ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

Whatsappicon.png
Whatsappicon.png
ज्ञानमती नेटवर्क से जुड़ने के लिये ADD ME < मोबाइल नं.> लिखकर +91 7599002108 पर व्हाट्सएप पर मेसेज करें |


पूज्य गणिनीप्रमुख आर्यिकाशिरोमणि श्री ज्ञानमती माताजी द्वारा देश के समस्त जैन विद्वानों के लिए विशेष सैद्धांतिक विषयों पर ऋषभगिरि-मांगीतुंगी से विद्वत प्रशिक्षण शिविर का पारस चैनल पर ४ दिसंबर २०१६- रविवार से सीधा प्रसारण चल रहा है | घर बैठे देखकर अवश्य ज्ञान लाभ लें |

12. ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती

ENCYCLOPEDIA से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज


[सम्पादन]
ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती

-stock-photo-3.jpg
-stock-photo-3.jpg

भगवान नेमिनाथ तीर्थंकर और पार्श्वनाथ तीर्थंकर के अंतराल में ये बारहवें चक्रवर्ती ब्रह्मदत्त हुए हैं। ये ब्रह्मराजा की महारानी चूड़ादेवी के पुत्र थे। इनके शरीर की ऊँचाई ७ धनुष एवं सात सौ वर्ष की आयु थी। इसमें इनका कुमारकाल २८ वर्ष, महामण्डलेश्वर काल ५६ वर्ष, दिग्विजयकाल १६ वर्ष, चक्रवर्ती राज्यकाल ६०० वर्ष रहा है। ये चक्रवर्तियों में अंतिम चक्रवर्ती हुए हैं। इन्होंने भी चक्ररत्न प्राप्तकर १४ रत्न एवं नवनिधियों के स्वामी होकर छह खण्ड पृथ्वी को जीतकर एकछत्र शासन किया है।

पुन: राज्य में ही दुध्र्यान से मरकर सातवें नरक गए हैं। जैनशासन में यह नियम है कि जो राज्यवैभव को भोगते हुए दुध्र्यान-आर्त अथवा रौद्रध्यान से मरते हैं, वे नरक चले जाते हैं और जो राज्य त्यागकर दीक्षा लेकर संयम धारण कर लेते हैं, वे ही स्वर्ग अथवा मोक्ष को प्राप्त कर लेते हैं।

प्रत्येक चतुर्थकाल में १२ चक्रवर्ती होते हैं। इनमें से वर्तमान के चतुर्थकाल में प्रथम चक्रवर्ती भरत, द्वितीय सगर, तृतीय मघवा, चतुर्थ सनत्कुमार, पंचम शांतिनाथ, छठे कुंथुनाथ, सातवें अरनाथ, नवमें महापद्म, दशवें हरिषेण ये मोक्ष गए हैं। आठवें सुभौम एवं बारहवें ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती नरक गए हैं तथा ग्यारहवें चक्रवर्ती जयसेन जयंत नाम के तृतीय अनुत्तर विमान में अहमिन्द्र हुए हैं।

यहाँ तक द्वादश चक्रवर्ती का वर्णन करने वाला यह तृतीय अधिकार पूर्ण हुआ।