ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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13 - संयम मार्गणासार

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संयम मार्गणासार

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संयममार्गणा का लक्षण—अिंहसादि पंचमहाव्रतों को धारण करना, पाँच समितियों का पालना, क्रोधादि चार कषायों का निग्रह करना, मन वचन, काय रूप दण्ड का त्याग तथा पाँच इंद्रियों का जय इसको संयम कहते हैं।

संयम के पाँच भेद हैं—सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसांपराय और यथाख्यात। इसी में संयमासंयम और असंयम के मिलाने से संयममार्गणा के सात भेद हो जाते हैं।

प्रश्न—संयममार्गणा में देशसंयम और असंयम को क्यों लिया ?

उत्तर—उस उस मार्गणा में उसके प्रतिपक्षी को भी ले लिया जाता है अथवा जैसे—वन में आम्र की प्रधानता होने से आम्रवन कहलाता है किन्तु उसमें नींबू आदि के वृक्ष भी रहते हैं।

जो संयम की विरोधी नहीं है ऐसी संज्वलन बादर कषाय के उदय से आरंभ के तीन संयम होते हैं। सूक्ष्मसंज्वलन लोभ के उदय से सूक्ष्म सांपराय संयम और सम्पूर्ण मोहनीय कर्म के उपशम या क्षय से यथाख्यात संयम होता है। तीसरी प्रत्याख्यानावरण कषाय के उदय से संयमासंयम और दूसरी अप्रत्याख्यानावरण के उदय से असंयम भाव होता है।

सामायिक—‘‘मैं सर्व सावद्य का त्यागी हूँ’’ इस तरह अभेद रूप से जो सम्पूर्ण सावद्य का त्याग करता है वह अनुपम दुर्लभ सामायिक संयम का धारी है।

छेदोपस्थापना—प्रमाद के योग से सामायिकादि से च्युत होकर उसका विधिवत् छेदन करके अपनी आत्मा को पंच प्रकार के व्रतों में स्थापन करना।

परिहारविशुद्धि—जन्म से लेकर तीस वर्ष तक सुखी रहकर पुन: दीक्षा ग्रहण कर तीर्थंकर के पादमूल में आठ वर्ष तक प्रत्याख्यान नामक नवमें पूर्व का अध्ययन करने वाले मुनि के यह संयम प्रगट होता है। इससे वे मुनि तीन संध्याकाल को छोड़कर प्रतिदिन दो कोस गमन करते हैं। इस संयम में वर्षाकाल में विहार का निषेध नहीं है। इसमें प्राणी पीड़ा का परिहार—त्याग होने से विशुद्धि है अत: ये संयमी जीवराशि में विहार करते हुए भी जल से भिन्न कमलवत् हिंसा से अलिप्त रहते हैं।

सूक्ष्मसांपराय—सूक्ष्म लोभ के उदय से दसवें गुणस्थान में सूक्ष्म सांपराय संयम होता है।

यथाख्यात—मोहनीय कर्म के सर्वथा उपशम या क्षय से यह संयम होता है। ग्यारहवें में उपशम से होता है और बारहवें, तेरहवें, चौदहवें गुणस्थान में कषाय के क्षय से होता है।

संयमासंयम—जो सम्यग्दृष्टि पाँच अणुव्रत, तीन गुणव्रत, चार शिक्षाव्रत ऐसे बारह व्रतों से युक्त हैं वे देशव्रती अथवा संयमासंयमी हैं। इस देशव्रत से भी जीवों के असंख्यातगुणी कर्मों की निर्जरा होती है।

इस देशव्रत में दर्शन प्रतिमा से लेकर उद्दिष्ट त्याग प्रतिमा तक ग्यारह भेद भी होते हैं।

असंयम—चौदह प्रकार के जीवसमास और अट्ठाईस प्रकार के इंद्रियों से जो विरत नहीं हैं उनको असंयम कहते हैं। जीव१ समास का पहले वर्णन हो चुका है। पाँच रस, पाँच वर्ण, दो गंध, आठ स्पर्श और षड्ज, ऋषभ, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद ये सात स्वर तथा एक मन इस तरह इंद्रियों के अट्ठाईस विषय हैं अर्थात् संयम के प्राणिसंयम, इंद्रियसंयम की अपेक्षा दो भेद हैं। जीवसमासगत प्राणििंहसा से विरत होना प्राणिसंयम और इंद्रिय विषयों से विरत होना इंद्रिय संयम है। असंयम में दोनों प्रकार की विरति नहीं है।

संयमी जीवों की संख्या—छठे गुणस्थान से लेकर चौदहवें तक सब संयमी हैं। उन सबकी संख्या तीन कम नव करोड़ प्रमाण है अर्थात् एक साथ अधिक से अधिक इतने संयमी रह सकते हैं।

प्रमत्त गुणस्थानवर्ती जीव ५,९३,९८,२०६, अप्रमत्त वाले २,९६,९९,१०३, उपशमश्रेणी वाले चारों गुणस्थानवर्ती १,१९६, क्षपकश्रेणी वाले चारों गुणस्थानवर्ती २,३९२, सयोगीजिन ८,९८,५०२, अयोगीजिन ५९८ इन सबका जोड़ ८,९९,९९,९९७ है। इन सबको मैं हाथ जोड़कर सिर झुकाकर त्रिकरणशुद्धि- पूर्वक नमस्कार करता हूँ।

आज पंचमकाल में मिथ्यात्व से लेकर चतुर्थ गुणस्थान तक असंयमी, देशसंयमी तथा मुनि अवस्था में सामायिक, छेदोपस्थापना संयमधारी मुनि होते हैं और पंचम काल के अंत तक होते रहेंगे इसमें कोई संशय नहीं है, ऐसा श्री कुंदकुंद भगवान ने कहा है। ऐसा समझकर वर्तमान काल के मुनियों को भी भावलिंगी मानकर नमस्कार, भक्ति, आहारदान आदि करके अपने मनुष्य जीवन को सफल करना चाहिए। हाँ, यदि कोई साधु चारित्रभ्रष्ट हों तो उनका स्थितिकरण उपगूहन करना चाहिए अन्यथा उनकी उपेक्षा कर देना चाहिए, उनकी निंंदा करके अपने सम्यक्त्व को मलिन नहीं करना चाहिए और स्वयं असंयत जीवन से निकलकर देशसंयत या मुनि बनना चाहिए।