ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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13- अन्तर्राष्ट्रीय बिंब

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अन्तर्राष्ट्रीय बिंब

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विवाह एक अद्भुत आनंदोत्सव भी है, जिसमें विशेष रूप से युवा वर्ग प्रमोद करता है। प्रस्तुत हैं कुछ बिंब: विभिन्न देशों की संस्कृतियों के :

१. यहूदी संस्कृति में वर—वधू की मातायें खाने की प्लेटें तोड़ती हैं। यह दोनों पक्षों के वचनबद्ध होने का संकेत होता है और इस प्रकार प्लेटें तोड़ने का अर्थ है, रिश्ते की बात पक्की। प्लेटों के ये टुकड़े संभावित लोगों को इस शुभकामना के साथ दिये भी जाते हैं कि उनके यहाँ ऐसा मौका शीघ्र ही आये।

२. जर्मनी में शादी की दूसरी रात को एक पार्टी आयोजित की जाती है, जिसमें मेहमान प्लेटें तोडकर फेकते हैं और वर—वधू उन्हें समेटते हैं। इस रिवाज के पीछे यह भाव होता है कि नव दम्पत्ति का परिवार कभी नहीं टूटे।

३. यूरोप में दूल्हे के मित्र, दुल्हन को किसी पब में ले जाते हैं। जब दूल्हा, दुल्हन को ढूंढता हुआ वहाँ पहुँचता है, तो दूल्हा पूरी पार्टी के खर्च का भुगतान करके, दुल्हन को वापस ले जाता है।

४. रोमन काल वधू के कमरबंध में एक गांठ लगाई जाती थी,जिसे एक रोचक रस्म के रूप में वर द्वारा खोला जाता था। यह प्रथा वैदिक संस्कृति में गांठ बांधने की प्रथा जैसी है।

५. विवाह की सभी रस्मों में चावल का उपयोग होता है। पूर्वकाल में प्रस में वधू द्वारा चावल की जगह गेहूं फेके जाते थे। उत्तरी अप्रका में अंजीर और खजूर, इटली में सिक्के, मेवा ओर मिश्री मिलाकर फेका जाता है। आजकल चावल की जगह फूल , रंगीन कागज और गुब्बारे भी फेके जाते हैं। रोम में वर—वधू का हाथ पकड़कर, दरवाजे की दहलीज पार कराते हैं।

६. जर्मनी में लड़की के पैदा होने पर, माता—पिता द्वारा वृक्षारोपण किया जाता है और लड़की की शादी के समय तक, बड़े हो चुके उन वृक्षों को, दहेज में धन देने के लिए बेचा जाता है।

७. आयरलैंड में सौभाग्य की कामना के साथ दुल्हन की ड्रेस में घोड़े की नाल टंकवाई जाती है।

८. प्राचीन रोम तथा ग्रीस में विवाह में होने वाले अपव्यय की इति करने के उद्देश्य से प्लेटो ने वर तथा वधू पक्ष के मेहमानों की संख्या सीमित कर दस कर दी थी।

९. पाश्चात्य देशों में दुल्हन का परिधान घेरेदार, ढ़ीला, आकर्षक तथा चुन्नटदार होता है। परिधान की चुन्नटें दुल्हन के व्यक्तित्व को गर्वीला, आदरास्पद तथा प्रभावशाली बना देती हैं।

१०. दुल्हन के परिधान का रंग श्वेत होता है, जो पवित्रता, सात्विकता, विश्वसनीयता और भोलेपन का प्रतीक है। रोमन वैवाहिक गांठ का रंग भी श्वेत होता था।

११. प्राचीन ग्रीक, रोमन तथा यहूदी आदि सभ्यताओं में, अन्य देशों के अतिरिक्त भी, वैवाहिक प्रसंगों में माला का प्रयोग होता रहा है। प्राचीन आंग्ल—सैक्सन चर्चो में, पादरी आशीर्वाद स्वरूप, वर—वधू की गर्दन में फूलों का हार पहनाते थे।

१२. प्राचीन ग्रीक सभ्यता में विवाहोत्सव के समय दूल्हे को मुकुट से सजाया जाता था।

१३. एथेन्स तथा मिश्र में वधू को मुकुट धारित करा कर सुशोभित करने की प्रथा है।

१४. हेबू में विवाह कर रहे दम्पत्ति, एक मुकुटनुमा छतरी के नीचे आ कर खड़े होते हैं।

१५. कुछ प्राचीन चर्चों में पादरी, वर—वधू के मस्तक पर विवाह की घोषणा के प्रतीक स्वरूप मुकुट धारित कराते हैं।

१६. क्रिश्चियन समाज में दूल्हे की दाहिनी ओर, दुल्हन बैठती है।

१७. हेबू समाज में समृद्धि और सुख के प्रतीक के रूप में, वर—वधू के सम्मुख, जौ के दाने छींटे जाते हैं।

१८. नॉटिंघमशायर तथा ससेक्स में दूल्हे तथा दुल्हन पर चमकते चावल छींटने का रिवाज है, जो सुख शांति और समृद्धि के निमित्त होता है। स्पेन में चावल के स्थान पर मक्के का छेपण किया जाता है।

१९. रोम में दूल्हे का, दुल्हन के घर पर स्वागत, वधू द्वारा, द्वार पर तेल लगाकर किया जाता था, जो शालीनता, आज्ञाशीलता एवं मानवीय स्वभाव की स्निग्धनता को दर्शाता था।

२०. प्राचीन ग्रीक समाज में दूल्हा अपने हाथ में आग तथा जल लेकर वधू के घर में प्रवेश करता था। रोम में भी दूल्हा, आग तथा जल लेकर चलता था। प्राचीन ग्रीक समाज में जलती हुई मोमबत्तियां, हाथ में लेकर चलने का विधान रहा है। अग्नि एवं जल की पवित्रता एवं अपरिमित शक्ति को वैश्विक सम्मान देने की प्रथा विद्यमान रही है।

२१. रूस के ग्रीक चर्चों में विवाहित पादरी ही वैवाहिक समारोह को संपादित करा सकते हैं।

२२. रूस के ग्रीक चर्च के नियमों और परम्पराओं के अनुसार दुल्हन के सम्मुख एक पर्दा लगा दिया जाता है, जिसमें वह दूल्हे को सीधे नहीं देख सकती है। हेबू समाज में भी पर्दे की ऐसी ही परम्परा है। इस तरह के पर्दे को विवाहोपरांत हटाया जाता था।

२३. पारसी समाज में विवाह में गांठ बांधने की परम्परा रही है, जो प्रेम, मैत्री, तथा पारस्परिक विश्वास की द्योतक है। प्राचीन कालिक ब्रितानी समाज में दुल्हन के परिधान के रिबन में कई गांठें लगी होती थीं।

२४. विभिन्न वैश्विक समुदायों में किसी—ना—कसी रूप में पाणिग्रहण की प्रथा विद्यमान है। अठारहवीं सदी में वर—वधू, इंगलैण्ड में, अपने शहर की समीपस्थ नदी में हस्त—प्रक्षालन के अनन्तर, एक दूसरे का हाथ पकड़ कर, वैवाहिक शपथ लिया करते थे। प्राचीन ग्रीक सभ्यता में, यह प्रथा, वैवाहिक सहमति की प्रमाण थी। प्राचीन रोम में वर—वधू को आसन पर विराजित कर, पादरी वर—वधू का हाथ, एक दूसरे को सौंपते थे और युगल हस्त पर ऊन रखकर, पाणिग्रहण संपन्न कराते थे। प्राचीन असायरियन समाज में वधू के पिता, वर-वधू के पिता, वर-वधू के हाथों को ऊनी धागे से बांधते थे।

२५. प्राचीन पर्शिया समाज में सात का अंक अत्यन्त पावन—पवित्र माना गया है, जिसे ईश्वरीय प्रतीक, एवं स्वर्गिक प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है और विभिन्न रीति—रिवाजों में भी यह अंक मुखरित हुआ है।

२६. प्राचीन वेल्स में विवाह के उपरांत चर्च के समीप किसी खुले स्थान पर, दूल्हे तथा दुल्हन के समूहों के बीच, दौड़ स्पद्र्धा आयोजित होती थी। जिस पक्ष की विजय होती थी, उसे यह अधिकार मिलता था कि दूसरे पक्ष के प्रति प्रेम तथा आदर अभिव्यक्ति में वह पहल करे।

२७. दक्षिणी प्रस में, विवाहोपरांत वर तथा वधू के घुटनों के बल बैठने की व्यवस्था रही है, जहां दोनों एक—दूसरे को, पिन चुभाते थे। चुभन के अहसास को, जो सबसे अधिक अभिव्यक्त करता था, वह जीवन में दर्द को कम सह सकेगा; इस रस्म का यही अभिप्रेत है।

२८. रूस के ग्रीक चर्च एवं क्रिश्चियन समाज में अन्यत्र भी विवाह के पूर्व, पादरी तीन बार वर—वधू से सहमति के संदर्भ में प्रश्न करते हैं। वैवाहिक मुद्रिका के धारण करने के अनंतर, पुन: पादरी तीन बार वैवाहिक घोषणा को अधिसूचित करते हैं एव उपस्थित जन समुदाय तथा वर—वधू से उनकी सहमति के विषय में तीन बार प्रश्न भी करते हैं। यह रीति, वर—वधू की पारस्परिक, सहमति तथा बिना दबाव के निर्णय की प्राविधि को संबलित करती है।


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