ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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14. भोग से योग की ओर

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भोग से योग की ओर

(काव्य सत्रह से सम्बन्धित कथा)
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अपने पुरुषार्थ से तीनों लोकों को भी एक सूत्र में बांध देने वाला मानव जिसके सम्मुख अपने घुटने टेकता है-उस शूरवीर का नाम क्या आप को ज्ञात है?

बड़े-बड़े तपस्वियों, दार्शनिकों, ज्ञानियों, शास्त्रों, पुराणों आदि ने अपना रोना जिसके कारण से रोया है, क्या उसका नाम आपको मालूम है? यही नहीं, परमात्मा नामधारी तथाकथित परमात्मा आज भी किस कमजोरी को अपने पास से नहीं हटा पा रहे हैं-उसे क्या आप जानते हैं?

तो सुनिये, अनंत संसार के रंग-मंच पर धूम मचाने वाले उस खलनायक का नाम है—‘‘मोह!’’...वही मोह निश्चयत: सच्चिदानन्द जाज्वल्यमान आत्मा रूपी सूर्य के प्रकाश को बादल बन कर रोके हुए हैं। शास्त्रीय भाषा में हम उसे दर्शन मोहनीय और चारित्र मोहनीय कर्मों के नाम से पुकारते हैं, और जिसे हम आठों कर्मों में सब से अधिक जबरदस्त और हाथ धोकर पीछे पड़ने वाला मानते हैं। लोक की व्यवहारिक भाषा में हम उसे प्रेम-मुहब्बत-इश्क या वासना के नाम से पुकारते हैं।

इश्क एक ऐसा रोग है कि जिसका कुछ इलाज नहीं और जवानी के दिनों में तो यह रोग सन्निपात का रूप धारण कर लेता है। उन्माद की अवस्था में मनुष्य की क्या-क्या दशाएँ होती हैं उसे तो कोई भुक्तभोगी ही जान सकता है। सचमुच मे जवानी में जो सम्हल गया वह सदा के लिये सम्हल गया। अन्यथा अभी तक तो जवानी के उन्माद में बड़े-बड़े झाड़ झंखाड़ बहते हुए ही नजर आये हैं। वासनात्मक प्रेम अथवा मोह पर विजय पाने के अनेक आध्यात्मिक उपचारों के अतिरिक्त एक उपचार सत्संगति का भी है। सत्संगति यदि मनुष्य को वासना से ऊपर उठाती है तो कुसंगति भी उसे घोर पतित करने से नहीं चूकति।

कामी को कामी मिले, मिले नीच को नीच।
पानी में पानी मिले, मिले कीच में कीच।।

उपर्युक्त लोकोक्ति के अनुसार रत्नशेखर भी ऐसी ही कुसंगति में पड़ गया।अर्थात् उसकी दोस्ती एक ऐसे जोगी हो गई, जो कहने को तो तपस्वी जटाजूटधारी और विविध चमत्कारों की योग्यता का स्वाँग किया करता था; परन्तु यथार्थ मे वह क्या था- इसे जानकर आप सिहंर उठेंगे। आज-कल के कई ढोंगी साधुओं के समान वह स्त्रियों को ताबीज आदि दिया करता था। लालसा सचमुच में बहुत बुरी बला है; फिर वह तो पुत्र की लालसा में मोहान्ध स्त्रियां सब कुद करने को तैयार हो जाती हैं।यहाँ तक कि उन्हें अपने अमूल्य सतीत्व का भी ख्याल नहीं रहता और टके सेर मे वे अपनी अस्मत उन मिथ्यात्वियों-ढोगियों के हाथ बेचने को तैयार हो जाती हैं।

रत्नशेखर उसका चेला है और ऐसा चेला हुआ कि गुरु तो गुड़ ही रह गया और चेला शक्कर हो गए। दुनियाँ के अन्य विषय तो सिखाने से भी सीखने में नहीं आते; परन्तु वासना तो जब बिना सिखाये ही मनुष्य में विभाव रूप से आ जाती है- तब रत्नशेखर को तो इस विषय की शिक्षा देने वाले स्पेशल गुरु भी थे। तात्पर्य यह कि वह वासना का कीड़ा सारी रात और सारे दिन चक्रेशपुर की गली-गली में चक्कर काटता फिरता और जो नहीं करना चाहिये था वह किया करता?... परन्तु होनहार उसकी भी कुछ अच्छी थी। उसकी शादी कर दी गई। जीवन संगिनी का नाम था ‘कल्याण श्री’।‘यथा नाम तथा गुण:’ मानो उस मदहोश-बेहोश आत्मा को होश में लाने के लिये दैव ने रत्नशेखर का सत्संग कल्याणश्री से कर दिया था। जिस प्रकार श्रेणिक को चेलना की सत्संगति ने सन्मार्ग दिखाया—उसी प्रकार कल्याणश्री ने भी उसके जीवन की दिशा-पतन की ओर से हटाकर ऊध्र्वगामी कर दी थी।

कल्याणश्री जैन कुलोत्पन्न सदाचारिणी विदुषी रमणी थी। महाप्रभावक श्री भक्तामर जी का पाठ उसकी ऋद्धि मंत्रो सहित करने की उसकी दैनिक दिनचर्या थी। जब उसने पतिदेव की यह दुरावस्था देखी तो पहिले तो वह अपना भाग्य ठोक कर रह गई; परन्तु बाद में साहस बटोरकर उसने जो किया-उसे आगे देखिये।

जोगी ने जब देखा कि रत्नशेखर को तो एक ऐसा गुरु मिल गया है जो अपना प्रभाव रत्नशेखर पर तो डालेगा ही साथ में मेरे दैनिक धन्धे को भी चौपट कर देगा; तो उसने चमत्कारों के जादू रत्नशेखर को दिखाने प्रारम्भ कर दिये। अर्थात् वह किसी अंगूठी को आकाश में उड़ता हुआ दिखला कर किसी भी वांछित प्रेयसी की अँगुली तक भेजने की क्रियाएँ करने लगा। इस भाँति रत्नशेखर का आकर्षण पुन: अपने पूर्व स्थान पर केन्द्रित होने लगा।

जब कल्याणश्री ने यह हाल देखा तो वह और भी चौकस रहने लगी तथा अधिक दृढ़ता से जोगी के प्रभाव को नष्ट करने की योजना सोचने लगी। अर्थात् कु-संगति और सत्संगति का संघर्ष छिड़ गया और रत्नशेखर दोनो के बीच त्रिशंकु की भाँति लटक गए। क्या करें क्या नहीं? परन्तु सात्विक गुणों की तो सदा सर्वदा ही अन्तिम विजय रही है। तामस गुणों मे वह ताकत कहाँ?

एक दिन कल्याणश्री ने जोगी को अपने घर आमंत्रित किया और भोजनोपरान्त जल को भक्ताम्बर जी के १७वें काव्य की ऋद्धि और मंत्र से मंत्रित किया और उस मंत्रित जल को स्वयं पीने के पश्चात् उच्छिष्ठ जल पीने के लिये पाखंडी जोगी के सामने रख दिया। जोगी जी उस जल को पीकर भोजन समाप्त कर रहे थे कि उसके पूर्व जिनशासन की अधिष्ठात्री ‘‘गांधारी’’ नाम की महादेवी आकर सामने खड़ी हो गई। उसने एक अँगूठी जोगी को देकर कहा कि ‘‘उड़ाओ इसे’’।...परन्तु कीलित अंगूठी काहे को उड़ती ?... अब गांधारी ने स्वयं वह सुवर्ण मुद्रिका आकाश में पैंकी, तो जहाँ पर वह गिरी वहाँ एक सुन्दर भव्य जिनालय दृष्टिगोचर हुआ।

महादेवी गांधारी के इस अनोखे चमत्कार को देखकर जोगी देवी के चरणों में आकर गिर पड़ा और हमेशा हमेशा के लिए दूसरों को चंगुल में फसाने वाली अपनी धूर्त विद्या का परित्याग कर सच्चा जिन भक्त बन गया।

अपने गुरु की यह अवस्था देखकर रत्नशेखर से भी न रहा गया-वह अपनी धर्मपत्नी कल्याण श्री के समक्ष अधिक लज्जित हुआ और उपरान्त जिनालय में जाकर अपने अपराधों का प्रतिक्रमण कर शेष जीवन सत्संगति में व्यतीत करने की प्रतिज्ञा ली।

जिन लोगों ने गांधारी के इस चमत्कार को देखा वे भी जिनेन्द्रभक्त बनकर सुख शांति का जीवन यापन करते हुए अपने को धन्य मानने लगे।