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भारत गौरव पूज्य गणिनी प्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी का ससंघ नैनागिरि तीर्थ में मंगल प्रवेश ।

प्रतिदिन पारस चैनल पर प्रातः ६ से ७ बजे के मध्य पू.आ. श्री चंदनामती माताजी द्वारा जैन धर्म का प्रारंभिक ज्ञान प्राप्त करें |

12 सितम्बर 2017 प्रवचन

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आहार दान की महिमा

भव्यातमाओ! प्रगाढ़ निद्रा से जाग्रत होकर सुप्रभात का प्रारंभ करना है|जिनेन्द्र देव की प्रतिमा का अवलोकन करके एवं गुरु माँ के आशीर्वाद से अपनी निद्रा का त्यागकर आँख खोलकर देव, शास्त्र ,गुरु, का दर्शन करना है|आपके स्वाध्याय के लिए सुबह-सुबह पूज्य गणिनी ज्ञानमती माताजी का सानिध्य सभी को प्राप्त होता है |आगम की वाणी माताजी के मुखार बिंदु से सुनने को मिलती है |ऐसे चिरकालीन प्राचीन दीक्षित संतो की वाणी से लाभान्वित होते है |इस प्रकार आप लोग बहुत ही पुण्य का संचय कर रहें हैं |

पारस चेनल के माध्यम से प्रतिदिन जिनेन्द्र देव की प्रतिमा जी का पंचामृत अभिषेक पूज्य चंद्नामती माताजी के मंत्रोचारण से पूज्य माताजी द्वारा किया जाता है |पूज्य माताजी जहां-जहां विराजमान रहती है,वहाँ प्रतिदिन दीवाली जैसा उत्सव -महोत्सव चलता रहेता है |

आज जैनम हाल के अंदर मुंबई जिनमंदिर विधान हुवा ;जो कि पूज्य चंदनामती माताजी ने पूज्य ज्ञानमती माताजी कि प्रेरणा से विधान की रचना की है | विधान के अंदर मुंबई के अनेक मंदिर हैं,एवं 25-30 चैत्यालय हैं इन सबको सम्मिलित करके यह विधान पूज्य माताजी ने बनाया है |यह विधान करके सभी भक्तों को इतनी आनंद की अनुभूति हुई है ,जिसका हम शब्दों में वर्णन नहीं कर सकते है |चंद्नामती माताजी ने एक नहीं सैकड़ों विधान , एवं हजारों कि संख्या में बनाये हैं|

आज-काल आश्विन का महिना चल रहा है| मास के अंतिम शरद पूर्णिमा के दिन गणिनी ज्ञानमती माताजी का जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया जाता है|

83 साल पहले शरद पूर्णिमा के दिन माता मोहिनी की कुक्षी से इस देवी का अवतार हुवा था |हम सभी आश्विन महीने को बहुत ही परम पावन मानते है |इस माह में गणिनी ज्ञानमती बारहमासा का पाठ प्रतिदिन चलता है|सभी लोग अपनी -अपनी तरफ से प्रभावना का वितरण भी करते हैं|ज्ञानमती माताजी की भक्ति करके सभी लोग अपना जीवन सार्थक कर रहें हैं|

पूज्य चंद्नामती माताजी ने अपने प्रवचन में सभी भक्तों को संबोधित करते हुवे कहा ;कि भव्यात्माओ !

श्री समंतभद्राचार्य स्वामी ने रत्नकरंडश्रावकाचार में श्रावक कि क्रियाओ का वर्णन करते हुवे कहा है ,ग्रहस्थ अपनी पञ्चसूना कार्य को करने के कारण नितप्रति पापों का संग्रह करता है ,क्योकि आरंभी हिंसा से वह बच नहीं सकता है ,श्रावक को संकल्पी हिंसा का त्याग करना चाहिए | चूल्हा जलना ,पानी भरना ,झाड़ू लगाना यह सब हिंसा के कारण हैं|आपनें शुद्ध भोजन बनाकर मुनि ,अरियका ,क्षुल्लक,क्षुल्लिका किसी अतिथि को आहार दान दे दिया जो आपको भोजन बनाने में जो हिंसा हुई,वह आहारदान देने से पापों का क्षालन हो गया ,आपने पानी भरकर अभिषेक कर लिया आपके लगे हुवे दोष दूर हो गये| इसलिए सुबह -सुबह पुण्य को प्राप्त करने का पाप को नष्ट करने का उपक्रम किया जाता है |

चंद्नामती माताजी आपको आहारदान कि महिमा का वर्णन बताते हुवे कहती हैं, एक छोटा सा बालक अपनी माँ से कहता है माँ मेरे लिए खीर बनाओ,मैं खीर खाऊंगा | माँ ने कहा मै तुम्हारे लिए खीर जरूर बनाउंगी| खीर बनाकर सबसे पहले किसी संत को पड़गाहन करके लाऊँगी इसके बाद तुमको खीर दूंगी माँ इतना कहकर पानी लेने चली जाती है| बच्चे से कहती है ,कोई भी संत आये उसको जाने मत देना| बच्चा बहार निकलता है उधर से एक संत निकलते है| बेटा कहता है साधू जी आइये मेरी माँ ने खीर बनाया है अभी माँ आ रही है बच्चे को क्या पता साधू ऐसे कहने से नहीं आते है इतने में बच्चे कि माँ घड़ा लेकर घर आती है और मुनि का पड़गाहन करती है मासोपवासी मुनि की विधि मिल जाती है| भोजनशाला में प्रवेश करवाती है बेटा बहुत ही खुश होता है कि हमको भी अभी खीर खाने को मिलेगी वोह साधू को उच्चासन करवाती है चरण प्रक्षालन कराती है ,पूजा करती है पूरी नवधा भक्ति कराती है |उसके बाद मुनि के कर पत्र में खीर का आहार देती है | बाहर बच्चा खड़ा होकर जय -जय बोलता है महाराज कि जय|संत जी का निर्विघ्न आहार होता है इसके बाद वह बच्चा खीर खाता है वह खीर अक्षय हो गई उसने अपने नगर के सभी लोगो को बुलाया खीर खिलाया लेकिन वोह खीर खत्म नहीं हुई क्योकि अक्षीण महानस ॠधिधारी मुनि ने आहार लिया है बच्चे कि जय -जय से देवताओं के आसन कम्पायमान हो जाते है |वह बालक आगे जाकर धन्ना सेठ हो जाता है |

महानुभाव! ऐसे आहार दान देकर पूजन करके अपने गृहस्थ धर्म में किये गए पापों का क्षालन हो आपका दिवस मंगलमय हो |

पूज्य ज्ञानमती माताजी द्वादशांग क्या है ,इसके माध्यम से सभी भक्तों को अपने वचनों से ओतप्रोत कराती है आज द्वादशांग उपलब्ध नहीं है जो द्वादशांग लिपिबध नहीं हो सकता , वह द्वादशांग क्या है ?उसका कुछ अंश उपलब्ध है |11 अंग 14 पूर्व का वर्णन बताती है ,यह गौतम गणधर कि वाणी है |समन्तभद्राचार्य ने ४ अनुयोगो में विभक्त किया है |प्रथमानुयोग,करणानुयोग,चरणानुयोगद्रव्यानुयोग|इन ग्रंथो का स्वाध्याय हमें क्रम से करना चाहिए ,अपने स्वाध्याय को दृढ करना ,यही सबके किये मंगल आशीर्वाद है |