ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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14.आहारमार्गणाधिकार

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विषय सूची

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आहारमार्गणाधिकार

अथ आहारमार्गणाधिकार:

अथ स्थलद्वयेन चतुर्भिः सूत्रैः अन्तरानुगमे आहारमार्गणाधिकारः कथ्यते। तत्र प्रथमस्थले आहारजीवानां अंतरकथनत्वेन ‘‘आहाराणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। तदनु द्वितीयस्थले अनाहारिणामन्तरनिरूपणत्वेन ‘‘अणाहारा’’ इत्यादिसूत्रमेकमिति पातनिका सूचिता भवति।
इदानीं आहारकजीवानामन्तरप्रतिपादनार्थ सूत्रत्रयमवतार्यते-
आहाराणुवादेण आहाराणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ?।।१४८।।
जहण्णेण एगसमयं।।१४९।।
उक्कस्सेण तिण्णिसमयं।।१५०।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थः सुगमो वर्तते। एकविग्रहं कृत्वा गृहीतशरीरस्य जीवस्य जघन्येनैक-समयस्यान्तरमुपलभ्यते। उत्कर्षेण त्रीन् विग्रहान् कृत्वा गृहीतशरीरस्य जीवस्य त्रिसमयान्तरं लभ्यते ।
एवं प्रथमस्थले आहारकाणामन्तरनिरूपणत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।
अनाहारकाणामन्तरप्रतिपादनाय सूत्रमवतरति-
अणाहारा कम्मइयकायजोगिभंगो।।१५१।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-अनाहारकाणां जीवानां जघन्येनान्तरं त्रिसमयोनक्षुद्रभवग्रहणकालमात्रं। उत्कर्षेणा-गुंलस्यासंख्यातभागः असंख्यातासंख्याताः अवसर्पिण्युत्सर्पिण्यः ज्ञातव्याः। इत्येताभ्यां जघन्योत्कृष्टान्तराभ्यां द्वयोरभेदात्।
अयमत्राभिप्रायः-एकजीवापेक्षयान्तरानुगमं विज्ञाय यत्र नैरन्तर्यं सुखमतीन्द्रियमस्ति तत्र मोक्षे एव स्पृहा विधातव्या। तस्य मोक्षस्य कारणं यत् चिच्यैतन्यमयं ज्योतिः तदेवात्मस्वरूपं परं तेजो वर्तते। तस्य कृते प्रयत्नः कर्तव्यः। उत्तंâ च श्रीपद्मनन्दिसूरिवर्येण-
केवलज्ञानदृक्सौख्य-स्वभावं तत्परं महः।
तत्र ज्ञाते न किं ज्ञातं दृष्टे दृष्टं श्रुते श्रुतम्।।२०।।
इति ज्ञेयं तदेवैकं श्रवणीयं तदेव हि।
दृष्टव्यं च तदेवैकं नान्यन्निश्चयतो बुधैः।।२१।।
गुरूपदेशतोऽभ्यासाद् वैराग्यादुपलभ्य यत्।
कृतकृत्यो भवेद् योगी, तदेवैकं न चापरम्।।२२।।
एवं द्वितीयस्थले अनाहाराणामन्तरनिरूपणत्वेन सूत्रमेकं गतम्।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे एकजीवापेक्षया अन्तरानुगमे
गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां आहारमार्गणानाम
चतुर्दशोऽधिकारः समाप्तः।
अस्मिन् मध्यलोके जम्बूद्वीपे भरतक्षेत्रस्यार्यखंडे द्वौ एव शाश्वततीर्थौ अयोध्यानगरी सम्मेदशिखरपर्वतं च। तत्तीर्थकरजन्मभूमिं निर्वाणभूमिं च नमस्कृत्य निजात्मशुद्ध्यर्थं निर्वाणप्राप्तसर्वसिद्धान् वंदामहे वयं भक्तिभावेन त्रिसंध्यं त्रिकरणशुद्ध्या तीर्थकरवाचश्च हृदि स्थापयामः संसारसमुद्रतरणाय सुलभेनेति।
इति श्रीमद्भगवत्पुष्पदन्तभूतबलिप्रणीतषट्खंडागमस्य श्रीमद्भूतबलिसूरिविरचितक्षुद्रकबंध-
नाम्नि द्वितीयखंडे एकजीवापेक्षयान्तरानुगमे श्रीवीरसेनाचार्यकृतधवलाटीकाप्रमुखनाना-
ग्रंथाधारेण विंशतितमे शताब्दौ प्रथमाचार्यः चारित्रचक्रवर्ती श्री शांतिसागरस्तस्य
प्रथमपट्टाचार्यस्य श्रीवीरसागरगुरोः शिष्या-जम्बूद्वीपरचनाप्रेरिका गणिनी-ज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणि-टीकायां एकपंचाशदधिकशतसूत्रैः एकजीवापेक्षयान्तरानुगमो नाम तृतीयोमहाधिकारः समाप्तः।

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अथ आहारमार्गणा अधिकार

अब दो स्थलों में चार सूत्रों के द्वारा अन्तरानुगम में आहारमार्गणा नाम का अधिकार प्रारंभ हो रहा है। उनमें से प्रथम स्थल में आहारक जीवों का अन्तर कथन करने वाले ‘‘आहाराणुवादेण’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। उसके पश्चात् द्वितीय स्थल में अनाहारक जीवों का अन्तर निरूपण करने हेतु ‘‘अणाहारा’’ इत्यादि एक सूत्र हैं। सूत्रों की यह समुदायपातनिका सूचित की गई है।

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अब आहारक जीवों का अन्तर प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

आहारमार्गणानुसार आहारक जीवों का अन्तर कितने काल तक होता है ?।।१४८।।

आहारक जीवों का अन्तर जघन्य से एक समय मात्र होता है।।१४९।।

आहारक जीवों का उत्कृष्ट अन्तर तीन समय प्रमाण है।।१५०।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-इन सभी सूत्रों का अर्थ सुगम है। एक विग्रह करके शरीर के ग्रहण कर लेने पर जघन्य से एक समय का अन्तर प्राप्त होता है। उत्कृष्ट से तीन विग्रहों को करके ग्रहण किये गये शरीर वाले जीव के तीन समय का अन्तर प्राप्त होता है। इस प्रकार प्रथम स्थल में आहारक जीवों का अन्तर बतलाने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब अनाहारक जीवों का अन्तर प्रतिपादन करने के लिए सूत्र अवतरित होता है-

सूत्रार्थ-

अनाहारक जीवों का अन्तर कार्मणकाययोगियों के समान है।।१५१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-अनाहारक जीवों का जघन्य से अन्तर तीन समय कम क्षुद्रभवग्रहण और उत्कृष्ट से अंगुल के असंख्यातवें भागमात्र अंतर असंख्यातासंख्यात उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी प्रमाण जानना चाहिए। क्योंकि इन जघन्य व उत्कृष्ट अन्तर की अपेक्षा दोनों में कोई भेद नहीं है।

यहाँ अभिप्राय यह है कि-एक जीव की अपेक्षा अन्तरानुगम जानकर जहाँ शाश्वत और अतीन्द्रिय सुख है, उस मोक्ष को प्राप्त करने की ही इच्छा करना चाहिए। उस मोक्ष का कारण जो चिच्चैतन्य स्वरूपमय ज्योति है, वही आत्मा का परं-उत्कृष्ट तेज है। उसकी प्राप्ति हेतु प्रयत्न करना चाहिए। श्री पद्मनंदि आचार्य ने कहा भी है-

श्लोकार्थ-जो उत्कृष्ट आत्मस्वरूपतेज है वह केवलदर्शन तथा केवलज्ञान और अनंतसुख स्वरूप ही है। इसलिए जिसने इस तेज को जान लिया उसने सब कुछ जान लिया और जिसने इस तेज को देख लिया, उसने सब कुछ देख लिया तथा जिसने इस तेज को सुन लिया, उसने सब कुछ सुन लिया ऐसा समझना चाहिए।।२०।।

इसलिए भव्य जीवों को निश्चय से एक चैतन्यस्वरूप ही जानने योग्य है तथा वही एक सुनने योग्य है और वही देखने योग्य है किन्तु उससे भिन्न कोई भी वस्तु न तो जानने योग्य है तथा न सुनने योग्य है और न देखने ही योग्य है, ऐसा समझना चाहिए।।२१।।

गुरु के उपदेश से तथा शास्त्र के अभ्यास से और वैराग्य से जिसको पाकर योगीश्वर कृतकृत्य हो जाते हैं, वह यही चैतन्यस्वरूपतेज और कोई नहीं है।।२२।।

इस तरह से द्वितीय स्थल में अनाहारक जीवों का अन्तर निरूपण करने वाला एक सूत्र पूर्ण हुआ।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में एक जीव की अपेक्षा अन्तरानुगम में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में आहारमार्गणा नाम का चौदहवाँ अधिकार समाप्त हुआ।

इस मध्यलोक में जम्बूद्वीप में भरतक्षेत्र के आर्यखण्ड में अयोध्या नगरी और सम्मेदशिखर पर्वत ये दो ही शाश्वत तीर्थ हैं। उस तीर्थंकर जन्मभूमि (अयोध्या) एवं निर्वाणभूमि (सम्मेदशिखर) को नमस्कार करके अपनी आत्मशुद्धि हेतु निर्वाण को प्राप्त समस्त सिद्धों की हम भक्तिभाव से वंदना करते हैं तथा तीनों संध्याओं में त्रिकरणशुद्धिपूर्वक और संसारसमुद्र से सुलभतया तिरने हेतु तीर्थंकर वचनों को हृदय में स्थापित करते हैं। इस प्रकार श्रीमान भगवान पुष्पदंत-भूतबली प्रणीत षट्खण्डागम ग्रंथ में श्री भूतबली आचार्य द्वारा विरचित क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में एक जीव की अपेक्षा अन्तरानुगम में श्रीवीरसेनाचार्य कृत धलवाटीका को प्रमुख करके नाना ग्रंथों के आधार से रचित बीसवीं सदी के प्रथमाचार्य चारित्रचक्रवर्ती श्री शांतिसागर महाराज उनके प्रथम पट्टशिष्य आचार्य श्री वीरसागर जी महाराज की शिष्या जम्बूद्वीप रचना की सम्प्रेरिका गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्त-चिंतामणिटीका में एक सौ इक्यावन सूत्रों के द्वारा वर्णित एक जीव की अपेक्षा अन्तरानुगम नाम का तृतीय महाधिकार समाप्त हुआ।