ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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13. रावण का वध

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रावण का वध

(१५५)

यह शब्द नहीं था वङ्कापात, रावण की गर्वित शक्ती पर ।
वह चिल्लाकर बोला लक्ष्मण, मत गर्व करो चक्रीपद पर ।।
जब देखा रावण का घमण्ड, बन गया आज लाचारी है।

तब चक्र घुमाकर चला दिया, तब शोर हुआ था भारी है।।
(१५६)

रावण का हृदय विदीर्ण हुआ, गिर पड़ा वहीं पृथ्वीतल पर।
सेना में हाहाकार मचा, और गिरा वङ्का सबके दिल पर ।।
सुग्रीव आदि विद्याधर सब, तब अभय घोषणा करते हैं।

मत डरो शांत हो जावो अब, सबको संवेदना देते हैं।।
(१५७)

वह चक्र मारकर रावण को, लक्ष्मण के हाथों में आया।
ये हुये आठवें नारायण, सब ओर यही स्वर लहराया।।
बलभद्र राम नारायण वेâ, जयकारों से नभ व्याप्त हुआ ।

थी चारों तरफ हुई शान्ति, उस दिन से युद्ध समाप्त हुआ।।
(१५८)

इस तरह भ्रात को पड़ा देख, था धैर्य विभीषण ने खोया।
वह मोह—शोक से पीड़ित हो भाई की हालत पर रोया।।
हे भ्राता ! क्यों सब छोड़ गये कह—कह मूच्र्छित हो जाते थे।

होकर सचेत वह बार—बार, बस यही शब्द दुहराते थे।।
(१५९)

जल में थल में नीले नभ में, हर तरफ उदासी छायी थी।
अठ्ठारह हजार रानियाँ भी, तब रोती—रोती आयी थी।।
थी चारों तरफ त्राहि—त्राहि, सबने मिल करूण विलाप किया।

श्री रामलखन ने किसी तरह, समझाकर सबको शांत किया।।
(१६०)

सबने मिलकर लंकेश्वर का, विधिपूर्वक दाहसंस्कार किया।
स्नान आदि से निर्वृत हो, सबने मिल यही विचार किया।।
श्री कुम्भकर्ण और इंद्रजीत को, कैसे बंधन मुक्त करें।

ये देख पिता की चिता कहीं, न हम पर ही उपसर्ग करें।।
(१६१)

इसलिए बेड़ियों सहित इन्हें, श्रीरामनिकट में ले आये।
बोले तब रघुवर उन सबसे, सम्भालों राज्यपाट अब ये।।
‘अब पाणिपात्र में ही भोजन, लेंगे ये करी प्रतिज्ञा है ’’।

यह राज्यभोग, सुखवैभव ये, क्षणभंगुर है सब मिथ्या है।।
(१६२)

ये रुकने वाले चरण नहीं, जिनको वैराग्य समाया है।
जब इन्द्रादिक पद पा करके, मन तृप्त नहीं हो पाया है।।
तब तुम्हीं कहो नृप भौतिक सुख, क्या सुख हमको दे पाएँगें।

यह मोरमुकुट ये राजमुकुट, क्या शांति हमें दे पाएँगे।।
(१६३)

प्रिय सुनो उसीदिन संध्या में, श्री अनंतवीर्य मुनि आये थे।
संघ में उनके छप्पन हजार, मुनि नभ से वहीं पधारे थे।।
कुसुमायुध उपवन धन्य हुआ, अरु धन्य हुई वह नगरी थी।

दो सौ योजन तक की वसुधा, निर्बैर हो गयी सगरी थी।।
(१६४)

आचार्य प्ररूपण करते हैं, यदि संघ सुबह ही आ जाता ।
तो रावण के संग लक्ष्मण का, सब बैर खत्म ही हो जाता ।।
उस रात अनंतवीर्य मुनि ने, था मुक्तिरमा को वरण किया।

स्वर्गों से देव वहां आये, दुंदुभी बजाकर नृत्य किया।।
(१६५)

उनकी ही छाया में आकर, सबने शिव का पथ अपनाया।
मंदोदरी आदि रानियां भी, संयम धर कर तज दी माया ।।
रूक सकते कदम नहीं कोई, जब प्रबल प्रेरणा आती है।

संयोग देखियेगा विधि का, अब कैसे विधि मिलाती है।।