ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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14.संज्ञी मार्गणा अधिकार

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संज्ञी मार्गणा अधिकार

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अथ संज्ञिमार्गणाधिकार:

अथ द्वाभ्यामन्तरस्थलाभ्यां षड्भिः सूत्रैः संज्ञिमार्गणाधिकारः कथ्यते। तत्र तावत् प्रथमस्थले संज्ञिनां कालकथनत्वेन ‘‘सण्णियाणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रत्रयं। ततः परं द्वितीयस्थले असंज्ञिजीवानां स्थितिनिरूपण-परत्वेन ‘‘असण्णी’’ इत्यादिसूत्रत्रयं इति पातनिका।
संप्रति संज्ञिमार्गणायां कालनिरूपणाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
सण्णियाणुवादेण सण्णी केवचिरं कालादो होंति ?।।२०४।।
जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।२०५।।
उक्कस्सेण सागरोवमसदपुधत्तं।।२०६।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-कश्चिद् जीवोऽसंज्ञिजीवेभ्यः निर्गत्य संज्ञ्यपर्याप्तकेषूत्पद्य क्षुद्रभवग्रहणप्रमाणकालं स्थित्वा असंज्ञित्वं गतः तस्य जघन्यकालः उपलभ्यते। उत्कर्षेण असंज्ञिभ्यः संज्ञिषूत्पद्य सागरोपमशतपृथक्त्वं तत्रैव परिभ्रम्य निर्गतस्य तदुपलंभात्।
एवं प्रथमस्थले संज्ञिजीवकालकथनमुख्यत्वेन सूत्रत्रयं गतम्।
असंज्ञिजीवस्थितिप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
असण्णी केवचिरं कालादो होति ?।।२०७।।
जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं।।२०८।।
उक्कस्सेण अणंतकालमसंखेज्जपोग्गलपरियट्टं।।२०९।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थः सुगमो वर्तते। एकेन्द्रियजीवादारभ्य असंज्ञिपंचेन्द्रियपर्यन्ताः ये केचिद् जीवाः ते सर्वेऽसंज्ञिन एव। ते असंख्यातपुद्गलपरिवर्तनप्रमाणमनन्तकालमपि तत्रैव परिभ्रमन्ति न च संज्ञित्वं प्राप्नुवन्ति, एतज्ज्ञात्वा संज्ञित्वं पंचेंद्रियत्वं मनुष्यपर्यायं च संप्राप्य येन केनापि प्रकारेण रत्नत्रयमनुपाल-नीयं न च प्रमादः कर्तव्यः इति।
एवं द्वितीयस्थले असंज्ञिजीवकालकथनमुख्यत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे एकजीवापेक्षया कालानुगमे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां संज्ञिमार्गणानाम त्रयोदशोेऽधिकारः समाप्तः।


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अथ संज्ञी मार्गणा अधिकार प्रारंभ

अब दो अन्तरस्थलों में छह सूत्रों के द्वारा संज्ञी मार्गणा नाम का अधिकार कहा जा रहा है। उनमें से प्रथम स्थल में संज्ञी जीवों का काल कथन करने वाले ‘‘सण्णियाणुवादेण’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। उसके बाद द्वितीय स्थल में असंज्ञी जीवों की स्थिति का निरूपण करने वाले ‘‘असण्णी’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। यह सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

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अब संज्ञीमार्गणा में काल का निरूपण करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

संज्ञीमार्गणानुसार जीव कितने काल तक संज्ञी रहते हैं ?।।२०४।।

जघन्य से क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण काल तक जीव संज्ञी रहते हैं।।२०५।।

उत्कृष्ट से सौ सागरोपमपृथक्त्वप्रमाण काल तक जीव संज्ञी रहते हैं।।२०६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-कोई जीव असंज्ञी जीवों में से निकलकर संज्ञी अपर्याप्तकों में उत्पन्न होकर क्षुद्रभव ग्रहण प्रमाण काल तक वहाँ रहकर पुन: असंज्ञी भाव को प्राप्त हुआ उस जीव के जघन्य काल पाया जाता है। उत्कृष्ट से असंज्ञी जीवों में से निकलकर जो संज्ञियों में उत्पन्न हो, वहीं पर सौ सागरोपमपृथक्त्व प्रमाण काल तक रहकर परिभ्रमण करके संज्ञीपने से निकलने वाले जीव के संज्ञित्व का सौ सागरोपमपृथक्त्वप्रमाण उत्कृष्ट काल पाया जाता है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में संज्ञी जीवों का काल कथन करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब असंज्ञी जीवों की स्थिति का प्रतिपादन करने के लिए तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

जीव कितने काल तक असंज्ञी रहते हैं ?।।२०७।।

जघन्य से क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण काल तक जीव असंज्ञी रहते हैं।।२०८।।

उत्कृष्ट से अनन्तकाल तक जीव असंज्ञी रहते हैं, जो अनन्तकाल असंख्यात पुद्गलपरिवर्तन के बराबर है।।२०९।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त सूत्रों का अर्थ सुगम है। एकेन्द्रिय जीव से लेकर असंज्ञी पंचेन्द्रिय पर्यन्त जितने भी जीव हैं, वे सभी असंज्ञी ही होते हैं। वे जीव असंख्यात पुद्गलपरिवर्तनप्रमाण अनन्तकाल तक भी उसी पर्याय में भ्रमण करते रहते हैं और संज्ञीपने को प्राप्त नहीं कर पाते हैं, ऐसा जानकर संज्ञीपना, पञ्चेन्द्रियत्व एवं मनुष्यपर्याय को प्राप्त करके जिस किसी भी प्रकार से रत्नत्रय का अनुपालन करने में प्रमाद नहीं करना चाहिए।

इस तरह से द्वितीय स्थल में असंज्ञी जीवों का काल कथन करने की मुख्यता वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में एक जीव की अपेक्षा कालानुगम में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में संज्ञीमार्गणा नाम का तेरहवाँ अधिकार समाप्त हुआ।