ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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15.आहारमार्गणा अधिकार

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आहारमार्गणा अधिकार

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अथ आहारमार्गणाधिकार:

संप्रति आहारमार्गणायां स्वामित्वप्रतिपादनाय सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-
आहाराणुवादेण आहारो णाम कधं भवदि ?।।८८।।
ओदइएण भावेण।।८९।।
अणाहारो णाम कधं भवदि ?।।९०।।
ओदइएण भावेण पुण खइयाए लद्धीए।।९१।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थः सुगमोऽस्ति। औदारिक-वैक्रियिक-आहारकशरीराणामुदयेन आहारो भवति।
तैजस-कार्मणयोरुदयेन आहारः किन्नोच्यते ?
नोच्यते, विग्रहगतौ अपि आहारकत्वप्रसंगात्। न चैवं, विग्रहगतौ अनाहारित्वदर्शनात्।
अयोगिभगवतां सिद्धानां च अनाहारत्वं क्षायिकं घातिकर्मणां सर्वकर्मणां च क्षयेण। विग्रहगतौ पुनः औदयिकेन भावेन, तत्र सर्वकर्मणामुदयदर्शनात्।
एवं चतुर्दशमस्थले आहारमार्गणायां स्वामित्वकथनत्वेन सूत्राणि चत्वारि गतानि।
इतो विस्तरः-घातिकर्मणां क्षयेण नवकेवललब्धय उत्पद्यन्ते-
‘‘ज्ञानदर्शनदानलाभभोगोपभोगवीर्याणि च।’’ अत्र चशब्देन सम्यक्त्वं चारित्रं च गृह्यते।
ज्ञानावरणस्य कर्मणः दर्शनावरणस्य च कृत्स्नस्य क्षयात् केवले ज्ञानदर्शने क्षायिके भवतः। दानान्तरायस्य कर्मणोऽत्यन्तसंक्षयादाविर्भूतं त्रिकालगोचरानन्तप्राणिगणानुग्रहकरं क्षायिकमभयदानं ।
लाभान्तरायाशेषनिरासात् परित्यक्तकवलाहारक्रियाणां केवलिनां यतः शरीरबलाधानहेतवोऽन्यमनुजा-साधारणाः परमशुभाः सूक्ष्माः अनन्ताः प्रतिसमयं पुद्गलाः संबंधमुपयान्ति स क्षायिको लाभः।
तस्मात्-‘‘औदारिकशरीरस्य किञ्चिन्न्यूनपूर्वकोटिवर्षस्थितिः कवलाहारमन्तरेण कथं संभवति’’ ? इति श्वेतपटानां यद्वचनं तदशिक्षितकृतं विज्ञायते।
कृत्स्नस्य भोगान्तरायस्य तिरोभावादाविर्भूतोऽतिशयवाननन्तो भोगः क्षायिकः। यत्कृताः पंचवर्णसुरभि-कुसुमवृष्टि-विविधदिव्यगंध-चरणनिक्षेपस्थानसप्तपद्मपंक्ति-सुगंधितधूप-सुखशीतमारुतादयो भावाः।
निरवशेषस्योपभोगान्तरायस्य कर्मण: प्रलयात् प्रादुर्भूतोऽनन्त उपभोग: क्षायिकः। यत्कृताः सिंहासन-बालव्यजनाशोकपादप-छत्रत्रय-प्रभामंडल-गंभीरस्निग्धस्वरपरिणाम-देव-दुंदभिप्रभृतयो भावाः।
आत्मनः सामथ्र्यस्य प्रतिबन्धिनो वीर्यान्तरायस्य कर्मणोऽत्यन्तसंक्षयादुद्भूतवृत्ति क्षायिकमनन्तवीर्यम्।
दर्शनमोहत्रिकस्य चारित्रमोहस्य च पंचविंशतिविकल्पस्य निरवशेषक्षयात् क्षायिके सम्यक्त्वचारित्रे भवतः।
अत्र कश्चिदाह-यद्यनन्तदानलब्ध्यादय उक्ता अभयदानादिहेतवो दानादिसंक्षयाद् भवन्ति सिद्धेष्वपि तत्प्रसंगः इति चेत् ?
आचार्य: प्राह-नैष दोषः, शरीरनामतीर्थकरनामकर्मोदयाद्यपेक्षत्वात्तेषां तदभावे तदप्रसंगः परमा-नन्दाव्याबाधरूपेणैव तेषां तत्र वृत्तिः केवलज्ञानरूपेणानन्तवीर्यवृत्तिवत्।
सिद्धत्वं हि सर्वेषां क्षायिकाणां भावानां साधारणमस्ति।
एवं आहारमार्गणायां आहारानाहारजीवप्रतिपादनत्वेन सूत्रचतुष्टयं गतं।
इति श्री षट्खण्डागमग्रन्थे द्वितीयखण्डे प्रथमे महाधिकारे सिद्धांतचिंतामणिटीकायां आहारमार्गणानाम चतुर्दशोऽधिकार: समाप्त:।
तात्पर्यमेतत्-सर्वौदयिकभावानामभावं कृत्वा क्षायिकभावानां लब्धये एव अस्माकं प्रयासो वर्तते। तासामपि लब्धीनां प्राक् क्षायिकसम्यक्त्वलब्धिः कदा मे भवेदिति भावनया यत् क्षायोपशमिकं सम्यक्त्वं अधुना मयि विद्यते तस्य प्रच्युतिर्न भवेत् तस्मिन् वा दोषा न प्रभवेयुः तत्सम्यक्त्वं क्षायिकंप्राप्तिपर्यन्तं मयि स्थेयादिति प्रार्थयामहे जिनचरणाब्जयोर्नित्यम्।
मंगलं स्यान्महावीर: श्रीगौतमश्च मंगलम् ।
जिनशासनमाचन्द्रं, स्थेयात् कुर्याच्च मंगलम्।।१।।
इति श्रीमद्भगवत्पुष्पदन्तभूतबलिप्रणीतषट्खण्डागमस्य श्रीभूतबलिसूरिविरचितक्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखंडे श्रीवीरसेनाचार्यकृतधवलाटीकाप्रमुखनानाग्रन्थाधारेण विरचितायां विंशतितमे
शताब्दौ प्रथमाचार्यः चारित्रचक्रवर्ती श्रीशांतिसागरस्तस्य शिष्यः प्रथमपट्टााधिपः श्रीवीरसागराचार्यस्तस्य शिष्या जम्बूद्वीपरचनापावनप्रेरिका-गणिनी
ज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां एकजीवापेक्षया स्वामित्वानियोगद्वाराख्यः प्रथमो महाधिकारः समाप्त:।

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अथ आहारमार्गणा अधिकार

अब आहारमार्गणा में स्वामित्व का प्रतिपादन करने हेतु चार सूत्र अवतरित होते हैं-

'सूत्रार्थ-

आहारमार्गणानुसार जीव आहारक किस कारण से होते हैं ?।।८८।।

औदयिक भाव से जीव आहारक होते हैं।।८९।।

जीव अनाहारक किस कारण से होते हैं ?।।९०।।

औदयिक भाव से तथा क्षायिक लब्धि से जीव अनाहारक होते हैं।।९१।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-उपर्युक्त सूत्रों का अर्थ सुगम है। औदारिक, वैक्रियिक व आहारक शरीर नामकर्म प्रकृतियों के उदय से जीव आहारक होता है।

शंका-तैजस और कार्मण शरीरनामकर्म की प्रकृतियों के उदय से जीव आहारक क्यों नहीं होता है ?

समाधान-नहीं, क्योंकि वैसा मानने पर विग्रहगति में भी जीव के आहारक होने का प्रसंग प्राप्त होता है। किन्तु ऐसा है नहीं, क्योंकि विग्रहगति में जीव के अनाहारकपना देखा जाता है।

अयोगिकेवली भगवान और सिद्धों के अनाहारकपना क्षायिक होता है, क्योंकि उनके क्रमश: घातिया कर्मों का व समस्त कर्मों का क्षय होता है। किन्तु विग्रहगति में औदयिक भाव से अनाहारकपना होता है, क्योंकि विग्रहगति में सभी कर्मों का उदय देखा जाता है।

इस प्रकार चौदहवें स्थल में आहारमार्गणा में स्वामित्व का कथन करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

अब इसका विस्तृत वर्णन करते हैं- घातिया कर्मों के क्षय से नौ केवल लब्धियॉँ उत्पन्न होती हैं। उनके नाम-‘‘क्षायिकज्ञान, क्षायिकदर्शन, क्षायिकदान, क्षायिकलाभ, क्षायिकभोग, क्षायिकउपभोग, क्षायिकवीर्य तथा च शब्द से क्षायिकसम्यक्त्व और क्षायिकचारित्र का ग्रहण किया जाता है। समग्र ज्ञानावरण कर्म के क्षय से केवलज्ञान और दर्शनावरण के क्षय से केवलदर्शन क्षायिक भाव है। दानान्तराय कर्म के अत्यन्त क्षय से आविर्भूत त्रिकालगोचर अनन्त प्राणियों का हितकारक, भगवान का अहिंसामय उपदेश होता है, जिससे जीवों को अभयदान मिलता है, वह भगवान का उपदेश क्षायिकदान है।

सम्पूर्ण लाभान्तराय कर्म का अत्यन्त क्षय होने पर कवलाहार न करने वाले केवली भगवान के शरीर की स्थिति में कारणभूत, अन्य मनुष्यों में नहीं पाये जाने वाले असाधारण परमशुभ, सूक्ष्म, दिव्य, अनन्त पुद्गल परमाणुओं का प्रतिसमय केवली के शरीर में संबंधित होना क्षायिकलाभ है।

इससे कवलाहार के बिना कुछ कम पूर्वकोटि वर्ष तक औदारिक शरीर की स्थिति कैसे रह सकती है ? यह श्वेताम्बरजनों का कथन निराधार हो जाता है। अर्थात् इस क्षायिक लाभ के कारण भगवान बिना आहार किए कुछ कम पूर्वकोटि वर्ष काल तक रह सकते हैं।

सकल भोगान्तराय के नाश से उत्पन्न होने वाला सातिशय भोग क्षायिकभोग है। इसी से पुष्पवृष्टि, गंधोदकवृष्टि, चरणनिक्षेप स्थान में सप्त कमलों की पंक्ति की रचना, सुगंधित धूप, सुगंधित सुखद शीतल वायु का चलना आदि अतिशय होते हैं।

समस्त उपभोगान्तराय कर्म के नाश से उत्पन्न होने वाला सातिशय उपभोग क्षायिक उपभोग है। इसी से सिंहासन, चमर, अशोकवृक्ष, छत्र-त्रय, प्रभा मंडल, गंभीर स्निग्ध मधुर दिव्यध्वनि, देव दुंदुभि आदि क्षायिक उपभोग प्राप्त होते हैं।

आत्मा की शक्ति के प्रतिबंधक, वीर्यान्तराय कर्म के अत्यन्त क्षय से उत्पन्न शक्तिविशेष अनन्त क्षायिकवीर्य है।

अनन्तानुबंधी क्रोध, मान, माया और लोभ ये चार चारित्र मोह की और दर्शनमोह की सम्यक्त्व प्रकृति, सम्यक्त्वमिथ्यात्व प्रकृति और मिथ्यात्व प्रकृति इन सात प्रकृतियों के पूर्ण क्षय हो जाने से क्षायिक सम्यग्दर्शन और शेष चारित्र मोह की २१ प्रकृतियों के क्षय से क्षायिक चारित्र होता है। यहाँ कोई शंका करता है कि-दानान्तरायादि के क्षय होने से प्रगट होने वाली जो अभयदानादि के हेतु अनंतदानादि लब्धियाँ कही हैं, वह अभयदानादि सिद्धों में भी होना चाहिए, क्योेंकि सिद्धों में भी दानान्तराय आदि का अभाव है ?

पुन: आचार्य देव इसका उत्तर देते हैं-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि दानादिलब्धियों के कार्य के लिए शरीर नामकर्म और तीर्थंकर प्रकृति के उदय की भी अपेक्षा रहती है। इसलिए शरीर एवं तीर्थंकर प्रकृति का अभाव होने से सिद्धों में दानादि नहीं है। सिद्धों में जैसे केवलज्ञान रूप से अनंतवीर्य है, उसी प्रकार परमानंद अव्याबाध सुखरूप से लब्धियाँ रहती हैं।

सभी क्षायिक भावों में व्यापक सिद्धत्व का भी कथन उन विशेष क्षायिक भावों में ही साधारणरूप से हो गया है।

इस प्रकार से आहारमार्गणा में आहारक और अनाहारक जीवों का प्रतिपादन करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ के द्वितीय खण्ड में प्रथम महाधिकार की सिद्धान्त-

चिंतामणिटीका में आहारमार्गणा नाम का चौदहवाँ अधिकार समाप्त हुआ।

तात्पर्य यह है कि-समस्त औदयिक भावों का अभाव करके क्षायिक भावों की प्राप्ति हेतु ही यह हमारा प्रयास है। उन समस्त नौ क्षायिक लब्धियों में से सर्वप्रथम मुझमें क्षायिकसम्यक्त्व नाम की लब्धि कब प्रगट होगी, ऐसी भावना से क्षायोपशमिक सम्यक्त्व जो आज मुझमें विद्यमान है, वह छूटने न पावे अथवा उसमें दोष न उत्पन्न होने पावे तथा क्षायिकसम्यक्त्व की प्राप्ति होने तक वह मुझमें स्थित रहे, भगवान जिनेन्द्र के श्रीचरणों में मेरी नित्य ही यही प्रार्थना है।

श्लोकार्थ-भगवान महावीर सबके लिए मंगलकारी होवे, उनके शिष्य गौतमगणधर मंगलस्वरूप हों तथा संसार में जब तक चंद्रमा का प्रकाश रहे, तब तक जिनशासन इस धरा पर स्थित रहे और सबका मंगल करे, यही भावना है।।१।।

इस प्रकार श्रीमान् भगवत्पुष्पदंत-भूतबली द्वारा प्रणीत षट्खण्डागम ग्रंथ में श्रीभूतबली आचार्य द्वारा विरचित क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में श्रीवीरसेनाचार्य कृत धवला टीका को प्रमुख करके तथा नाना ग्रंथों के आधार से रचित इस ग्रंथ में बीसवीं सदी के प्रथमाचार्य चारित्रचक्रवर्ती श्री शांतिसागर जी महाराज के शिष्य प्रथम पट्टाधीश आचार्य श्री वीरसागरजी महाराज की शिष्या जम्बूद्वीप रचना की पावन प्रेरिका गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणि टीका में एक जीव की अपेक्षा स्वामित्व अनियोग नाम का प्रथम महाधिकार समाप्त हुआ।