ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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13.संज्ञीमार्गणाधिकार

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विषय सूची

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संज्ञीमार्गणाधिकार

अथ संज्ञिमार्गणाधिकार:

अथ स्थलद्वयेन षड्भिः सूत्रैः अन्तरानुगमे संज्ञिमार्गणानामधिकारःप्रारभ्यते। तत्र तावत् प्रथमस्थले संज्ञिजीवानामन्तरकथनेन ‘‘सण्णिया-’’ इत्यादिसूत्रत्रयंं । तदनु द्वितीयस्थले असंज्ञिजीवानामंतरप्रतिपादनत्वेन ‘‘असण्णीण-’’ इत्यादिना त्रीणि सूत्राणीति समुदायपातनिका।
इदानीं संज्ञिमार्गणायां संज्ञिनामन्तरप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
सण्णियाणुवादेण सण्णीणमंतरं केवचिरं कालादो होेदि ?।।१४२।।
जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।१४३।।
उक्कस्सेण अणंतकालमसंखेज्जपोग्गलपरियट्टं।।१४४।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थः सुगमोऽस्ति। संज्ञिजीवेभ्योऽसंज्ञित्वं गत्वा असंज्ञिजीवानां स्थितिं स्थित्वा संज्ञिजीवेषूत्पन्नस्यावलिकायाः असंख्यातभागमात्रपुद्गलपरिवर्तनान्तरमुपलभ्यते।
एवं प्रथमस्थले संज्ञिनामन्तरनिरूपणत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।
असंज्ञिजीवानामन्तरनिरूपणाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
असण्णीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।१४५।।
जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।१४६।।
उक्कस्सेण सागरोवमसदपुधत्तं।।१४७।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-असंज्ञिजीवेभ्यः संज्ञिनामवस्थां गत्वा संज्ञिस्थितिं भ्रमित्वा असंज्ञिषूत्पन्नस्य सागरोपमशतपृथक्त्वमात्रान्तरमुपलभ्यते।
तात्पर्यमेतत्-‘‘हिताहितप्राप्तिपरिहारसमर्थं हि प्रमाणं ततो ज्ञानमेव तत्१।’’ इति सूत्रकथितेन ये संज्ञिनो जीवाः त एव समीचीनज्ञानेऽधिकारत्वं प्राप्नुवन्ति ततः कारणात् संज्ञित्वं संप्राप्य ‘कदाचिदपि वयमसंज्ञित्वं न गच्छेम’ इति भावयित्वा मोक्षपुरुषार्थे एव प्रयत्नो विधेयः।
एवं द्वितीयस्थले असंज्ञिजीवानामन्तरप्रतिपादनत्वेन सूत्रत्रयं गतम् ।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे एकजीवापेक्षया अन्तरानुगमे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां संज्ञिमार्गणानाम त्रयोदशोऽधिकारः समाप्तः।

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अथ संज्ञीमार्गणा अधिकार

अब दो स्थलों में छह सूत्रों के द्वारा अन्तरानुगम में संज्ञीमार्गणा नाम का अधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथम स्थल में संज्ञी जीवों का अन्तर कथन करने वाले ‘‘सण्णिया’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। पुन: द्वितीय स्थल में असंज्ञी जीवों का अन्तर प्रतिपादन करने हेतु ‘‘असण्णीण’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

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अब संज्ञीमार्गणा में संज्ञी जीवों का अन्तर प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित किये जाते हैं-

सूत्रार्थ-

संज्ञीमार्गणानुसार संज्ञी जीवों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।१४२।।

संज्ञी जीवों का अन्तर जघन्य से क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण है।।१४३।।

संज्ञी जीवों का उत्कृष्ट अन्तर अनन्तकाल है। जो असंख्येय पुद्गलपरिवर्तनों के बराबर है।।१४४।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त सभी सूत्रों का अर्थ सुगम है। संज्ञी जीवों से असंज्ञियों में जाकर और वहाँ असंज्ञी की स्थितिप्रमाण रहकर संज्ञियों में उत्पन्न हुए जीव के आवली के असंख्यातवें भागमात्र पुद्गलपरिवर्तनप्रमाण अन्तर पाया जाता है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में संज्ञी जीवों का अन्तर निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब असंज्ञी जीवों का अन्तर निरूपण करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

असंज्ञी जीवों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।१४५।।

असंज्ञी जीवों का अन्तर जघन्य से क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण है।।१४६।।

असंज्ञी जीवों का उत्कृष्ट अन्तर सौ सागरोपमपृथक्त्वप्रमाण है।।१४७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-असंज्ञियों से संज्ञियों में जाकर और वहाँ संज्ञी की स्थितिप्रमाण काल तक भ्रमणकर असंज्ञियों में उत्पन्न हुए जीव के सौ सागरोपमपृथक्त्वमात्र अन्तर प्राप्त होता है।

तात्पर्य यह है कि-‘‘हित की प्राप्ति और अहित का परिहार करने में जो समर्थ है, वही ज्ञान कहलाता है और वही ज्ञान प्रमाण है।’’ इस सूत्र कथित सिद्धान्त के द्वारा जो संज्ञी जीव हैं, वे ही समीचीन ज्ञान को प्राप्त करने के अधिकारी होते हैें, इस कारण से संज्ञीपने को प्राप्त करके हम पुन: कभी भी असंज्ञीपने को प्राप्त न होने पाएं ऐसी भावना भाते हुए मोक्षपुरुषार्थ में ही प्रयत्न करना चाहिए।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में असंज्ञी जीवों का अन्तर बतलाने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में एक जीव की अपेक्षा अन्तरानुगम में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में संज्ञीमार्गणा नाम का तेरहवाँ अधिकार समाप्त हुआ।