वाले हैं, समुद्र के समान स्वयं धन की इच्छा से रहित होकर रत्नों के स्वामी हैं, आकाश के समान व्यापक होने से किन्हीं के द्वारा स्पष्ट न होकर विश्व की विश्रांति के कारण हैं, ऐसे अपूर्व गुणों के धारक प्राचीन मुनियों के निकट में रहने वाले कितने ही साधु आज भी विद्यमान हैं। श्री सोमदेव सूरि ने भी कहा है कि-

‘कलौ काले चले चित्ते, देहे चान्नादि कीटके।’

एतच्चित्रं यदद्यापि, जिनरूपधरा नरा:।,

यह कलिकाल है, मनुष्यों का चित्त अत्यंत चंचल है और शरीर अन्न का कीड़ा बना हुआ है। बड़े आश्चर्य की बात है कि आज भी जिनमुद्रा के धारक दिगम्बर साधु दिख रहे हैं। श्री कुन्दकुन्ददेव ने भी मोक्षपाहुड़ में कहा है कि-

भरहे दुस्सम काले, धम्मज्झाणं हवेइ साहुस्स।

तं अप्पसहावठिदे, ण हु मण्णइ सो वि अण्णाणी।।

भरत क्षेत्र में इस दु:षम काल में साधुओं को धर्मध्यान होता है, वे आत्मा के स्वभाव में स्थित होते हैं किन्तु ऐसा जो नहीं मानते हैं वे अज्ञानी हैं। उसी प्रकार से श्री पूज्यपाद आचार्य ने व्रतों के माहात्म्य का वर्णन करते हुए कहा है कि-व्रतों से स्वर्ग को प्राप्त करना अच्छा है किन्तु अव्रती रहकर नरक जाना अच्छा नहीं है। दूसरी बात यह है कि व्रती नियम से स्वर्ग ही जाता है अन्य तीन गतियों में नहीं जाता है। कहा भी है- अणुव्रत और महाव्रत को प्राप्त करने वाला जीव देवायु का ही बंध करता है अन्य तीन आयु का नहीं। हाँ, महाव्रती तो कदाचित द्रव्यादि सामग्री के अनुकूल होने से मोक्ष प्राप्त कर लेता है लेकिन आज इस पंचम काल में मोक्ष संभव नहीं है। इसी प्रकार से कायक्लेश आदि तप के द्वारा शरीर को क्लेश पहुँचाने का भी जैनशासन में कथन है। प्रकारान्तर से देखा जाये तो सम्यग्दृष्टि शरीर से भिन्न आत्मा की श्रद्धा करने वाले हैं। अत: शरीर आदि के क्लेश में आत्मा को दु:खी नहीं मानते हैं तभी तो वे केशलोंच, उपवास आदि से शरीर के शोषण में लगे रहते हैं। इसी प्रकार से श्री कुन्दकुन्ददेव ने मूलाचार में मयूरपिच्छी के पाँच गुण बतलाए हैं और मुनियों को उसी के लेने का विधान किया है सूतादि की पिच्छी नहीं मानी है। यथा-धूलि और पसीना को ग्रहण नहीं करना, मृदु होना, सुकुमार होना, लघु-वजन में हल्की होना जिसमें ये पाँच गुण होते हैं ऐसी मयूर पंखों की पिच्छी जीव दया का साधन होने से संयम का उपकरण है।

जैनाचार्यों ने शासन देवता को भी उनके योग्य अघ्र्य आदि देकर पूजन का विधान किया है। हाँ, जिनेन्द्रदेव सदृश वे उपासनीय नहीं हैं। उसी प्रकार से जब तक आत्मा शुद्धोपयोग में स्थिर होने में असमर्थ है तब तक के लिए पंचपरमेष्ठी परमदेव माने गये हैं उनकी वंदना, ध्यान करना आदि का महामुनियों के लिए भी विधान है। श्री गौतम स्वामी ने स्वयं ही चैत्यभक्ति में पंचपरमेष्ठी, कृत्रिम, अकृत्रिम प्रतिमाओं की विशेष भक्ति वंदना की है। भगवान महावीर के बाद गौतम स्वामी, सुधर्माचार्य और जम्बूस्वामी ये तीन ही अनुबद्ध केवली हुए हैं। महापुराण आदि कथाएं प्रथमानुयोग के अन्तर्गत होने से विकथाएं नहीं हैं ऐसा समझना चाहिए।

जो मनुष्य सम्यग्दर्शन से च्युत हो जाते हैं वे कुछ कम अर्धपुद्गल परिवर्तन काल तक संसार में परिभ्रमण कर सकते हैं जो अनंतकाल के सदृश बहुत ही बड़ा माना गया है। जैसे कि मरीचिकुमार सम्यक्त्व से च्युत होकर असंख्यातों भवों तक एकेन्द्रियादि दुर्गतियों में भटकता रहा है। यही कारण है कि आचार्यदेव सम्यग्दर्शन से भ्रष्ट को दीर्घसंसारी मान रहे हैं। किन्तु जो सम्यग्दृष्टि तो है कारणवश चारित्र से भ्रष्ट है अर्थात् या तो उन्होंने अणुव्रत-महाव्रत लिया ही नहीं है इसलिए चारित्र से शून्य हैं तो भी वे सम्यग्दृष्टि होने के नाते संसार, शरीर और भोगों से उदासीन रहते हैं इसलिए किसी न किसी दिन वे चारित्र ग्रहण कर मोक्ष को प्राप्त कर ही लेंगे क्योंकि सम्यग्दृष्टि यदि चारित्रमोह के तीव्रोदय से चारित्र ग्रहण नहीं कर पाते हैं तो भी वे चारित्रधारी साधुओं की, व्रतिकों की निंदा कथमपि नहीं करते हैं और जो चारित्रधारियों की निंदा या उपेक्षा करते हैं वे सम्यग्दृष्टि ही नहीं हैं ऐसा समझना।

अथवा यदि कदाचित् कोई सम्यग्दृष्टि अणुव्रती-महाव्रती बनकर उन व्रतों में दोष लगा देता है या कदाचित् उन व्रतों को भंग कर देता है तो भी वह कालांतर में गुरु से प्रायश्चित्त लेकर या पुनव्र्रत ग्रहण कर पुनर्दीक्षा आदि लेकर शुद्ध हो जाता है तो उसे मोक्ष का अधिकारी माना जा सकता है। क्योंकि रत्नत्रय की पूर्णता ही मोक्ष का कारण है मात्र सम्यग्दर्शन अकेला मोक्ष का कारण नहीं है यह बात अन्यत्र ग्रंथों में वर्णित है। यहाँ समझने की बात यही है कि चारित्र से भ्रष्ट या शून्य मनुष्य सम्यक्त्व के प्रभाव से बहुत जल्दी ही अपने चारित्र को सुधार सकता है किन्तु सम्यक्त्व से भ्रष्ट हो जाने के बाद तो यदि वह निगोद आदि पर्याय में, एकेन्द्रिय आदि स्थावर योनियों में चला गया तो उसे वहाँ समझाने वाला कौन मिलेगा ? षट्प्राभृत ग्रन्थ के टीकाकार श्री श्रुतसागरसूरि ने भी चारित्रभ्रष्ट में महाराज श्रेणिक आदि का उदाहरण रखा है। राजा श्रेणिक चारित्र से भ्रष्ट न होकर चारित्र से हीन थे और सम्यक्त्व से सहित थे अत: केवली के पादमूल में तीर्थंकर प्रकृति का बंध करके आगे तीर्थंकर होने वाले हैं। ऐसे ही पुष्पडाल मुनि का उदाहरण लिया जा सकता है कि जो द्रव्य से चारित्रवान होते हुए भाव से पत्नी के साथ भोगों की आकांक्षा लिए हुए थे। उनको भी वारिषेण मुनि ने स्थितिकरण करके सच्चे भावलिंगी चारित्रवान बना दिया था अथवा श्री समंतभद्र स्वामी जैसे महामुनि का ही उदाहरण लीजिए। गुरु की आज्ञा से भस्मक जैसी महाव्याधि को दूर करने के लिए ही उन्होंने अन्य वेष धारण किया था। सम्यक्त्व के प्रभाव से ही चन्द्रप्रभ भगवान की मूर्ति प्रगट कर देने की योग्यता रखने वाले श्री समंतभद्र स्वामी सम्यग्दर्शन से सहित थे। इसीलिए उन्होंने पुन: चारित्रग्रहण कर लिया था और वे मोक्ष के अधिकारी माने गये हैं इसलिए चारित्रभ्रष्ट सिद्ध हो जाते हैं। इस कथन से यहाँ पर ब्रह्मचर्य आदि से भ्रष्ट व्रती या मुनि को नहीं लेना चाहिए, क्योंकि महाव्रत में भ्रष्ट हुए मुनि तो सम्यग्दृष्टि न रहकर मिथ्यादृष्टि ही हो जायेंगे। उत्कृष्ट मुनिपद में या व्रती पद में अनर्गल चेष्टा करने वाले तो महापापी ही माने जायेंगे।

भगवान आदिनाथ के समक्ष दीक्षा लेकर नग्न वेष में फल खाकर नदी का पानी पीकर अनर्गल चर्या करते हुए साधुओं को देखकर वनदेवता ने स्पष्ट निषेध किया था कि तुम इस निग्र्रंथ दिगम्बर वेष में रहकर यह अनर्गल चेष्टा मत करो, यह तीनलोक पूज्य अर्हंत मुद्रा है। तब उन साधुओं ने तापसियों के नाना वेष बनाकर ही पाखण्ड मत चलाया था। इससे स्पष्ट है कि दिगम्बर वेष में अनर्गल चर्या कथमपि ग्राह्य नहीं है।

वास्तव में छ्यानवे हजार रानियों के साथ रहने वाला चक्रवर्ती, पंचमगुणस्थानवर्ती निर्दोष श्रावक कहा जाता है और वह दान पूजादि सत्कर्म करने से पुण्यवान है। किन्तु ब्रह्मचारी के वेष में रहकर यदि कोई परस्त्री का सेवन कर लेता है तो वह पापी, व्यभिचारी, नीच कहलाता है वह व्रती श्रावक या अव्रती सम्यग्दृष्टि की कोटि में नहीं आ सकता है क्योंकि अनर्गल चेष्टा होने से वह मिथ्यादृष्टि है, धर्म से शून्य है। पद विरुद्ध क्रिया करने से सम्यग्दृष्टि संज्ञा उसे कैसे आ सकती है?

इसलिए यहाँ पर चरित्रभ्रष्ट से चरित्रहीन अर्थ लेना ही उपयोगी है और जब वह चारित्र ग्रहण कर लेता है तभी मोक्ष प्राप्त कर लेता है चारित्र बिना नहीं।

इसलिए श्रावकों के लिए दान, पूजा आदि सत्क्रियाओं का निषेध कभी नहीं करना चाहिए। सदैव आस्तिक भाव से सहित रहना चाहिए। ‘जो सम्यक्त्वरूपी रत्न से भ्रष्ट हैं वे बहुत प्रकार के शास्त्रों को जानते हुए भी आराधना से रहित हैं अत: वे वहीं के वहीं भ्रमण करते रहते हैं। जो मनुष्य सम्यक्त्वरूपी रत्न से शून्य होकर दान, पूजा आदि प्रशस्त कार्यों का निषेध करते हैं वे तर्क, व्याकरण, छंद, अलंकार, साहित्य और सिद्धांत आदि ग्रंथों को जानते हुए भी जिनेन्द्र भगवान के वचनों की श्रद्धारूप आराधना से शून्य होने के कारण नरक निगोद आदि दुर्गतियों में ही घूमते रहते हैं।

आराधना के चार भेद हैं-दर्शन आराधना, ज्ञान आराधना, चारित्र आराधना और तप आराधना। इनमें से जब तक सम्यग्दर्शन नहीं है तब तक पहली आराधना ही नहीं है तो पुन: आगे की आराधनाओं के न मिलने से वह मनुष्य अनंत संसार में ही भ्रमण करता रहता है। जो मनुष्य दान, पूजा आदि प्रशस्त क्रियाओं का निषेध करके अनर्गल उपदेश देते हैं वे सम्यग्दृष्टि नहीं हैं अत: उनके कोई भी आराधना नहीं है। वास्तव में श्रावक को निश्चय रूप आत्मधर्म की प्राप्ति हो नहीं सकती है, वह शुद्ध आत्मतत्त्व की श्रद्धा करते हुए भी शुद्ध आत्मतत्त्व का अनुभव और ध्यान कर नहीं सकता है अतएव उसके लिए ग्यारह प्रतिमाओं की चर्यारूप व्यवहार धर्म ही उपादेय है। वह एकदेश चारित्र के बल से ही अपनी आत्मशक्ति को बढ़ाता है अत: वह जब तक गृहस्थ है तब तक उसे दान, पूजा आदि क्रियाओं को करना ही है। आचार्यों ने श्रावक के पूजा, दान, शील और उपवास ये चार धर्म माने हैं। यदि कोई इन क्रियाओं का निषेध करते हैं तो वे उत्सूत्र प्ररूपणा करने से मिथ्यादृष्टि ही हैं ऐसा अर्थ फलित होता है अत: आगम के अनुकूल चर्या करते हुए उसी के अनुरूप उपदेश देकर अपने सम्यक्त्वरूपी रत्न को सुरक्षित रखना चाहिए।

‘सम्यग्दर्शन से रहित मनुष्य अच्छी तरह उग्र-उग्र तपश्चरण करते हुए भी हजार करोड़ वर्षों में भी बोधि को नहीं प्राप्त कर पाते हैं, ऐसा दर्शनप्राभृत गाथा ५ में कहा है।’

जो मनुष्य सम्यग्दर्शन से पतित हैं वे भले ही कठिन से कठिन मासोपवास आदि विशिष्ट तपों का आचरण करते हों तो भी हजार करोड़ वर्षों में भी सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र रूप रत्नत्रय से युक्त बोधि को नहीं प्राप्त कर पाते हैं अर्थात् सम्यक्त्व के बिना अनंतकाल पुरुषार्थ करके भी मुक्ति को नहीं प्राप्त किया जा सकता है। ऐसा समझ करके निश्चयधर्म में प्रधानभूत दान, पूजा आदि व्यवहारधर्म को नहीं छोड़ना चाहिए। तात्पर्य यही है कि निश्चयधर्म को प्राप्त कराने के लिए कारणभूत ऐसा व्यवहारधर्म सर्वथा उपादेय है क्योंकि मुनियों के लिए तो निश्चयधर्म की प्राप्ति तक ही वह साधन माना गया है लेकिन श्रावकों के लिए तो पंचसूना के पाप को हल्का करने के लिए दान, पूजादि क्रियाएं अवश्य करने योग्य ही हैं। यदि कोई श्रावक पद में रहकर भी दान, पूजा को छोड़कर अपने आपको गुरु कहलाकर पूजा कराने लगता है या दान पूजादि को हेय कहकर छोड़ने का उपदेश देने लगता है तो वह आचार्यों के कथनानुसार सम्यग्दृष्टि नहीं है।

जो भव्यजीव सम्यक्त्व ज्ञान, दर्शन, बल और वीर्य को वृद्धिंगत करते हुए कलिकाल के कलुषित पाप से रहित होते हैं वे सभी महापुरुष शीघ्र ही उत्कृष्ट ज्ञानी हो जाते हैं।

जिन वचन में श्रद्धा रखना सम्यक्त्व है, जिनागम का पठन-पाठन आदि करना ज्ञान है, पदार्थ की सामान्य सत्ता का अवलोकन होना दर्शन है, अपनी शारीरिक शक्ति को नहीं छिपाना बल है और आत्मा की शक्ति का नाम वीर्य है। जिनके ये गुण वृद्धिंगत हो रहे हैं वे भव्यजीव हैं वे ही कलिकाल में प्रगट हुए नाना प्रकार से मिथ्यात्वरूप पाप से बच सकते हैं।

आचार्यों का कहना है कि ‘इस पंचमकाल में जो शौच धर्म से रहित हैं-मलिन हैं, वर्णव्यवस्था का लोप करवेâ चाहे जहाँ भिक्षा से भोजन ग्रहण कर लेते हैं, मांसाहारी लोगों के यहाँ भी प्रासुक अन्न ले लेते हैं, म्लेच्छ और श्मशानवासी लोगों के यहाँ भी भोजन कर लेते हैं वे धर्म से शून्य हैं और जो देव, शास्त्र, गुरु की पूजा निषेध करने वाले हैं वे सम्यग्दर्शन से रहित होने से मोक्ष के अधिकारी नहीं हैं। इससे विपरीत शौच धर्म को धारण करने वाले, वर्ण संकर, जाति संकर, सूतक-पातक आदि दोषों से रहित श्रावक के यहाँ निर्दोष प्रासुक आहार लेने वाले मुनि ही मोक्षमार्गी हैं। जिसके हृदय में सम्यक्त्वरूपी जल का प्रवाह निरंतर प्रवाहित रहता है उसका कर्मरूपी बालू का बांध बद्ध होने पर भी नष्ट हो जाता है।

संसाररूपी संताप का निवारण करने वाला होने से तथा पापरूपी कलंक का प्रक्षालन करने वाला होने से सम्यग्दर्शन निर्मल, शीतल और स्वादिष्ट पानी के समान है। जिस मनुष्य के हृदय में जलपूर के समान सम्यग्दर्शन सदा प्रवाहित रहता है, उसके चिरकाल से संचित भी पापकर्म रूपी बालू का बांध नष्ट हो जाता है। जिस प्रकार कोरे घड़े पर स्थित धूलि चिपकती नहीं है उसी प्रकार से सम्यग्दृष्टि से लगा हुआ पापकर्म बंध को प्राप्त नहीं होता है। यह सब सम्यग्दर्शन का ही माहात्म्य है।

‘जो मनुष्य सम्यग्दर्शन से भ्रष्ट हैं, सम्यग्ज्ञान से भ्रष्ट हैं और सम्यक्चारित्र से भ्रष्ट हैं अर्थात् इन तीनों से शून्य हैं वे भ्रष्टों में भी विशिष्ट भ्रष्ट हैं तथा अन्य मनुष्यों को भी भ्रष्ट कर देते हैं।

सम्यग्दर्शन के निसर्गज और अधिगमज की अपेक्षा अथवा निश्चय और व्यवहार की अपेक्षा दो भेद हैं। औपशमिक, क्षायिक और क्षायोपशमिक की अपेक्षा तीन भेद हैं। आज्ञा सम्यक्त्व, मार्ग सम्यक्त्व आदि की अपेक्षा दश भेद हैं। ज्ञान के शब्दशुद्धि, अर्थशुद्धि, उभयशुद्धि, कालशुद्धि, उपधानशुद्धि, विनयशुद्धि, अनिन्हवशुद्धि और बहुमानशुद्धि की अपेक्षा से आठ भेद हैं। चारित्र के पाँच महाव्रत, पाँच समिति और तीन गुप्ति रूप से तेरह भेद होते हैं। जो इन रत्नत्रय से भ्रष्ट हैं वे अन्य लोगों को भी भ्रष्ट कर देते हैं अथवा यदि श्रावकों के लिए कहा जाये तो जो श्रावक सम्यग्दर्शन, ज्ञान तथा पाँच अणुव्रत, तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत से बारहव्रत रूप एकदेश चारित्र से भ्रष्ट हैं वे अन्य अपने आश्रित को भी उन्मार्गगामी ही बनायेंगे।

जो मनुष्य धर्म के अभ्यासी, संयम, तप, नियम, योग और उत्तरगुणों के धारी महामुनियों के दोष कहते हैं-उनमें मिथ्या दोषों का आरोप करते हैं वे स्वयं तो चारित्र से पतित हैं हीं, दूसरों को भी चारित्र से पतित कर देते हैं।

जिस प्रकार मूल-जड़ के नष्ट हो जाने से वृक्ष की शाखा आदि परिवार की वृद्धि नहीं होती है उसी प्रकार जो जिनदर्शन अर्थात् जिनेन्द्रदेव के मत से अथवा सम्यग्दर्शन से भ्रष्ट हैं-रहित हैं वे मूल से ही रहित हैं वे सिद्ध नहीं हो सकते हैं। जिस प्रकार मूल अर्थात् जड़ के होने से वृक्ष के स्वंâध, शाखा आदि परिवार का बहुत रूप से विस्तार फैलता चला जाता है उसी प्रकार से अर्हंत भगवान का मत अथवा सम्यग्दर्शन मोक्षमार्ग का मूल कहा गया है।

जिस प्रकार मूल से ही वृक्ष का तना वृद्धि को प्राप्त होता है और मूल से ही वृक्ष की शाखाओं और उपशाखाओं का समूह पत्ते पुष्प आदि से युक्त होता है उसी प्रकार जिनदर्शन ही रत्नत्रय स्वरूप मोक्षमार्ग को फलित करने वाला है।

जो स्वयं तो सम्यग्दर्शन से भ्रष्ट-रहित हैं और सम्यग्दृष्टियों को-सम्यक्त्व सहित मुनियों को नमस्कार नहीं करते हैं वे अव्यक्तभाषी अथवा गूंगे होते हैं तथा उनके लिए रत्नत्रय की प्राप्ति दुर्लभ है।’

सम्यग्दर्शन के निसर्गज, अधिगमज की अपेक्षा दो भेद हैं। औपशमिक, क्षायिक और क्षायोपशमिक की अपेक्षा तीन भेद हैं। आज्ञासमुद्भव, मार्गसमुद्भव, सूत्रसमुद्भव, बीजसमुद्भव, संक्षेपसमुद्भव, विस्तार- समुद्भव, अर्थसमुुद्भव, अवगाढ़ और परमावगाढ़ इनकी अपेक्षा दश भेद हैं। इन सम्यक्त्वों से जो भ्रष्ट हैं-रहित हैं, मयूरपिच्छिका, कमण्डलु और जिनशास्त्र इन संयम शौच और ज्ञान के उपकरणों से रहित हैं, गृहस्थ वेष के धारी हैं अर्थात् स्वयं अव्रती हैं और संयमी सम्यग्दृष्टि मुनियों के चरण युगलों में नहीं झुकते हैं उन्हें ‘नमोस्तु’ कहकर नमस्कार नहीं करते हैं, अभिमान से खड़े रहते हैं वे अस्पष्टभाषी गूंगे हो जाते हैं पुन: उन्हें लाखों जन्म में बोधि रत्नत्रय की प्राप्ति होना कठिन हो जाता है। दर्शनपाहुड़ की गाथा २० में कहा है-

एवं जिणपण्णत्तं दंसणरयणं धरेह भावेण।

सारं गुणरयणत्तय सोवाणं पढम मोक्खस्स।।३१।।

इस प्रकार से जिनेन्द्र भगवान द्वारा कहे हुए सम्यग्दर्शनरूपी रत्न को हे भव्य जीवों! तुम भावपूर्वक धारण करो। यह सम्यग्दर्शनरूपीरत्न उत्तम क्षमा आदि गुणों तथा सम्यग्दर्शन आदि तीन रत्नों में सर्वश्रेष्ठ रत्न है और मोक्षरूपी महल में चढ़ने के लिए पहली सीढ़ी है। पुनरपि आचार्यदेव कहते हैं-

जं सक्कइ तं कीरइ जं च ण सक्केइ तं च सद्दहणं।

केवलिजिणेहिं भणियं सद्दहमाणस्स सम्मत्तं।।२२।।

जो करना शक्य है उसे तो करना चाहिए और जो करना शक्य नहीं है उसका श्रद्धान करना चाहिए, क्योंकि केवली भगवान ने श्रद्धान करने वाले के ही सम्यक्त्व कहा है।

आजकल कुछ लोग चारित्र पालन करने में स्वयं प्रमादी होते हुए चारित्र को ढोंग या पाखंड अथवा यह व्यवहार चारित्र हेय है ऐसा कहकर उपेक्षा कर देते हैं और चारित्र के धारकों की निंदा, अवहेलना आदि करते हैं, उन्हें द्रव्यलिंगी, पाखंडी, मिथ्यादृष्टि आदि कहते हैं। उनके प्रति ही भगवान कुन्दकुन्ददेव का यह उपदेश है कि जितना शक्य हो उतना करो, जो कुछ शक्य न हो उस पर श्रद्धान करो यही सम्यक्त्व है क्योंकि मोक्षमार्ग में अपनी शक्ति को छिपाना भी आत्म वंचना है। इसीलिए प्रत्येक गृहस्थ का कर्तव्य है कि मोक्षमार्ग में अपने आत्म गुणों को वृद्धिंगत करने का ही सतत पुरुषार्थ करते रहना चाहिए। प्रमाद को छोड़कर संसार के दु:ख से छुड़ाने वाली देवपूजा, गुरुपास्ति आदि आवश्यक क्रियाओं को शक्ति से बाहर न समझकर यथायोग्य करते ही रहना चाहिए और चारित्रधारी संयमी या देशव्रती श्रावकों की निंदा न करके उनके गुणों में अनुरक्त होते हुए उनकी प्रशंसा करनी चाहिए यही गृहस्थ का कर्तव्य है। इस प्रकार सम्यक्त्व का माहात्म्य जानकर अपने सम्यक्त्व को सदैव दृढ़ रखना चाहिए तथा शक्ति के अनुसार देशसंयम या सकल संयम को धारण करके क्रमश: मोक्षपथ के पथिक बनना चाहिए, यही सम्यक्त्वमार्गणा में अन्तर समझने का सार है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में सासादन आदि गुणस्थानों का अन्तर बतलाने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नामक द्वितीय खण्ड में एक जीव की अपेक्षा अन्तरानुगम में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में सम्यक्त्वमार्गणा नाम का बारहवाँ अधिकार समाप्त हुआ।