ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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14.संज्ञीमार्गणा अधिकार

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संज्ञीमार्गणा अधिकार

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अथ संज्ञिमार्गणाधिकार:

संप्रति संज्ञिमार्गणायां भावप्रतिपादनाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-
सण्णियाणुवादेण सण्णी णाम कधं भवदि ?।।८२।।
खओवसमियाए लद्धीए।।८३।।
असण्णी णाम कधं भवदि ?।।८४।।
ओदइएण भावेण।।८५।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थः सुगमो वर्तते। नोइंद्रियावरणस्य सर्वघातिस्पर्धकानां जातिवशेन अनंतगुणहान्या घातयित्वा देशघातित्वं प्राप्य उपशांतानां उदयेन संज्ञित्वदर्शनात्। इमे संज्ञिनः क्षायोपशमि-कलब्ध्या भवन्ति। असंज्ञिनः औदयिकभावेन, नोइंद्रियावरणस्य सर्वघातिस्पर्धकानामुदयेन असंज्ञित्वदर्शनात्। न च नोइंद्रियावरणमसिद्धं कार्यस्यान्वयव्यतिरेकाभ्यां कारणस्यास्तित्वसिद्धेः।
संज्ञि-असंज्ञित्वविरहितानां भावनिरूपणाय सूत्रद्वयमवतार्यते-
णेव सण्णी णेव असण्णी णाम कधं भवदि ?।।८६।।
खइयाए लद्धीए।।८७।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-ज्ञानावरणस्य निर्मूलक्षयेण उत्पन्नपरिणामः नोइन्द्रियनिरपेक्षलक्षणः क्षायिका लब्धिर्नाम। तया क्षायिकया लब्ध्या संज्ञित्वमसंज्ञित्वं न लभते। अर्हन्तो भगवन्त: सिद्धाश्च न संज्ञिनो नासंज्ञिन:।
उक्तं च- संज्ञ्यसंज्ञिद्वयावस्था-व्यतिरिक्तामलात्मने।
नमस्ते वीतसंज्ञाय नम: क्षायिकदृष्टये।।३०।।
एवं संज्ञिमार्गणायां सूत्रषट्कं गतम्।
इति श्री षट्खण्डागमग्रन्थे द्वितीयखण्डे प्रथमे महाधिकारे सिद्धांतचिंतामणिटीकायां संज्ञिमार्गणानाम त्रयोदशोऽधिकार: समाप्त:।


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अथ संज्ञीमार्गणा अधिकार

अब संज्ञीमार्गणा में भावों का कथन करने हेतु चार सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

संज्ञीमार्गणानुसार जीव संज्ञी किस कारण से होते हैं ?।।८२।।

क्षायोपशमिक लब्धि से जीव संज्ञी होते हैं।।८३।।

जीव असंज्ञी किस कारण से होते हैं ?।।८४।।

औदयिक भाव से जीव असंज्ञी होते हैं।।८५।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सभी सूत्रों का अर्थ सुगम है। नोइंद्रियावरण कर्म के सर्वघाती स्पर्धकों के अपनी जाति विशेष के कारण अनन्तगुणी हानिरूप घात के द्वारा देशघातीपने को प्राप्त होकर उपशान्त हुए उनके उदय से संज्ञिपना देखा जाता है। ये संज्ञी जीव क्षायोपशमिक लब्धि से होते हैं। असंज्ञी जीव औदयिक भाव से होते हैं, क्योंकि नोइंद्रियावरणकर्म के सर्वघाती स्पर्धकों के उदय से असंज्ञीपना देखा जाता है। नोइन्द्रियावरण कर्म असिद्ध भी नहीं है, क्योंकि कार्य के अन्वय और व्यतिरेक के द्वारा कारण के अस्तित्व की सिद्धि हो जाती है।

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अब संज्ञी और असंज्ञी दोनों अवस्थाओं से रहित सिद्धों के भाव निरूपण हेतु दो सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

जीव न संज्ञी न असंज्ञी किस कारण से होते हैं ?।।८६।।

क्षायिकलब्धि से जीव न संज्ञी न असंज्ञी होते हैं।।८७।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-ज्ञानावरण कर्म के निर्मूलक्षय से जो नोइन्द्रियनिरपेक्ष लक्षण वाला जीवपरिणाम उत्पन्न होता है, उसी को क्षायिक लब्धि कहते हैं। उसी क्षायिक लब्धि से जीव न संज्ञी और न असंज्ञी होते हैं। अरिहंत और सिद्ध भगवान संज्ञी और असंज्ञी दोनों अवस्थाओं से रहित होते हैं।

सहस्रनाम स्तोत्र में श्री जिनसेन आचार्य ने भी कहा है-

श्लोकार्थ-हे भगवन्! जो संज्ञी और असंज्ञी दोनों अवस्थाओं से रहित अमल-पवित्र आत्मा हैं। ऐसे वीतसंज्ञक क्षायिकसम्यग्दृष्टि अरिहंत भगवान के लिए मेरा नमस्कार होवे।।३०।।

इस प्रकार संज्ञीमार्गणा में छह सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ के द्वितीय खण्ड में प्रथम महाधिकार की सिद्धान्तचिंतामणिटीका में संज्ञीमार्गणा नाम का तेरहवाँ अधिकार समाप्त हुआ।