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14.अथ वज्रपंजरस्तोत्रम्

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अथ वज्रपंजरस्तोत्रम्

परमेष्ठिनमस्कारं, सारं नवपदात्मकम्।

आत्मरक्षाकरं वज्र-पंजराख्यं स्मराम्यहम्।।१।।

ॐ णमो अरहंताणं, शिरस्कन्धरसं स्थितम्।
ॐ णमो सिद्धाणं, मुखे मुखपटाम्बरम्।।२।।

ॐ णमो आइरियाणं, अंगरक्षातिशायिनी।
ॐ णमो उवज्झायाणं, आयुधं हस्तोयोर्दृढम्।।३।।

ॐ णमो लोए सव्वसाहूणं, मोचके पदयो: शुभे।
एसो पंच णमोयारो, शिला वङ्कामयी तले।।४।।

सव्वपावप्पणासणो, वप्रो वज्रमयो बहि:।
मंगलाणं च सव्वेसिं, खदिरांगारखातिका।।५।।

स्वाहान्तं च पदं ज्ञेयं, पढमं हवइ मंगलम्।
वप्रोपरि वज्रमयं, पिधानं देहरक्षणे।।६।।

महाप्रभावरक्षेयं, क्षुद्रोपद्रवनाशिनी।
परमेष्ठीपदोद्भूता, कथिता पूर्वसूरिभि:।।७।।

यश्चैवं कुरुते रक्षां, परमेष्ठिपदै: सदा।
तस्य न स्याद् भयं व्याधि-राधिश्चापि कदाचन।।८।।