ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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13.एक बकरे की आत्म-कथा

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एक बकरे की आत्म-कथा

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अन्य सभी जीवों की भांति अनेकों योनियों में भ्रमण करने के बाद जब मैं बकरी माँ के गर्भ में आया और पांच महिने गर्भ की त्रास सहने के बाद जब मेरा जन्म हुआ तो एक बार मुझे यह दुनिया बहुत सुन्दर व प्यारी लगी । मनुष्य व उसके छोटे-छोटे बच्चे सब मुझे बड़ा प्यार करते, अपनी गोदी में लेते व खाने को कोमल हरी पत्तियाँ देते । अपनी बकरी माँ का दूध पीकर मैं शीघ्र बड़ा होने लगा । मेरी माँ का मालिक भी मुझे प्यार करता व अपने खेत पर ले जाता जहां मैं अपने आप हरी पत्तियाँ खाता । मेरे वहां गोबर कर देने पर व खेत में लोट पोट कर खेलने पर भी मालिक कभी नाराज़ नहीं होता । जब मैंने अपनी माँ से इसका कारण पूछा तो उसने बताया कि हमारे गोबर से खाद बन जाती है व खेत में लेटने से धरती अधिक -उपजाऊ बनती है जो मालिक के खेत की उपज बढ़ाती है, इसलिए मालिक कुछ बूरा नहीं मानता ।

धीरे- धीरे समय बीतता गया और मैं अपने साथियों के साथ मस्त जीवन बिताता रहा । जब मैं करीब डेढ़ वर्ष का हुआ तो एक दिन एक नया आदमी मेरे मालिक के पास आया, उसने मालिक से कुछ बात की और मालिक ने मुझे व मेरे अन्य चालीस, पचास साथियों को एक साथ खड़ा कर दिया । कुछ ही देर बाद वहां एक बड़ी सी गाड़ी आई और हम सबको उसमें जबरदस्ती ठूंस दिया गया । मैं मां के पास जाना '-त्रहता था, किन्तु असमर्थ था जब मैंने मा मां पुकारा तो एक भद्दे से आदमी ने मुझे लकड़ी से मारा । लाचार हम गाड़ी में दुबक गए । गाड़ी में घिचपिच' के कारण मेरा दिमाग चकराने लगा । मेरे अन्य साथियों का भी बुरा हाल था सबके चेहरों की मायूसी व पीलापन देख कर एक ओर कुछ भय व आशंका हो रही थी तो दूसरी ओर गाड़ी के झटकों से आपस में लड़ते हुए हमारे बदन की खरोंचे कसक रहीं थीं । दिन बीता रात आई फिर दिन बीता रात आई किन्तु गाड़ी सफर करती ही जा रही थी । रास्ते में गाड़ी चलाने वाले के आदमी ने हमें दो बार कुछ खाना दिया लेकिन उससे तो हमारा आधा पेट भी नहीं भरा । जैसे तैसे अगले दिन हमारी गाड़ी एक बड़े शहर मे आकर रुकी । तभी गाड़ी के पास एक लंबी दाढ़ी मूंछ वाला आदमी आया उसने गाड़ी वाले को कुछ दिया और गाड़ी वाले ने हम सबको उसके हवाले कर दिया । नया मालिक हम सबको डंडे मारता हुआ एक मकान के पास लाया और हमें धूप में खड़ा कर दिया । भूख-प्यास से व्याकुल, ऊपर से धूप व मालिक का डंडा, इससे अपने प्राण निकले जा रहे थे ।

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काफी देर बाद हमें मकान के अंदर ठेला गया, वहां एक आदमी कान मे कुछ नली सी लगाकर हमारे जैसे अन्य साथियों को बारी बारी देख रहा सा लगता था । जब हम लोगों की बारी आई तो हमारे मालिक ने उसे कुछ दिया और उसने हमें बगैर देखे ही अंदर भेज दिया । यह बात मैं कुछ समझ नहीं सका किन्तु मेरे एक बड़े साथी ने बताया कि यह डाक्टर था जो हम सबकी जांच करता था क्योंकि अब हम सब की मौत नज़दीक है । यह सुनते ही मैं तो अधमरा हो गया, भय से भूख प्यास सब गायब हो गई और जब एक बार हमें खाना व पानी दिया गया तो वह भी मुझसे खाया नहीं गया । पानी के लिए मुंह बढ़ाया किन्तु भय से पानी हलक में जा ही नहीं पायॉ। तभी एक दूसरे कमरे का दरवाजा खुला और वहां का दृश्य देख कर तो मेरी रूह कांपने लगी, आखो के अते अंधेरा-सा छा गया । उस कमरे से मेरे साथियों के रोने व चिल्लाने की आवाजें आ रहीं थीं जिसे सुनकर मुझे भी रोना आ गया । मैंने चिल्लाने की कोशिश की, किन्तु पता नहीं मेरी आवाज को क्या हो गया था मुंह से कुछ आवाज़ निकल ही नहीं पाई । बाहर भागने के लिए मैंने पीछे मुड़ने का प्रयत्न किया किन्तु तभी एक आदमी ने मेरी दोनों टांगों को पीछे से पकड़ कर उसी कमरे में धकेल दिया जहां एक डरावना राक्षस जैसा व्यक्ति हाथ में बड़ा सा चाकू लिए मेरे साथियों को मौत के घाट उतार रहा था । अचानक एक विचार मेरे दिमाग में कौंधा कि क्या यह वही इंसान है जो अपने को देवताओं व पीरों का वंशज बताता है और अहिंसा अहिंसा की रट लगाता है । नहीं यह वह इंसान नहीं हो सकता, ऐसी सामूहिक हिंसा तो वे जंगली पशु भी नहीं करते जिनका भोजन सिर्फ दूसरे पशु ही हैं । मैं सोच ही रहा था कि एक आदमी मेरा कान खींच कर उस भयानक आदमी की ओर ले जाने लगा । दर्द व पीड़ा से मेरा भय अब गुस्से में बदलने लगा, मैंने अपना पूरा जोर लगा कर छूटना चाहा किन्तु कोई फल नहीं निकला, क्षोभ से मेरा खून खौलने लगा, मुंह में झाग आ गये, मल मूत्र ??? लगा किन्तु किसी को भी मेरी हालत पर तरस नही आया । उल्टे दो और आदमियों ने आकर मुझे पकड़ लिया, एक ने मेरी टांगे पकड़ी व दूसरा मेरी गरदन पर छुरी चलाने लगा । मेरी गरदन से खून का फौहारा छूट गया और रोम-रोम पीड़ा से भर गया । अब मेरे पास कोई उपाय नहीं था और मैं यही चाह रहा था कि ड़ेस भांति पीड़ा देने की बजाए मुझे ये फौरन ही मार दें तो अच्छा है, किन्तु नहीं मुझे अभी और कष्ट उठाने थे और तडूपना था क्योंकि सिर्फ आधी गरदन कटी होने से मेरी मौत में विलंब हो रहा था । इस बेबसी व यातना का एक-एक क्षण मुझे एक वर्ष से भी बड़ा लग रहा था । कभी अपने भाग्य को कोसता हुआ व कभी भगवान को याद करता हुआ मैं बेसब्री से अपनी मौत की प्रतीक्षा कर रहा था ।

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धीरे- धीरे मेरी आखों के आगे अंधेरा छाने लगा व चेतना लुप्त होने लगी, शायद सांस चलना भी बंद हो गया हो । मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे प्राण निकल चुके हैं अरौर यमदूत मुझे आकाश में कहीं उड़ाए लिए जा रहे हों, किन्तु यह क्या? मेरा शरीर तो अभी भी वहीं कल्लखाने में पड़ा था और अब तो दो आदमी मेरे शरीर की खाल को भी मांस चरबी व हड्डियों से अलग कर रहे थे । उन्होंने मेरी सारी खाल अलग करके एक तरफ फेंक दी व मांस एक तरफ । कुछ समय बाद मेरा मांस एक अन्य आदमी खरीद कर ले गया और उसे एक होटल के रसोईघर में पहुंचा दिया गया । वहां एक अन्य आदमी ने छुरी से मेरे मांस के अनगिनत टुकड़े कर कर के उसका बिल्कुल भुरता ही बना दिया । यह सब जुल्म भी शायद इस देवता स्वरूप इंसान के लिए कम था क्योंकि कटे पर नमक मिर्च लगाना जो इनकी पुश्तैनी आदत व शौक है वह तो अभी बाकी था सो उसे यह मेरे लिए ही क्यों छोड़ते? अत : मेरे मांस का भुरता बनाने के बाद उसमें न केवल नमक मिर्च बल्कि कई अन्य मसाले डालकर व आग पर भून कर पूरी तरह अपनी क्रूरता का परिचय दे दिया । अब इसके आगे क्यो हलो मैं यह देख ही रहा था कि तभी एक आदमी ने मेरे मांस को एक प्लेट में सजा कर एक शानदार कमरे मैं बैठे एक नौजवान जोड़े के सामने ला कर रख दिया । आदमी ने तो बड़ी शान जताते हुए मुझे खाना शुरू कर दिया, किन्तु उसके सामने बैठी औरत को मेरा मांस खाना शायद अच्छा नहीं लग रहा था और वह केवल अपने पति का साथ निभाती सी प्रतीत हो रही थी । अब तक मैं धर्मराज के दरबार में पहुंच जीवात्माओं की लाईन में लग चुका था और चित्रगुप्त जी की आवाज़ ने जो सबका लेखा-जोखा बता रहे थे । मेरा ध्यान अपनी ओर खेंच लिया । मेरी बारी आने पर चित्रगुप्त जी ने बताया कि पिछले जन्म में मैंने एक बकरे का मांस खाया था, जिसके परिणामस्वरूप मुझे इस जन्म में एक बकरा बनना पड़ा व अपना मांस दूसरों के भोजन के लिए देना पड़ा । उन्होंने यह भी बताया कि इस समय जो व्यक्ति होटल में बैठे तुम्हारा मांस खा रहे हैं वे तुम्हारे पूर्व जन्म की अपनी प्यारी संतान ही हैं, जिसके लिए तुमने उस जन्म में अपना पूरा जीवन दांव पर लगाया था । अब ये इस जन्म में जो तुम्हारा मांस खा रहे हैं इसका दण्ड इन्हे अगले जन्म मे भुगतना पड़ेगा । इतना सुनते ही मेरी आत्मा थरथरा उठी र मैं यह कैसे पसद कर सकता था कि मेरी संतान को भी मेरी भांति यत्रणा सहनी पड़े । अत : मैंने धर्मराज जी से प्रा र्थना की, कि इन सबको वे क्षमा कर दें क्योकि मैने भी इन सबको क्षमा कर दिया है, मे किसी से कोई बदला नहीं चाहता । धर्मराज जी ने मुझ पर कृपा की और कहा कि चूंकि तुमने बकरे की यानि में केवल बेल पने ही खाये है व किसी का अहित नहीं किया और अब सबको क्षमा कर दिया है । अतएव अब तुब्दे मनुष्य यानि में भेजा जा रहा है और उन्होंने मेरी उरात्मा को पुन : मनुष्य जन्म के लिए भेज दिया । दूसरे जन्म के लिए जाते हुए मैने यह निश्चय किया कि अब मैं दया सत्य व सद् आचरण ही करूगा और कभी भी किसी भी जीव की हत्या करना व उसका मांस खाना तो दूर किसी भी जीव को कोई कष्ट तक नही दूंगा और न ही किसी को कोई नुकसान पहुचाऊंगा । मैं सदैव हर जीव की रक्षा करूगा, इन्हीं विचारो के साथ मैं अपनी नई मां की कोख में चला गया ।