ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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13.सम्यक्त्व मार्गणा अधिकार

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सम्यक्त्व मार्गणा अधिकार

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अथ सम्यक्त्वमार्गणाधिकार:

अथ पंचभिरन्तरस्थलैः षोडशसूत्रैः सम्यक्त्वमार्गणानाम द्वादशोऽधिकारः प्रारभ्यते । ततस्तावत् प्रथमस्थले सामान्येन सम्यक्त्वमार्गणायां कालकथनप्रमुखेन ‘‘सम्मत्ता’’ इत्यादिना त्रीणि सूत्राणि। ततः परं द्वितीयस्थले क्षायिकसम्यक्त्वस्थितिप्रतिपादनत्वेन ‘खइय’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तत्पश्चात् तृतीयस्थले वेदकसम्यग्दृष्टीनां कालनिरूपणत्वेन ‘‘वेदग’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तदनंतरं चतुर्थस्थले उपशमसम्यग्दृष्टीनां सम्यग्मिथ्यादृष्टीनां च कालप्ररूपणत्वेन ‘‘उवसम’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। ततः परं पंचमस्थले सासादनानां मिथ्यादृष्टीनां च कालप्ररूपणत्वेन ‘‘सासण’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयं इति समुदायपातनिका।
इदानीं सम्यक्त्वमार्गणायां कालप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
सम्मत्ताणुवादेण सम्माइट्ठी केवचिरं कालादो होंति ?।।१८८।।
जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।१८९।।
उक्कस्सेण छावट्ठिसागरोवमाणि सादिरेयाणि।।१९०।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-य कश्चिद् बहुशः सम्यक्त्वपर्यायेण परिणतः मिथ्यादृष्टी जीवः सम्यक्त्वं गत्वा जघन्यमन्तर्मुहूर्तं स्थित्वा मिथ्यात्वं गतः तस्यैष जघन्यकाल उपलभ्यते । कश्चित् जीवः त्रीण्यपि करणानि कृत्वा प्रथमसम्यक्त्वं गृहीत्वान्तर्मुहूर्तं स्थित्वा वेदकसम्यक्त्वं प्रतिपद्य तत्र तिसृभिः पूर्वकोटिभिः समधिक-द्विचत्वािरशत्सागरोपमाणि गमयित्वा क्षायिकसम्यक्त्वं प्रतिष्ठाप्य चतुर्विंशति सागरोपमायुःस्थितिकेषु देवेषूत्पद्य पुनः पूर्वकोटि-आयुःस्थितिकेषु मनुष्येषूत्पद्यावसानेऽबंधकत्वं गतस्तस्योत्कृष्टकालो लभ्यते सातिरेकं षट्षष्टिसागरप्रमाणमिति।
एवं प्रथमस्थले सामान्यसम्यग्दृष्टीनां कालप्ररूपणत्वेन सूत्रत्रयं गतं।
संप्रति क्षायिकसम्यग्दृष्टीनां कालकथनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
खइयसम्माइट्ठी केवचिरं कालादो होंति ?।।१९१।।
जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।१९२।।
उक्कस्सेण तेत्तीससागरोवमाणि सादिरेयाणि।।१९३।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-वेदकसम्यग्दृष्टेर्जीवस्य दर्शनमोहनीयं क्षपयित्वा क्षायिकसम्यक्त्वं प्रतिपद्य जघन्यकालेनाबंधकत्वं गतस्य तदुपलंभात्।
उत्कर्षेण-चतुर्विंशतिप्रकृतिसत्ताकः सम्यग्दृष्टिर्देवो नारको वा पूर्वकोट्यायुष्कमुनष्येषु उत्पन्नः, गर्भाद्यष्ट-वर्षाणामन्तर्मुहूर्ताभ्यधिकानां उपरि क्षायिवंâ प्रतिष्ठाप्य देशोनपूर्वकोटिप्रमाणं स्थित्वा त्रयस्त्रिंशदायुःस्थितिदेवे-षूत्पद्य पुनः पूर्वकोट्याः स्थितिमुनष्येषूत्पद्यान्तर्मुहूर्तावशेषे संसारेऽबंधभावं गतः, तस्य द्वि-अंतर्मुहूर्ताधिकाष्ट-वर्षोणद्विपूर्वकोटिभिः साधिकत्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाणामुपलभ्यते।
एवं द्वितीयस्थले क्षायिकसम्यग्दृष्टीनां कालनिरूपणत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।
वेदकसम्यग्दृष्टीनां कालनिरूपणाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
वेदगसम्माइट्ठी केवचिरं कालादो होंति ?।।१९४।।
जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।१९५।।
उक्कस्सेण छावट्ठिसागरोवमाणि।।१९६।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-दृष्टमोक्षमार्गः मिथ्यादृष्टिः सम्यक्त्वं गृहीत्वा जघन्यमन्तर्मुहूर्तं स्थित्वा मिथ्यात्वं गतस्तस्य एतद्जघन्यकालः उपलभ्यते।
उत्कर्षेण-उपशमसम्यक्त्वात् वेदकसम्यक्त्वं प्रतिपद्य शेषभुज्यमाना-युष्केनोनिंवशतिसागरोपमा-युष्कस्थितिकेषु देवेषूत्पद्य ततो मनुष्येषु उत्पद्य पुनः मनुष्यायुष्केषु ऊनद्वाविंशति-सागरोपमायुष्केषु देवेषु उत्पद्य पुनो मनुष्यगतिं गत्वा भुज्यमानमनुष्यायुष्केन दर्शनमोहक्षपणपर्यंतभुक्ष्यमाण-मनुष्यायुष्केन च न्यूनचतुर्विंशति सागरोपमायुष्कस्थितिकेषु देवेषूत्पद्य मनुष्यगतिमागत्य तत्र वेदकसम्यक्त्व-कालोऽन्तर्मुहूर्तमात्रोऽस्ति इति दर्शनमोहक्षपणं प्रतिष्ठाप्य कृतकरणीयो भूत्वा कृतकरणीयचरमसमये स्थितस्य षट्षष्टिसागरोपममात्रकाल उपलभ्यते।
एवं तृतीयस्थले वेदकसम्यग्दृष्टीनां कालनिरूपणत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।

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अथ सम्यक्त्वमार्गणा अधिकार प्रारंभ

अब पाँच अन्तर स्थलों में सोलह सूत्रों के द्वारा सम्यक्त्व मार्गणा नाम का बारहवाँ अधिकार प्रारंभ हो रहा है। उनमें से प्रथम स्थल में सामान्य से सम्यक्त्वमार्गणा में काल कथन की मुख्यता वाले ‘‘सम्मत्ता’’ इत्यादि तीन सूत्र कहेंगे। उसके बाद द्वितीय स्थल में क्षायिक सम्यक्त्व की स्थिति का प्रतिपादन करने हेतु ‘‘खइय’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। तत्पश्चात् तृतीय स्थल में वेदक सम्यग्दृष्टि जीवों का काल निरूपण करने हेतु ‘‘वेदग’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। तदनंतर चतुर्थ स्थल में उपशमसम्यग्दृष्टि जीवों का एवं सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवों का काल प्ररूपण करने वाले ‘‘उवसम’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। उसके पश्चात् पंचम स्थल में सासादनसम्यग्दृष्टि और मिथ्यादृष्टि जीवों का काल प्ररूपण करने हेतु ‘‘सासण’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। इस प्रकार सूत्रों की समुदायपातनिका हुई है।

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अब सम्यक्त्वमार्गणा में काल का प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित किये जा रहे हैं-

सूत्रार्थ-

सम्यक्त्वमार्गणानुसार जीव सम्यग्दृष्टि कितने काल तक रहते हैं ?।।१८८।।

जघन्य से अन्तर्मुहूर्त काल तक जीव सम्यग्दृष्टि रहते हैं।।१८९।।

उत्कृष्ट से कुछ अधिक छ्यासठ सागरोपम काल तक जीव सम्यग्दृष्टि रहते हैं।।१९०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-जिसने अनेक बार सम्यक्त्व पर्याय प्राप्त कर ली है ऐसे मिथ्यादृष्टि जीव के सम्यक्त्व को प्राप्तकर जघन्य से अन्तर्मुहूर्त काल तक रहकर मिथ्यात्व में जाने पर सम्यग्दर्शन का अन्तर्मुहूर्त काल प्राप्त हो जाता है। किसी जीव ने तीनों ही करण करके प्रथम सम्यक्त्व ग्रहण किया और वहाँ अन्तर्मुहूर्त काल तक रहकर वेदकसम्यक्त्व को धारण कर लिया। वहाँ तीन पूर्व कोटि अधिक ब्यालीस सागरोपमकाल व्यतीत करके क्षायिकसम्यक्त्व स्थापित किया और चौबीस सागरोपम आयुस्थिति वाले देवों में उत्पन्न हुआ। इसके पश्चात् पूर्वकोटि आयु स्थिति वाले मनुष्यों में उत्पन्न होकर आयु के अन्त समय में अबंधक भाव प्राप्त कर लिया। ऐसे जीव के सम्यग्दर्शन का कुछ अधिक (चार पूर्वकोटि अधिक) छ्यासठ सागरोपमप्रमाण काल प्राप्त हो जाता है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में सामान्य सम्यग्दृष्टि जीवों का कालनिरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीवों का काल कथन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

जीव क्षायिकसम्यग्दृष्टि कितने काल तक रहते हैं ?।।१९१।।

जघन्य से अन्तर्मुहूर्त काल तक जीव क्षायिकसम्यग्दृष्टि रहते हैं।।१९२।।

उत्कृष्ट से कुछ अधिक तेतीस सागरोपमप्रमाणकाल तक जीव क्षायिकसम्यग्दृष्टि रहते हैं।।१९३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-वेदकसम्यग्दृष्टि जीव के दर्शनमोहनीय का क्षपण करके क्षायिकसम्यक्त्व को उत्पन्न कर जघन्यकाल से अबंधक भाव को प्राप्त होने पर अन्तर्मुहूर्त काल पाया जाता है।

उत्कृष्ट से-जब चौबीस कर्मों की सत्ता वाला सम्यग्दृष्टि देव या नारकी पूर्वकोटि आयु वाले मनुष्यों में उत्पन्न होकर गर्भ से आठ वर्ष व अन्तर्मुहूर्त अधिक हो जाने पर क्षायिकसम्यक्त्व को स्थापित करता है और कुछ कम पूर्वकोटि तक रहकर तेतीस सागरोपम की आयु स्थिति वाले देवों में उत्पन्न होकर पुन: पूर्वकोटि आयु स्थिति वाले मनुष्यों में उत्पन्न हुआ, वहाँ अन्तर्मुहूर्तमात्र संसारकाल के अवशेष रहने पर अबंधक भाव को प्राप्त हो जाता है, तब उसके क्षायिकसम्यक्त्व का काल दो अन्तर्मुहूर्त से अधिक आठ वर्ष कम दो पूर्वकोटि सहित तेतीस सागरोपमप्रमाण पाया जाता है।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में क्षायिक सम्यग्दृष्टि जीवों का काल निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब वेदक सम्यग्दृष्टि जीवों का काल निरूपण करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

जीव वेदकसम्यग्दृष्टि कितने काल तक रहते हैं ?।।१९४।।

जघन्य से अन्तर्मुहूर्त काल तक जीव वेदकसम्यग्दृष्टि रहते हैं।।१९५।।

उत्कृष्ट से छ्यासठ सागरोपमकाल तक जीव वेदकसम्यग्दृष्टि रहते हैं।।१९६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-जिसने मोक्षमार्ग देख लिया है, ऐसे मिथ्यादृष्टि जीव के, सम्यक्त्व ग्रहण करके जघन्य से वहाँ अन्तर्मुहूर्त रहकर पुन: मिथ्यात्व में चले जाने पर वेदकसम्यक्त्व का जघन्यकाल अन्तर्मुहूर्त काल प्राप्त हो जाता है।

उत्कृष्ट से-कोई जीव उपशमसम्यक्त्व से वेदकसम्यक्त्व को प्राप्त होकर शेष भुज्यमान आयु से कम बीस सागरोपम आयुस्थिति वाले देवों में उत्पन्न हुआ। फिर वहाँ से मनुष्यों में उत्पन्न होकर पुन: मनुष्यायु से कम बाईस सागरोपम आयु स्थिति वाले देवों में उत्पन्न हुआ। पुन: वहाँ से मनुष्यगति में जाकर भुज्यमान मनुष्यायु से तथा दर्शनमोह के क्षपण में जितना काल लगना संभव है, उतने काल प्रमाण आगे भोगी जाने वाली मनुष्यायु से कम चौबीस सागरोपम आयु स्थिति वाले देवों में उत्पन्न हुआ। वहाँ से पुन: मनुष्यगति में आकर वहाँ वेदकसम्यक्त्वकाल के अन्तर्मुहूर्त मात्र रहने पर दर्शनमोह के क्षपण को स्थापित कर कृतकरणीय-कृतकृत्यवेदक हो गया। ऐसे कृतकरणीय के अंतिम समय में स्थित जीव के वेदकसम्यक्त्व का छ्यासठ सागरोपमप्रमाण काल पाया जाता है।

इस प्रकार तृतीय स्थल में वेदकसम्यग्दृष्टि जीवों का काल निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अधुना उपशमसम्यग्दृष्टीनां सम्यग्मिथ्यादृष्टीनां च कालनिरूपणाय सूत्रत्रयमवतार्यते-

उवसमसम्मादिट्ठी सम्मामिच्छादिट्ठी केवचिरं कालादो होंति ?।।१९७।।

जहण्णेण अंतोमुहुत्तं।।१९८।।
उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं।।१९९।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-कश्चिद् मिथ्यादृष्टिर्जीवः प्रथमसम्यक्त्वं प्रतिपद्य षडावलिकाशेषे सासादनं गतस्तस्य तदुपलंभात्। एवमेव मिथ्यात्वात् वेदकसम्यक्त्वाद्वा सम्यग्मिथ्यात्वं गत्वा जघन्यकालं स्थित्वा गुणस्थानान्तरं गतःतस्य जघन्यकालो लभ्यते।
इत्थमेव उत्कर्षेण उपशमसम्यक्त्वस्य सम्यग्मिथ्यात्वस्य चान्तर्मुहूर्तमेव।
एवं चतुर्थस्थले उपशमसम्यग्दृष्टि-सम्यग्मिथ्यादृष्टिजीवयोः कालनिरूपणत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।
संप्रति सासादन-मिथ्यादृष्टिजीवानां कालप्रतिपादनाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-
सासणसम्माइट्ठी केवचिरं कालादो होंति ?।।२००।।
जहण्णेण एयसमओ।।२०१।।
उक्कस्सेण छावलियाओ।।२०२।।
मिच्छादिट्ठी मदिअण्णाणीभंगो।।२०३।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-उपशमसम्यक्त्वकाले एकसमयावशेषे सासादनं गतस्य सासादनगुणस्थानस्य एकसमयकालोपलंभात्। एकसमयादारभ्य यावदुत्कर्षेण षडावलिकाः अवशेषाः संति, एषां मध्ये यावन्त उपशमसम्यक्त्वकालास्तावन्तश्चैव सासादनगुणस्थानविकल्पाः भवन्ति।
कश्चिदाह-य उपशमसम्यक्त्वकालं संपूर्णं स्थितः, सः सासादनगुणस्थानं न प्रतिपद्यते इति कथं ज्ञायते ?
आचार्यः प्राह-एतस्मादेव सूत्राद् ज्ञायते, आचार्यपरंपरागतोपदेशाच्च।
सासादनस्य उत्कृष्टकालः षडावलिकाः प्रमाणं भवति ।
मिथ्यात्वस्य अनाद्यनन्तं अनादिसान्तं सादिसान्तमिति त्रिविधाः विकल्पाः सन्ति। सादिसान्तकाल: जघन्येनान्तर्मुहुर्तं, उत्कर्षेण उपाद्र्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाणमिति ज्ञातव्यं।
तात्पर्यमेतत्-सम्यक्त्वमार्गणायां एकजीवापेक्षया कालस्य व्याख्यानं ज्ञात्वा महता प्रयत्नेन सम्यक्त्वकाल एवाश्रयणीयः। किंच-
उक्तं श्रीमत्समन्तभद्रस्वामिना-
न सम्यक्त्वसमं किञ्चित्त्रैकाल्ये त्रिजगत्यपि ।
श्रेयोऽश्रेयश्च मिथ्यात्व-समं नान्यत्तनूभृताम्।।३४।।
एवं पंचमस्थले सासादनमिथ्यात्वकालनिरूपणत्वेन चत्वारि सूत्राणि गतानि।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे एकजीवापेक्षया कालानुगमे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां सम्यक्त्वमार्गणानाम द्वादशोऽधिकारः समाप्तः।


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अब उपशमसम्यग्दृष्टि एवं सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवों का काल निरूपण करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

जीव उपशमसम्यग्दृष्टि व सम्यग्मिथ्यादृष्टि कितने काल तक रहते हैं ?।।१९७।।

जघन्य से अन्तर्मुहूर्त काल तक जीव उपशमसम्यग्दृष्टि व सम्यग्मिथ्यादृष्टि रहते हैं।।१९८।।

उत्कृष्ट से अन्तर्मुहूर्त काल तक जीव उपशमसम्यग्दृष्टि व सम्यग्मिथ्यादृष्टि रहते हैं।।१९९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-कोई मिथ्यादृष्टि जीव प्रथम सम्यक्त्व को प्राप्त कर प्रथमोपशमसम्यक्त्व के काल में छह आवली शेष रहने पर सासादन गुणस्थान में जाता है तब उसके उपशमसम्यक्त्व का जघन्यकाल अन्तर्मुहूर्त पाया जाता है। इसी प्रकार मिथ्यात्व से या वेदक सम्यक्त्व से सम्यग्मिथ्यात्व में जाकर व जघन्यकाल प्रमाण वहाँ रहकर अन्य गुणस्थान में जाने पर सम्यग्मिथ्यात्व का अन्तर्मुहूर्तमात्र जघन्य काल पाया जाता है।

इसी प्रकार उत्कृष्टरूप से उपशमसम्यक्त्व का एवं सम्यग्मिथ्यात्व का काल अन्तर्मुहूर्त ही होता है।

इस प्रकार चतुर्थ स्थल में उपशमसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवों का काल निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब सासादनसम्यग्दृष्टि एवं मिथ्यादृष्टि जीवों का काल प्रतिपादन करने हेतु चार सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

जीव सासादनसम्यग्दृष्टि कितने काल तक रहते हैं ?।।२००।।

जघन्य से एक समय तक जीव सासादनसम्यग्दृष्टि रहते हैं।।२०१।।

उत्कृष्ट से छह आवली काल तक जीव सासादनसम्यग्दृष्टि रहते हैं।।२०२।।

मिथ्यादृष्टि जीवों की काल प्ररूपणा मतिअज्ञानी जीवों के समान है।।२०३।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपशम सम्यक्त्व के काल में एक समय शेष रहने पर सासादन गुणस्थान में जाने वाले जीव के सासादन गुणस्थान का एक समय काल पाया जाता है। एक समय से प्रारंभ करके अधिक से अधिक छह आवलियों तक का सासादन गुणस्थान का उत्कृष्टकाल है, इस मध्य जितना उपशमसम्यक्त्व का काल है, उतना ही सासादनगुणस्थान काल के विकल्प होते हैं।

यहाँ कोई शंका करता है कि-जो जीव उपशमसम्यक्त्व के संपूर्ण काल तक उपशमसम्यक्त्व में रहता है वह सासादन गुणस्थान में नहीं जाता, यह कैसे जाना जाता है ?

तब आचार्य समाधान देते हैं कि-इसी प्रस्तुत सूत्र से ही तथा आचार्य परम्परागत उपदेश से यह बात जानी जाती है। सासादनसम्यक्त्व का उत्कृष्ट छह आवली प्रमाण होता है।

मिथ्यात्व के अनादि-अनन्त, अनादि-सान्त, सादि-सान्त इस प्रकार तीन प्रकार के विकल्प हैं। सादि-सान्त काल जघन्य से अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट से उपाद्र्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण जानना चाहिए।

तात्पर्य यह है कि-सम्यक्त्वमार्गणा में एक जीव की अपेक्षा काल का व्याख्यान जानकर बहुत प्रयत्न करके सम्यक्त्व के काल का ही आश्रय लेना चाहिए। क्योंकि श्री समन्तभद्र स्वामी ने कहा भी है-

श्लोकार्थ-तीनों लोकों में और तीनों कालों में संसारी प्राणियों के लिए सम्यक्त्व के समान हितकारी एवं मिथ्यात्व के समान कोई अहितकारी वस्तु नहीं है।

इस तरह से पंचम स्थल में सासादन एवं मिथ्यात्व का काल निरूपण करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रक बंध नामक द्वितीय खण्ड में एक जीव की अपेक्षा कालानुगम में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में सम्यक्त्वमार्गणा नाम का बारहवाँ अधिकार समाप्त हुआ।