ऊँ ह्रीं श्री ऋषभदेवाय नम:।

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15.आहार मार्गणा अधिकार

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आहार मार्गणा अधिकार

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अथ आहारमार्गणाधिकार:

अथ स्थलद्वयेन सप्तसूत्रैः आहारमार्गणानामाधिकारः प्रारभ्यते। तत्र प्रथमस्थले आहारकजीवानां कालकथनप्रमुखेन ‘‘आहाराणुवादेण’’ इत्यादिसूत्रत्रयं । ततः परं द्वितीयस्थले अनाहारकाणां स्थितिनिरूपणत्वेन ‘‘अणाहारा’’ इत्यादिसूत्रचतुष्टयम् इति समुदायपातनिका ।
संप्रति आहारमार्गणायां आहारककालप्रतिपादनाय सूत्रत्रयमवतार्यते-
आहाराणुवादेण आहारा केवचिरं कालादो होंति ?।।२१०।।
जहण्णेण खुद्दाभवग्गहणं तिसमयूणं।।२११।।
उक्कस्सेण अंगुलस्स असंखेज्जदिभागो असंखेज्जासंखेज्जाओ ओसप्पिणी- उस्सप्पिणीओ।।२१२।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-जघन्येन त्रीन् विग्रहान् कृत्वा सूक्ष्मैकेन्द्रियेषूत्पद्य चतुर्थसमये आहारी भूत्वा भुज्यमानायुषं कदलीघातेन घातयित्वावसाने विग्रहं कृत्वा निर्गतस्य त्रिसमयोनक्षुद्रभवग्रहणमात्राहारकालः उपलभ्यते। उत्कर्षेण विग्रहं कृत्वा आहारी भूत्वांगुलस्यासंख्यातभागमसंख्यातासंख्यातावसर्पिणी-उत्सर्पिणी-कालमात्रं परिभ्रम्य कृतविग्रहस्य तदुपलंभात्।
एवं प्रथमस्थले आहारकजीवकालनिरूपणत्वेन त्रीणि सूत्राणि गतानि।
संप्रति अनाहारजीवानां स्थितिनिश्चयार्थं सूत्रचतुष्टयमवतार्यते-
अणाहारा केवचिरं कालादो होंति ?।।२१३।।
जहण्णेणेगसमओ।।२१४।।
उक्कस्सेण तिण्णि समया।।२१५।।
अंतोमुहुत्तं।।२१६।।
सिद्धांतचिंतामणिटीका-सूत्राणामर्थः सुगमोऽस्ति। त्रिविग्रहकृतजीवे समुद्घातगतसयोगिकेवलिनि वा तदुत्कृष्टकालो लभ्यते। अयोगिकेवलिनोऽनाहारकस्यान्तर्मुहूर्तकाल उपलभ्यते।
कश्चिदाह-एषा कालप्ररूपणा बंधकानां जीवानां कथिता, न चायोगी भगवान् बंधकः, तत्रास्रवाभावात्। न चान्यत्रानाहारिणो जीवस्यान्तर्मुहूर्तमात्रः कालो लभ्यते। ततो नेदं सूत्रं घटते इति चेत् ?
आचार्यः प्राह-नैष दोषः, अघातिचतुष्ककर्मपुद्गलस्कंधानां लोकमात्रजीवप्रदेशानां चान्योन्यबंधमपेक्ष्या-योगिनामपि बंधकत्वाभ्युपगमात्।
तर्हि ‘‘मणुस्सा अबंधा वि अत्थि’’ इति एतेन सूत्रेण सह विरोधो भवेत् ?
न भवेत्, किंच-योगकषायादिभ्यो जायमाननूतनबंधाभावं प्रतीत्य तत्र सूत्रे तथोपदेशात्।
आसु मार्गणासु कालकथनं ज्ञात्वा कालस्य क्षणिकत्वं विचार्य अविनाशिअनंतकालस्थायि-सिद्धपदप्राप्तये प्रयत्नो विधेयः, यस्य पदस्य प्रशंसा पूर्वाचार्यैः सर्वशास्त्रेषु गीयते। तथाहि-
जातिर्याति न यत्र यत्र च मृतो मृत्युर्जरा जर्जरा।
जाता यत्र न कर्मकायघटना नो वाग् रुजो व्याधयः।।
यत्रात्मैव परं चकास्ति विशदं ज्ञानैकमूर्तिर्विभुः।
नित्यं तत्पदमाश्रिता निरुपमा सिद्धाः सदा पान्तु वः।।
यत्र जातिर्जन्म न विद्यते-पुनर्जन्म नास्ति, यत्र च मृत्युर्मृतः आयुःकर्मविनष्टे सति मृत्युः स्वयमेव मृतः समाप्तः पुनरागमनं न भविष्यति। यत्र जरा जर्जरा जाता-वृद्धावस्था वृद्धत्वं गता विनष्टा इति यावत्। यत्र च कर्मकायघटना नास्ति-न कर्मणां संबंधः, न च शरीरस्य संबंधोऽपि तत्र अशरीरत्वं एव। यत्र न वाणी न रुजो न व्याधयः सन्ति, इमाः शरीराश्रितत्वादिति। यत्रात्मा एव परं उत्कृष्टं केवलं वा चकास्ति। असौ आत्मा ज्ञानैकमूर्तिः-ज्ञानशरीरी,विभुः-व्यापकः त्रैलोक्ये अलोकाकाशेऽपि न चात्मप्रदेशैः ज्ञानरश्मिभिरेव। तन्नित्यं पदं आश्रिताः उपमाव्यतीताः सिद्धपरमेष्ठिन: सदा वो युष्माकं सर्वेषां मम च पान्तु-रक्षन्तु।
एवं द्वितीयस्थले अनाहाराणां स्थितिकथनत्वेन सूत्रचतुष्ट्यं गतम्।
इति श्रीषट्खण्डागमस्य क्षुद्रकबंधनाम्नि द्वितीयखण्डे एकजीवापेक्षया कालानुगमे गणिनीज्ञानमतीकृत-सिद्धांतचिंतामणिटीकायां आहारमार्गणानाम- चतुर्दशोऽधिकारः समाप्तः।


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अथ आहारमार्गणा अधिकार प्रारंभ

अब दो स्थलों में सात सूत्रों के द्वारा आहारमार्गणा नाम का अधिकार प्रारंभ होता है। उनमें से प्रथम स्थल में आहारक जीवों का काल कथन करने वाले ‘‘आहाराणुवादेण’’ इत्यादि तीन सूत्र हैं। उसके बाद द्वितीय स्थल में अनाहारक जीवों की स्थिति का निरूपण करने वाले ‘‘अणाहारा’’ इत्यादि चार सूत्र हैं। इस प्रकार सूत्रों की समुदायपातनिका हुई।

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अब आहारमार्गणा में आहारक जीवों का काल प्रतिपादन करने हेतु तीन सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

आहारमार्गणानुसार जीव आहारक कितने काल तक रहते हैं ?।।२१०।।

जघन्य से तीन समय हीन क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण काल तक जीव आहारक रहते हैं।।२११।।

उत्कृष्ट से असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणी-उत्सर्पिणी काल तक जीव आहारक रहते हैं जो काल अंगुल के असंख्यातवें भाग के बराबर है।।२१२।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-जघन्य से तीन मोड़े लेकर सूक्ष्म एकेन्द्रिय जीवों में उत्पन्न होकर चौथे समय में आहारक होकर भुज्यमान आयु को कदलीघात से छिन्न करके अंत में विग्रह करके निकलने वाले जीव के तीन समय कम क्षुद्रभवग्रहणप्रमाण आहारकाल पाया जाता है। उत्कृष्ट से विग्रह करके आहारक हो, अंगुल के असंख्यातवें भागप्रमाण असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणी-उत्सर्पिणी काल प्रमाण परिभ्रमण कर विग्रह करने वाले जीव के यह उत्कृष्ट काल पाया जाता है।

इस प्रकार प्रथम स्थल में आहारक जीवों का काल निरूपण करने वाले तीन सूत्र पूर्ण हुए।

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अब अनाहारक जीवों की स्थिति का निश्चय करने हेतु चार सूत्र अवतरित होते हैं-

सूत्रार्थ-

जीव अनाहारक कितने काल तक रहते हैं ?।।२१३।।

जघन्य से एक समय तक जीव अनाहारक रहते हैं।।२१४।।

उत्कृष्ट से तीन समय तक जीव अनाहारक रहते हैं।।२१५।।

उत्कृष्ट से अन्तर्मुहूर्त काल तक ये जीव अनाहारक रहते हैं।।२१६।।

सिद्धान्तचिंतामणिटीका-सभी सूत्रों का अर्थ सुगम है। तीन मोड़ा लेने वाले जीव के अथवा समुद्घात करने वाले सयोगिकेवली भगवन्तों के अनाहारकपने का उत्कृष्टकाल तीन समय प्रमाण पाया जाता है। अयोगिकेवली भगवान के अनाहारकपने का काल अन्तर्मुहूर्त पाया जाता है।

यहाँ कोई शंका करता है कि-यह काल प्ररूपणा बंधक जीवों की अपेक्षा की गई है किन्तु अयोगी भगवान तो बंधकर्ता नहीं होते, क्योंकि उनके कर्मों के आस्रव का अभाव है और अन्यत्र कहीं अनाहारी जीव का अन्तर्मुहूर्तप्रमाण काल पाया नहीं जाता। अतएव यह अनाहारी का अन्तर्मुहूर्त प्रमाण काल वाला सूत्र उनमें घटित नहीं होता है ?

तब आचार्य समाधान देते हैं कि-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि चार घातिया कर्मों के पुद्गल-स्वंâधों का और लोकप्रमाण जीव प्रदेशों का परस्पर बंधन देखकर अयोगी जिनों के भी बंधकर्तृत्व स्वीकार किया है।

शंका-ऐसा मानने पर ‘मनुष्य अबंधक भी होते हैं, इस सूत्र के साथ विरोध भी आ जावेगा।’

समाधान-ऐसा नहीं होगा, क्योंकि उक्त सूत्र में योग और कषाय आदि से उत्पन्न होने वाले नवीन बंध के अभाव की अपेक्षा से अयोगी केवलियों में नूतन बंध के अभाव का उपदेश किया गया है।

इन मार्गणाओं में काल का कथन जानकर समय के क्षणिकपने का विचार करके अविनाशी, अनंतकाल तक स्थाई रहने वाले सिद्धपद की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए, ऐसे उस सिद्धपद की प्रशंसा पूर्वाचार्यों ने सभी शास्त्रों में गाई है।

श्री पद्मनंदि आचार्य ने भी पद्मनंदिपंचविंशतिका ग्रंथ में कहा है-

श्लोकार्र्थ-जहाँ पर न जन्म है, न मरण है, न जरा है, न कर्मों का तथा शरीर का संबंध है, न वाणी है और न रोग है तथा जहाँ पर निर्मलज्ञान का धारण करने वाला प्रभु आत्मा सदा प्रकाशमान है, ऐसे उस अविनाशी पद में रहने वाले उपमारहित (अर्थात् जिनको किसी की उपमा ही नहीं दे सकते ऐसे) सिद्ध भगवान मेरी रक्षा करे, अर्थात् ऐसे सिद्धों की मैं शरण लेता हूँ।

अर्थात् जहाँ जाकर पुन: संसार में आकर जन्म नहीं लेना पड़ता है, जहाँ मृत्यु का मरण हो चुका है अर्थात् जहाँ आयुकर्म का विनाश हो जाने के कारण मृत्यु स्वयमेव समाप्त हो गई है, अत: पुनरागमन नहीं होगा। जहाँ जरा-वृद्धावस्था जर्जर हो गई है-नष्ट हो गई है ऐसा अभिप्राय है और जहाँ कर्मकाय की घटना नहीं है-कर्मों का संबंध ही नहीं रह गया है एवं शरीर का संबंध मात्र भी न होने से जहाँ अशरीरीपना प्रगट हो गया है। जहाँ न वाणी है, न रोग हैं, न व्याधियाँ हैं, क्योंकि ये सब चीजें शरीर के आश्रित होती हैं। जहाँ मात्र आत्मा ही उत्कृष्ट अथवा केवलरूप से सुशोभित हो रहा है। ऐसा वह आत्मा ज्ञानमूर्तिरूप-ज्ञानशरीरी है, विभु-व्यापक है अर्थात् वह तीनों लोकों में और अलोकाकाश में भी भले ही आत्मप्रदेशों के रूप से नहीं किन्तु ज्ञानरश्मियों से व्यापक है। उस अविनश्वर नित्य पद का आश्रय प्राप्त करने वाले उपमा रहित सिद्ध परमेष्ठी भगवान हमारी, तुम्हारी एवं सभी की रक्षा करें।

इस प्रकार द्वितीय स्थल में अनाहारक जीवों की स्थिति का कथन करने वाले चार सूत्र पूर्ण हुए।

इस प्रकार श्री षट्खण्डागम ग्रंथ में क्षुद्रकबंध नाम के द्वितीय खण्ड में एक जीव की अपेक्षा कालानुगम में गणिनी ज्ञानमती माताजी द्वारा रचित सिद्धान्तचिंतामणिटीका में आहारमार्गणा नाम का चौदहवाँ अधिकार समाप्त हुआ।