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विश्वशांति महावीर मण्डल विधान का आयोजन ऋषभदेवपुरम्-मांगीतुंगी (नासिक) महा. में दशलक्षण पर्व में 14 से 24 सितम्बर 2018

‘‘ॐ ह्रीं अर्हन्मुखकमलसमुद्गताय उत्तमसंयमधर्माङ्गाय नम:’’

14 सितम्बर 2018 दशलक्षण धर्म के प्रवचन

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दशलक्षण पर्व

क्षमा धर्म का प्रवचन

आज बहुत ही उत्तम दिवस है दशलक्षण पर्व। मांगीतुंगी सिद्धक्षेत्र में १०८ फुट के भगवान ऋषभदेव के चरण सान्निध्य में पूज्य ज्ञानमती माताजी ससंघ विराजमान हैं। माताजी के सान्निध्य में दशलक्षण पर्व मनाने के लिए हजारों भक्तगण दूर-दूर से आये हैं। प्रात:कालीन मंगल बेला में पारस चैनल के माध्यम से पूज्य चंदनामती माताजी ने सर्वप्रथम पर्व दशलक्षण का भजन माताजी ने अपनी सुमधुर वाणी से भक्तों को रसास्वादन कराया। तत्पश्चात् माताजी ने कहा-भव्यात्माओं! दशलक्षण पर्व को एक बगीचे की उपमा दी गयी है। जहाँ क्षमा से लेकर ब्रम्हचर्य तक उत्तम-उत्तम पुण्य खिलते हैं। प्रत्येक प्राणी धर्म के पुष्पों से सुगंधित और सुसज्जित करता है। पूृज्य माताजी ने दशधर्म को बताया कि यह सिद्धिरूपी मोक्ष महल की सीढी है ऐसे वे दश धर्म हमारे हृदय को पवित्र करें, ऐसी भावना प्रभु के चरणों में प्रदर्शित की गयी है। क्षमा को एक देवी की उपमा दी गयी है।

भगवान पार्श्वनाथ के समान हमारे अंदर भी सहन शक्ति, धैर्य, क्षमा को अवतरित करे, यह क्षमा देवी मेरी अंदर अवतीर्ण हो जाये। चाहे जैसा प्रसंग आये मेरे अंदर क्रोध न आने पाये। हमारा भारत देश क्षमा की प्रतिकृति के रूप में रहा है। यह देश शुरू से ही क्षमाशील देश रहा। अंग्रेजों ने भारत को कष्ट दिया। लेकिन वीर पुरुष ने अपना बलिदान देकर देश को आजाद किया। ऐसे भारत में रहकर हम एक दिन नहीं हमेशा क्षमा को मन में धारण करने की कोशिश करें। अन्र्तमन के अंदर जब समताभाव प्रगट होता है, तब अपने आप ही क्षमाभाव प्रगट हो जाता है। जो देवी के समान क्षमाधर्म है, वह दशधर्म की पूजा करके यह भावना भाई है कि मेरे मन में दश धर्म प्रगट हो जाये, मेरी भी आत्मा एक दिन परमात्मा बन जाए। क्षमा धर्म सारे धर्मों में उत्तम है। क्षमा का पर्व उत्तम क्षमा का दिन सबसे ज्यादा उत्तम कहलाता है।


क्षमा से पर्व का उद्गम क्षमा से ही समापन है|
क्षमा स्रोतस्वनी सिंधु में पारस का उदाहरण है |
कमठ के तीव्र उपसर्गों को भी जीता क्षमा बाल पर |
क्षमा यदि वे नहीं धरते नहीं बन पते तीर्थंकर |

अर्थात भगवान पार्श्वनाथ जो जीते जागते क्षमा के उदाहरण हैं, उन्होंने सहन किया जब उनके अंदर पूर्ण क्षमा आ गई तो तीर्थंकर पद के धारक बन गये। ऐसे शांतिसागर महाराज ने ५०० धर्म विद्वेषी द्वारा प्रहार करने पर भी महाराज जी ने कहा उनको दण्ड मत दो छोड़ दो। ज्ञानमती मातजाी की साक्षात् मूर्ति है। हम लोगों के अंदर प्राकृति रूप से क्षमा धर्म प्रगट हो जावे, यही भावना करते हैं।

इसके पश्चात् पूज्य दिव्यशक्ति गणिनीप्रमुख श्री ज्ञानमती माताजी ने नवग्रह मंदिर में पारस चैनल के माध्यम से सर्वप्रथम अनेक मंत्रों का उच्चारण करवाया। हजारों की संख्या में भक्तगण पधारकर बहुत ही हर्ष का अनुभव करते हैं। माताजी ने अपने मुखार विंद से दशलक्षण पर्व के महत्त्व को बताया। कहा कि यह पर्व अनादि है सादि है। यहाँ की तिथि के अनुसार असंख्यातों देवगण पंचमेरु की वंदना कर रहे हैं, दशलक्षण पर्व मना रहे हैं। तीन वर्ष अनादि हैं, अनेक व्रत अनादि भी है, सादि भी है। दशधर्म में दशधर्म की उपासना है, पंचमेरु में जो पंचमेरु है, इन पाँचों मेरुओं में प्रत्येक मेरु पर १६-१६ जिनमंदिर हैं, सबसे ऊँचा सुमेरु पर्वत है। इसे ऊँचा विश्व में कोई पर्वत नहीं है। पूज्य माताजी ने कहा कि हजारों वर्षों में यह परम्परा चल रही है कि दशलक्षण पर्व में तत्त्वार्थसूत्र की पूजा होती है। सभी श्रावकगण तत्त्वार्थसूत्र की पूजा करते भी है। वैसे ही पर्व में गौतम गणधर वाणी पुस्तक है, इसमें १० अध्याय हैं, यहाँ पर भी हर वर्ष इसकी वाचना होती है, एक-एक अध्याय की वाचना होती है। माताजी ने कहा-२५०० वर्ष पूर्व भगवान महावीर का समवसरण लगा था कि उनको केवलज्ञान होने के बाद ६६ दिन तक भगवान की दिव्यध्वनि नहीं खिरी थी। इनके योग्य शिष्य गणधर का अभाव था। वह वेगशाला में पहुँचता है, जहाँ पर ३ मूर्धन्य विद्वान् रहते हैं, उनके पास वृद्ध का रूप बनाकर पहुँचते हैं और एक प्रश्न करते हैं-त्रैकाल्यं, द्रव्य षट्क आदि। गौतम बोले चलों गुरु के पास चलकर शास्त्रार्थ करेंगे। वह ५०० शिष्यों को लेकर पहुँचते हैं, वहाँ पहुँचते ही मानस्तंभ को देखते ही उनका मान गलित हो जाता है। उसी क्षण वह स्तोत्र का उच्चारण करते हैं-जयति भगवान् हेमाम्भोज..... उसी क्षण दिगम्बर मुद्रा धारण करते ही सभी ऋद्धियाँ प्रगट हो गर्इं। उनको प्रथम गणधर पद प्राप्त हो गया।

पूज्य माताजी ने गौतम गणधर का सार बताया। सभी भक्तों ने माताजी का प्रवचन श्रवण करके अपने पुण्य की सराहना की।