ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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14.सद्बोध चन्द्रोदयाधिकार प्रश्नोत्तरी

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सद्बोध चन्द्रोदयाधिकार

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प्रश्न २८६—चैतन्य रूपी तत्त्व द्रव्य की अपेक्षा कैसा है और पर्याय की अपेक्षा कैसा है ?

उत्तर—चैतन्य रूपी तत्त्व द्रव्य की अपेक्षा नित्य है और पर्याय की अपेक्षा अनित्य है।

प्रश्न २८७—स्वद्रव्य की अपेक्षा चैतन्य स्वरूप कैसा है ?

उत्तर—स्वद्रव्य की अपेक्षा चैतन्य स्वरूप एक रूप है।

प्रश्न २८८—स्वद्रव्यादि चतुष्टय और परद्रव्यादि चतुष्टय की अपेक्षा चैतन्य तत्त्व कैसा है ?

उत्तर—स्वद्रव्यादि चतुष्टय की अपेक्षा वह पूर्ण है और परद्रव्यादि चतुष्टय की अपेक्षा शून्य है।

प्रश्न २८९—कौन सी आत्मा वन्दनीय है ?

उत्तर—जो आत्मा अणिमा, महिमा आदिक ऋद्धियों की इच्छा न करके आदरपूर्वक मोक्ष में दृष्टि लगाकर समता में लीन होती है वह आत्मा वन्दनीय है।

प्रश्न २९०—चैतन्य रूपी तेज का वर्णन कीजिए ?

उत्तर—चैतन्यरूपी तेज समस्त पदार्थों को प्रकाश देने वाला है, स्वयं प्रकाशमान है, अंतकर रहित है तथा वाणी के अगोचर है।

प्रश्न २९१—क्या चैतन्य रूपी तत्त्व मन आदि के प्रत्यक्ष है ?

उत्तर—चैतन्य रूपी तत्व मन तथा वचन के गोचर न होकर भी स्वानुभव गोचर है।

प्रश्न २९२—मन के साथ आत्मा की परिणति कैसी है ?

उत्तर—जब तक मन का सम्बन्ध इस आत्मा के साथ रहता है तब तक मन बाह्य पदार्थों में घूमता रहता है इसलिए आत्मा की परिणति भी बाह्य पदार्थों में लगी रहती है किन्तु जिस समय आत्मा परमात्मा हो जाता है उस समय इस मन का सर्वथा नाश हो जाता है। उस समय इसकी बाह्य पदार्थों में परिणति नहीं लगती इसलिए परमात्मा में स्थित न होकर बाह्य पदार्थों में ही घूमता रहता है क्योंकि पृथ्वीतल में जब सब मरण से डरते हैं, अपने मरण का मन को पूरा—पूरा भय है।

प्रश्न २९३—उत्कृष्ट ध्यान के पात्र कौन हैं ?

उत्तर—जो मनुष्य आत्मीक वस्तु में तत्पर हैं वे ही उत्कृष्ट ध्यान के पात्र हैं।

प्रश्न २९४—जो तपस्वी आत्मस्वरूप में लक्ष्य नहीं देते हैं वे क्या कहलाते हैं ?

उत्तरअत्यन्त गहन चैतन्य रूपी तत्त्व में भलीभाँति लक्ष्य न देकर जो तपस्वी अज्ञानमयी बनते हैं वे तपस्वी जड़ अर्थात् मूर्ख हैं और वे नाटक के पात्र के समान शोभित होते हैं।

प्रश्न २९५—चैतन्य स्वरूप को जानता हुआ भी अज्ञानी मनुष्य संसार में क्यों भ्रमण करता है ?

उत्तर—अंधहस्तिन्याय के समान अंधे के आँखों के न होने के कारण वह हाथी के समस्त स्वरूप को नहीं देख सकता इसलिए हाथी के समस्त स्वरूप के अज्ञानी उस अन्धे द्वारा बतलाया हुआ हाथी का स्वरूप जिस प्रकार प्रमाणभूत नहीं माना जाता उसी प्रकार अज्ञानी द्वारा जाना हुआ अनेकान्तात्मक चैतन्य तेज प्रमाणभूत नहीं माना जा सकता अतएव अज्ञानी चैतन्यस्वरूप को जानता हुआ भी संसार में ही भ्रमण करता है।

प्रश्न २९६—आत्मा अनेक धर्मात्मक किस प्रकार से है ?

उत्तर—आत्मा किसी अपेक्षा से कर्मबंधन कर सहित है, किसी अपेक्षा से कर्मबंधन कर रहित है, किसी अपेक्षा से राग—द्वेष से मलिन है तथा किसी अपेक्षा से निर्मल है, किसी अपेक्षा से आत्मा शरीर सहित है और किसी अपेक्षा से शरीर कर रहित है इस प्रकार आत्मा अनेक धर्मात्मक है।

प्रश्न २९७—क्या अनेकान्तात्मक वस्तु में किसी प्रकार विरोध आता है ?

उत्तरनहीं, जो अनेकान्तात्मक तत्त्व नाश रहित होने पर भी नाशकर सहित है, शून्य होने पर भी सम्पूर्ण है तथा एक होने पर भी अनेक है ऐसा होने पर भी उसमें किसी प्रकार का विरोध नहीं है।

प्रश्न २९८—आत्मस्वरूप की प्राप्ति कब तक नहीं होती ?

उत्तर—जब तक कर्म जनित राग—द्वेष अथवा इच्छा आदि उपाधियों का सम्बन्ध इस आत्मा के साथ रहता है तब तक आत्मस्वरूप की प्राप्ति नहीं होती है।

प्रश्न २९९—स्वस्वरूप की प्राप्ति किसे कहते हैं ?

उत्तर—ज्ञान दर्शन की परिपूर्णता ही आत्मा का स्वरूप है और जिस समय में इस अखण्ड ज्ञान तथा दर्शन की प्राप्ति हो जाती है उसी को स्वस्वरूप की प्राप्ति कहते हैं।

प्रश्न ३००—किस प्रकार संयमी मोक्ष पद को प्राप्त करता है ?

उत्तर—र्नििवकल्प पदवी का आश्रयण करने वाला संयमी ही मोक्षपद को प्राप्त होता है।

प्रश्न ३०१—मोक्ष के अभिलाषी को कौन से भावों का त्याग करना चाहिए ?

उत्तर—मोक्ष के अभिलाषी को द्वैत तथा अद्वैत दोनों भावों का त्याग करना चाहिए।

प्रश्न ३०२—शुद्धपद और अशुद्ध पद की कारण कौन सी भावनाएँ हैं ?

उत्तर—शुद्ध भावना तो शुद्ध पद की कारण है और अशुद्ध भावना अशुद्ध पद की कारण है।

प्रश्न ३०३—मोक्ष पद की प्राप्ति किसे होती है ?

उत्तर—‘‘कारण सदृशानि कार्याणि भवन्ति’’ अर्थात् कारण के समान ही कार्य उत्पन्न होते हैं, इस नीति के अनुसार जो भव्य जीव निष्कलंक, शुद्ध, बुद्ध परमात्मा का ध्यान करते हैं उनको परम पद मोक्षपद की प्राप्ति होती है।

प्रश्न ३०४—क्या परमार्थ को जानने वाले योगी को किसी प्रकार के सुख—दुख का अनुभव नहीं करना पड़ता है ? अगर हाँ, तो क्यों ?

उत्तर—अपने से कर्म को भिन्न समझने वाला और परमार्थ को भलीभाँति जानने वाला योगीश्वर कर्मजनित सुख—दुख के होने पर भी अपने को सुखी—दुखी नहीं मानता।

प्रश्न ३०५—योग से आत्मा की क्या परिणति होती है ?

उत्तर—योग अर्थात् ध्यान अनेक प्रकार का होता है। अशुभ ध्यान से मनुष्य बंधन को प्राप्त करता है और शुभ ध्यान से मनुष्य मोक्ष को प्राप्त करता है, जो भव्य जीव मोक्ष के अभिलाषी हैं उनको यह समस्त ध्यान का मार्ग गुरू के उपदेश से समझना चाहिए।

प्रश्न ३०६—रमणीक स्थान कौन सा है ?

उत्तर—निर्मल सम्यग्ज्ञान स्वरूप वस्तु ही रमणीक स्थान है।

प्रश्न ३०७—समाधि रूपी कल्पवृक्ष मुनियों को क्या प्रदान करता है ?

उत्तर—समाधिरूपी कल्पवृक्ष यदि खोटे विषयों में प्रवृत्त मन से नष्ट न होवे तो वह वांछित फल का प्रदाता है।

प्रश्न ३०८—शास्त्रों में बुद्धि कब तक भटकती रहती है ?

उत्तर—जब तक मन में परमात्मा का ज्ञान नहीं होता है तभी तक बुद्धि शास्त्रों में भटकती फिरती है और जिस समय मन में परमात्मा का ज्ञान हो जाता है उस समय बुद्धिमान की बुद्धि शास्त्र की ओर नहीं जाती है।

प्रश्न ३०९—संसार में देदीप्यमान क्या है ?

उत्तर—जिस चैतन्य के साथ क्रोधादि कषायों का सम्बन्ध नहीं है, जिसमें सम्यग्ज्ञान मौजूद है, जिसकी स्थिति निर्मल और देदीप्यमान है ऐसा चैतन्य अवश्य ही मोह को नाशकर संसार में प्रकाशमान रहता है।

प्रश्न ३१०—कौन सी बुद्धि उत्तम है ?

उत्तर—जो बुद्धि आत्मस्वरूप से भिन्न बाह्य पदार्थों में भ्रमण करती है वह बुद्धि उत्तम बुद्धि नहीं है और आत्मा के स्वरूप से भिन्न पदार्थों में अपनी बुद्धि को भ्रमण न करने देवें और स्थिर रखें, उसी समय उनकी बुद्धि उत्तम बुद्धि हो सकती है।

प्रश्न ३११—भव्य जीव हेय और उपादेय में से किसे ग्रहण करता है ?

उत्तर—हेय और उपादेय दोनों प्रकार के पदार्थों में भव्य जीव हेय को छोड़कर उपादेय को ग्रहण करता है वही मोक्ष को जाता है।

प्रश्न ३१२—मोहनिद्रा में मग्न मनुष्य को बाह्य पदार्थ कैसे लगते हैं ?

उत्तर—जो मनुष्य मोह निद्रा में मग्न हैं उन मनुष्यों को बाह्य पदार्थ भी स्वस्वरूप ही मालूम होते हैं।

प्रश्न ३१३—परमात्मा के नाम मात्र के लेने से ही क्या लाभ होता है ?

उत्तर—परमात्मा के नाममात्र के कथन से ही अनेक जन्मों में संचय किया हुआ पापों का समूह पल भर में नष्ट हो जाता है।

प्रश्न ३१४—समस्त योगियों में उत्तम योगी कौन है ?

उत्तर—जिसका चित्त सांसारिक सुखों से सर्वथा विरक्त है और चैतन्य स्वरूप उत्तम पद—मोक्षपद में लगा हुआ है वही योगी समस्त योगियों में उत्तम योगी है।

प्रश्न ३१५—उत्तम कार्यों की सिद्धि के अभिलाषी भव्य जीवों को क्या करने योग्य है ?

उत्तर—जितने जीव संसार में मौजूद हैं उन सबको अपने समान ही देखना चाहिए तभी कार्यसिद्धि होती है।

प्रश्न ३१६—किसका हृदय संसार के चरित्रों को देखकर विकार भाव को नहीं प्राप्त होता है ?

उत्तर—आत्मज्ञानी और मोक्ष में निवास करने वाले योगी का हृदय संसार के चरित्रों को देखकर कदापि विकार भाव को नहीं प्राप्त होता है।

प्रश्न ३१७—लोक के उद्धार का उपाय क्या है ?

उत्तर—अनादिकाल से यह लोक मोहरूपी गाढ़ निद्रा में सोया हुआ है, ऐसे में अग्रहीत और गृहीत वस्तु को शास्त्रानुसार जानकर जागृत अवस्था को प्राप्त करने से ही लोक का उद्धार सम्भव है।

प्रश्न ३१८—मोक्ष की प्राप्ति में विघ्न उत्पन्न करने वाला कौन है ?

उत्तर—मोक्ष की प्राप्ति में अन्यान्य सामग्री के होते हुए भी स्वभाव से कुटिल, विघ्न करने वाला मोह हो तो कदापि मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती है।